गुरुवार, अगस्त 25, 2016

मुफ़्तिये भगत

जून माह में निंदक जी और छत्तीसगढ़ वाले ललित शर्मा जी के साथ कुमाऊं जाने का अवसर मिला। पह्ले दिन का ठहराव हुआ रानीखेत से लगभग ४ किमी बाहर एक रिसोर्ट में। अगले दिन सुबह हम कुकुछीना नामक स्थान के लिये चल दिये। रास्ते में द्रोणागिरी मंदिर आया जिसकी स्थानीय निवासियों में बहुत मान्यता है। यह मंदिर सड़क से लगभग १ किलोमीटर अंदर ऊंचाई पर स्थित है। हमारी गाड़ी एक बार पंचर हो चुकी थी तो उस समय की भरपाई हमने सड़क से ही मस्तक नवाकर कर ली, विश्वास रहता है कि हमारे देव बहुत दयालु हैं J
रानीखेत से द्वाराहाट होते हुये कुकुछीना की दूरी लगभग ५५ किलोमीटर है। बहुत छोटी सी एक बस्ती जिसमें प्रवेश करते ही एक गेस्ट हाउस, तय था कि हमें यहीं रुकना है। सामान कमरे में पटककर भोजन किया और बाबाजी की गुफ़ा में जाने के लिये तैयार हो गये। लगभग डेढ किलोमीटर एक बहुत संकरा मार्ग है जहाँ तक कार जा सकती है उसके आगे गुफ़ा तक जाने के लिए खड़ी चढ़ाई है। जहाँ तक कार जा सकती थी गये और फ़िर उतरकर हम तीनों मलंग पैदल चल दिये।
अब तक इस छोटे से रास्ते में न कोई वाहन दिखा था और न कोई मनुष्य। अनुमान से एक तरफ़ चढ़ाई शुरु की तो दूर से एक महिला ने चिल्लाकर हमें सचेत किया कि गुफ़ा के लिए जाना है तो उस रास्ते से मत जाओ, इधर से जाओ। हम उधर चल दिये तो उन महिला ने रास्ते की निशानी बताई और वहीं अपनी झोपड़ीनुमा मकान के बाहर रखी लकड़ियों में से छड़ी जैसी निकालकर दी कि ये ले जाओ, चढ़ाई में काम आयेगी। अकेला परिवार वहाँ पहाड़ की तलहटी में रह रहा था, आदमी बैठा था और महिला कपड़े धोकर सुखाने वाली थी कि उसकी नजर हमपर पड़ी थी और उसने आवाज लगाई। मकान के दरवाजे पर ’यहाँ चाय मिलती है’ लिखा था, चायपान का कार्यक्रम वापिसी के लिये सोचकर और लौटते समय छड़ी लौटाने की कहकर हम चलने लगे।

इस यात्रा का कार्यक्रम अचानक ही बना था। असल में इन दिनों में ललित जी को मोटरसाईकिल पर लेह-लद्दाख जाना था लेकिन अचानक स्वास्थ्य संबंधी कुछ समस्याओं के कारण उन्हें वो कार्यक्रम छोड़ना पड़ा था। वहाँ नहीं जा पाये तो उन्होंने निंदक जी से फ़ोन पर बात की, निंदक जी ने अपने पास बुला लिया कि आप बस गाजियाबाद तक आ जाओ तो आपकी यात्रा की हुड़क मैं पूरी करवा दूँगा। भीतर की बात ये थी कि निंदक जी कई बार मुझे कह चुके थे कि पहली बार ऐसा हुआ है कि पहाड़ों पर जाने में मुझे इतना गैप हो गया, मैं तो इस समय बुरी तरह बेचैन हो रहा हूँ। ऐसे में ललित जी ने जब फ़ोन पर अपनी पीड़ा बताई तो वही बात हो गई कि ’इधर से तो बुआ के मन में जाने की थी और उधर से फ़ूफ़ा लिवाने आ गया।’ अच्छा, मेरा कोई प्रोग्राम था नहीं लेकिन बाद में बुआ कौन और फ़ूफ़ा कौन वाला विवाद न हो इसलिये जनहित में मैं भी साथ में टँग लिया था, मेरे लिये तो भई दोनों ही अग्रज आदरणीय ठहरे।
तो अब पेंच ये फ़ँसा कि जब योगी जी की गुफ़ा के लिए चढ़ाई शुरु करने लगे तो ललित जी को लगने लगा कि तबियत ठीक नहीं है। उन्होंने तय किया कि वो वहीं बैठेंगे, चाय पियेंगे और उन लोगों से गपशप करेंगे। निंदक जी और मैं गुफ़ा की ओर चल दिए। बहुत छोटा सा ट्रैक है लेकिन रास्ता बहुत मनोरम। गुफ़ा तक जाने में रास्ते में दो ग्रुप मिले जो वापिस आ रहे थे। कुछ देर में गुफ़ा तक पहुँच गये, योगदा ट्रस्ट वालों ने उस गुफ़ा को अब एक छोटे कमरे का रूप दे रखा है। हम वहाँ पहुँचे तो अंदर कोई अनुष्ठान चल रहा था, शायद ५-६ तमिल भाषी लोग बैठे थे और मंत्रोच्चारण और पूजा चल रही थी।


