सोमवार, नवंबर 14, 2016

नाम खुमारी

आज फिर से फ़िल्म 'नमक हराम' की बात से शुरू करते हैं । 'नमकहराम' फिल्म में विक्की सेठ(अमिताभ) के सोनू(राजेश) से यह पूछने पर कि ये लोग कई साल से मेरे नौकर हैं और तुम्हें यहाँ आए अभी कुछ दिन हुए हैं लेकिन ये तुम्हें मुझसे ज्यादा क्यों चाहते हैं, सोनू पलटकर विक्की से उसके माली/ड्राईवर का नाम पूछता है जो विक्की नहीं बता पाता। सोनू कहता है कि आज इन लोगों को उनके नाम से पुकारना और देखना वो कैसे तुम्हारे लिए जान देने को तैयार हो जाएंगे। वो तो खैर फ़िल्म थी, कुछ ज्यादा ही हो गया लेकिन बात में दम है। व्यवहार में मैंने भी यह देखा है, यह बात प्रभावी है। खासतौर पर तब, जब सामने वाला आपको अपने से कहीं बहुत ऊंचा मानता हो।
एक कहावत भी है कि सबसे कर्णप्रिय आवाज 'अपना नाम' है।
कहने को शेक्सपियर ने भी कहा बताते हैं कि नाम में कुछ नहीं रखा है लेकिन उसके सामने कोई यही बात किसी और के नाम से क्वोट कर देता तो पक्की बात है शेकूआ उससे गुत्थमगुत्था हो जाता
अक्सर फेसबुक पर भी देखा है कि कोई कहानी या कविता किसी अखबार या कवि सम्मेलन में छपती या पढी जाती है तो बाद में रौलारप्पा हो जाता है। खैर, यह भी सम्वाद का एक तरीका ही है। प्रसिद्धि के लिए तो लोग कपड़े तक उतार लेते हैं और कई अपने कपड़े फाड़कर भी नाम जरूर कमाना चाहते हैं। सोशल मीडिया पर भी बहुत उदाहरण मिल जाते हैं, लोग बहुत कुछ सिद्ध कर लेते हैं।
मैं अक्सर बहक जाता हूँ। सोचता कुछ हूँ, लिखना कुछ और चाहता हूँ और लिख कुछ और जाता हूँ।
सिखों के प्रथम गुरु श्री नानक देव जी की आज जयन्ती है। उन्हें प्रणाम करने लगा तो उनका कहा 'नाम खुमारी नानका, चढी रहे दिन रात' याद आ गया मन में सवाल ये आयाकि गुरु नानक देव जी ने जब यह उचारा तो वो किस नाम की खुमारी की बात कर रहे थे?
गुरु नानक देवजी द्वारा की गई यात्रायें 'चार उदासियों'  के नाम से जानी जाती हैं। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान वो सिद्धों के इलाके(आज तारीख में तराई का इलाका) में पहुँचे। अपने वर्चस्व वाले इलाके में एक नये साधु का आना सुनकर उन्होंने एक बर्तन भेजा, जो लबालब दूध से भरा हुआ था।  लाने वाले ने वो बर्तन पेश किया और चुपचाप खड़ा हो गया, गुरू साहब ने उस बर्तन में गुलाब के फ़ूल की पंखुडियाँ डाल दीं जो दूध के ऊपर तैरने लगीं। इन यात्राओं में बाला और मरदाना उनके सहायक के रूप में शामिल थे। ये माजरा उन्हें समझ नहीं आया तो फ़िर गुरू नानक देव जी ने उन्हें समझाया कि सिद्धों ने उस दूध भरे बर्तन के माध्यम से यह संदेश भेजा था कि यहाँ पहले से ही साधुओं की बहुतायत है, और गुंजाईश नहीं है। गुरूजी ने गुलाब की पंखुडि़यों के माध्यम से यह संदेश दिया कि  इन पंखडि़यों की तरह दूध को बिना गिराये अपनी खुशबू उसमें शामिल हो जायेगी, अत: निश्चिंत रहा जाये। उसके बाद दोनों पक्षों में प्रश्नोत्तर भी हुये। 
 सिद्धों ने एक प्रश्न किया था कि आप ध्यान के लिये किन वस्तुओं का प्रयोग करते हैं? 
उत्तर देते हुये गुरू नानक देव जी ने कहा था, "नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात"  कि प्रभु नाम सिमरन की ये खुमारी दूसरे नशों की तरह नहीं कि घड़ी दो घड़ी के बाद उतर जाये। ये तो वो नशा है जो एक बार चढ़ जाये तो दिन रात का साथी बन जाता है।
अपना या अपनों का ही नहीं, सबका सुख यानी 'सरबत दा भला' माँगता ये गीत सुनिए - 


शुक्रवार, अक्तूबर 21, 2016

हैलो हैलो...

