बृहस्पतिवार, मई 23, 2013

’आस्तिकों का प्याज़’

कल सुबह बैंक के लिये निकल रहा था, माताजी से बाय-बाय कहते ही सुनाई पड़ा, "आजकल लू बहुत चल रही है, जेब में एक छोटा सा प्याज रख ले।" आदत के हिसाब से मैंने नानुकर की तो समाचार सुन रहे पिताजी ने भी मेरे विपक्ष में अपना वोट डाल दिया। उपलब्ध प्याजों में से सबसे छोटा प्याज(जोकि इतना छोटा भी नहीं था),  अपनी पेंट की छोटी सी जेब के हवाले करके मैंने कूच का नगाड़ा बजा दिया।

मेट्रो स्टेशन पहुँचकर बैग  स्कैनिंग मशीन के हवाले किया  और खुद लाईन में खड़ा हो गया। भीड़ के हिसाब से सवारियों के शरीर पर जल्दी जल्दी हाथ फ़ेरते जवान ने पैंट के एकतरफ़ा उभार पर लाकर हाथ रोक दिये। "क्या है ये?"  मैंने जेब से प्याज निकालकर दिखा दिया और आसपास के लोगों के हँसते चेहरे देखकर स्पष्ट करना चाहा कि ये प्याज तो मैं अपनी माताजी का मन रखने के लिये जेब में रखे हुये हूँ। लाईन को रुकी देखकर पास में खड़ा सब-इंस्पेक्टर नजदीक आकर मामला समझने लगा। लाईन में मेरे पीछे खड़े बंदों में से एकाध ने मजाक में कुछ कहा तो हम हिंदुस्तानियों का मनपसंद काम शुरू हो गया - बहसबाजी। तीन लड़कों का ग्रुप था वो, जुट गये मेरी खिंचाई करने पर। वक्त-वक्त की बात है, कभी हम ’संतरे के बीज’ के नाम पर अपने दोस्तों को खींचा करते थे और आज प्याज को मुद्दा बनाकर भाईलोग हमारी खिंचाई कर रहे थे। खिंचाई भी खाज की तरह है, खुद करो तब भी मजा और दूसरा करे तब भी मजा। इस प्रकरण के ज्यादा विस्तार में नहीं जाऊंगा,  कुछ डायलाग्स पेश हैं - 

- भाई साहब नये नये मुसलमान बने हैं, तभी प्याज जेब में रखकर घूम रहे हैं।

- अरे नहीं यार, माताजी ने जबरदस्ती रखवा दिया। कहती हैं कि जेब में प्याज रहे तो लू नहीं लगती।

- और आपने आजके समय में ये बात चुपचाप मान ली? कभी इस बात की टेस्टिंग की है?

- नहीं भाई, मना किया था पहले। वो नहीं मानी, मैंने सोचा कि उनकी बात रख लेता हूँ।

- क्या प्रूफ़ है कि जेब में प्याज रखने से लू नहीं लगती?

- कोई प्रूफ़ नहीं है, मैंने माँगा भी नहीं। मैंने तो ये सोचा कि इसमें नुकसान क्या है?

बातें एकदम क्रम में नहीं हैं लेकिन ऐसी ही बातें चलती रहीं। बातों से बातें निकलती रहीं कि वैसे तो प्याज एक तामसिक गुण वाली वनस्पति है इसीलिये पेटपूजा के अलावा किसी पूजा में इसका प्रयोग नहीं किया जाता। अंधविश्वास, अंधश्रद्धा, लकीरे के फ़कीर, घिसीपिटी मान्यतायें, तर्कशीलता जैसी कई बातें हुईं। एक बंधु ने तो लू पर ही सवाल खड़ा कर दिया कि कैसे मान लें कि लू चलती है? और भी बहुत सी बातें होती रहीं, जिसका जिसका स्टेशन आता रहा वो अपने रास्ते जाता रहा। 

बातचीत में बार बार एक मुद्दा आता था कि सिद्ध कैसे किया जाये? कैसे सिद्ध किया जाये कि लू नाम की कोई शै होती भी है? जो दिखती नहीं, जिसका कोई रंग नहीं, कोई खुशबू नहीं, कोई आकार नहीं - उसके अस्तित्व को कैसे स्वीकार कर लिया जाये?  अगर मान भी लिया जाये कि ऐसी कोई चीज होती है तो फ़िर यह कैसे सिद्ध किया जाये कि जेब में प्याज रखने मात्र से लू से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है? मौके पर तो मुझे बात सूझती नहीं, बाद में सोचता रहता हूँ। जैसे चिडि़याघर का एक गधा किसी दूसरे के सुनाये चुटकुले पर दो दिन के बाद हँसता है। भाई, जब समझ आयेगा तभी तो हँसेगा। मुझे भी सवाल बाद में समझ आये तो बाद में ही जवाब सोचूँगा न?

