रविवार, दिसंबर 07, 2014

देश-विदेश


मास्टरजी ने बच्चों से पूछा, "अंटार्कटिका कहाँ है?"
बालक चुप।
"एंडीज़ पर्वत श्रृंखला किस किस देश से होकर निकलती है?"
बालक चुप।
"बाल्टिक सागर की लोकेशन बतायेगा कोई?"
बालक चुप।
मास्टरजी ने खूब डाँटा, "सुसरयो, घर में पड़े रहे हो और आँख फ़ोड़ो हो टीवी, कंप्यूटर में। थोड़ी घणी बाहर की जानकारी भी रख्या करो।"
फ़त्तू ने डरते डरते एक प्रश्न पूछने की अनुमति माँगी, "मास्टर जी, आप बता सको हो कि मलखान कौन सै?"
मास्साब ने सोचा और उसीसे पूछा, "कौण सै मलखान?"
फ़त्तू बोला, "मास्साब, गोभी खोदन लग रया सै थारी। थोड़ी-घणी घर की भी जानकारी रख्या करो।"
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नेपाल में ये शानदार स्वागत हुआ, अमेरिका-आस्ट्रेलिया लूट लिया, सारी दुनिया से लोहा मनवा लिया।

कोई शक नहीं कि इससे हमारा भी सिर गर्व से ऊँचा हुआ है लेकिन परधान मास्टर जी, हमारी समझ

में घर का ध्यान पहले रखना चाहिये। कोई शक नहीं कि हमारी सोच और जानकारी और आपकी

सोच और जानकारी एक बराबर नहीं हो सकती। इसमें भी कोई शक नहीं  कि फ़ेसबुक पर हमारे 

लिखने से आप तक ये बात पहुँचने वाली भी नहीं लेकिन आप अपने ’मन की बात’ रेडियो पर कर सकते 

हैं तो हम भी अपने ’मन की बात’ तो यहाँ करेंगे ही। छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले, कश्मीर में

सीरियल अटैक - इन सब पर अमन के दुश्मनों की बौखलाहट, चुनाव में भारी मतदान से उनका चिढ़ना,

भारत को उकसाने की कोशिशोंं जैसे बयान कोई  सांत्वना नहीं पहुँचा रहे हैं। हमारे जवान पहले भी मर

 रहे थे, अब भी मर रहे हैं। इनका जान देना ही नियति है तो फ़िर कोई  सरकार हो, कोई फ़र्क नहीं पड़ना। 

वर्दी पहन लेने भर से कोई किसी का भाई, बेटा, पति, पिता होने से मुक्त नहीं हो जाता।


अपने लोगों की लाशों पर नहीं चाहिये हमें सारी दुनिया का सम्मान और वाहवाही। करिये बहिष्कार 

हर उस सम्मेलन का और हर उस कांफ़्रेंस का जिसमें देश के दुश्मनों की भागीदारी होती हो फ़िर वो

चाहे देश के बाहर के हों या अंदर के। ये सोच सोच कर दिमाग खराब हुआ पड़ा है कि मानवाधिकार क्या

सिर्फ़ आतंकवादियों के होते हैं या इन शहीदों के भी कोई अधिकार होते हैं?