गेस्ट हाऊस से चले तो गुफ़ा तक ही आने की सोचकर आये थे क्योंकि दोपहर के बाद खाना खाकर तो हम चले ही थे और हमें यही बताया था कि गुफ़ा और टॉप दोनों जगह जाने का प्रचलित रास्ता अलग अलग है। गुफ़ा के बाहर पूजा करवा रहे लोगों का ड्राईवर बैठा था, उसने कहा कि अगर बहुत थकान न हो रही हो तो शार्टकट से ऊपर भी जा सकते हैं, पहाड़ की टॉप ’पांडुखोली’ या ’पांडवखोली’ कहलाती है और वहाँ एक घास का मैदान और मंदिर भी है। ऐसा माना जाता है कि पाँडव अपने अज्ञातवास के दौरान वहाँ रुके थे। हम ऊपर की ओर चल दिये।
 फ़िर वही वीराना पहाड़ी रास्ता, कहीं कहीं छोटी सी पगडंडी, बीच बीच में पत्थरों पर पेंट का निशान ताकि जाने वाले रास्ता न भटकें। मौसम बता रहा था कि कभी भी बारिश हो सकती है। निंदक जी सरकारी सेवा से निवृत्त हो चुके हैं लेकिन पहाड़ी रास्तों पर चलने के अभ्यस्त हैं और जवानों से भी ज्यादा फ़िट। वो आगे थे, रास्ता पहचानते थे और मैं लक्ष्मण की तरह उनके पैरों को देखकर पीछे घिसटता रहा।

एकदम कैजुअल मूड में हम चढ़ते जा रहे थे, एकाध बार बूँदाबांदी भी हो चुकी थी। बिना रुके चल रहे थे, अब पसीना भी बहुत आने लगा था। ऊपर से उतर रहे एक दो सन्यासी मिले, अभिवादन होता और वो हमारा उत्साह  बढ़ाते हुए उतरते गये, ’बहुत अच्छे, बस पहुँच ही गये।“ हम टॉप पर पहुँच गये, सामने बड़ा सा घास का मैदान। बहुत से फ़ूल उगे हुये, पृष्ठभूमि में मंदिर और चढ़ाई चढ़ पाने की संतुष्टि, सब अच्छा ही अच्छा लगने लगा। दूर मंदिर में एक ऊँचे स्थान पर खड़े एक साधु की आकृति भी दिख रही थी, वो भी इधर ही देख रहे थे।