एक फ़ेसबुक स्टेटस और फ़िर प्रवीण जी की पोस्ट से पता चला कि ब्लॉगजगत के ठहरे हुये पानी में भगवान के नाम पर  थोड़ी बहुत हलचल मची है। बड़ी  बहस में सक्रिय भाग लेने की फ़ुर्सत भी नहीं, क्षमता भी नहीं और सच कहूँ तो इच्छा भी नहीं। तर्क/कुतर्क तो बहुत से दिये जा सकते हैं लेकिन उनसे सस्ती लोकप्रियता के अलावा कुछ और हासिल होता हो, मुझे नहीं लगता। हम तो यहीं लिखकर लू से बचने का जुगाड़ कर रहे हैं। वैसे प्याज पर पहले भी एक पोस्ट लिखी थी लेकिन तब मामला अलग था। तब प्याज महंगाई का पैमाना था, आज प्याज अपने लिये आस्तिकता-नास्तिकता का पैमाना है।    

इस प्रकरण के बाद सोच रहा हूँ कि प्याज को लू से बचाव का सार्थक उपाय मानने वाले और इसे सिर्फ़ एक टोटका मानने वालों में से कौन सही है और कौन गलत? शायद दोनों ही सही हों या दोनों ही गलत या फ़िर दोनों ही सही भी हों और गलत भी हों। वैसे ऐसा भी  हो सकता है क्या? 

किसी का मानना है कि प्याज जेब में रखने से लू नहीं लगेगी, किसी का मानना है कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।  जिसे विश्वास है वो उसपर अमल करे और जिसे विश्वास नहीं है वो न करे, यहाँ तक स्वीकार्य। अब अगर विश्वास करने वाला दूसरे की गर्दन पर छुरी रखकर उसे मजबूर करे कि प्याज को जेब में रख या विश्वास न करने वाला ऐसे ही दूसरे को विवश करे कि जेब से प्याज निकाल, तब बात अस्वीकार्य होनी ही चाहिये। जेब में प्याज रख लेने भर को लू से बचने की गारंटी मान लेना शायद मूर्खता ही होगा। दूसरी तरफ़ जेब में प्याज रखने से अगर हर समय मुझे यह अहसास रहे कि लू से शरीर को नुकसान हो सकता है, इसीलिये मैंने यह जेब में रखा है।  और मुझे इस बारे में असावधान नहीं रहना चाहिये तो प्याज के चिकित्सीय गुण उतने न होने पर भी हमें उसका लाभ मिल सकता है। 

जहाँ भी असहमति दिखती है उसकी मूल में ’कुछ होने’ से ज्यादा बड़ी बात ’हम उसे कैसे मानते हैं’ लगती है। मैं ऐसा मानता हूँ, कोई दूसरा कुछ और मान सकता है और इसमें कोई बुराई भी नहीं। बुराई तब है जब हम दूसरों  के अपने से अलग विचारों को सहन भी नहीं करना चाहते। बुराई तब है जब एक या दोनों पक्ष ये चाहें कि सामने वाला उसके हिसाब से ही सोचे और माने। 

बाई द वे, आपमें से कोई हिचकी न रुकने का कोई आसान सा इलाज बता सकता है? बिना दवा वाला टोटका बतायेंगे तो भी चलेगा।  अपना एक अनुभव तो मेरे पास भी है लेकिन घर का मुर्गा तो आप जानते ही हो कि चने बराबर होता है :)

बुधवार, अप्रैल 24, 2013

समय का चक्र

                                                             
                                            (कोणार्क सूर्य मंदिर का एक चित्र, गूगल से साभार)