रविवार, नवंबर 23, 2014

बैठे-ठाले

बहुत छोटा था, उन दिनों की बात है कि पिताजी अपना मकान बनवा रहे थे इसलिये चार छह महीने के लिये किराये पर रहने की नौबत आ गई थी। इस झमेले में बड़ों को कितनी भी असुविधा होती हो लेकिन अपने लिये ये एक नई दुनिया थी। स्कूल से लौटकर आता और खाना लेकर छत पर भाग जाता। उस मकान के साथ लगते खेत थे और छत से रेलवे लाईन साफ़ दिखती थी, मुश्किल से दो सौ मीटर दूर।  गाड़ियों की उतनी आवाजाही नहीं थी लेकिन कोयले वाली गाड़ी जब छुकछुक करती आती थी और आसमान में धुंए की लकीर छोड़ती चली जाती तो बहुत अच्छा लगता था। सवारी गाड़ी की जगह जब मालगाड़ी आती थी तो वो ज्यादा अच्छी लगती थी, वजह शायद यह हो कि मालगाड़ी की लंबाई ज्यादा होती है। लेकिन ऐसा भी नहीं था कि सिर्फ़ छुकछुक की आवाज और आसमान में धुंए की लकीर ही अच्छी लगती थी क्योंकि सबसे अच्छा तब लगता था जब ’रथ’ आता था।  ’रथ’ नाम हमने रखा था पटरी पर चलने वाले उस वाहन का जिसपर लाल रंग की एक झंडी टंगी रहती थी, उसपर कुछ लोग बैठे होते थे और दो लोग दौड़ते हुये धक्का लगाते थे। पटरियों पर पड़ते उनके सधे हुये कदम और रथ के गति पकड़ लेने पर उनका कूदकर रथ पर बैठ जाना बिल्कुल वैसा लगता था जैसे कोई योद्धा तलवार भाँजते-भाँजते सुयोग  देखकर अपने घोड़े पर सवार हो जाते हों। बाद में पता चला कि वो ट्राली थी जिसपर बैठकर रेलवे के इंजीनियर लोग जिन्हें PWI कहा जाता है, रेल पटरी की सुरक्षा जाँच करते थे। "बड़े होकर क्या बनोगे" हमसे ये सवाल किसी ने पूछा ही नहीं वरना मेरा जवाब ’रथ को धक्का देने वाला’ होता और किसी कारणवश इस पद के लिये योग्य न माना गया तो दूसरा विकल्प होता,  ’मालगाड़ी का गार्ड’  -   नो थर्ड ऑप्शन। लेकिन कुछ समय बाद हमारा अपना मकान बन गया और यहाँ से रेलवे लाईन दिखती नहीं थी तो निश्चय धूमिल हो गया।

मेरा ख्याल है कि ’मारुति’ के पदार्पण के बाद ही एक आम आदमी कार मालिक होने का ख्वाब देखने लगा होगा, उससे पहले कार हम लोगों के लिये एक ’आकाशकुसुम’ ही थी।  खैर, हम इतने आम भी नहीं थे इसलिये कार के बारे में बेकार नहीं सोचते थे। कुछ बड़े हो चुके थे, कैरियर के बारे में कभी-कभार सोचने लगे थे। सुनते थे कि नौकरी बहुत मुश्किल से मिलती है, सिफ़ारिश लगवानी पड़ती है या चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है तो हथेली में पसीना आ जाता था।  उन्हीं दिनों अखबार  में कुछ रोचक खबरें पढ़ने के बाद और इधर उधर की हाँकने वाले मित्रों के सौजन्य से मन ही मन यह  निश्चित किया गया कि सरकार ने आराम से  नौकरी दे दी तो ठीक है वरना किसी सेठ के यहाँ ड्राईवरी कर लेंगे। उसीकी गाड़ी, उसी का खर्चा और चलाने का मजा हम लेंगे। मजे का मजा और पैसे के पैसे, आम के आम और गुठलियों के दाम।        लेकिन बिना सिफ़ारिश और बिना चढ़ावे के नौकरी मिल गई और ’ड्राईवरी’ मुल्तवी हो गई।

हमारी नजर में एक ही जासूस हुआ था और वो था 007. एक बार तो सोचा कि चलो हम वही बन जायेंगे, 007 नहीं तो 008 या  009 or whatever it is. लेकिन ये बड़ा कठिन लगा। वैसे तो खुद पर विश्वास था कि जेम्स बांड के द्वारा किये जाने वाले मुश्किल दिखने वाले काम, जिन्हें देखने में ही अभी हमारी साँस रुक जाती हो, उनमें तो अभ्यास से ये जड़मत भी सुजान हो जायेगा लेकिन वो जो कुछ भी खा लेने का और कुछ भी पी लेने वाला काम है, उसे सोचकर हमने मन मसोसकर खुद से कहा कि रहने देते हैं भैया, हमसे न होगा।