अब हम रुककर आराम से वो नजारा देखने लगे, किसी डेकोरेटिड पार्क में घास फ़ूल अलग तरह के होते हैं और प्राकृतिक जगहों पर अलग तरह के। एक में ब्यूटी पार्लर वाली चमक दमक और एक में नैसर्गिक सौन्दर्य। इतने में जोर से बारिश होने लगी, शाम भी कुछ देर में ढलने को ही थी। मैदान के पार मंदिर और नीचे चाय सुड़कते ललित जी, हमें अपेक्षा से अधिक समय लग गया था तो वो चिंतित न हो रहे हों, हम दोनों तरफ़ सोच रहे थे। अब ध्यान आया कि छोटा हैंडबैग तो ललित जी के पास ही है, हम तो एकदम कैजुअल मूड और ड्रेस में थे। टीशर्ट में जेब नहीं और ट्रैक पैंट में मोबाईल भी मुश्किल से फ़ँसाया था। इतनी दूर तक आये हैं और जेब में एक पैसा भी नहीं कि मंदिर में कुछ चढ़ा भी सकें। मैं तो ठहरा पलायनवादी आदमी, निंदक जी को सुझाव दिया कि पहाड़ पर ही तो चढ़ना था सो चढ़ लिये। चैलेंज पूरा हुआ, बाकी अपने भगवान जी तो सर्वव्यापक हैं उन्हें यहीं से प्रणाम करके लौटते हैं। निंदक जी बोले, “भगवान की तो कोई बात नहीं लेकिन उन बाबा ने हमें देखा है और हम यहाँ तक आकर बिना मंदिर गये लौट जायेंगे तो वो क्या सोचेंगे? चलो, देखते हैं।“ हम मंदिर की ओर चल दिये।
मंदिर परिसर अच्छा खासा बड़ा है, पहुँचे तो वहाँ एक स्थानीय युवा ने आकर अभिवादन किया और हम कहाँ से आये हैं आदि बात करने लगा। बहुत सभ्य लड़का था, मंदिर का सेवादार ही था। फ़ौरन दो गिलास पानी लाया, “पानी पीजिये, आप थक गये होंगे क्योंकि यह रास्ता थोड़ा कठिन है, लोग दूसरे रास्ते से आते हैं जो थोड़ा लंबा है लेकिन अपेक्षाकृत सरल है।“ हमने पानी पीकर लड़के का धन्यवाद दिया और हँसकर बताया कि हम तो बाहर से लौटने वाले थे। कारण जानकर वो भी हँसने लगा और पैसे न होने के कारण मंदिर से बाहर से ही लौट जाने वाली हमारी सोच की मीठी निंदा की(निंदा यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ रही J ) बल्कि यह जानकर कि मलंग बिल्कुल खाली हाथ हैं, उसने विशेष आग्रह किया कि आप दर्शन कर लें तब तक मंदिर की रसोई में आपके लिये चाय बनवा रहा हूँ। एक तरह से यह आग्रह जबरदस्ती वाला था, दर्शन के पश्चात रसोई में जाकर चूल्हे पर बनी चाय पी। मंदिर के सेवादार अपनी रात की रसोई की तैयारी कर रहे थे, चाय पीने के बाद जब उन लोगों को धन्यवाद दिया तो उनकी तरफ़ से भोजन का भी आग्रह किया गया और रात को सोने का प्रबंध होने का भी। फ़िर कभी दोबारा आने की कहकर हमने उन लोगों से विदा ली।


लौटते समय हम एक जगह गलत मोड़ पर मुड़ गये, अच्छा खासा लंबा रास्ता चलना पड़ा लेकिन लक्ष्य मालूम था तो कोई समस्या नहीं हुई। सही रास्ते से थोड़ा सा विचलन लक्ष्य तक पहुँचने में विलंब कर देता है।तब तक ललित जी उस पहाड़ी परिवार से स्थानीय विषयों की जानकारी लेते रहे। हम लोगों ने चाय पी और गेस्ट हाऊस के लिये चल दिये। यहाँ भी मजे की बात ये हुई कि वो परिवार चाय के पैसे लेने को तैयार नहीं हो रहे थे, एक तरह से जबरन ही देने पड़े। जब उन्हें याद दिलाया कि टी-स्टाल लिख रखा है इसलिए पैसे लेने में संकोच तो बिल्कुल नहीं करना चाहिये, महिला ने बताया कि टी-स्टाल का पोस्टर मंदिर के बाबाजी ने जोर देकर लगवाया था कि आगंतुकों की सहायता तो तुम लोग वैसे भी करते ही हो। 
समाज वही है, जहाँ परस्पर हित की भावना हो।
मंदिरों के पास बहुत धन संपत्ति है, समाज के लिये उसका कुछ उपयोग नहीं होता आदि आदि जैसे प्रलाप सुनकर मुझे आत्मग्लानि नहीं होती बल्कि ’हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊँ’ वाला मुहावरा याद आता है। श्रद्धालुओं द्वारा दान या चढ़ावा धार्मिक भावना से धर्म के कार्य के लिये प्रयुक्त किये जाने के लिये किया जाता है लेकिन वो पैसा किस मद में खर्च होगा ये श्रद्धालु तय नहीं कर सकते क्योंकि बहुसंख्यक समाज के बड़े मंदिरों का स्वामित्व सरकार के हाथ में है। यह राशि सरकारी खजाने का हिस्सा बनती है और सरकारी संसाधनों पर पहला हक उस  वर्ग का नहीं जिसका इसे भरने में सबसे ज्यादा योगदान है।