"हैलो"
"हाँ जी, कूण बोल रहे हो?"
"अबे बावले, मैं हूँ ....। बोल के बात थी?"
"नमस्ते ... साब, मैं नूं कहूँ था जी अक आज मैं आऊँ के न आऊँ। मैंने सोची फोन पे.."
"लै भाई, मैं किस तरयां बता दूं कि तू आ या न आ?"
"जी मेरा मतबल था कि बेरा तो होना चाहिए न? म्हारे अफसर हो आप।"
"भाई, तू देख ये तो।"
"न जी, वो बात न है। देखणा तो मन्ने ही है पर फोन करना तो मेरा बने ही था न कि आज आऊं के न आऊं?"
"अरे बावले, फेर वाई बात। मैं कह दूं कि आ जा और तैने न आना हो तो? और मैं कहूँ कि न आ और तैने आना हो, फेर? तूए देख ये।"
"आप समझो तो हो न बात को, शुरू हो जाओ हो। भड़क जाओ हो तावले सी।"
"लै! मैं के न्यूए भड़क गया? बाउली बात पूछेगा तो तेरे गीत गाऊंगा?"
"मन्ने के पूछ ली आपते? मैं तो नूं कह रा था कि आज मेरा ड्यूटी पे आण का पक्का न है। आ भी सकूँ हूँ और न भी आ सकूँ हूँ। कैश में किसी को बैठा दियो आप, कदे मेरीए बाट देखे जाओ।"
"सच में बावली ... है, शुरुए में न कह देता ये बात?"
"और के कहण खातर फोन करया था? न्यौता देऊँ था के? यही तो कहण लग रया हूँ सुरु से कि आज आऊँ के न आऊँ"
"अच्छा छोड़ बाउली बात, नूं बता के आएगा ड्यूटी पे अक नहीं?"
"ह्ह्ह्ह, जी आ भी सकूँ हूँ और हो सके न भी आऊँ।"
.................
मोबाइल पीढी को इस लैण्डलाईनिया वार्ता को समझना शायद पकाऊ काम लगे, पर अपनी ऐसी कई यादें लैंडलाइन से जुडी हैं।
एक पुराना पोलिटिकली करेक्ट वार्तालाप अचानक याद आ गया।

शनिवार, अक्तूबर 15, 2016

सबको मालूम है....

