शुक्रवार, अगस्त 10, 2012

युगपुरुष

वो किसी राजमहल का सुसज्जित प्रसूति कक्ष नहीं बल्कि कारागार था|  आततायी सत्ता का जैसा प्रभाव बाहर समाज में  था, वैसा ही उस अंधेरी काल कोठरी में भी था| वहाँ  पसरा सन्नाटा बाहर के सन्नाटे का ही सहोदर था| यूं तो सत्ता बहुधा निरंकुशता की ही प्रतीक रही है, रामराज्य अपवाद ही होते हैं लेकिन  निरंकुशता की निरंतरता जब दिनोदिन गहरी और गाढी होती जाती है,  कभी न कभी वह क्षण आता ही है जब अन्धकार भी अपना विस्तार थामने को विवश हो जाता है| यही वह क्षण होता है जब गहन अन्धकार को चीरकर प्रकाश की एक लौ भभकती है,  एक ज्योति प्रज्ज्वलित होती है -  एक अमर ज्योति| यही वह क्षण होता है जब असुरी सत्ता के सर्वनाश का शंखनाद करता  एक युगपुरुष इस धरती पर अवतरित होता है|  

आतंक, अन्याय, दुराचार, शोषण अपने दांतों और नाखूनों से जब  मानवता को नोच खसोट रहे होते हैं, असल में वे अपने पाप का घडा स्वयं भर रहे होते हैं| अपने खोखले उसूलों को क्रूरता का जामा पहनाकर वो सामान्य जन को प्रताडित तो करते दिखते हैं लेकिन असल में वो खुद अंतर में कातर और भयभीत होते हैं और यही कुंठा उन्हें उनके कुकृत्यों के लिए बाध्य करती है| यही वह क्षण होता है जब किसी कृष्ण का धर्म की फिर से स्थापना के लिए आगमन होता है| 

उस कृष्ण का आगमन, जिसने जन-जन में उत्साह का संचार कर दिया| वही साधारण जन जो निरीह और खुद को असहाय मान कर हरदम कमर झुकाए और घुटने टिकाये सत्ता के सामने नतमस्तक होना अपना भाग्य समझते थे, अपनी और संगठन की शक्ति पहचानने लगे| 

परम्परागत आत्मनिर्भर ग्राम्य अर्थव्यवस्था को  बाजारी शक्तियाँ नष्ट करने  लगी थीं|  गाँव देहात में बहुतायत में उपलब्ध  दूध, दही,  घी का दोहन करके दुग्ध सरिता  का रुख नगरों की ओर मोड़ दिया गया  था| बालक कृष्ण ने बाल सुलभ तरीकों से समाज का ध्यान इस तरफ आकर्षित किया|

जल जैसे प्राकृतिक साधन पर कुंडली मारे बैठे कालिया नाग का मर्दन करते कृष्ण ने  अपनी प्राथमिकताएं सिद्ध कर दी| लोकोपयोगी संसाधनों पर बलपूर्वक कब्जा समाज को स्वीकार्य नहीं| 

इंद्र जैसे प्रभावशाली देवता की अपेक्षा गोवर्धन को ज्यादा मान देकर कृष्ण ने फिर से स्पष्ट  किया कि वन, भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधन हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं|

ठेठ बालपन में ही पूतना, वकासुर जैसों और फिर बाद में अग्रज बलराम की सहायता से अपने से कहीं विशालकाय चाणूर, मुष्टिक मल्लों को पराजित करके कंस के अत्याचारों को चुनौती दे दी थी कि अब अन्याय सहन नहीं होगा| 

कालान्तर में कंस वध भी हुआ और शिशुपाल वध भी| और ये सब करते हुए निर्भय कृष्ण कहीं भी अहम प्रदर्शन करते नहीं दिखते बल्कि उनकी निर्भीकता आमजन के लिए अभय का सन्देश और साथ में सखा भाव  लिए थी|  महाभारत के युद्ध में संख्या बल में भारी असमानता के रहते भी पांडवों की विजय संभव हुई तो सिर्फ इसलिए कि श्रीकृष्ण मात्र अर्जुन के रथ के सारथी ही नहीं थे, वरन सम्पूर्ण पांडव पक्ष के सारथी की भूमिका में थे|