शुक्रवार, जुलाई 22, 2016

नजरबंदी

कुछ दिन पहले इस विषय में श्रीमान आनंद राजाध्यक्षा जी ने पोस्ट लिखकर विचार माँगे थे हालाँकि वहाँ परिपेक्ष्य कुछ अलग था, उन्होंने inter religion marriage/लव जेहाद से जोड़कर पोस्ट लिखी थी। मेरे परिचय में ऐसी तीन घटनायें सामने आ चुकी हैं, जिनमें से नवीनतम घटना कल की है। पहले वही घटना बता देता हूँ, जैसी जानकारी मिली।
हमारे पड़ौस में एक अंकलजी रहते हैं, ’होर वड़ो’ वाला बयान जिनका था, वही। आयु ७०+ है लेकिन शारीरिक रूप से बहुत अच्छी तरह सक्रिय हैं। सुबह ५ बजे से पहले उठकर नंगे पाँव पैदल चलकर ही गुरुद्वारे जाते हैं, वहाँ से लौटकर संयुक्त परिवार के लिये फ़ल, सब्जियाँ लेने जाते हैं। फ़िर लौटकर कुछ और फ़ुटकर काम के लिये इधर उधर जाना मतलब जब देखो मूवमेंट करते ही दिखते हैं। दोपहर खाना लेकर बच्चों के पास दुकान पर चले जाते हैं, वहाँ से फ़िर किसी बच्चे के साथ दुकान के लिये खरीद्दारी करने। सुबह से लेकर रात तक वो ऐसे ही व्यस्त रहते हैं।
कल दिन में दस बजे के करीब ऐसे ही बिजली का बिल जमा करवाने जा रहे थे। घर से कुछ दूर ही एक आदमी ने उन्हें रोका और कहा कि उसके साहब उन्हें बुला रहे हैं, कोई वारदात हो गई है और इस बारे में पूछताछ करनी है। कुछ कदम चलकर वो उसके साथ आये तो तथाकथित साहब अपनी मोटरसाईकिल खड़ी करके उसका सहारा लेकर खड़े थे। अभिवादन के बाद पूछा गया कि आप यहीं रहते हैं, नाम वगैरह। फ़िर उसने कहा कि यहाँ कुछ देर पहले कोई अपराध हुआ है, इसलिये आपसे कुछ जानकारी लेनी है। बताया कि जीप थोड़ी दूर खड़ी है, वहाँ तक चलना होगा। और इतने में बोला कि अरे, ये कड़ा आपने पहना है क्या सोने का है? इसे उतारकर जेब में रख लीजिये। यह बातचीत चल रही थी तो एक और आदमी के साथ उसका दूसरा साथी यही सब बात कर रहा था और उसने अपनी सोने की चैन उतारकर जेब में रख ली। हमारे सिंह साहब अंकल ने भी उसे चैन उतारते देखकर अपना कड़ा उतार दिया। उन लोगों ने अखबार में लपेट कर जेब में रखने का सुझाव दिया और खुद ही इस काम में मदद करने लगे। अखबार में लिपटा कड़ा जेब में रखवा दिया और उसके बाद सिंह साहब चले गये बिल जमा करवाने और वो दोनों लोग अपनी मोटरसाईकिल पर बैठकर गये अपने रास्ते। सिंह अंकल बिल जमा करवाकर घर आ गये, इस सब में करीब एक डेढ घंटा बीत गया था। दुकान पर जाने लगे तो जेब से पुड़िया निकालकर कड़ा डालने लगे तो अखबार मेंं से एक आर्टिफ़िशियल कड़ा निकला, वैसे तो उसपर कई चमकीले शोख से नग लगे हुये थे और लेकिन वो सरदार जी का ५ तोले का कड़ा नहीं था। इस बार ’होर वड़ो’ हमारे अंकल जी के साथ ही हो गई है।
दिन दिहाड़े और अच्छी भीड़ भाड़ वाली सड़क पर वो भी अपने परिचित इलाके में यह सब हो गया। इसी तरह की दो घटनायें पहले भी परिचितों के साथ हो चुकी हैं हालाँकि वो कुछ पुरानी बात हैं और इस एरिया से दूर घटित हुई थीं। घटनाक्रम ऐसा ही, कोई अचानक से आकर किसी बहाने से बात करता है और उसके बाद आप वही करते जाते हैं जैसा आपको कहा जाये। एक मित्र की माताजी के शरीर से सब गहने उन्होंने स्वयं ऐसे ही एक एक करके उतारकर दे दिये थे, दूसरे मामले में लड़के ने अपना महंगा सा फ़ोन। आंखें खुली रहती हैं लेकिन चैतन्य होते हैं घंटे दो घंटे में।
अब कुछ लोग इसे हिप्नोटिज़्म बता रहे हैं, कुछ का कहना है कि इस तरह की सिद्धि या शिफ़ा कुछ लोगों के पास होती है। ताजा घटना तो एक सीसीटीवी फ़ुटेज में भी आई हैं और उनमें किसी तरह की जोर जबरदस्ती जैसा कुछ नहीं दिख रहा। मैं अब भी इसे ऐसा कुछ न मानकर चालाकी से किसी कैमिकल वगैरह के प्रयोग से प्रभावित करने वाला मामला मान रहा हूँ लेकिन सच तो ये है कि मैं अल्पमत में हूँ। मेरे पास अपनी बात के पक्ष में सिर्फ़ एक ही दलील है कि ऐसी सिद्धि जिसके पास हो वो ऐसे सड़कों पर अपनी सिद्धियों को व्यर्थ नहीं कर सकते, वो बहुत बड़े काम कर सकते हैं।
इस तरह की कुछ हजार या लाख रुपये की ठगी में सम्मोहित करने वाली बात या ऐसी किसी आलौकिक शक्तियों के प्रयोग पर आपको विश्वास आता है?