जीवन के अलग अलग पड़ाव पर कैरियर के बारे में निर्णय बदलते रहे। कभी शिक्षक बनने की सोची, कभी लाईब्रेरियन बनने की, फ़ौज में जाने की भी इच्छा थी। चार्टर्ड एकाऊंटेंट बनने के तो चांस भी बनने लगे थे, एडमिशन भी ले लिया था और आर्टिकलशिप भी साल भर की हो गई थी कि मंडल-कमंडल के रगड़े में ये गरीब आ गया। कहने का मतलब ये है कि हम बहुत कुछ बन सकते थे मगर ये हो न सका। मगर ये हो न सका और अब ये आलम है कि हमने जो बन गया उसी को मुकद्दर समझ लिया और जो नहीं बना मैं उसको भुलाता चला गया।

मैं छोटा था तो कई लोग कहते थे कि He is too mature, आज मैं पैतालीस के लपेटे में हूँ तो मुझे लगता है कि I am too childish. मुझे खुद पता नहीं रहता कि कब मैं एकदम गंभीर हो जाता हूँ और कब एकदम हल्का। गंभीर चर्चा चल रही होती है और मैं ऐसी प्रतिक्रिया दे बैठता हूँ कि सामने वाला चौंक जाये। कभी हँसी-मजाक में भी गंभीरता का पुट, सामने वाला कह देता है कि यार इतने सीरियस भी मत रहा करो। वो अपना माथा पीटते हैं और पता चलने पर मैं अपना, मेरी नीयत तो साफ़ थी।

यूँ तो मनुष्य की आदत है कि जो मिल जाता है उसका मान नहीं करता और जो नहीं मिला उसके लिये दुखी रहता है। यह स्वाभाविक है लेकिन चिंगारी को यार लोगों ने भी भड़का दिया है, सोच रहा हूँ कि कैरियर स्विच कर लिया जाये। हालाँकि वर्तमान में जिस नौकरी में हूँ, तन्ख्वाह ठीक ठाक है और रिटायरमेंट के हिसाब से अभी तो मैं जवान हूँ।  लेकिन परेशानी ये है कि यहाँ काम करना पड़ता है। काम भी करो और काम भी बिना मजे का, बाज आये ऐसी नौकरी से। अब हम ऐसे काम की तलाश में हैं जिसमें पैसे कुछ कम मिलें लेकिन करने में आनंद आये। कुछ ड्रीम कैरियर मैं ऊपर बता चुका लेकिन उनके लिये आयु सीमा निकल चुकी, कुछ विकल्प नीचे बताता हूँ। आप सुझाव देना चाहें तो स्वागत है, कोई भी विकल्प बता सकते हैं। नौकरी करते रहने का, नौकरी छोड़ने का, ये काम करने का, वो काम बिल्कुल न करने का सुझाव, कुछ भी सुझाव चलेगा। लिस्ट को विस्तार देना चाहें तो साथ में सुझाव देने का आपका औचित्य भी बतायें, डबल आभार अग्रिम में। अब इतने स्वागत करने के बाद, अग्रिम में डबल आभार देने के बाद भी  किसी को माथा पीटना पड़े तो किस्मत उसकी, हमारी नीयत तो एकदम साफ़ है।

१.  चूड़ियां पहनाने का धंधा - सीज़नल है लेकिन सदाबहार धंधा लेकिन अपनी भाषा सुधारनी पड़ेगी।

२.  चाट-पकौड़ी का धंधा     -  ये भी सदाबहार है लेकिन मिर्च-मसाला हमें अपने हिसाब से डालने 
                                             की आदत है।

३.   झोटा पालन                -   मुनाफ़े का काम लेकिन दिल्ली छोड़नी पड़ेगी।

४.   धार लगाने का धंधा     -   चाकू छुरियों पर धार लगाने में आगे अच्छा स्कोप दिखता है लेकिन 
                                             अपने हाथ कटने का डर है।

और विकल्पों पर मंथन जारी है.....