त्रेतायुग  में राम  ने  मर्यादाओं के पालन पर जोर दिया, वो उस युग की मांग थी| द्वापर तक आते आते सभ्यता ने कई रंग देख लिए|  द्वापर के इस अवतार कृष्ण  ने आवश्यक होने पर पुरातन मान्यताओं का अंधानुकरण करने की बजाय नए युग की नई मान्यताएं स्थापित कर दीं|  योग और शक्ति के  साथ कूटनीति, राजनीति को मिलाया| 

युगपुरुष किसी एक धर्म, जाति, देश के नहीं होते वरन सम्पूर्ण मानवता के होते हैं क्योंकि उनके द्वारा किये जाने वाले काम व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर सर्वजन के हित के ही होते हैं|.व्यक्तिगत रूप से तो जैसे कष्ट  उठाने के लिए ही अवतार लेते हैं लेकिन फिर भी कोई रुदन नहीं, कोई विलाप नहीं, कोई प्रलाप नहीं|  कर्तव्य हमेशा सर्वोपरि| 

गीता जैसा अनमोल सन्देश विश्व को देने वाले श्रीकृष्ण ने जिस भारतभूमि पर जन्म लिया, वह भूमि धन्य है और हम सब  धन्यभागी हैं|

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर आप सबको बहुत बहुत शुभकामनाएं| 

                                               

रविवार, अगस्त 05, 2012

An interview with Field Marshal Sam Manekshaw


                                                                                                                                                                                 

                                                     

अप्रैल का समय था या अप्रैल जैसा ही था| एक कैबिनेट मीटिंग में मुझे बुलाया गया| श्रीमती गांधी बहुत गुस्से में  और परेशान  थीं  क्योंकि शरणार्थी पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में आ रहे थे|

'देखो इसे, अधिक-से-अधिक आ रहे हैं - असम के मुख्यमंत्री का तार, एक और तार.....से,  इस बारे में आप क्या कर रहे हैं?' उन्होंने मुझसे कहा|

मैंने कहा, 'कुछ भी नहीं, इसमें मैं क्या कर सकता हूँ?'

उन्होंने कहा, 'क्या आप कुछ नहीं कर सकते? आप क्यों कुछ नहीं करते?'

'आप मुझसे क्या चाहती हैं?'

'मैं चाहती हूँ कि आप अपनी सेना अंदर ले जाएँ|'

मैंने कहा, 'इसका मतलब है - युद्ध?'  

और उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं पता, यदि यह युद्ध है तो युद्ध ही सही|' 

मैं बैठ गया और कहा, 'क्या आपने 'बाईबल' पढ़ा है?' 

सरदार स्वर्ण सिंह ने कहा, 'अब इसका बाईबल से क्या वास्ता?'

'बाईबल के पहले अध्याय के पहले अनुच्छेद में ईश्वर ने कहा है -- 'वहाँ प्रकाश हो तो वहाँ प्रकाश हो गया', आपने भी वैसा महसूस किया| वहाँ युद्ध हो, और वहाँ युद्ध हो जाए| क्या आप तैयार हो?...मैं निश्चित रूप से तैयार नहीं हूँ|'

