शनिवार, फ़रवरी 22, 2025

ऑफिशिएटिंग अवार्ड

 एक सीनियर सहकर्मी थे, पूरी नौकरी एक ही पद और एक ही शहर में काट दी। ऐसा नहीं कि योग्य नहीं थे लेकिन शहर नहीं छोड़ना था तो प्रोन्नति न लेने का यह उनका सोचा समझा निर्णय था। आगे बढ़ने से पहले बैकिंग सर्विस की थोड़ी जानकारी भी ले लेते हैं जिससे पृष्ठभूमि समझनी कुछ सरल हो जाएगी। बहुत आरम्भ में ही श्रम संघों ने तकनीकी आधार पर बैंक में चपरासी, गार्ड, सफाई कर्मी तथा क्लर्क, हैड कैशीयर आदि अधीनस्थ पदों पर काम करने वालों को कुछ विशेषाधिकार दिलवा दिए। इनके सर्विस रूल्स आदि केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित समितियों के तय/संस्तुत किए बिंदुओं से पूरी बैकिंग इंडस्ट्री में संचालित होने आरम्भ हुए थे। इन समितियों के अध्यक्ष के नाम पर इन संस्तुतियों को देसाई अवार्ड/पंचाट तथा शास्त्री अवार्ड/पंचाट के नाम से जाना जाता है तथा इसी कारण इनसे कवर होने वाले सभी non-officer कर्मचारियों को पंचाट कर्मचारी अथवा award staff भी कहा जाता है। इसका एक परिणाम यह हुआ कि कुछ मामला बनने पर सरकार तथा न्यायालय आदि की दृष्टि में सभी पंचाट कर्मचारी लेबर की परिभाषा में आते हैं, भले ही उनके वेतन, भत्ते आदि उनके साथ काम कर रहे किसी officer से अधिक क्यों न हों। कालांतर में प्रत्येक पांच वर्ष में प्रबंधन और यूनियन के बीच सहमति से वेतन तथा किए जाने वाले कार्यों पर द्विपक्षीय समझौते होते हैं जिन्हें Bipartite Settlement कहते हैं, बेस इनका वही अवार्ड्स/पंचाट हैं। बहुत गहराई में नहीं जाएंगे अन्यथा इन्हीं गहराइयों मे डूबे रहेंगे, संक्षेप में इतना समझ लीजिए कि नियमानुसार award staff से वही और अधिकतम उतना ही काम और उतने ही समय में करने के लिए कहा जा सकता है जितना यूनियन के साथ उपर्लिखित अवार्डस अथवा  द्विपक्षीय समझौते में निर्धारित हुआ था।

तो प्रेक्टिकली होता यह था कि कोई अर्जेन्ट फोटोकॉपी करवाना है और अधीनस्थ कर्मचारी को कहा जाए कि शीघ्रता से ये दो पेज का फोटोकॉपी करवा लाओ, पता चलता था कि फोटोस्टेट खर्चा दो रुपए और रिक्शा किराये का वाउचर दस रुपए। क्लियरिंग हाऊस जाना है जो 100 कदम की दूरी पर है, लोकल कनवेयेन्स का वाउचर पंद्रह रुपए। इस वर्ग को उनके लिए निर्धारित समय से काम के कारण थोड़ा भी अधिक रोका जाए तो ओवरटाईम। और ये बताने में या पढ़ने में लग रहा होगा कि बढ़ा चढ़ाकर बताया जा रहा है लेकिन यह सामान्य व्यवहार की बात है, एकाध बार मेरा भी वाउचर बना है 😄

लौटते हैं उन सीनियर सहकर्मी वाली बात पर। लोकल व्यक्ति था, सुदर्शन व्यक्तित्व वाला। बैंक क्लर्क होने के कारण भले ही लेबर केटेगरी में आता हो लेकिन कहीं किसी से कम नहीं।

वो भाईसाहब जब तब अपना अवार्ड स्टाफ होने वाला बैज चमका दिया करते थे, 'असी अफसर नहीं हैगे, असी हैगे अवार्ड स्टाफ' 'पंज वजे तक जिन्ना काम होएगा, करांगे', 'ए मेरी ड्यूटी नहीं है, जिम्मेदारी वाला कम्म अफसर दा हुंदा है', 'साइन करवाओ वो पीछे बैठे अफसर से, हम क्लर्क हैं' 'अफसर क्या करते है सारा दिन? चिड़िया ही तो बैठानी होती है, काम तो सारा हम करते हैं'....आदि आदि 

