गुरुवार, जून 27, 2013

केदारनाथ

जून माह के मध्य में देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तरांचल में भारी बारिश, बादल फ़टने की प्राकृतिक घटनाओं के चलते हुई विभीषिका ने  समस्त देश को हिलाकर रख दिया है। ऐसी आपदाओं के होने के कारणों पर, उनसे बचाव\पूर्व-पश्चात प्रबंधन पर हमारे विचार अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन किसी भी परिपक्पव मनुष्य की पहली प्राथमिकता स्थिति को सामान्य करने की होनी चाहिये।  आपदा प्रबंधन में सेना\आईटीबीपी के अतुलनीय योगदान ने फ़िर बहुत से लोगों को बचा लिया नहीं तो हानि की मात्रा बहुत ज्यादा होती।  अपने परिवार में या परिचय में एक की भी असमय मृत्यु हमें शोकाकुल कर देती है, यहाँ तो हजारों की संख्या में नागरिक असमय काल के गाल में समा गये। वास्तविक हानि का  अब तक अनुमान नहीं लगाया जा सका है।

दूसरी तरफ़ इन दुर्घटनाओं से भी अपने आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक हित साधने वालों की कोई कमी नहीं है    और ये काम इतनी सधे तरीके से किये जाते हैं कि इनकी तह तक पहुँचना बहुत आसान नहीं रहता। ब्लॉगर भाईजान अपने सेक्रेटरी पर बात डाल सकते हैं या प्रतिष्ठित अखबारों पर डाल सकते हैं, मीडियावाले अपने से भी ज्यादा प्रतिष्ठित जर्नलिस्ट्स पर डाल सकते हैं, विकल्प असंख्य हैं। ऐसे जुझारू लोग ही इस और इससे पहली पोस्ट के सरोगेट फ़ादर हैं, हम जैसों के प्रेरणास्रोत हैं। वो खुद भी बाज नहीं आते और समय समय पर हमारे अंदर का कलुष भी निकलवाते रहते हैं। 

पीछे वाली पोस्ट से आगे बढ़ते हुये एक बार ’हारम’ एग्रीगेटर पर most viewed articles के अंतर्गत पहले\ दूसरे नंबर पर चमकती रही एक पोस्ट का स्नैप शॉट(एडिटिड वर्ज़न) देख लें। एडिशन में शब्दों के साथ मैंने कोई छेड़्छाड़ नहीं की है, मेरी समझ में जितना कुछ बात करने लायक है, उसे आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
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’महिलाओं की आबरू’ और ’उनकी आबरू पर हमला’ पर जो लिंक दिया गया है, वो वही है जो लिंक मैंने पिछली पोस्ट पर दिया था और  उत्तराखंड में हुई त्रासदी से इसका संबंध पूछा था। मुझे दोनों में कोई संबंध नहीं दिखा था तो सोचा आप से मार्गदर्शन ले लूँ।  हो सकता है आपके चश्मे का रंग मेरे चश्मे से अलग हो और कुछ ऐसा दिख जाये जो मुझे नहीं दिख रहा था लेकिन इस मामले में आप सब भी मेरी तरह ’ऐंवे-से’ ही निकले।

सिर्फ़ ऊपर वाली पोस्ट और उसमें दिये लिंक ही नहीं, अंग्रेजी की कई पोस्ट्स भी देखीं जिनमें महिलाओं के साथ बलात्कार होने की बात कही गई लेकिन लेखक ने जिक्र किया कि उन्होंने किसी से ऐसा सुना है। नुकसान तो दूसरे प्रांत के लोगों के साथ  उत्तरांचलवासियों का भी हुआ है बल्कि उनका ज्यादा हुआ है। लूटपाट और बलात्कार वाली घटनायें जानकर मैं सोच रहा था कि भूखे-प्यासे लोग, जिनकी खुद की जान पर बनी हुई है वो क्या ऐसी हरकतों में शामिल हो सकते हैं? डाक्टर, वैज्ञानिक, मनोविशेषज्ञ इस बात पर ज्यादा अच्छे से बता सकते हैं। 