शनिवार, जुलाई 16, 2016

कुमारिल भट्ट


हो सकता है यह कहानी आपने न सुनी हो, हो सकता है कि सुन रखी हो। ऐसा भी हो सकता है कि किसी और रूप में सुन रखी हो। यह सब महत्वपूर्ण नहीं, महत्व इस बात का होना चाहिये कि किसी कहानी से आप पाना क्या चाहते हैं और पाते क्या हैं। मनोरंजन, ज्ञान, प्रेरणा, अवसाद या ऐसा ही कुछ और भाव। महत्व इस बात का भी है कि इससे आप कितना प्रभावित होते हैं। इस भूमिका से सुधीजन समझ ही गये होंगे कि कुछ ऐसी बात पढ़ने को मिलेगी जिसे रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब आदि मान्यताप्राप्त और स्थापित ’कारों के रचे इतिहास में ढूँढने जायेंगे तो निश्चित ही निराशा हाथ लगेगी। आप सोच सकते हैं कि फ़िर ऐसी बातों को कोई लिखे भी क्यों और पढ़े भी क्यों? मेरे लिखने और आपके पढ़ने के पीछे एक विश्वास होगा। विश्वास मात्र लेखक पर नहीं, अपनी चेतना और अपने विवेक पर कि इसके सत्य होने की संभावना बनती भी है या नहीं। मानना या न मानना अपने हाथ में है, यह सनातन की भूमि है जिसपर विरोधी मत भी न सिर्फ़ सुने गये बल्कि उन्हें एक भिन्न शाखा के रूप में मान्यता भी मिली है। यहाँ अपनी बात मनवाने के लिये गर्दन पर तलवार नहीं रखी जाती। 