गाड़ी में उस दिन भाई साहब हमेशा की तरह बोल तो कम ही रहे थे लेकिन चेहरा कुछ ज्यादा ही उतरा हुआ था।  मैंने पूछा तो कहने लगे, "अब आप लोगों के साथ शाम का साथ छूट जायेगा। गरीबी रेखा से नीचे वाले लोगों का सर्वे शुरू हो रहा है, मेरी भी ड्यूटी लगेगी। कम से कम तीन चार महीने तक इसके बाद वाली गाड़ी पकड़ने को मिलेगी।" अनुमान लगाया तो उस अल्पभाषी सहयात्री ने शायद तीन चार महीने की एकतरफ़ा अनुपस्थिति की गणना करके ही इतना लंबा वाक्य बोला होगा, हम भी कुछ उदास तो हो ही गये।

अगले दिन ट्यूबलाईट स्माईल देखकर समझ गया कि ड्यूटी में कुछ बढ़िया सेटिंग हो गई है, कुरेदने पर उन्होंने बताया कि उनके बॉस ने सर्वे के एरिया बाँटने की ड्यूटी उन्हें ही सौंप दी थी और उसका फ़ायदा उठाते हुये उन्होंने शहर की एकमात्र पोश कालोनी वाला एरिया अपने नाम लिख लिया था। अब पोश एरिया में कितने  BPL वासी होंगे?  चहकते हुये बताने लगे कि हमारी शाम वाली कंपनी बनी रहेगी, इसलिये खुश हैं। 

कुछ दिन बीतने के बाद भाई साहब खीझे-खीझे दिखने लगे। पता चला कि उस एकमात्र पोश कालोनी\सेक्टर में बहुत से लोग बीपीएल लिस्ट में नाम जुड़वाना चाहते हैं और इस काम के लिये  नेताओं के समझाईश, धमकाईश वाले फ़ोन आ चुके हैं। "तेरी जेब से जायेगा क्या पैसा?" "सरकार की स्कीम सै, सरकार ने ही सरदर्दी लेण दे"  "कोठी में रहे सैं तो फ़ेर के हो गया? कोठी उसके नाम तो ना है न? "इणका हक सै, रुकावट मत बणया कर बीच में। तेरा काम लिस्ट बनाण का सै, बणा दे चुपचाप और खुद भी ठाठ से रह।"   भाई साहब की हालत साँप के गले में छछुँदर जैसी थी, न उगलते बनता था न निगलते। 

बैंक सेवा के दौरान मैंने भी ऐसे कई मामले देखे। अच्छी-अच्छी जमीन जायदाद वाले लोग-लुगाईयों का नाम सरकारी सहायता वाली लिस्ट में रहता था। सोच वही कि मिल रहा है तो ले रहे हैं। एक दिन एक बुढ़िया को गार्ड साहब ने टोका भी, "ताई, तू भी यो पांच सौ रुपये महीने वाली पेंशन लेती है? करोड़ों की जमीन सै तेरे पास, धत्त तेरे की।" ताई ने अनुभव की बात बताई, "बेट्टा, सरकार तो चूण चोकर भी दे तो बेशक पल्ला पसारकर लेणा पड़े,  ले लेणा चाहिये। अपना हक कदे न छोडना चाहिये।"

एक समय था जब कर्तव्य सर्वोपरि था। उसीके पालन की शिक्षा दी जाती थी और उनलोगों के द्वारा दी जाती थी जो खुद कर्तव्यपालन में विश्वास रखते थे। कर्तव्यबोध परिवार, मित्रता, जाति, धर्म, देश, मानवता किसी भी कारक से प्रेरित हो सकता था। मेढ़ बचाने के लिये आरुणि खुद सारी रात बारिश में भीगता रहा तो उसके पीछे गुरु की आज्ञा को कर्तव्य मानने की मानसिकता ही थी। लंका पहुँचने के लिये अथाह जलराशि पार करते मारुतिनंदन हनुमान को जब विश्राम का प्रलोभन मिला तो ’राम काज कीन्है बिना, मोहे कहाँ विश्राम’ स्वामी-मित्र के प्रति कर्तव्यबोध की पराकाष्ठा ही थी। आततायी शासकों को मुँहतोड़ जवाब देने के लिये खुद को और अपने परिवार को वार देना गुरू गोबिंदसिंह जी को देश, धर्म के प्रति अपना कर्तव्य ही लगा था।  उदाहरण अनंत हैं, सैंकड़ो-हजारों और गिनवाये जा सकते हैं, सीमित तो हमारी खुद की लिखने पढ़ने और समझने की क्षमता है। कर्तव्य मार्ग कठिन अवश्य था और ध्यान कर्म पर ज्यादा रहता था, उसके परिणाम की अपेक्षा गौण थी। मान्यता यही थी कि ’कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फ़लेषु कदाचन"।  उस मार्ग पर चलने से यानि प्रत्येक जन के अपने कर्तव्यपालन के प्रति सजग  रहने से समाज के दूसरे घटकों के प्रति कोई अन्याय होने की संभावना बहुत कम थी। 