शाखाओं में किसी अफसर के अवकाश पर जाने की स्थिति में सीनियरमोस्ट क्लर्क से उस अधिकारी की सीट पर काम करवाने और बदले में उसे officiating allowance देने का प्रावधान भी होता है। ऐसे दिनों में भाईसाहब ऑफिशिएट करने को उत्सुक रहते थे क्योंकि इसमें वैध तरीके से कुछ अतिरिक्त आय होती थी लेकिन पेंच यह था कि दूसरे अवार्ड स्टाफ प्राय: अवकाश पर जाते थे जबकि शाखा में उन दिनों पोस्टेड अधिकारी बहुत कम अवकाश लेता था। इस कारण ऑफिशिएटिंग अलाउन्स वाले अवसर कम आते थे और डॉयलॉगबाजी वाले बहुत। मैनेजर साहब को आए भी कुछ ही दिन महीने हुए थे तो प्रतिदिन यही डॉयलॉग सुनाई पड़ते थे। एक बार चांस बन गया, अधिकारी गया अवकाश पर और मैनेजर साहब ने ऑफिस ऑर्डर निकालकर भाईसाहब को बैठाया ऑफिशिएटिंग पर। संयोग से पेंशन बँटने का दिन था या ऐसा ही कुछ, उस दिन काम भी सामान्य से अधिक। दोपहर तक ठीक ठाक काम खिंचता रहा। लंच के बाद भाईसाहब ढीले पड़ने लगे। इधर से चैक पास होने के लिए आ रहे, उधर से fd बन्द होने के लिए उनके पास, कहीं से कोइ ड्राफ्ट बनवाने वाला मगज मार रहा, कहीं से पासबुक लेने वाला। पब्लिक डीलिंग बन्द हो गई लेकिन काम समाप्त होने को न आए। एक बार मैनेजर साहब से बोले कि अमुक काम कल के लिए रोक लेते हैं तो सुनने को मिला कि चिड़िया ही तो बैठानी है, बैठा दो। अगली बार कुछ पूछने बताने गए कि इस काम के लिए अधिकारी आ जाएं तो ही सेफ रहेगा, सुनने को मिला कि आप आज ऑफिशिएट कर रहे हो, आज आप ही अधिकारी हो। उधर घड़ी पांच बजाने को आई तो भाईसाहब स्वभाववश बैग सेट करने लगे। इतने में मैनेजर साहब भी बाहर हॉल में आ गए, केबिन से कुछ कागजों का छोटा सा एक गट्ठर लाए थे जो भाईसाहब की टेबल पर रख दिया कि ये रिकन्साइल करने हैं और स्वयं हॉल में ही दूसरी टेबल पर बैठकर काम करने लगे। हॉल में अब तक कोई पब्लिक नहीं बची थी, भाईसाहब दोनों हाथ से सिर थामकर सामने शून्य में ताक रहे थे। दूसरे स्टाफ घर जाने को उठ खड़े हुए। मैनेजर साहब ने भाईसाहब की ओर एक फाइल बढ़ाई, "अरे यार, ये और देखना।"

भाईसाहब थोड़ा सा झल्लाकर बोले, "ये भी?"

एक स्टाफ ने चुहल कर दी, "हाँ भाई, आज तू ऑफिशिएट कर रहा है। अफसर है, अलाउन्स भी मिलेगा।"


(आप आगे पढ़ने जा रहे हैं एक कालजयी संवाद। निवेदन इतना ही है कि सस्ते समय की बात बता रहा हूँ, कुछ उन्नीस बीस हो तो पाठकवृन्द एडजस्ट कर लें)


भाईसाहब थोड़ा सा झल्लाकर बोले, "ये भी?"

एक स्टाफ ने चुहल कर दी, "हाँ भाई, आज तू ऑफिशिएट कर रहा है। अफसर है, अलाउन्स भी मिलेगा।" और मैनेजर से हँसते हुए पूछा भी, "है न सर?"