तब मैंने कहा, 'मैं आपको बताऊँगा कि क्या हो रहा है| यह  अप्रैल महीने का अंत है| कुछ दिनों में 15-20 दिनों में, पूर्वी पाकिस्तान में मानसून का प्रवेश होगा| जब बारिश होगी तो वहाँ की नदियाँ सागर में तब्दील हो जायेंगी| यदि आप एक किनारे पर खड़े होंगे तो दुसरे किनारे को नहीं देख सकेंगे| अंततः: मैं सड़कों तक ही सीमित हो जाऊंगा|' वायुसेना मुझे सहायता देने में अक्षम होगी और पाकिस्तानी मुझे परास्त कर देंगे - यह एक कारण है| दूसरा मेरी कवचित डिवीज़न बबीना क्षेत्र में है, दूसरा डिवीजन -याद नहीं आ रहा है-सिकंदराबाद क्षेत्र में है| हम अभी फसल काट रहे हैं| मुझे प्रत्येक वाहन, प्रत्येक ट्रक, सभी सड़कें, सभी रेलगाडियां चाहिए होंगी, ताकि जवानों को रवाना कर सकूं| और आप फसलों को लाने-ले जाने में अक्षम होंगी| फिर मैं कृषि मंत्री श्री फखरुद्दीन अली अहमद की ओर मुड़ा और कहा कि यदि भारत में भुखमरी हुई तो वे लोग आपको दोषी ठहराएंगे| मैं उस वक्त उस समय दोष सहने के लिए नहीं रहूँगा| तब मैंने उनकी तरफ घूमकर कहा, 'मेरा कवचित डिवीज़न मेरा आक्रामक बल है| आप जानते हैं, उनके पास सिर्फ 12 टैंक हैं, जो सक्रिय  हैं?'

वाई..बी.चव्हाण  ने पूछा,  'सैम, सिर्फ 12 क्यों?'

मैंने कहा, 'सर, क्योंकि आप वित्त्त्मंत्री हैं| मैं आपसे कुछ महीनों से आग्रह कर रहा हूँ| आपने कहा, 'आपके पास पैसे नहीं हैं, इसी कारण|'

तब मैंने कहा, 'प्रधानमंत्री जी, सन 1962 में आपके  पिताजी ने एक सेना प्रमुख के रूप में जनरल थापर की जगह अगर मुझसे कहा होता, 'चीनियों को बाहर फेंक दो|'  मैंने उनकी तरफ देखकर कहता, इन सब समस्याओं को देखिये| अब मैं आपसे कह रहा हूँ, ये समस्याएं हैं| यदि अब भी आप चाहती हैं कि मैं आगे बढूँ तो प्रधानमंत्रीजी, मैं दावा करता हूँ कि शत-प्रतिशत हार होगी| अब आप मुझे आदेश दे सकती हैं|'

तब जगजीवन राम ने कहा, 'सैम, मान जाओ न|'

मैंने कहा, 'मैंने अपना मत दे दिया है, अब सरकार निर्णय ले सकती है|' प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं कहा| उनका चेहरा लाल हो गया था| बोलीं, 'अच्छा, कैबनेट में चार बजे मिलेंगे|' सभी लोग चले गए| सबसे कनिष्ठ होने के कारण मुझे सबसे अंत में जाना था| मैं थोड़ा मुस्कराया|

'सेनाध्यक्षजी, बैठ जाईये|'

मैंने कहा, 'प्रधानमंत्रीजी, इससे पहले कि आप कुछ कहें, क्या आप चाहती हैं कि मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य के आधार पर मैं अपना इस्तीफा भेज दूं?'

उन्होंने कहा, 'बैठ जाओ, सैम| आपने जो बातें बताईं, क्या  वे सही हैं?'

'देखिये, युद्ध मेरा पेशा है| मेरा काम लड़ाई करके जीतने का है| क्या आप तैयार हैं? निश्चित रूप से मैं तैयार नहीं हूँ| क्या आपने सब अंतर्राष्ट्रीय तैयारी कर ली है? मुझे ऐसा नहीं लगता है| मैं जानता हूँ, आप क्या चाहती हैं; लेकिन इसे मैं अपने मुताबिक, अपने समय पर करूँगा और मैं शत-प्रतिशत सफलता का वचन देता हूँ| लेकिन मैं सब स्पष्ट करना चाहता हूँ| वहाँ एक कमांडर होगा| मुझे ऐतराज नहीं, मैं बी.एस.एफ., सी.आर.पी.एफ. या किसी  के भी अधीन, जैसा आप चाहेंगी, काम कर लूंगा|  लेकिन कोई सोवियत नहीं होगा, जो कहे कि मुझे क्या करना है| मुझे एक राजनेता चाहिए, जो मुझे निर्देश दे| मैं शरणार्थी मंत्री, गृहमंत्री, रक्षा मंत्री सभी से निर्देश नहीं चाहता| अब आप निर्णय कर लीजिए|'