ब्रांच में FD receipts खत्म होने वाली थीं। यह   ’ सिक्योरिटी स्टेशनरी’ श्रेणी में आती हैं। शाखायें अपने स्तर पर प्रिंट नहीं करवा सकतीं बल्कि बैंक स्वयं इनकी प्रिंटिंग करवाकर शाखाओं को उनकी आवश्यकतानुसार  जारी करता है ताकि इनका दुरुपयोग न हो सके। मैंने स्टाफ़ में पूछा कि बताओ भाई कौन लेने जाना चाहेगा? (दिल्ली के ऑफ़िस से लानी थी, आम तौर पर देखा है कि स्टाफ़ में टीए बिल वगैरह का उत्साह रहता है। ’अंधे की मक्खी राम उड़ाये’ चरितार्थ हो रही थी, एक भी स्टाफ़ वैसा नहीं निकला जैसा लोग बताते थे। एक सुर में सबने कहा कि आप का घर दिल्ली में है, कल आराम से वहाँ से FD कलेक्ट करिये। लखनवी नवाबों वाली बात हो गई, मैं उन्हें कहूँ कि आपस में सलाह करके कोई एक चला जाये और वो सब मुझे कहें कि रोज भागमभाग करते हो तो एक दिन ऑन ड्यूटी आराम करिये। पूरे दिन के आराम के बदले बड़े ऑफ़िस में जाकर सबको नमस्ते करना अपने को सस्ता सौदा नहीं लगा। कोई निर्णय नहीं हो पाया।
थोड़ी देर में फ़रीदाबाद ब्रांच के हमारे चीफ़ मैनेजर साहब का किसी काम से फ़ोन आया। चौधरी साहब आयु, पद दोनों पैमानों पर अपने से बहुत सीनियर बैठते थे और सबसे बड़ी बात उनका आपसी व्यवहार, अपने से छोटों को भी हमेशा सम्मान देकर बुलाते। एक और मजे की आदत, मुझे हमेशा ’चौधरी साहब’ या ’छोटे भाई’ कहकर बुलाते थे और ”चौधरी’ बुलाने पर मेरे प्रतिवाद करने पर कहते, "बता मोहे, कहाँ लिखा है कि चौधरी सिर्फ़ हम गुज्जर या जाट ही होंगे?"  बातों-बातों में  मैंने पूछा कि इमरजेंसी स्टॉक में से कुछ FD दे सकेंगे क्या?
"अरे ले लो चौधरी साब, हैं तो हमारे पास भी कम ही लेकिन आपका काम तो चल ही जायेगा। मैं अगले  हफ़्ते किसी को भेजकर अपने लिये और मंगा लूँगा।" चलो जी, समस्या सुलझ गई। शाम को प्रतिदिन वाले समय से एक घंटा पहले निकलकर मैं चौधरी साहब की ब्रांच में पहुँच गया। हमेशा की तरह बहुत प्यार से गले मिले, सफ़ाई कर्मचारी को आवाज लगाई, "ओ जिज्जी, दो गिलास पानी ला ठंडा। और जूस बोल दे, छोटा भाई आया है बहुत दिन के बाद।" पानी आ गया, जूस के लिए जिज्जी को मैं मना करता रहा लेकिन चीफ़ साहब की बात का मोल ज्यादा होना ही था। साधारण बातचीत होती रही, जूस आ गया और पी लिया। अब काम की बात करनी थी क्योंकि बैंक बंद होने का समय भी हो रहा था। चौधरी साहब घंटी बजाने लगे, उनकी शाखा के FD इंचार्ज का नाम लेकर बोले, "फ़लाने को कह दूँ आपको FD recipts दे देग।" मैंने डिमांड लेटर पर     उनकी  स्वीकृति लेते हुए कहा, "जी,  बुलाने की क्या जरुरत है? एक बार बात सुनने आयेगा, फ़िर सामान देने आयेगा। मैं ही जाकर ले लेता हूँ।" और फ़लाने साहब के पास पहुँच गया। फ़लाने साहब से मुलाकात पहली थी लेकिन फ़ोन पर अच्छा परिचय हो चुका था, किसी पेंशनर द्वारा उनकी शिकायत होने पर चौधरी साहब ने मेरे ही कान पकड़कर मामला खत्म करवाया था तो फ़ोन पर ये भी कई बार आभार प्रकट कर चुके थे। मैंने जाकर अपना परिचय दिया और चौधरी साहब द्वारा FD receipts जारी करने की परमीशन वाला लेटर उन्हें दिया। एक और ग्राहक भी उनकी टेबल पर शायद मेरे आगे आगे पहुँचा ही था। लेटर हाथ में लेकर इंचार्ज साहब कहने लगे, "FD receipt तो मेरे पास भी खत्म ही होने वाली हैं। वेरी सॉरी, मेरी भी खत्म हो ही गई थीं। मैं उस ब्रांच में गया तो उन्होंने नहीं दी फ़िर दूसरी ब्रांच में गया तो बहुत रिक्वेस्ट करने के बाद थोड़ी सी दी हैं। ये है, वो है, ऐसा है, वैसा है। सॉरी सर।" 