अब इतने स्वागत करने के बाद, अग्रिम में डबल आभार देने के बाद भी  किसी को माथा पीटना पड़े तो किस्मत उसकी, हमारी नीयत तो एकदम साफ़ है जी............

गुरुवार, अक्टूबर 23, 2014

दीपोत्सव

महापर्व के दिन हैं तो पिछले दो तीन दिन से  लौटते समय मेट्रो में बहुत भीड़ हो जाती थी। ’नानक दुखिया सब संसार, सारे दुखिया जमनापार’ के रिमिक्स श्लोक के द्वारा  दिल्ली के जिन जमनापारियों का महिमामंडन दशकों से होता आया हो, उन जमनापार वालों की मेट्रो लाईन पर होने वाली भीड़भाड़ च धक्कामुक्की का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं। सिवाय इसके, एक दो फ़ले फ़ूले से दीवाली गिफ़्ट भी हाथ में थे तो माबदौलत ने कल शाम मेट्रो को तलाक-तलाक-तलाक कहकर धुर तक भारतीय रेल से नाता रखने का निर्णय लिया। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हाल और भी शानदार था, खुर्जा जाने वाली गाड़ी का इंतज़ार करते हुये देखा तो जमनापार वालों के साथ उत्तम प्रदेश यानि पुत्तर प्रदेश के बाशिदे भी मनसे के साथ ओवैसी की MIM की तरह हाजिर। संजय कुमार, होर वड़ो..., इससे तो मेट्रो ही ठीक नहीं थी?

ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना? ’व्हेन इन रोम, डू एज़ रोमंस डू’ को याद किया और जमनापारियों की तरह डू’ते हुये यानि कि बाजू, कोहनी, कंधों, पैरों के साथ जुबान का भरपूर इस्तेमाल करते हुये हम भी गाड़ी में चढ़ ही गये। हर तरफ़ उत्सव का प्रभाव दिख रहा है, ज्यादातर सहयात्री पुरानी दिल्ली और आसपास के बाजारों में दुकानों पर काम करने वाले लड़के हैं और उनकी बातें मालिक से मिले उपहार और अपनी अपेक्षाओं के अंतर पर केंद्रित। जो अपने मन में, वो उनकी बातों में - हम सब एक हैं :)

रात के नौ बजने वाले हैं, बाहर नजर जाती है तो आसमान में गहरा अंधेरा। अजीब बात है लेकिन अंधेरा मुझे अच्छा लगता है, गहरा अंधेरा और ज्यादा अच्छा। दूर कहीं कोई रोशनी चमकती है तो बहुत बहुत अच्छा लगता है। 

मन ही मन स्वयं  कन्फ़र्म कर रहा हूँ कि  मैं शायद विरोधाभासों से भरा आदमी हूँ, उत्सवप्रिय  नहीं हूँ लेकिन वैसा भी नहीं जैसों के बारे में कहा जाता है कि ’निर्भाग टाबर त्यौहार के दिन रूसयां करैं।’ खुद बहुत उत्साही नहीं हूँ लेकिन दूसरों को उत्साहित देखता हूँ तो अच्छा लगता है, छोटी खुशियों पर उत्साहित देखता हूँ तो और ज्यादा अच्छा लगता है। जिस खुशी से दूसरों को दुख न होता हो, ऐसी खुशी को देखकर बहुत बहुत अच्छा लगता है।