समय बदलता रहता है, कठिन मार्ग का और भी कठिन लगना स्वाभाविक ही रहा होगा। आज का युग अधिकार का युग है। महिलाओं का अधिकार, श्रमिकों का अधिकार, बाल अधिकार, ग्राहकों का अधिकार और इसके अलावा बहुत से अधिकार बल्कि सबके लिये कोई न कोई अधिकार। किसी किसी के लिये तो एक से अधिक अधिकार भी। प्राथमिकतायें बदलकर कर्तव्यपालन की जगह अधिकार प्राप्ति की हो गई हैं। अपना काम निकलवाने के लिए चाहे जिस अधिकार की दुहाई देनी पड़े, दी जाती है। अपने कर्म से ज्यादा परिणाम पर फ़ोकस है और इसे जस्टिफ़ाई करने के लिये एक लंबी सी अधिकार सूची और अनंत तर्क। परिणामस्वरूप अपनी बात और अपनी आवाज को दमदार तरीके से न उठा सकने वाले अपने अस्तित्व के लिये संघर्षरत और शोषण और अन्याय को झेलने के लिये अभिशप्त हैं।

समय का चक्र चलता रह्ता है, ’रामकाज कीन्है बिना मोहे कहाँ विश्राम’ से लेकर ’ये लो अपनी कंठीमाला, भूखे भजन न होय गोपाला’   और  ’कर्मण्येवाधिकारस्ते ....’ से  चलकर ’साड्डा हक, ऐत्थे रख’  तक के सफ़र की मुझ समेत आप सबको बधाई। हमारे आपके योगदान के बिना ये पड़ाव इतनी सहजता से शायद न आता।  आगे समय का चक्र किस पड़ाव पर ले जाकर पटकेगा, देखते रहेंगे..... हम लोग। 


मंगलवार, अप्रैल 16, 2013

अपने पराये

वापिसी में जब कभी गाड़ी देर से आ रही होती तो हमारे एक साथी को चाय की तलब लग जाती थी। हम लोग प्लेटफ़ार्म पर ही स्थित टी-स्टाल पर चले जाते थे। छोटे शहरों में नौकरी करने का सुख भी अलग ही होता है, लोग आईडेंटिफ़ाई करते हैं। स्टाल पर हमें देखकर ठेकेदार खुद मोर्चा संभाल लेता था और स्पेशल चाय विद मट्ठी पेश कर दी जाती थी। सबसे पहली बार तो उसने पैसे लेने से भी मना कर दिया। बहुत झिकझिक हुई, आखिर में उसे समझाया गया कि भाई साहब, हम तो भाव के भूखे हैं। कभी कभार आ जायें तो आपके माथे पर सिलवटें  न दिखें कि आ गये फ़्री के भड़ुए, अपने लिये  इतनी इज्जत  बहुत है। इससे ज्यादा इज्जत अपने से बर्दाश्त भी नहीं होती है। दोबारा बुलाना चाहते हो तो पैसे पकड़ो, तब श्रीमान जी ने पैसे काटे। हफ़्ते - दस दिन में एकाध बार ऐसा मौका बन ही जाता था या फ़िर ऐसा मौका बनता बरसात के दिनों में - अहा, उस दिन मट्ठी की जगह दूसरे प्लेटफ़ार्म से पकौड़े  मंगाये जाते और चाय के साथ उनका लुत्फ़ उठाया जाता। धीरे धीरे हुआ ये कि स्टाल के आसपास डेरा जमाये बैठी ताश मंडली के लोग हमें और हम उनको पहचानने लगे।