"ओके, कोई बात नहीं।" मैं मुड़ा तो उन्होंने आवाज लगाकर रोका।
"एक मिनट, सर"
"हाँ, जी?"
"एक बात पूछूँ आपसे?"
"पूछो न"
कुछ रुककर कहने लगा, "आप एक गलती करके आये हो। मैं सही कह रहा हूँ न?"
अब मेरा माथा थोड़ा सा ठनकने लगा, "होश संभालने के बाद मैंने गलतियाँ ही की हैं। आप किस गलती की पूछ रहे हो, सीधे से पूछोगे तो हाँ या न बताऊँ, मुझसे गोलमोल बातें ज्यादा देर होती नहीं।"
"आप सीधे अपनी ब्रांच से आ रहे हैं, आपने ड्रिंक कर रखी है न?"
".... जी, मैंने किसी जन्म में इतनी पी थी कि इस जन्म में मरते दम तक भी न पियूँगा तो काम चल जायेगा।"
"ये बता दो सरजी, मैं ठीक कह रहा था न?"
कोई अच्छा सा जवाब ही दिया होगा मैंने भी, क्योंकि वो मुझे अब याद नहीं।    मैं चौधरी साहब के केबिन में आ बैठा। चौधरी साहब फ़ाईलों में उलझे थे, मुझे देखा तो पूछा, "मिल गईं चौधरी साब?"
मैंने हँसते हुए कहा, "FD तो नहीं मिलीं, खत्म हो रही बताते हैं लेकिन एक सर्टिफ़िकेट जरूर मिल गया।"
"कैसा सर्टिफ़िकेट? क्या बात हुई?"
मैं अपनी दिल्ली की पुरानी ब्रांच में फ़ोन कर रहा था। मित्र अभी बैंक में ही था, उसे बोला कि थोड़ी सी FD चाहियें, निकलवाकर रख लेना। मैं अभी और लेट हो जाऊंगा, आकर साईन कर दूँगा।
चौधरी साहब फ़ाईल साईड में रखकर बैठे थे। "क्या बात हुई, वहाँ क्यों तंग कर रहे हो उन्हें?" १ घंटा और बैठना पड़ेगा उन लोगों को भी।"
मैंने बताया कि एक घंटा नहीं, कम से कम दो घंटे और बैठना पड़ेगा मेरे दोस्तों को। मेरे काम से जा रहा हूँ तो भी बिना कुछ खिलाये-पिलाये नहीं जाने देंगे :)
अब चौधरी साहब मेरे पीछे पड़ गये, "कौन से सर्टिफ़िकेट की बात कर रहे थे। मुझे बात बताओ पूरी।"  
बतानी पड़ी, ये भी बताया कि हो सकता है जिज्जी जो जूस लाई थी उसीमें कुछ मिला हो :) 
सुनते ही चौधरी साहब ने घंटी बजाई, "इसकी तो @^#%$   ^& @&^,  हिम्मत कैसे हो गई उसकी?" 
जिज्जी उन फ़लाने साहब को बुलाने गई और फ़ौरन ही लौट भी आई। "साहब, उनसे गलती हो गई थी। आपके आने के बाद वो बहुत पछता रहे थे। मैं वहीं सफ़ाई कर रही थी उस समय जब आपसे उनकी बात हो रही थी। वो एक और कस्टमर और आप दोनों एक साथ ही उनकी टेबल पर पहुँचे थे, उसने पी रखी थी।" फ़िर चीफ़ साहब से बोली, "साहब जी, डाँटियो मत ज्यादा। अभी महीने भर की छुट्टी से आया है बीमारी के बाद, हार्ट का पेशेंट वैसे है। सच में उसे गलती लग गई, आपके बुलाने से पहले ही बहुत परेशान हो रहा था।"
तब तक वो खुद भी आ गया और कुछ कहे जाने से पहले ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। बहुत शर्मिंदा होते हुए वही सब बताने लगा, "उस कस्टमर के कारण मुझसे बेवकूफ़ी हो गई। मैंने उसे भगा दिया, ऐसा हुआ वैसा हुआ।"
चौधरी साहब को मैंने ही रिक्वेस्ट करके शांत किया, "जाने दो चौधरी साहब, इनकी गलती न है। मेरी शक्ल ही ऐसी है।"
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फ़ेसबुक पर एक प्यारा सा शरारती मित्र बना। कुछ दिन पहले कभी मिलने की बात हो रही थी तो बोला, "सर, एक बार आपके साथ बैठकर पीनी है।" 
क्या कहता मैं? 
यही कहा, "ठीक है भाई, मेरे साथ बैठके पी लियो।" 
गलती तेरी न है, मेरी शक्ल ही ऐसी है:) 