स्टेशन कितनी दूर है, यह अनुमान लगाने के लिये दृष्टि अंधियारे आसमान से जमीन की तरफ़ लाता हूँ तो आम तौर पर अंधेरों में डूबी रेल पटरी के आसपास की कच्ची-पक्की झुग्गियाँ  रंग बिरंगी रोशनी से नहाई हुईं दिख रही हैं। पीछे की कॉलोनियों में छोटे-बड़े मकानों पर बिजली की चमचमाती लड़ियाँ ऐसा लग रहा है कि अंधेरे से रोशनी की लड़ाई थमी नहीं है बल्कि पूरे उत्साह से जारी है। अच्छा अनुभव हो रहा है, बहुत अच्छा लग रहा है। यही तो है दीप पर्व का असली उद्देश्य, जहाँ अंधेरा है वहाँ रोशनी की जरूरत ज्यादा भी और सार्थक भी।

सच ये भी है कि बीच बीच में ऐसे भूखंड भी आ रहे हैं, जहाँ आज सामान्य से भी कम रोशनी और सन्नाटा है। इन इलाकों से वास्ता रहा है तो जानता हूँ कि ये अंधेरा यहाँ आज ज्यादा गहरा क्यों है। ये भी जानता हूँ कि कुछ जगहों पर अंधेरा हमेशा रहेगा भी हालाँकि ’अंधेरों में जो बैठे हैं, नजर उनपर जरा डालो - अरे ओ रोशनी वालों’ वाली गुहार सुनकर कभी भावुक भी मैं ही होता था।   पहले ही मान चुका हूँ कि अंतर्विरोधों से भरा आदमी हूँ :) लेकिन इन अंधेरों से अब परेशानी भी नहीं होती क्योंकि अंधेरे के अभिशप्तों के अंधेरे की उनकी अभ्यस्तता के अधिकार का सम्मान करना समय ने सिखा दिया है। 

स्टेशन से बाहर निकल रहा हूँ। कुछ साल पहले तक यहाँ झुग्गियाँ थीं, अब पक्के मकान बन चुके हैं तो अच्छा लगा। एक औरत ने जो निश्चित ही किसी अंबानी/अडानी परिवार से नहीं है. मेज का जुगाड़ करके उसपर कुछ मोमबत्तियों के पैकेट और सजावटी सामान बेचने के लिये रखे हुये हैं, देखकर बहुत अच्छा लगा। हर कोई उद्यमशीलता की ओर प्रवृत्त होता दिखे तो बहुत बहुत अच्छा लगेगा। 

अंधकार और प्रकाश का यह प्रतिद्वंद्व सतत है और रहेगा। आप किसके पक्ष में है, यह चुनाव आपने करना है।

आप सबको दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें। हम तो इस वर्ष शायद दीपावली न मनायें लेकिन आप सभी पटाखे, आतिशबाजी आदि का प्रयोग करते समय अपनी व दूसरों की सुरक्षा में लापरवाही कदापि न बरतें।  स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें। 

पुनश्च ’शुभ दीपावली’






रविवार, अगस्त 03, 2014

एक गुंडे का कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट


मोबाईल में अब भी वही गाना बज रहा था ’अपने लिये जिये तो क्या जिये,  तू जी ऐ दिल ज़माने के लिये’ और वो साथ साथ गुनगुना रहा था। मेट्रो स्टेशन से बाहर निकले तो उसके आगे एक लड़की थी जिसके कंधे पर डिज़ाईनर बैग और हाथ में बड़ा सा मोबाईल था। वो यूँ ही सोचने लगा कि मैंने अपना सस्ता सा मोबाईल भी जेब में रखा हुआ है और ये लड़की अपने महंगे मोबाईल को भी हाथ में लेकर चल रही है। फ़िर सोचने लगा कि शायद यही महंगे-सस्ते का अंतर ही प्रदर्शन करने और न करने का कारण है। 