यह वो समय था जब विभिन्न सामाजिक और राजनैतिक कारणों के चलते सनातन से विमुख होकर आमजन नये धर्म की तरफ़ जा रहा था। ईश्वर को जानने और उसे पाने की पुरानी रीति-विधियों और नये तरीकों के बीच एक प्रतियोगिता रूपी संघर्ष चल रहा था। परिवारों में विमर्श का यह एक ज्वलंत विषय था, कुछ सदस्य अपने धर्म को त्यागना सही नहीं मानते थे वहीं कुछ सदस्य इसे केंचुली की तरह उतारने को तत्पर थे। नए धर्म को राज्याश्रय का लाभ भी था फ़लस्वरूप सनातनियों की संख्या कम हो रही थी। 
उस समय के प्रचलन के अनुसार किसी सनातनी गुरुकुल में विद्याध्ययन कर रहा एक युवा भिक्षाटन के लिये नगर में निकला हुआ था। अचानक उसके हाथ पर कुछ उष्ण तरल पदार्थ की बूँदें गिरीं, युवक ने सिर उठाकर देखा तो गवाक्ष में खड़ी कोई स्त्री रो रही थी और उसीकी आँखों से गिरे आँसू ही थे जिन्होंने युवा का ध्यानाकृष्ट किया था।(अलग अलग मान्यताओं के अनुसार वह स्त्री नगर की रानी या गणिका बताई जाती है)
"हे देवी, आपको क्या कष्ट है?"
स्त्री ने रूंधे गले से कहा, "हमारे धर्म की रक्षा कौन करेगा?"
जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो जीवन की दिशा को गति दे देते हैं और कई बार दिशा बदल भी देते हैं। कई बार हम अनिर्णय की स्थिति में लंबा समय निकाल देते हैं लेकिन कोई एक क्षण ऐसा आता है जब आर या पार का निर्णय लेने में किंचित मात्र भी विलंब नहीं होता। युवक के जीवन में संभवत: वही क्षण आ पहुँचा था। स्त्री के शब्द "हमारे धर्म की रक्षा कौन करेगा?" सुनकर युवक सहसा बोल उठा, "मैं करूंगा।" उसके जीवन की दिशा भावी द्वारा निर्धारित हो चुकी थी।
उस युवा ब्राह्मण का नाम था ’कुमारिल भट्ट’और वह वर्तमान के आसाम से विद्याध्ययन करने वाराणसी आया हुआ था। कुछ लोग इन्हें दक्षिण भारत से आया भी मानते हैं। उसी क्षण से कुमारिल भट्ट का मनन चिंतन इस समस्या के कारण-निवारण में लग गया। उसने अनुभव किया कि सनातन से पलायन के पीछे सनातन के विरुद्ध किये जा रहे नकारात्मक प्रचार की मुख्य भूमिका थी। जीवन का अच्छा खासा समय सनातन में बिताने के बाद जब कोई विपक्ष में जाता था तो उसके पास अपने पूर्व धर्म की अच्छाई-बुराई की भरपूर जानकारी होती थी। जिस घर में हम रहते हैं, उसका कौन सा कोना निरापद है और कौन सा कमजोर, कहाँ धूप बहुत आती है और कहाँ सीलन, ये हम अच्छे से जानते हैं। अराजकताप्रधान समाज तब भी नहीं था तो विवाद आदि या तो शास्त्रार्थ से सुलझाये जाते थे या प्रचलित न्याय नियमों के अनुसार। ऐसी स्थिति आने पर सनातन की कमियों को निर्ममता से उजागर किया जाता था और परिणाम यह होता था कि लोगों को अपने धर्म में कमियाँ ही कमियाँ दिखती थीं। साधारण शब्दों में ये समझिये कि सारी लड़ाई हमारी ही जमीन पर होती थी, वो जीत गये तो हमारी जमीन पायेंगे और हम अपनी जमीन बचा लेने को ही अपनी जीत मानने को बाध्य थे।
कुमारिल भट्ट ने निर्णय किया कि उन्हें टक्कर देने के लिये मुझे भी बौद्ध धर्म और उसकी पुस्तकों को समझना होगा। कुमारिल भट्ट बौद्ध बन गये, दत्तचित्त होकर शिक्षा प्राप्त की और उस दर्शन में पारंगत हुए। पुन: हिन्दु धर्म में प्रवेश किया और शास्त्रार्थ के क्षेत्र में पुन: सनातन की कीर्ति पताका फ़हराई। कुमारिल भट्ट का समय आदि शंकराचार्य और वाचस्पति मिश्र से पहले का है। भवभूति, मंडन मिश्र आदि उनके शिष्य रहे।
कुमारिल के दर्शन का तीन मुख्य भागों में अध्ययन किया जा सकता है- ज्ञानमीमांसा, तत्वमीमांसा और आचारमीमांसा। उस सब में जिन्हें रुचि हो वो पैठ सकते हैं। पहले भी कह चुका कि सहमत होना या न होने की स्वतंत्रता है। मेरी रुचि इस बात में है कि स्थापित इतिहासकारों ने भले ही भारत के सामाजिक जीवन में स्त्रियों की दशा आदि के बारे में कुछ भी लिख रखा हो, इस धरती की स्त्रियाँ कठिन समय में समाज को और धर्म को प्रेरणा देने में और हमारे पूर्वज चुनौतियों का सामना करने में सक्षम थे।
प्रस्तुत पोस्ट बहुत पहले पढ़ी किसी रचना और लोकजीवन में सुनी बातों के आधार पर लिखी है। कुमारिल भट्ट के बारे में बहुत अधिक विवरण उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि जिनके जिम्मे यह सब काम थे, उन्हें इतिहास लिखना नहीं बल्कि बनाना था। उनके हित कुछ वंशों का ही गौरवगान करने से सधने थे। उदाहरण के लिये मुगल साम्राज्य को हमारे इतिहास में आवश्यकता से अधिक ग्लोरीफ़ाई किया गया जबकि विजयनगर साम्राज्य के बारे में न्यूनतम बताया गया है।
अंत में यही कहूँगा कि किसी घटना के वर्णन या कहानी में महत्व इस बात का है कि इससे आप कितना प्रभावित होते हैं।