गुरुवार, अगस्त 25, 2016

मुफ़्तिये भगत

जून माह में निंदक जी और छत्तीसगढ़ वाले ललित शर्मा जी के साथ कुमाऊं जाने का अवसर मिला। पह्ले दिन का ठहराव हुआ रानीखेत से लगभग ४ किमी बाहर एक रिसोर्ट में। अगले दिन सुबह हम कुकुछीना नामक स्थान के लिये चल दिये। रास्ते में द्रोणागिरी मंदिर आया जिसकी स्थानीय निवासियों में बहुत मान्यता है। यह मंदिर सड़क से लगभग १ किलोमीटर अंदर ऊंचाई पर स्थित है। हमारी गाड़ी एक बार पंचर हो चुकी थी तो उस समय की भरपाई हमने सड़क से ही मस्तक नवाकर कर ली, विश्वास रहता है कि हमारे देव बहुत दयालु हैं J
रानीखेत से द्वाराहाट होते हुये कुकुछीना की दूरी लगभग ५५ किलोमीटर है। बहुत छोटी सी एक बस्ती जिसमें प्रवेश करते ही एक गेस्ट हाउस, तय था कि हमें यहीं रुकना है। सामान कमरे में पटककर भोजन किया और बाबाजी की गुफ़ा में जाने के लिये तैयार हो गये। लगभग डेढ किलोमीटर एक बहुत संकरा मार्ग है जहाँ तक कार जा सकती है उसके आगे गुफ़ा तक जाने के लिए खड़ी चढ़ाई है। जहाँ तक कार जा सकती थी गये और फ़िर उतरकर हम तीनों मलंग पैदल चल दिये।
अब तक इस छोटे से रास्ते में न कोई वाहन दिखा था और न कोई मनुष्य। अनुमान से एक तरफ़ चढ़ाई शुरु की तो दूर से एक महिला ने चिल्लाकर हमें सचेत किया कि गुफ़ा के लिए जाना है तो उस रास्ते से मत जाओ, इधर से जाओ। हम उधर चल दिये तो उन महिला ने रास्ते की निशानी बताई और वहीं अपनी झोपड़ीनुमा मकान के बाहर रखी लकड़ियों में से छड़ी जैसी निकालकर दी कि ये ले जाओ, चढ़ाई में काम आयेगी। अकेला परिवार वहाँ पहाड़ की तलहटी में रह रहा था, आदमी बैठा था और महिला कपड़े धोकर सुखाने वाली थी कि उसकी नजर हमपर पड़ी थी और उसने आवाज लगाई। मकान के दरवाजे पर ’यहाँ चाय मिलती है’ लिखा था, चायपान का कार्यक्रम वापिसी के लिये सोचकर और लौटते समय छड़ी लौटाने की कहकर हम चलने लगे।

इस यात्रा का कार्यक्रम अचानक ही बना था। असल में इन दिनों में ललित जी को मोटरसाईकिल पर लेह-लद्दाख जाना था लेकिन अचानक स्वास्थ्य संबंधी कुछ समस्याओं के कारण उन्हें वो कार्यक्रम छोड़ना पड़ा था। वहाँ नहीं जा पाये तो उन्होंने निंदक जी से फ़ोन पर बात की, निंदक जी ने अपने पास बुला लिया कि आप बस गाजियाबाद तक आ जाओ तो आपकी यात्रा की हुड़क मैं पूरी करवा दूँगा। भीतर की बात ये थी कि निंदक जी कई बार मुझे कह चुके थे कि पहली बार ऐसा हुआ है कि पहाड़ों पर जाने में मुझे इतना गैप हो गया, मैं तो इस समय बुरी तरह बेचैन हो रहा हूँ। ऐसे में ललित जी ने जब फ़ोन पर अपनी पीड़ा बताई तो वही बात हो गई कि ’इधर से तो बुआ के मन में जाने की थी और उधर से फ़ूफ़ा लिवाने आ गया।’ अच्छा, मेरा कोई प्रोग्राम था नहीं लेकिन बाद में बुआ कौन और फ़ूफ़ा कौन वाला विवाद न हो इसलिये जनहित में मैं भी साथ में टँग लिया था, मेरे लिये तो भई दोनों ही अग्रज आदरणीय ठहरे।
तो अब पेंच ये फ़ँसा कि जब योगी जी की गुफ़ा के लिए चढ़ाई शुरु करने लगे तो ललित जी को लगने लगा कि तबियत ठीक नहीं है। उन्होंने तय किया कि वो वहीं बैठेंगे, चाय पियेंगे और उन लोगों से गपशप करेंगे। निंदक जी और मैं गुफ़ा की ओर चल दिए। बहुत छोटा सा ट्रैक है लेकिन रास्ता बहुत मनोरम। गुफ़ा तक जाने में रास्ते में दो ग्रुप मिले जो वापिस आ रहे थे। कुछ देर में गुफ़ा तक पहुँच गये, योगदा ट्रस्ट वालों ने उस गुफ़ा को अब एक छोटे कमरे का रूप दे रखा है। हम वहाँ पहुँचे तो अंदर कोई अनुष्ठान चल रहा था, शायद ५-६ तमिल भाषी लोग बैठे थे और मंत्रोच्चारण और पूजा चल रही थी।