मैनेजर सहित सब हँस रहे थे।

भाईसाहब सीट से उठे, मैनेजर साहब के सामने जाकर पलट गए। पैंट खोलकर गिरा दी और पीछे देखते हुए अपनी बैकग्राउंड की ओर संकेत करते हुए बोले, "सरजी, पूरे साढ़े छः रुपए का एलाउन्स बनता है आज का। एक ये काम और बच रहा है, इसे भी निबटा ही दो।"

शुक्रवार, अक्टूबर 07, 2022

टुकड़े टुकड़े गैंग ट्विस्ट


मई माह में एक फ्लैट किराए पर लेना था। संयोगवश एक फ्लैट के बारे में सूचना मिली जो लोकेशन, लोकेलिटी व उपलब्ध फर्नीचर आदि के स्तर पर उचित लगा। मुम्बई का सिस्टम ऐसा है कि बिना ब्रोकर के ऐसी बात बनती नहीं और ब्रोकर अपने गांव जो महाराष्ट्र में ही कहीं है, गया हुआ था। पूर्व किराएदार जोकि मेरे सहकर्मी ही हैं, और फ्लैटमालिक की उससे बात फोन पर ही हुई और उसकी सहमति मिलने के बाद फ्लैटमालिक ने अन्य औपचारिकताएं पूरी करके फ्लैट की चाबी दे दी, मैं शिफ्ट हो गया। ब्रोकरेज आदि देने, फ्लैट में बिजली-पानी तथा सोसायटी के अन्य नियम आदि के बारे में बात करने के लिए कॉल किया तो ब्रोकर महोदय ने बताया कि वो बद्री-केदार दर्शन के लिए निकल चुका है और लौटकर भेंट करने आएंगे। अगले दिन व्हाट्सएप्प स्टेटस में श्रीमान जी के माथे पर 'जय बद्रीविशाल' का छापा और पृष्ठभूमि में हेलीकॉप्टर दिख गया। अर्थात बद्रीनाथ दर्शन कर आए थे और अब उनकी केदारनाथ की तैयारी थी। अगले सप्ताह फोन पर समय तय करके मुझसे मिलने आए, रुमाल में लपेटकर प्रशाद भी लाए थे। दर्शन अच्छे होने की जिज्ञासा के उत्तर में मिश्रित प्रतिक्रिया मिली, "बद्रीनाथ धाम में बहुत अच्छे से दर्शन हो गए लेकिन सरजी हम केदारनाथ धाम नहीं जा सके। हेलीकॉप्टर का टिकट मिला नहीं औऱ पैदल जाने का साहस नहीं हुआ।" मैंने भी अपनी दिल्ली(+ पंजाबियों वाली भी) टिपिकल गोली दे दी, "अरे तो क्या हुआ, केदारनाथ के दर्शन हम करवा देंगे। ये भी भला कोई बड़ी बात है?" भोले आदमी ने गोली तुरन्त गटक ली, "पक्का न, सरजी?"

"पक्का।"

अब यह साप्ताहिक कार्यक्रम हो गया कि पिसल भाई का फोन आए और वो पूछे कि कैसे जाएंगे, और कौन होगा, और पक्का न? मैं कहता कि ये सब इतना सोचने का मैटर नहीं है लेकिन है पक्का। महीने भर में पिसल भाई ने जाने की टेण्टेटिव तिथि भी तय कर ली, मुझसे छुट्टी स्वीकृत करवाने और टिकट बुक करवाने के परामर्श भी देने लगे। अब मैं सोचने लगा कि ये भी मुझे सीरियसली लेने लगे!

इस बीच मुझे मेरे नियोक्ता की ओर से फ्लैट एलॉट हो गया और मात्र डेढ़ माह के बाद मैं वह फ्लैट छोड़कर अन्य क्षेत्र में शिफ्ट हो गया। मुझे लगा कि अब केदारनाथ वाली गोली आई-गई हो जाएगी लेकिन पिसल भाई के साथ ये नहीं था, वो गोली को कसकर धँसाए था। आते-आते सितम्बर भी आ गया।

अब तक प्रफुल्ल और सुभाष जी मुम्बई आकर जा चुके थे और संयोग ऐसे बने कि पिसल भाई की इन दोनों से भेंट भी हो गई और उसे यह भी परिचय मिल गया कि हम इकट्ठे अनेक यात्राओं पर जा चुके हैं, भाई का टेम्पो अब higher than high हो चुका था। सम्भावित टूर की चर्चा अब इन दो से भी होने लगी थी। दिल्ली से अपनी गाड़ी द्वारा जाने की हमारी योजना जानकर पिसल भाई बहुत उत्साहित था और अपने साथ अपने एक और मित्र को भी ले जाने का आग्रह कर चुका था।