मेरे खुद के एक कुलीग और बहुत अच्छे मित्र इसी क्षेत्र के रहने वाले है। उस दिन दूसरी ब्रांच से एक दूसरे  गढ़वाली मित्र किसी काम से आये तो उन दोनों की बातचीत में इस बात को लेकर बहुत फ़िक्र थी कि कैसे उनके क्षेत्रवासियों का नाम ऐसी दरिंदगी भरी घटनाओं में सामने आ रहा है। अपनी दौड़ नेट तक है तो  मैंने घर आकर नेट पर ऐसी खबरों की वास्तविकता जाननी चाही।  वाकई कई पोस्ट्स दिखीं लेकिन जब विस्तार में जाकर पढ़ा तो कुछ और ही पाया। ऐसा नहीं कि लूटपाट नहीं हुई होगी या वो जस्टीफ़ाईड है लेकिन इस आड़ में भ्रामक दुष्प्रचार करना केवल सनसनी पैदा करने की ललक है या इसके पीछे हैं कुटिल इरादे, इस पर सबके अपने अपने ख्याल हो सकते हैं। 

हो सकता है औरों को ये सब बातें बहुत बड़ी न लगती हो लेकिन सबके पैमाने भी तो एक से नहीं हो सकते।  मुझे भी कई बार लगता है कि कुछ बातों पर मेरी प्रतिक्रिया अजीब सी होती है,  लेकिन अंतत: तो मैं खुद के प्रति ही जवाबदेह हूँ और मुझे यही ठीक लगता है कि इस बात की तरफ़ अन्य इच्छुक मित्रों का ध्यान भी जाये। हो सकता है समय की कमी या किसी और वजह से वो इधर न देख पाये हों या फ़िर यह कि हो सकता है कि इस बहाने से मुझे ही इस घटना को मेरे किसी अनदेखे कोण से देखने का अवसर मिल जाये।

हाँ, एक बात जरूर कहना चाहता हूँ कि शब्दों का जीवन मानव-जीवन से कहीं ज्यादा लंबा है और प्रभाव असीमित। बहुत बार एक शब्द या एक वाक्य भी जीवन की दिशा बदल देता है।  हम बचपन में कहावत सुनते थे कि ’मारते का हाथ पकड़ सकते हैं लेकिन बोलते का मुँह नहीं।’ आज के समय में इस मुहावरे के आयाम और भी विस्तृत हो गये हैं, बोलने के साथ हमें लिखने की भी आजादी मिल गई है तो सूचनाओं को ग्रहण करने में और भी अधिक सतर्कता की आवश्यकता है।

दैवी आपदा से प्रभावित प्रत्येक जीव तक हमारी संवेदना पहुँचे और उनके दुख का कुछ हिस्सा हम बाँट सकें,  ईश्वर से यही प्रार्थना है। 

मंगलवार, जून 25, 2013

आप कितने बुद्धिमान हैं?

आपने भी जरूर बचपन में ये ट्राई किया होगा। दो लगभग एक जैसे चित्र बने रहते थे और उनमें कुछ अंतर होते थे। दिये गये समय में कौन कितने अंतर ढूँढ पाता है, उसी के आधार पर जीनियस, बुद्धिमान, सामान्य आदि श्रेणियाँ मिल जाती थीं।

आईये बचपन को फ़िर से याद करें लेकिन और भी आसान तरीके से, नीचे दिये लिंक को ध्यान से देखिये और फ़िर इस आसान से प्रश्न का उत्तर देना चाहें तो दे सकते हैं -