 उन्होंने कहा, 'ठीक है सैम, कोई दखलअंदाजी नहीं करेगा| आप मुख्य कमांडर होंगे|'

'धन्यवाद, मैं सफलता का दावा करता हूँ|'

इस प्रकार, फील्ड मार्शल के पद और बर्खास्तगी के बीच एक पतली  सी रेखा थी| कुछ भी हो सकता था|
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मेजर जनरल शुभी सूद  की लिखी पुस्तक 'फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ' से साभार|

('सोल्ज़र टॉक : एन इंटरव्यू विद फील्ड मार्शल सैम मानेकशा',  क्वार्टरडेक-1996, इ.एस.ए. द्वारा प्रकाशित, नौसेना मुख्यालय, नई दिल्ली, पृ. 10-11' )


रविवार, जुलाई 29, 2012

हानि-लाभ ....

"जुताई करते करते एक जगह उसका हल जमीन में अटक गया| आसपास खोदने पर पता चला कि कोई कलश गड़ा हुआ है| स्वाभाविक है कि उस कलश में स्वर्ण मुद्राएँ ही थीं| कुछ दिनों के बाद राजा के पास न्याय के लिए एक वाद प्रस्तुत हुआ,  जिस किसान को वो स्वर्ण मुद्राएं मिली थीं, वो उन मुद्राओं को उस व्यक्ति को देना चाह रहा था जिससे कुछ समय पहले उसने जमीन खरीद ली थी| उसका तर्क ये था कि उसने खेती के लिए  जमीन के पैसे दिए हैं, जमीन के नीचे से इस प्रकार मिला अनपेक्षित खजाना उसका नहीं है|  जिस किसान ने जमीन बेची थी, उसका तर्क था कि जमीन के पैसे ले लिए तो वहाँ अब सोना निकले या पत्थर, उसके लिए स्वीकार्य नहीं  हैं|  राजा भी उसी ब्रांड का था, उस खजाने को अपने हवाले करने की बजाय उसने अपने खजाने से कुछ रकम और मिलाई और उस धन से  जनता के लिए एक तालाब का निर्माण करवा दिया|" 

पिछले ज़माने की कोई कहानी है ये, इससे पता चलता है कि विवाद क्या है, ये ज्यादा निर्भर इस बात पर करता है कि साधारण जनता की मानसिकता कैसी है| 
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एक अपना भाई-दोस्त cum दोस्त-भाई है(वे दो भाई हम दो भाईयों के दोस्त हैं तो ये संबोधन दिया है), परसों शाम उसका फोन आया, "भाई साहब, कुछ पैसे एकाऊंट में डालने थे| शाम को आपको दे दूं क्या? मेरा बैंक जाना बच जाएगा|"  मामूली  सा काम था, एक हाँ में अपना काम चल सकता था लेकिन आजकल अपनी आदत हो गई है कि अपने से छोटा कोई मामूली सी बात भी करे तो अपने से सीधा जवाब नहीं दिया जाता| मैंने कहा,  "भरोसा है तो मुझे पैसे पकड़ा दियो|" स्माईली लगाया भी था लेकिन फोन पर दिखा नहीं होगा| खैर, "क्या भाई साहब, आप भी किसी बात करते हैं" वगैरह वगैरह के बाद बात खत्म हो गयी| 

अगले दिन सुबह बैंक के लिए तैयार हो रहा था तो बन्धु आया  और पॉलीथीन से निकालकर  अडतालीस हजार रुपये नकद और तीस हजार का एक बियरर चैक समर्पित करने लगा| जैसे बाबा लोग टाट उठाकर नोट वहाँ रखने का इशारा करते हैं कि हम तो माया को हाथ भी नहीं लगाते, उसी तर्ज पर मैंने भी यही कहा कि यार नोट और चैक पॉलीथीन में ही रहने दे, मैंने हाथ में लेकर  क्या करने हैं?   असल में पॉलीथीन मेरे हिसाब से थी ही बहुत प्यारी|  प्यारी कहने से पॉलीथीन का  उत्पीडन वगैरह होता हो तो इसे  प्यारा भी मान  सकते हैं, आई मीन प्यारा पॉलीथीन|