बुधवार, जुलाई 13, 2016

सजन रे झूठ मत बोलो

अनुभव बताता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गाना गाने वाले ही असली असहिष्णु हैं। देश या धर्म से संबंधित विवाद खड़े करने हों या इनकी अस्मिता पर प्रहार करना हो, लोक मत को काऊंटर करने के लिये अगर-मगर लगाकर और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम लेकर यह लॉबी अपना कार्य करती रहती है। इसका प्रतिदान इन्हें किस रुप में मिलता है, यह अनुमान लगाना बहुत कठिन नहीं। फ़ेलोशिप, विभिन्न अवार्ड, देशी और विदेशी कांफ़्रेंसों में भाग लेने के और रिटायरमेंट के बाद मानवाधिकार या ऐसे ही किसी अन्य सफ़ेद हाथी पर सवारी करने के अवसर किसी से छुपे नहीं हैं। वहीं ये काम किनके इशारे पर और किन्हें लाभ पहुँचाने के लिये होते हैं, यह समझना भी बहुत मुश्किल नहीं है।
कश्मीर के एक आतंकवादी के हथियार उठाये हुये और भड़काऊ भाषण देते वीडियो उसीके सोशल मीडिया एकाऊंट पर उपलब्ध हैं। उसके स्तर का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुठभेड़ में सेना द्वारा इस आतंकवादी को मार दिये जाने के बाद कई दिन तक घाटी बंद और कर्फ़्यू लगा है, हिंसा हुई है और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का अधिकृत संदेश जारी हुआ कि बुरहान वानी के मरने से उन्हें सदमा पहुँचा है। इस प्रकरण से सबक लेने की बात कहते हुये हमारे ही देश के  सरकारी विश्वविद्यालय में एक हिन्दी के प्रोफ़ेसर साहब उसे हर तरह से क्लीनचिट दे रहे हैं। यह तो हुई उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जब उन्हें बेशर्मी से झूठ बोलने की बात कही जाये तो वो टिप्पणी डिलीट हो जाती है।
धर्म और भगवान को मानना कामरेडों के लिये वर्जित होता है इसलिये ’खुदा के पास जाना है’ की याद दिलाना तो नाहक ही होगा लेकिन एक अंतरात्मा तो इनकी भी होती होगी। वो भी ऐसी बात कहने से नहीं कचोटती तो यकीन मानो, अंतरात्मा जरूर बेच खाई होगी।