इधर मेरे विभाग में कार्य सहसा इतना बढ़ गया कि मेरा जा पाना मुझे ही संदिग्ध लगने लगा था। यह बताना रह गया कि बहुत प्रयास करने के उपरांत भी हेलीकॉप्टर के दो टिकट ऑनलाइन उपलब्ध नहीं हो सके थे। मैंने सोच लिया कि मेरा जाना न हो सका तो हरिद्वार से इन दोनों लोगों का पैकेज टूर प्रबन्ध करवा देंगे। इस बीच सुभाष जी ने आश्वस्त किया कि मैं साथ चलूं तो अच्छा ही है अन्यथा वो ही दो मराठों को केदारनाथ धाम के दर्शन करवा देंगे। मराठों को कह दिया गया कि वो 30 सितम्बर दोपहर तक हरिद्वार पहुँच जाएं, उनके हुड़क इतनी थी कि उन्होंने रेल के टिकट तुरन्त बुक कर लिए। उधर प्रफुल्ल ने भी अवकाश का जुगाड़ कर रखा था, अनिश्चित था तो मेरा कार्यक्रम। 

सत्ताईस सितम्बर को जैसे तैसे हाथ पैर जोड़कर मैंने भी 28 सितम्बर से अवकाश की मौखिक स्वीकृति पा ही ली। 29 को घर पहुंचकर फिर से हाथ पैर जोड़ने पड़े और 30 की प्रातः झोला उठाकर हिमालय की ओर निकल लिया। प्रफुल्ल भी अपना ट्रॉली बैग लेकर मेट्रो में मिला और गाजियाबाद से सुभाष जी की गाड़ी में बैठकर हम तीनों चल दिए, चलो केदारनाथ।

मराठों की ट्रेन की स्थिति पर पिछले दिन से ही निरंतर अपना ध्यान था। रास्ते में सुभाष गुरुजी को नाना विधि से बहला-फुसलाकर 'कार को कार ही रहने दो, वन्देभारत न करो' अभियान चलाया गया जो लगभग सफल भी रहा। मराठों की ट्रेन हरिद्वार पहुंचनी थी दोपहर साढ़े बारह, हम पहुंच गए साढ़े ग्यारह। हाईवे पर ही नाश्ता आदि निबटाने तक ट्रेन भी हरिद्वार पहुंच गई थी, नियत समय से कुछ पूर्व ही। गंगा किनारे उनसे भेंट हुई, विधिवत यात्रा आरम्भ करने से पूर्व सबने गंगा जी में स्नान किया और 'हर हर महादेव' कहते हुए चल दिए।


गुरुवार, मई 26, 2022

एक्स्ट्रा वसूली

रविवार को अकेला था तो मैं एलिफेंटा गुफाएं, जो कि मुंबई से कुछ दूर घड़ापुरी नामक टापू पर हैं, देखने चला गया था। वहाँ जाने के लिए गेटवे ऑफ इण्डिया से फैरी चलती है जो लगभग एक घण्टे में उस टापू तक पहुंचा देती है। बालकनी में जाने के पहले ही उनका एक कर्मी खड़ा था जो ऊपर जाकर बैठने के दस रुपए एक्स्ट्रा ले रहा था, मैंने सामान्य प्रैक्टिस समझते हुए दे दिए। बाद में अन्य लोग आए तो एडवांस कलेक्शन सम्भव नहीं रहा होगा, वो ऊपर आकर सबसे दस रुपए लेने लगा। एक दम्पत्ति जिनके साथ एक बच्ची भी थी, फैल गए कि एक्स्ट्रा कुछ नहीं देंगे। उन्हें देखकर एक और जोड़ा भी फैल गया। थोड़ा-बहुत इमोशनल ड्रामा करके उस कर्मी ने फैरी के जैक स्पैरो को आवाज लगाकर कहा, "मास्टर, तीन लोग ये और दो लोग ये पेमेंट नहीं दिया है।" मैंने सोची कि पचास रुपए के चक्कर में शायद बीच समन्दर में जाकर फैरी को हिचकोले खिलवाए जाएं लेकिन मास्टर ने जैकस्पैरोपना नहीं दिखाया। अब जाकर मुझे मेरे दस रुपए का दुःख हुआ। 

लौटते में फैरी दूसरी थी लेकिन कहानी फिर वही, बोले कि ऊपर तले में जाने का दस रुपया एक्स्ट्रा। अबके मैंने काउंटर ऑफर दिया कि दस रुपए मुझे दे दो तो मैं बेसमेंट में चला जाता हूँ। वो नहीं माना, मेरी वैसे भी कोई मानता नहीं है इसलिए मैं इसे ईगो का विषय नहीं बनाता। चुपचाप सामान्य सीट पर बैठ गया। अकेला था इसलिए कोने वाली सीट ले ली, सबसे आगे की सीट। जाते समय की अपेक्षा लौटते समय समुद्र में लहरों की हलचल कुछ अधिक थी।