खैर हमने  विमर्श को भटकने नहीं देना है, इसलिए मुद्दे पर आईये| आजकल प्रायः सभी बैंक, सिवाय वोट बैंक के, ओनलाईन और सेंट्रलाईजड हैं और उस दिन सुबह से नेटवर्क फेल्योर के चलते काम ठप्प था| क्लियरिंग वगैरह  कुछ काम बहुत टाईमबाऊंड रहते हैं, तय किया गया कि कुछ फाईल्स किसी दूसरी ब्रांच से जाकर लाई जाएँ और बहुत जरूरी वाला काम निबटाया जाए| दुल्हन को उसके मायके से लेकर आना हो तो क्या दूल्हा, और क्या दूल्हे के भाई, यार दोस्त सब के सब भाईचारा निभाने को तत्पर रहते हैं लेकिन लेकर आना था फाइल को, काम के ढेर को तो फिर कौन जाएगा? जो बहस से बचता हो, वही न? आप  सब बहुत  समझदार हो  वैसे:)

अपनी ब्रांच में काम ठप्प था और दूसरी ब्रांच में जाना ही था तो सोचा कि भाईदोस्त वाले  पैसे वहीं जमा करवा दूंगा, अब तक पॉलीथीन में रखे थे| उसी पॉलीथीन में कुछ दुसरे जरूरी कागज रखे, पैन ड्राईव डाला और पानी की बोतल रख ली और चल दिए हम अपने दोपहिया वाहन पर| मैंने चैक किया भी कि गौर से देखने पर नोट चमक रहे थे लेकिन फिर सोचा कि कौन इतने गौर से देखेगा? और चीजें थोड़ी है बाहर देखने को, जो मेरी बाईक से टंगी पॉलीथीन को आँखे फाड फाडकर कोई देखेगा?  दूसरी ब्रांच में जाकर पॉलीथीन फिर से अपने साथ ले गया, जहां बैठकर काम कर रहा था अपने सामने ही ज्यादा से ज्यादा एक डेढ़ फुट की दूरी पर टांग  दी| करीब आधा घंटा उस ब्रांच में रहा, वहाँ भी भीड़ बहुत थी और इस बीच मेरी ब्रांच से भी फोन आ चुका था कि  वर्किंग शुरू हो गई है तो सोचा कि अब पैसे अपनी ब्रांच में जाकर ही जमा करवा  दूंगा|

कई बार घटा बढ़ा कर बोलता हूँ, आज नहीं बोलूंगा, पहले की ही तरह नोट भी पॉलीथीन में थे, कुछ दुसरे सरकारी कागज़ भी(बिना किसी फाईल के), पैन ड्राईव भी और पानी की बोतल भी| मैं आकर बाईक पर बैठ गया, स्टार्ट कर दी फिर दिमाग में अचानक ही एक ख्याल आया कि पैसे इस पॉलीथीन में से निकालकर जेब में रख लिए जाएँ तो क्या बुराई है? पता नहीं उस एक हल्की सी सोच में क्या असर था कि मैंने वहीं  बैठे पॉलीथीन के अंदर ही हाथ डालकर नोटों के पैकेट को और चैक को एक कागज़ में लपेटा और उसे शर्ट  के हवाले कर दिया| मेरी ब्रांच के पास वाली लालबत्ती पर पहुँच गया था तो एकदम से कुछ गिरने की आवाज आई, देखा तो पॉलीथीन से पानी की बोतल गिरी है|  जब तक झुककर उसे पकडता वो लुढकती हुई दूर चली गई थी, और इधर ग्रीन लाईट हो गई थी| हाय री दिल्ली की भीड़ भरी सड़कें,  जाने वाली को रोक भी न सका मैं बेचारा| रुकती तो खैर क्या,  बस अपनी तसल्ली  हो जाती कि हमने अपनी कोशिश कर ली :) 