रोज का रास्ता है तो वो जानता है कि आये दिन यहाँ मोबाईल छीनने की वारदात होती रहती हैं। बीच में तो एक टुकड़ा ऐसा भी आता है जहाँ स्ट्रीट लाईट भी नहीं जलती। पता नहीं क्यों, बार बार उसे लग रहा था कि इस लड़की के हाथ में लहराता मोबाईल आज कुछ गुल जरूर खिलायेगा। वो भी मन ही मन संभावित मोबाईल झपट को नाकाम करने के लिये खुद को तैयार करने लगा। बरसों पहले पढ़े जासूसी नॉवल्स की यादें,  विज्ञापनों में देखे अक्षय-सलमान के स्टंट्स, कानों में बजता हुआ गाना सब मिलकर नसों में एड्रेनालाईन उत्पादन असर दिखाने लगे थे। रास्ते के एक तरफ़ दीवार थी तो एक साईड तो कवर हो गई, उसने अपनी पोज़ीशन आगे चलती लड़की के थोड़ा सा पीछे और थोड़ी सी दायीं तरफ़ तय कर ली ताकि पीछे से तो कोई झपटमार न ही आ सके। सामने की तरफ़ से आकर किसी ने हरकत की तो उसे रंगे हाथ पकड़ने के लिये ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। 

लड़की की भी छठी इंद्री शायद काम करने लगी थी, बीच बीच में पीछे मुड़कर देख रही थी। हम्म, मतलब ये कि इतनी बेवकूफ़ नहीं है। आंखों ही आंखों में उसने लड़की को आश्वस्त भी किया कि चिंता मत करना, हम साथ-साथ हैं। एकदम से लड़की रुक गई और कोई नंबर मिलाने लगी। वही जगह थी जहाँ अंधेरा ज्यादा था। अजीब घामड़ लड़की है यार, यहीं रुककर फ़ोन करना था? दोनों के बीच गैप ज्यादा तो था नहीं, अगर चलता रहा तो वो लड़की से आगे निकल जायेगा और जमाने के लिये जीने की सारी प्लानिंग धरी रह जायेगी।  वो भी रुककर बहाने से अपनी जेब टटोलने लगा। लड़की चलने लगी, वो भी चलने लगा। धीरे धीरे अंधेरे वाला हिस्सा पार हो गया और सड़क किनारे बैठे सब्जीवाले और मोलभाव करते ग्राहकों की आवाजें बढ़ने लगीं। यूँ ही कुछ देर के बाद खतरे वाला रास्ता खत्म हो गया, उसे भी सड़क छोड़कर दूसरे रास्ते पर मुड़ना था। उसकी चाल अब कुछ धीमी हो गई थी। मन की हालत अजीब सी थी, अंदाजा गलत होने का थोड़ा सा मलाल भी था और इस बात का थोड़ा इत्मीनान भी कि झपटमारी नहीं हुई ।

दिल के बहलाने को उसको ये ख्याल अच्छा लगा कि लड़की उसे एस्कार्ट करने के लिए थैंक्स कह रही है लेकिन इस ख्याल ने कन्फ़्यूज़ भी कर दिया कि जवाब में’मेंशन नॉट’  कहना ज्यादा सही होगा या ’यू आर वेलकम’ कहना। मुड़ने से पहले एक बार फ़िर उधर देखा तो पाया कि चौराहे पर स्थित पुलिस बूथ पर तैनात कर्मियों से कुछ बात कर रही है। वो अपने घर के रास्ते पर मुड़ गया।

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’ओ भाई साहब, ठहरो जरा" पुलिस कर्मी ने पीछे से आकर रोका और उसे अपने साथ पुलिस बूथ पर ले गया। 

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(आधा घंटा बाद का द्रश्य )