खैर, ये बात तो शुरुआती दिनों की ही है।  ऐसे ही एक दिन हम चाय पी रहे थे कि आँखों पर एक मोटा सा चश्मा चढ़ाये एक पचपन-छप्पन साल का आदमी ताश मंडली से आकर ठेकेदार के पास खड़ा हो गया। हाँ यार, देखा तो है इसे कई बार ताशवालों के पास बैठे हुये लेकिन इतना गौर नहीं किया था। कमीज के एक दो बटन टूटे हुए, हाथ में बीड़ी, चेहरे पर दीनता नहीं लेकिन विनम्रता वाली एक साधारण स्मित बस यूँ मान लीजिये कि संभ्रांत गरीबी वाला एक कैरेक्टर था।  ठेकेदार अच्छी ठसक वाला आदमी था लेकिन उस आदमी से बहुत अपनापे से बात कर रहा था। उन दोनों की बातचीत से पता चला कि कुछ दिन पहले ही इस बंदे की पत्नी का देहाँत हो गया है।  उसकी पत्नी के नाम से बैंक में एक फ़िक्स डिपाज़िट थी जिसमें उसकी लड़की का नामांकन था, उस बारे में ठेकेदार से कुछ सलाह कर रहा था। ठेकेदार ने गेंद इधर हमारे पाले में डाल दी। अपनी समझ के अनुसार उसको हमने सलाह दी और बिना झिझक के बैंक में आने का न्यौता भी दिया। हो सकता है कि हम लोगों की हमजबानी, जिसे आम भाषा में ताना मारने के लिये गैर पंजाबी लोग ’तुसी-मुसी’ कहते है, इसका भी कुछ योगदान रहा ही हो।  ज्यादा शराफ़त का एक दुष्परिणाम भी रहता है कि इंसान बहुत बार अनावश्यक भी सकुचाता रहता है। कहना न होगा, उस आदमी के लिये हम जैसों का इतना सा आश्वासन भी बहुत बड़ा सहारा बन गया, वो एक दिन के बाद अपनी बेटी के साथ और बताये गये दस्तावेज लेकर आया और नियमानुसार सब काम हो गये।

उस दिन के बाद जब जब हम चाय पीने जाते और ताश मंडली के उस स्थायी दर्शक की नजर हम पर पड़ जाती, वो उठकर हमारे पास आता। दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते करता, हालचाल पूछता, चाय पिलाने की जिद करता और खुद निहाल होता और हमें शर्मिंदा करता जाता, वही ज्यादा इज्जत बर्दाश्त न होने वाली बात :) ऐसे ही बहुत से दिनों में से एक दिन था, स्टेशन पर ही हमारी दुआ सलाम, हँसी मजाक चल रही थी। हमारे बैंक की एक रेगुलर महिला ग्राहक जो कि प्राध्यापिका थीं और हरियाणा की ही थीं,  अपने परिवार के साथ वही गाड़ी पकड़ने के लिये उसी प्लेटफ़ार्म पर पास में ही खड़ी थीं। बल्कि उस समय वो अपने श्रीमान जी से परिचय करवाकर ही हटी थीं कि हमारे ये पंजाबी भाई हाथ जोड़कर प्रगट हुये थे। कुछ देर के बाद टीचरजी हँसते हुये कहने लगीं, "एक बात है संजय जी, आप पंजाबी बहुत अच्छी बोल लेते हैं।" 

मैंने कहा, "इसमें कोई बड़ी बात नहीं है, वो इसलिये कि  मेरी मातृभाषा पंजाबी ही है।" 

बहुत हैरान होते हुये उन्होंने पूछा, "सच बताओ?"

मेरे हाँ कहने पर जैसे उन्हें बहुत आश्चर्य सा हुआ, कहने लगीं, "इतनी बार आपसे बात होती है, कभी ऐसा लगा ही नहीं। हम तो समझते थे कि आप हम लोगों में से ही हो।" 

अपने नहीं बल्कि पराये होने वाली बात पर मैंने कुछ जवाब दिया, हम सब खूब हँसे उस दिन। लेकिन कभी अवकाश के पलों में सोचता हूँ तो ये भी एक यक्ष प्रश्न लगता है - अपना कौन, पराया कौन?