 ब्रांच में आकर देखा तो पॉलीथीन के तले  वाले हिस्से में दिनों किनारे लगभग एक चौथाई तक कटे फटे हुए हैं| प्रथमदृष्टया ये चूहों का काम लगता है, विस्तृत  जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेजने की सोच रहा हूँ, ज्यादा शोर शराबा होने पर  कोई आयोग वायोग भी खड़ा किया जा सकता है| 

कुल जमा नुक्सान हुआ है एक पैन ड्राईव, एक पानी की बोतल और हाँ,  वो प्यारा\प्यारी सी पॉलीथीन भी अब किसी काम की नहीं रही| घाटे वाली अर्थव्यवस्था को एक और झटका झेलना पड  गया, उस पर तुर्रा ये कि हमारे गार्ड साहब, सफाईकर्मी, चायवाला और उनके कंधे पर बन्दूक रखके दफ्तर के दूसरे साथी भी जोर डाल रहे हैं कि पार्टी दी जाए| हमारा इत्ता नुकसान हो गया और लोगों को पार्टी की सूझ रही है, कहते हैं कि तीन चार सौ के घाटे को रोने की बजाय अठहत्तर हजार बच गए, उस पर ध्यान देना चाहिए| अगर ऐन  वक्त पर दिल की आवाज  न सुनता और नोट भी पॉलीथीन में ही रहने देता तो होता असली नुक्सान|  वाह जी वाह, अपने दिल की बात क्यों न सुनता? और अगर नोट गिर ही जाते तो सबसे ऊपर लिखी कथा चेप देता दोस्त-भाई के सामने कि देख कैसे कैसे उच्च आदर्श रहे हैं हमारे सामने| पता नहीं मानता या नहीं:)

अब सवाल उठ रहा है कि घाटा हुआ या  इसे फायदा समझूं?  एक साथी हरदम सुनाते रहते थे  कि शेयर मार्केट के चक्कर में डेढ़ लाख का घाटा खा चुके हैं| एक दिन फुर्सत थी, मैं घेरकर बैठ गया| पता चला कि जो शेयर उन्होंने एक लाख में खरीदे थे वो एक लाख पचास हजार में बेचे| मैं  कामर्स का विद्वान  रहा होता तो इस खेल में डेढ़ लाख का घाटा निकाल ही नहीं सकता था, कुरेदने पर साथी ने बताया कि शेयर मार्किट की ऊंचाई के समय में उनके शेयर्स की कीमत ढाई लाख तक पहुँच गई थी लेकिन उन्होंने नहीं बेचे थे, इस तरह से डेढ़ लाख का घाटा होना सिद्ध हुआ|  मजा आता है ये सब देख देखकर, नफ़ा-नुकसान, उपदेश देने-लेने में कैसे पैमाने बदलते हैं| 

कभी आपके साथ भी ऐसा हुआ है  कि अंदर से कुछ आवाज आई हो और ......?


                                                                       

                                                          
                                                   






बुधवार, जुलाई 25, 2012

खिचडी.......


                                                            

(डिसक्लेमर - अपना इस पोस्ट में सिर्फ नमक है, आटा पीढ़ियों का है| कहाँ आटा  है और कहाँ नमक, ये अब मुझे भी नहीं पता|)


एक लड़के  का पेट कुछ गड़बड़ कर रहा था, उसकी मां ने उसे एक वैद्यजी के पास जाने को कहा| वो गया और अपनी समस्या बताई| वैद्यजी ने निरीक्षण करने के बाद उसे कहा कि कोई विशेष बात नहीं है, कुछ खाने पीने में लापरवाही के चलते पेट खराब हुआ है, घर जाकर खिचडी बनवाकर खा लेना, ठीक हो जाओगे| अब वो ठहरा पुराने टाइम का और पुराने स्टाइल का बन्दा, जिसे सिर्फ खाने से मतलब रहता था|  'चूल्हा चौका संभाले घर की औरतें' मानसिकता वाला था तो उसे खिचडी के बारे में कुछ मालूम नहीं था| वैद्य जी से बार बार पूछने लगा तो उन्होंने कहा कि तुम्हारा काम सिर्फ इतना है कि घर जाकर अपनी मां से यह कहना कि खिचडी खानी है, वो समझ जायेगी| 