लिंक

प्रश्न :       केदारनाथ त्रासदी और इस घटना में साम्यता\संबंध बताईये।

p.s. -कृपया पोस्ट शीर्षक पर न जायें, वो दिखावटी है। शीर्षक होना तो ये चाहिये था कि ’यहाँ सब बुद्धिमान हैं।

गुरुवार, मई 23, 2013

’आस्तिकों का प्याज़’

कल सुबह बैंक के लिये निकल रहा था, माताजी से बाय-बाय कहते ही सुनाई पड़ा, "आजकल लू बहुत चल रही है, जेब में एक छोटा सा प्याज रख ले।" आदत के हिसाब से मैंने नानुकर की तो समाचार सुन रहे पिताजी ने भी मेरे विपक्ष में अपना वोट डाल दिया। उपलब्ध प्याजों में से सबसे छोटा प्याज(जोकि इतना छोटा भी नहीं था),  अपनी पेंट की छोटी सी जेब के हवाले करके मैंने कूच का नगाड़ा बजा दिया।

मेट्रो स्टेशन पहुँचकर बैग  स्कैनिंग मशीन के हवाले किया  और खुद लाईन में खड़ा हो गया। भीड़ के हिसाब से सवारियों के शरीर पर जल्दी जल्दी हाथ फ़ेरते जवान ने पैंट के एकतरफ़ा उभार पर लाकर हाथ रोक दिये। "क्या है ये?"  मैंने जेब से प्याज निकालकर दिखा दिया और आसपास के लोगों के हँसते चेहरे देखकर स्पष्ट करना चाहा कि ये प्याज तो मैं अपनी माताजी का मन रखने के लिये जेब में रखे हुये हूँ। लाईन को रुकी देखकर पास में खड़ा सब-इंस्पेक्टर नजदीक आकर मामला समझने लगा। लाईन में मेरे पीछे खड़े बंदों में से एकाध ने मजाक में कुछ कहा तो हम हिंदुस्तानियों का मनपसंद काम शुरू हो गया - बहसबाजी। तीन लड़कों का ग्रुप था वो, जुट गये मेरी खिंचाई करने पर। वक्त-वक्त की बात है, कभी हम ’संतरे के बीज’ के नाम पर अपने दोस्तों को खींचा करते थे और आज प्याज को मुद्दा बनाकर भाईलोग हमारी खिंचाई कर रहे थे। खिंचाई भी खाज की तरह है, खुद करो तब भी मजा और दूसरा करे तब भी मजा। इस प्रकरण के ज्यादा विस्तार में नहीं जाऊंगा,  कुछ डायलाग्स पेश हैं - 

- भाई साहब नये नये मुसलमान बने हैं, तभी प्याज जेब में रखकर घूम रहे हैं।

- अरे नहीं यार, माताजी ने जबरदस्ती रखवा दिया। कहती हैं कि जेब में प्याज रहे तो लू नहीं लगती।

- और आपने आजके समय में ये बात चुपचाप मान ली? कभी इस बात की टेस्टिंग की है?

- नहीं भाई, मना किया था पहले। वो नहीं मानी, मैंने सोचा कि उनकी बात रख लेता हूँ।

- क्या प्रूफ़ है कि जेब में प्याज रखने से लू नहीं लगती?

- कोई प्रूफ़ नहीं है, मैंने माँगा भी नहीं। मैंने तो ये सोचा कि इसमें नुकसान क्या है?

बातें एकदम क्रम में नहीं हैं लेकिन ऐसी ही बातें चलती रहीं। बातों से बातें निकलती रहीं कि वैसे तो प्याज एक तामसिक गुण वाली वनस्पति है इसीलिये पेटपूजा के अलावा किसी पूजा में इसका प्रयोग नहीं किया जाता। अंधविश्वास, अंधश्रद्धा, लकीरे के फ़कीर, घिसीपिटी मान्यतायें, तर्कशीलता जैसी कई बातें हुईं। एक बंधु ने तो लू पर ही सवाल खड़ा कर दिया कि कैसे मान लें कि लू चलती है? और भी बहुत सी बातें होती रहीं, जिसका जिसका स्टेशन आता रहा वो अपने रास्ते जाता रहा। 