मैंने टाइटैनिक नहीं देखी लेकिन बढ़िया हवा, पानी की छिटपुट बूंदें मुझे अपनी इस छोटी सी यात्रा का मिलान अमानुष, पाइरेट्स ऑफ द कैरिबियन, वाटरवर्ल्ड, कास्टअवे आदि के साथ करने को पर्याप्त प्रेरणा दे रही थीं। अचानक से फैरी से honking की आवाजें आने लगीं। इनके हॉर्न की आवाज भी अलग तरह की होती है, कुछ-कुछ बिगुल जैसी। वैसे सब जानते होंगे लेकिन मैंने चूँकि इस यात्रा के लिए ताजा ताजा 260₹ + 10₹ अलग से खर्च किए हैं तो ज्ञान छौंकना बनता है कि भले ही ये स्टीमर/फैरी सड़क या पटरी पर न चलकर समुद्र में चलते हों लेकिन इनका एक निर्धारित रुट होता है, सामान्यतः उसी रुट का पालन करना होता है। यह अलग बात है कि यह रुट एकदम से रेल की पटरी या सड़क जैसा फुट/मीटर की बाध्यता नहीं माँगता। इस कारण आने और जाने वाले स्टीमर/फैरी कुछ अंतर से ही एक दूसरे को क्रॉस करते हैं।

अन्य यात्री अपने जोड़ीदारों/सेल्फी आदि में मस्त दिखे लेकिन मैं अकेला था तो सोचने लगा कि लगातार बज रहे हॉर्न के पीछे क्या कारण हो सकता है? यह स्पष्ट समझ आ गया कि सामने वाली फैरी को कुछ संकेत दे रहा है। इतने में इस मास्टर का सहायक फैरी के सबसे आगे के नुकीले हिस्से में जाकर सामने से आ रही फैरी को दोनों हाथ हिलाकर और ऊंची आवाज में रुकने के लिए संकेत करने लगा। कन्फ्यूजन ये हो रहा था कि इधर वाले का हॉर्न सुनकर सामने वाला दूर से ही अपनी फैरी को रुट से अलग ले जाता था। दो केस ऐसे होने के बाद हमारी फैरी वाले ने एक अतिरिक्त काम किया कि हॉर्न देने के साथ स्वयं भी यूटर्न ले लिया। अब लोगों के माथे पर चिंता झलकने लगी। आगे संक्षेप में बताऊं तो जैसे-तैसे इस बार सामने वाले को भी समझ आया कि कोई विशेष बात होगी, दूर से ही इनका हाल्टिंग संवाद हुआ और दोनों फैरी को एकदम निकट लाकर और लगभग रोककर इधर से एक युवक को उधर वाली फैरी में कुदवाया गया। पता चला कि इन साहब को आधे रास्ते में आकर पता चला था कि मोबाईल टापू पर ही छूट गया है। ये सब कवायद इसीलिए थी। मेरा अनुमान है कि हमारे स्टीमर को कम से कम दो किलोमीटर का एक्स्ट्रा रास्ता तय करना पड़ा होगा और समय भी अतिरिक्त लगा। मैंने ऐसे समझा कि मेरे दस रुपए ऐसे वसूल होने थे।

प्रदूषणों में सबसे खराब प्रदूषण मुझे ध्वनि प्रदूषण लगता है विशेष रूप से सड़क पर बजते अनावश्यक हॉर्न लेकिन उस दिन ये आनन्द का कारण बने। जीवन में कुछ उल्लेखनीय न चल रहा हो तो छोटी छोटी बातें भी बड़ी लगती हैं।

शनिवार, अप्रैल 23, 2022

विचित्र चिंताएं

दिल्ली के साथ भी एक विचित्र सा सम्बन्ध रहा है, न हम बंधें और न ही छूट सके। जीवन में दो ही मुख्य उद्देश्य रह गए लगते हैं, दिल्ली में कुछ वर्ष रहो तो 'चलो दिल्ली से' और कुछ वर्ष दूर रहो तो 'चलो दिल्ली।' एक बार पुनः दिल्ली छूट रही है, एक बार पुनः मैं अनिश्चय की स्थिति में हूँ कि प्रसन्न दिखना चाहिए या अप्रसन्न। मेरी चिंताएं भी तो विचित्र हैं, साथी लोग बताते हैं कि मुम्बई में आवास मिलना बहुत कठिन है और मुझे चिंता है कि छाता तो नहीं खरीदना पड़ेगा?

अन्ततः यही तय पाया गया कि देखें आगे क्या होता है। और कुछ नहीं तो इस बार नॉस्टैल्जिक होने का अभिनय भी सीख लेंगे☺️