ये भी कुछ पहले ही की बात है, शनिवार का दिन था। पब्लिक डीलिंग का समय खत्म हो चुका था, एक लड़का जो उम्र और बैग वगैरह से कोई कालेज स्टूडेंट दिखता था, रिक्वेस्ट करके बैंक के अंदर आ गया। कहने लगा कि एक ड्राफ़्ट बनवाने के लिये पैसे जमा करवा गया था, वही ड्राफ़्ट लेना है। डीलिंगहैंड से उसकी बातचीत सुनी तो पता चला कि जिस कालेज के पक्ष में उसने  ड्राफ़्ट बनवाना था, आवेदनपत्र में उसका नाम स्पष्ट न लिखा होने के कारण आज ड्राफ़्ट नहीं बन पाया और अब कैश का समय समाप्त हो चुका। कभी कभी दूसरों के फ़टे में टाँग फ़ँसाने की आदत के चलते वो आवेदन पत्र देखा, वाकई उसने नाम कन्फ़्यूज़िंग तरीके से लिखा था। नीचे देखा तो आवेदक पाठक सरनेमधारी छात्र था। उम्र में हमसे छोटा था और गरजमंद भी था, इसलिये दो बात सुनाने का अच्छा मौका था। मौके का फ़ायदा उठाकर उसकी कमी बताई और उसे शर्मिंदा किया। बालक ने महसूस किया कि ’कैपिटल अक्षरों में फ़ार्म भरें’  लिखा होने के उपरांत भी उसने कैपिटल अक्षरों में फ़ार्म  नहीं भरा था तो गलती उसकी ही है। सोमवार को आने की कहकर चला गया। 

सोमवार सुबह आकर पैसे जमा करवाये और शाम को ड्राफ़्ट लेने की कहकर चला गया। शाम को आया तो बैंक वालों ने ड्राफ़्ट गलत जगह के लिये बना दिया था। बात फ़िर से अगले दिन शाम  पर गई। तीसरे दिन फ़िर वही कहानी, शाम को आया तो इस बार जगह ठीक थी लेकिन नाम में गलती थी। हर चक्कर में वो लड़का मेरी सीट का काम न होते हुये भी ’नमस्ते सर’ कह जाता था, कोई शिकायत नहीं, कोई शिकवा नहीं। गलती किसी की हो, वो खुद खिसियाया हुआ सा कल फ़िर आने की  बात कहकर ’नमस्ते सर’ कहकर चला जाता। चौथे दिन इन नमस्तेओं से हताहत मैंने खुद उस ड्राफ़्ट बनवाने वाले साथी के पास खड़ाकर होकर अपने सुपरविज़न में ड्राफ़्ट बनवाया और चाशनी में लपेटकर इस ड्राफ़्ट के चक्कर में लगने वाले उस लड़के के चक्करों के बारे में सुनाया। साथी ने मुस्कुराते हुये पूछा, "सरजी,  कोई अपना है क्या जिसके लिये इतनी फ़िक्र कर रहे हो? ये तो नाम से ब्राह्मण लग रहा है कोई।" 

मैंने कहा, "हाँ यार, ये गलती तो बहुत बड़ी हुई। वो ब्राह्मण मैं गैरब्राह्मण,  वो हिंदीभाषी और मैं पंजाबी, वो यू.पी या बिहार का और मैं दिल्ली का,  अपना तो कहीं से भी नहीं लेकिन दोस्त अगर उसकी जगह तेरा लड़का होता तो.."

"अरे लो सरजी, आप तो बात का बतंगड़ बनाने लगते हो। आपकी बात का जवाब तो मैं बहुत अच्छे से दे दूँ  लेकिन फ़िर सोचता हूँ  कि बाहर वालों के लिये आपस में क्यों बिगाड़ना।"

मैंने हँसते हुये यही कहा कि दोस्त, इसी बात के बतंगड़ में तो हमें मास्टरी है।

हाँ, मैं तबसे  इस सवाल को और ज्यादा खोजने में लगा हूँ कि अपना कौन है और पराया कौन है? आपमें से किसी को जवाब मिले तो संभालकर रख लेना, कभी मिलेंगे तभी समझ लूँगा। यहाँ बताने के लिये कह दिया तो हो सकता है एक और विवाद शुरू हो जाये :)

                                                                                                    

रविवार, अप्रैल 07, 2013

स्टिंग ऑपरेशन

(एक निम्न मध्यमवर्गीय एकल परिवार के स्टिंग ऑपरेशन का नाट्य रूपांतरण)