बातचीत में बार बार एक मुद्दा आता था कि सिद्ध कैसे किया जाये? कैसे सिद्ध किया जाये कि लू नाम की कोई शै होती भी है? जो दिखती नहीं, जिसका कोई रंग नहीं, कोई खुशबू नहीं, कोई आकार नहीं - उसके अस्तित्व को कैसे स्वीकार कर लिया जाये?  अगर मान भी लिया जाये कि ऐसी कोई चीज होती है तो फ़िर यह कैसे सिद्ध किया जाये कि जेब में प्याज रखने मात्र से लू से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है? मौके पर तो मुझे बात सूझती नहीं, बाद में सोचता रहता हूँ। जैसे चिडि़याघर का एक गधा किसी दूसरे के सुनाये चुटकुले पर दो दिन के बाद हँसता है। भाई, जब समझ आयेगा तभी तो हँसेगा। मुझे भी सवाल बाद में समझ आये तो बाद में ही जवाब सोचूँगा न?

एक फ़ेसबुक स्टेटस और फ़िर प्रवीण जी की पोस्ट से पता चला कि ब्लॉगजगत के ठहरे हुये पानी में भगवान के नाम पर  थोड़ी बहुत हलचल मची है। बड़ी  बहस में सक्रिय भाग लेने की फ़ुर्सत भी नहीं, क्षमता भी नहीं और सच कहूँ तो इच्छा भी नहीं। तर्क/कुतर्क तो बहुत से दिये जा सकते हैं लेकिन उनसे सस्ती लोकप्रियता के अलावा कुछ और हासिल होता हो, मुझे नहीं लगता। हम तो यहीं लिखकर लू से बचने का जुगाड़ कर रहे हैं। वैसे प्याज पर पहले भी एक पोस्ट लिखी थी लेकिन तब मामला अलग था। तब प्याज महंगाई का पैमाना था, आज प्याज अपने लिये आस्तिकता-नास्तिकता का पैमाना है।    

इस प्रकरण के बाद सोच रहा हूँ कि प्याज को लू से बचाव का सार्थक उपाय मानने वाले और इसे सिर्फ़ एक टोटका मानने वालों में से कौन सही है और कौन गलत? शायद दोनों ही सही हों या दोनों ही गलत या फ़िर दोनों ही सही भी हों और गलत भी हों। वैसे ऐसा भी  हो सकता है क्या? 

किसी का मानना है कि प्याज जेब में रखने से लू नहीं लगेगी, किसी का मानना है कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।  जिसे विश्वास है वो उसपर अमल करे और जिसे विश्वास नहीं है वो न करे, यहाँ तक स्वीकार्य। अब अगर विश्वास करने वाला दूसरे की गर्दन पर छुरी रखकर उसे मजबूर करे कि प्याज को जेब में रख या विश्वास न करने वाला ऐसे ही दूसरे को विवश करे कि जेब से प्याज निकाल, तब बात अस्वीकार्य होनी ही चाहिये। जेब में प्याज रख लेने भर को लू से बचने की गारंटी मान लेना शायद मूर्खता ही होगा। दूसरी तरफ़ जेब में प्याज रखने से अगर हर समय मुझे यह अहसास रहे कि लू से शरीर को नुकसान हो सकता है, इसीलिये मैंने यह जेब में रखा है।  और मुझे इस बारे में असावधान नहीं रहना चाहिये तो प्याज के चिकित्सीय गुण उतने न होने पर भी हमें उसका लाभ मिल सकता है। 