अब वो चल दिया अपने घर को, और कहीं उस डिश का नाम न भूल जाए इसलिए 'खिचडी-खिचडी' का जाप करता घर को चल दिया| अब रास्ते में पता नहीं उसने शेर देख लिया कि कोई हिरनी, ये कन्फर्म नहीं है लेकिन अब वो खिचडी की जगह 'खाचिडी-खाचिडी'  बोलता जा रहा था| कोई किसान अपनी पकी फसल की रखवाली कर रहा था और ये उसे देखते हुए अपने उसी मंत्र पाठ में जुटा रहा| किसान को आया गुस्सा, उसने सोचा कि मैं तो हलकान हुआ जाता हूँ इन चिड़ियों को भगाते-भगाते और ये उन्हें  'खाचिडी-खाचिडी'  कहकर उकसा रहा है| किसान उकस गया और उस लड़के की छित्तर परेड कर दी| फिर उसे समझाया कि  'खाचिडी-खाचिडी' नहीं बल्कि  'उड़चिडी- उड़चिडी' बोल|  

उसने फिर से रास्ता नापना शुरू किया, अब बोल रहा था   'उड़चिडी- उड़चिडी|'  कुछ आगे गया तो एक बहेलिया जाल बिछाए और दाना गिराये  बैठा था| काफी देर से खाली बैठा था और इसकी 'उड़चिडी- उड़चिडी' सुनकर उसने बोहनी न होने का जिम्मेदार इसे मान लिया|  जाल समेट लिया गया और बालक की फिर से हो गई  छित्तर परेड|  बहेलिये का आज का दिन खराब हो चुका था तो आगे के लिए उसे ऑर्डर मिला कि 'ऐसा दिन कभी न आये' का जाप करना है| 

आज्ञाकारी बालक फिर से चल पडा और आगे चलकर एक और कामेडी-cum- ट्रेजेडी उसका इंतज़ार कर रही थी| किसी अभागे  की घुडचढी हो रही थी, बालक के मुंह से   'ऐसा दिन कभी न आये' सुनकर घोड़ा या दूल्हा या दोनों ही न बिदक जाएँ, इस आशंका से बाराती बिदक गए और बालक के साथ CP once more  हो गई|  नया हुकम हुआ 'ऐसा सबके साथ हो' रटने का|


अगले पड़ाव पर किसी की शमशान यात्रा की तैयारी हो रही थी| बालक-उवाचम श्रवणयन्ति , मुर्दे को वहीं छोड़कर भीड़ ने  उस बेचारे मरीज को अधमरा कर दिया गया|  लंगडाता-कराहता वो घर पहुंचा तो उसकी मां ने सारी कहानी सुनकर उसको तो नहीं पीटा, अपना माथा पीट लिया|

इस कथा से बालक ने ये सबक सीखा कि वैद्य से इलाज करवाना बड़ा कष्टकारक होता है|

लोककथा है, लगभग सभी ने पढ़ सुन रखी होगी| ये जरूर हो सकता है कि अब भूल गए होंगे,  मुझे बहुत पसंद रही  हैं ऐसी कहानियां|  आजकल शायद इनका कथन श्रवण कम हो गया है फिर भी आशा तो कर ही सकते हैं  कि जैसे सबके दिन बहुर रहे हैं, इनके भी बहुरेंगे:)  

ब्लॉग सक्रियता बनाए रखने के लिए आज इस से अच्छी, शानदार, सार्थक  कोई और बात सूझी नहीं और हमने एक साधारण सी कहानी याद करने-कराने  की कोशिश कर ली|  हाजमा ठीक रखियेगा, आपको पसंद आयें न आयें लेकिन  आती रहेंगी ऐसी पोस्ट्स|    इस बहाने अपनी भी तैयारी होती रहेगी, काहे से कि आने वाले समय में नाती-पोता(he+single+single)  को कहानी सुनाने का डिपार्टमेंट  भी अपने ही जिम्मे आएगा:)