"इतवार के दिन भी घर की समस्याओं की तरफ़ ध्यान मत देना, तुम्हारे किताबों में सिर छुपा लेने से जैसे सब काम अपने आप हो जायेंगे।  बच्चों के स्कूल खुल गये हैं। इस बार तीन महीने की फ़ीस जानी है, नई वर्दी और किताबें लानी हैं लेकिन तुम्हें इन सबसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पिछले महीने का मकान का किराया नहीं दिया अब तक।  मकान मालकिन कैसे टेढ़ा टेढा बोलती है, मैं जानती हूँ। लेकिन तुम्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता।   करम फ़ूटे थे मेरे जो.....।"

"अरे पूरे हफ़्ते वो मालिक खून पीता है, कम से कम एक दिन तो चैन की साँस आने दो। एक बार बड़बड़ाना चालू करती हो तो फ़िर दुरंतो एक्सप्रेस की तरह नोन-स्टोप भड़भड़ भड़भड़..। कई दिन से सोच रहा था कि अब मैं भी कविता लिखूंगा। मुश्किल से विचार इकट्ठे हो रहे थे, तुम्हारी बकबक एक्सप्रेस ने सब बिखेर दिया। तुम्हारे फ़ूटे करमों को भुगत कौन रहा है? मैं ही तो। ये नहीं कि एक प्याली चाय बना देती।"

"चाय नहीं, गरमागरम खीर बना देती हूँ न। दूध की तो नदियाँ बहा रखी हैं जैसे तुमने घर में। बच्चे भी दिन में एक से दूसरी बार दूध मांग ले तो दूध में फ़ैट और मिलावट बताकर बहला देते हो। लिखेंगे कविता देश को आगे बढ़ाने की, हुंह। जैसे तुम्हारे लिखने से ही  सारे हिंदुस्तानी देशभक्त बने  हैं। पहले पता होता कि तुम्हें कागज काले करने का शौक है तो मेरे पिताजी मुझे यहाँ झोंकते भला?"

"रहने दो तुम्हारी खीर, तुम्हारी बातों से ही पेट भर जाता है। अगले हफ़्ते तन्ख्वाह मिल जायेगी तो सब शौक पूरे कर लेना।    देशभक्ति पर लिखने के जनरली तीन मौके होते हैं  - छब्बीस जनवरी, पन्द्रह अगस्त और चुनाव। आज देशभक्ति पर नहीं, सामाजिक समस्या पर लिखने की सोची है।"

"जानती हूँ तुम्हारी कलमिया तलवार को, सामाजिक समस्या पर लिखोगे तो एक नई समस्या और पैदा हो जायेगी।"

"अरे गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, शोषण पर लिखूँगा लेकिन आज मैंने कविता जरूर लिखनी है, आधी प्याली चाय ही बना दो यार।"

"एक बार जता दिया तो समझ लेना चाहिये कि दूध खत्म है, चाय नहीं बन सकती।"

"अच्छा बाबा, तुम सही कहती हो।  देश नहीं, समाज भी नहीं, समस्या भी नहीं तो आज प्यार, रोमांस जैसी नाजुक भावनाओं पर ही कुछ कोशिश करूंगा लेकिन भगवान के वास्ते कुछ देर मुझे अकेला छोड़ दो। दिमाग वाला काम है बहुत।"

"नालायकों के बस्ते भारी, तुम लिखोगे प्यार-व्यार पर कविता?  किंतु तुम खुद ही तो कह रहे थे कि ये बहुत दिमाग वाला काम है?" ........................................... क्या हुआ, चुप क्यों हो गये?  कोई एक टॉपिक तो फ़ाईनल हुआ नहीं तुमसे, खाक कविता लिखोगे तुम।"

"मैं,  मैं तुम पर कविता लिखूँगा।"


"मुझ पर?"


"हाँ रानी, तुम पर। कैसे इतनी तकलीफ़ में भी तुम मेरा सहारा बनी हुई हो, मेरी हर समस्या से आगे बढ़कर जूझने लगती हो। कोई और होती तो कब की मुझे छोड़ गई होती।"

"तुम भी न बस्स, बाल पकने लगे लेकिन ..।   मैं अभी तुम्हारे लिये इलायची वाला दूध गरम करके लाती हूँ फ़िर आराम से बैठकर सोचना। बच्चों के साथ बाजार मैं ही चली जाऊंगी। तुम्हें भी तो आराम के लिये सप्ताह में  एक ही दिन मिलता है।" 
पति के बालों में उँगलियाँ फ़ेरकर प्रफ़ुल्लित मन से पत्नी  कमरे से बाहर निकल जाती हैं।