उसकी हालत खराब होती जा रही थी। किसी जानपहचान वाले ने देख लिया कि पुलिसवालों ने पूछताछ के लिये रोक रखा है तो उसका कितना अपमान होगा? घर के लोगों को पता चलेगा तो उन्हें भी कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी। बच्चों को कैसे मुँह दिखायेगा? किस किस को सफ़ाई देगा कि लड़की को गलतफ़हमी हुई होगी? ईमानदारी से सोचकर देखा तो लड़की ने कुछ गलत भी नहीं किया। बिना जान पहचान के अगर कोई सधे कदमों से पीछे आ रहा है तो उसे पीछा करना ही माना जायेगा। हो सकता है कि लड़की ये चैक करने के लिये ही रास्ते में ठिठक कर रुकी हो और उसकी खुद की मति खराब हो गई थी जो वो भी रुककर अपनी जेबें टटोलने लगा था। अब वो खुद पर ही खीझने लगा था, और करो भलाई। अपनी जान पहचान के दो तीन सज्जनों का हवाला पुलिसवालों को दे चुका था लेकिन हैरानी की बात ये हो रही थी कि जिनकी सज्जनता का वो और उसकी पहचान वाले दम भरते थे, उन्हें इलाके के पुलिस वाले ही जानने और मानने से इंकार कर रहे थे।

"अरे भैया, कैसे? क्या बात हो गई?"  कार नजदीक ही आकर रुकी और ड्राईविंग सीट पर बैठे बंटी ने पूछा। 

उसने कहा, "कोई बात नहीं, वैसे ही जरा। तू जा यहाँ से।"  मन ही मन बुदबुदाया, ’इसे कहते हैं कोढ़ में खाज’ इन कठोरों को पता चल गया कि ये दस नंबरी अपना रिश्तेदार है तो वारंट कटे ही कटे। ऊपर से ये और खुश होगा कि भैया भी बड़े नाक वाले बनते थे और लड़कियों का पीछा करने का केस दर्ज होने वाला है।’

दरवाजा खोलकर बंटी बाहर निकला और उसके मना करते करते भी बूथ में घुस गया। पांच सात मिनट तक उन लोगों में ’अबे यार, दिमाग खराब है? भों.... के, ...तिया है क्या?’  होती रही, वो भोंचक्का होकर देखता सुनता रहा। वो हैरानी से ये सब देख रहा था कि तभी बंटी ने बूथ इंचार्ज के कान के पास मुँह ले जाकर कुछ कहा और इंचार्ज जोर से हँसने लगा।  बंटी आकर ड्राईविंग सीट पर बैठ गया, साथ वाला दरवाजा खोलकर उसे भी बैठने के लिये कहने लगा। उसने मुड़कर पुलिस वालों की तरफ़ सवालिया निगाहों से देखा तो वो मुस्कुरा रहे थे, "जाओ भाईसाहब और आईंदा से घणा गोपीचंद जासूस मत न बणियो।"

कार में बैठने लगा था कि वो ठिठक गया। बंटी से कहा, "तू जा यार बंटी, मुझे कुछ काम है।" बंटी हँसने लगा, "ठीक है भैया, किसी ने तुम्हें मेरे साथ बैठा देख लिया तो वैसे भी पता नहीं क्या सोचेगा आपके बारे में। जाता हूँ।"

कार चली गई, वो भी घर जाने के लिये तत्पर हुआ। बूथ इंचार्ज को कहा, "ठीक है सर, थैंक्यू।" फ़िर कुछ याद आया तो उसने पूछा, ’सर, ये बंटी आपके कान में क्या कह रहा था?"

इंचार्ज फ़िर से हँसने लगा, "थारी शराफ़त का सुबूत दे रहा था, बतावे था कि वो एक बार  तेरे धोरे  कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट बनवाण गया था और तैंने मना कर दी थी।" 

घर जाते समय वो सारे रास्ते सोच रहा था कि बरसों पहले उसने कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट देने से मना करके सही किया था या गलत?

घर में घुसते ही जब तक बच्चे देरी का कारण पूछें, उससे पहले ही उसने लड़के से कहा, "यार, मेरे मोबाईल में वो गाना डाल दे ’अपना काम बनता, ....   ..... जनता’        कल से वही सुनेंगे।