जहाँ भी असहमति दिखती है उसकी मूल में ’कुछ होने’ से ज्यादा बड़ी बात ’हम उसे कैसे मानते हैं’ लगती है। मैं ऐसा मानता हूँ, कोई दूसरा कुछ और मान सकता है और इसमें कोई बुराई भी नहीं। बुराई तब है जब हम दूसरों  के अपने से अलग विचारों को सहन भी नहीं करना चाहते। बुराई तब है जब एक या दोनों पक्ष ये चाहें कि सामने वाला उसके हिसाब से ही सोचे और माने। 

बाई द वे, आपमें से कोई हिचकी न रुकने का कोई आसान सा इलाज बता सकता है? बिना दवा वाला टोटका बतायेंगे तो भी चलेगा।  अपना एक अनुभव तो मेरे पास भी है लेकिन घर का मुर्गा तो आप जानते ही हो कि चने बराबर होता है :)

बुधवार, अप्रैल 24, 2013

समय का चक्र

                                                             
                                            (कोणार्क सूर्य मंदिर का एक चित्र, गूगल से साभार)


गाड़ी में उस दिन भाई साहब हमेशा की तरह बोल तो कम ही रहे थे लेकिन चेहरा कुछ ज्यादा ही उतरा हुआ था।  मैंने पूछा तो कहने लगे, "अब आप लोगों के साथ शाम का साथ छूट जायेगा। गरीबी रेखा से नीचे वाले लोगों का सर्वे शुरू हो रहा है, मेरी भी ड्यूटी लगेगी। कम से कम तीन चार महीने तक इसके बाद वाली गाड़ी पकड़ने को मिलेगी।" अनुमान लगाया तो उस अल्पभाषी सहयात्री ने शायद तीन चार महीने की एकतरफ़ा अनुपस्थिति की गणना करके ही इतना लंबा वाक्य बोला होगा, हम भी कुछ उदास तो हो ही गये।

अगले दिन ट्यूबलाईट स्माईल देखकर समझ गया कि ड्यूटी में कुछ बढ़िया सेटिंग हो गई है, कुरेदने पर उन्होंने बताया कि उनके बॉस ने सर्वे के एरिया बाँटने की ड्यूटी उन्हें ही सौंप दी थी और उसका फ़ायदा उठाते हुये उन्होंने शहर की एकमात्र पोश कालोनी वाला एरिया अपने नाम लिख लिया था। अब पोश एरिया में कितने  BPL वासी होंगे?  चहकते हुये बताने लगे कि हमारी शाम वाली कंपनी बनी रहेगी, इसलिये खुश हैं। 

कुछ दिन बीतने के बाद भाई साहब खीझे-खीझे दिखने लगे। पता चला कि उस एकमात्र पोश कालोनी\सेक्टर में बहुत से लोग बीपीएल लिस्ट में नाम जुड़वाना चाहते हैं और इस काम के लिये  नेताओं के समझाईश, धमकाईश वाले फ़ोन आ चुके हैं। "तेरी जेब से जायेगा क्या पैसा?" "सरकार की स्कीम सै, सरकार ने ही सरदर्दी लेण दे"  "कोठी में रहे सैं तो फ़ेर के हो गया? कोठी उसके नाम तो ना है न? "इणका हक सै, रुकावट मत बणया कर बीच में। तेरा काम लिस्ट बनाण का सै, बणा दे चुपचाप और खुद भी ठाठ से रह।"   भाई साहब की हालत साँप के गले में छछुँदर जैसी थी, न उगलते बनता था न निगलते। 

बैंक सेवा के दौरान मैंने भी ऐसे कई मामले देखे। अच्छी-अच्छी जमीन जायदाद वाले लोग-लुगाईयों का नाम सरकारी सहायता वाली लिस्ट में रहता था। सोच वही कि मिल रहा है तो ले रहे हैं। एक दिन एक बुढ़िया को गार्ड साहब ने टोका भी, "ताई, तू भी यो पांच सौ रुपये महीने वाली पेंशन लेती है? करोड़ों की जमीन सै तेरे पास, धत्त तेरे की।" ताई ने अनुभव की बात बताई, "बेट्टा, सरकार तो चूण चोकर भी दे तो बेशक पल्ला पसारकर लेणा पड़े,  ले लेणा चाहिये। अपना हक कदे न छोडना चाहिये।"

एक समय था जब कर्तव्य सर्वोपरि था। उसीके पालन की शिक्षा दी जाती थी और उनलोगों के द्वारा दी जाती थी जो खुद कर्तव्यपालन में विश्वास रखते थे। कर्तव्यबोध परिवार, मित्रता, जाति, धर्म, देश, मानवता किसी भी कारक से प्रेरित हो सकता था। मेढ़ बचाने के लिये आरुणि खुद सारी रात बारिश में भीगता रहा तो उसके पीछे गुरु की आज्ञा को कर्तव्य मानने की मानसिकता ही थी। लंका पहुँचने के लिये अथाह जलराशि पार करते मारुतिनंदन हनुमान को जब विश्राम का प्रलोभन मिला तो ’राम काज कीन्है बिना, मोहे कहाँ विश्राम’ स्वामी-मित्र के प्रति कर्तव्यबोध की पराकाष्ठा ही थी। आततायी शासकों को मुँहतोड़ जवाब देने के लिये खुद को और अपने परिवार को वार देना गुरू गोबिंदसिंह जी को देश, धर्म के प्रति अपना कर्तव्य ही लगा था।  उदाहरण अनंत हैं, सैंकड़ो-हजारों और गिनवाये जा सकते हैं, सीमित तो हमारी खुद की लिखने पढ़ने और समझने की क्षमता है। कर्तव्य मार्ग कठिन अवश्य था और ध्यान कर्म पर ज्यादा रहता था, उसके परिणाम की अपेक्षा गौण थी। मान्यता यही थी कि ’कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फ़लेषु कदाचन"।  उस मार्ग पर चलने से यानि प्रत्येक जन के अपने कर्तव्यपालन के प्रति सजग  रहने से समाज के दूसरे घटकों के प्रति कोई अन्याय होने की संभावना बहुत कम थी। 

समय बदलता रहता है, कठिन मार्ग का और भी कठिन लगना स्वाभाविक ही रहा होगा। आज का युग अधिकार का युग है। महिलाओं का अधिकार, श्रमिकों का अधिकार, बाल अधिकार, ग्राहकों का अधिकार और इसके अलावा बहुत से अधिकार बल्कि सबके लिये कोई न कोई अधिकार। किसी किसी के लिये तो एक से अधिक अधिकार भी। प्राथमिकतायें बदलकर कर्तव्यपालन की जगह अधिकार प्राप्ति की हो गई हैं। अपना काम निकलवाने के लिए चाहे जिस अधिकार की दुहाई देनी पड़े, दी जाती है। अपने कर्म से ज्यादा परिणाम पर फ़ोकस है और इसे जस्टिफ़ाई करने के लिये एक लंबी सी अधिकार सूची और अनंत तर्क। परिणामस्वरूप अपनी बात और अपनी आवाज को दमदार तरीके से न उठा सकने वाले अपने अस्तित्व के लिये संघर्षरत और शोषण और अन्याय को झेलने के लिये अभिशप्त हैं।

समय का चक्र चलता रह्ता है, ’रामकाज कीन्है बिना मोहे कहाँ विश्राम’ से लेकर ’ये लो अपनी कंठीमाला, भूखे भजन न होय गोपाला’   और  ’कर्मण्येवाधिकारस्ते ....’ से  चलकर ’साड्डा हक, ऐत्थे रख’  तक के सफ़र की मुझ समेत आप सबको बधाई। हमारे आपके योगदान के बिना ये पड़ाव इतनी सहजता से शायद न आता।  आगे समय का चक्र किस पड़ाव पर ले जाकर पटकेगा, देखते रहेंगे..... हम लोग।