गेस्ट हाऊस से चले तो गुफ़ा तक ही आने की सोचकर आये थे क्योंकि दोपहर के बाद खाना खाकर तो हम चले ही थे और हमें यही बताया था कि गुफ़ा और टॉप दोनों जगह जाने का प्रचलित रास्ता अलग अलग है। गुफ़ा के बाहर पूजा करवा रहे लोगों का ड्राईवर बैठा था, उसने कहा कि अगर बहुत थकान न हो रही हो तो शार्टकट से ऊपर भी जा सकते हैं, पहाड़ की टॉप ’पांडुखोली’ या ’पांडवखोली’ कहलाती है और वहाँ एक घास का मैदान और मंदिर भी है। ऐसा माना जाता है कि पाँडव अपने अज्ञातवास के दौरान वहाँ रुके थे। हम ऊपर की ओर चल दिये।
 फ़िर वही वीराना पहाड़ी रास्ता, कहीं कहीं छोटी सी पगडंडी, बीच बीच में पत्थरों पर पेंट का निशान ताकि जाने वाले रास्ता न भटकें। मौसम बता रहा था कि कभी भी बारिश हो सकती है। निंदक जी सरकारी सेवा से निवृत्त हो चुके हैं लेकिन पहाड़ी रास्तों पर चलने के अभ्यस्त हैं और जवानों से भी ज्यादा फ़िट। वो आगे थे, रास्ता पहचानते थे और मैं लक्ष्मण की तरह उनके पैरों को देखकर पीछे घिसटता रहा।

एकदम कैजुअल मूड में हम चढ़ते जा रहे थे, एकाध बार बूँदाबांदी भी हो चुकी थी। बिना रुके चल रहे थे, अब पसीना भी बहुत आने लगा था। ऊपर से उतर रहे एक दो सन्यासी मिले, अभिवादन होता और वो हमारा उत्साह  बढ़ाते हुए उतरते गये, ’बहुत अच्छे, बस पहुँच ही गये।“ हम टॉप पर पहुँच गये, सामने बड़ा सा घास का मैदान। बहुत से फ़ूल उगे हुये, पृष्ठभूमि में मंदिर और चढ़ाई चढ़ पाने की संतुष्टि, सब अच्छा ही अच्छा लगने लगा। दूर मंदिर में एक ऊँचे स्थान पर खड़े एक साधु की आकृति भी दिख रही थी, वो भी इधर ही देख रहे थे।




अब हम रुककर आराम से वो नजारा देखने लगे, किसी डेकोरेटिड पार्क में घास फ़ूल अलग तरह के होते हैं और प्राकृतिक जगहों पर अलग तरह के। एक में ब्यूटी पार्लर वाली चमक दमक और एक में नैसर्गिक सौन्दर्य। इतने में जोर से बारिश होने लगी, शाम भी कुछ देर में ढलने को ही थी। मैदान के पार मंदिर और नीचे चाय सुड़कते ललित जी, हमें अपेक्षा से अधिक समय लग गया था तो वो चिंतित न हो रहे हों, हम दोनों तरफ़ सोच रहे थे। अब ध्यान आया कि छोटा हैंडबैग तो ललित जी के पास ही है, हम तो एकदम कैजुअल मूड और ड्रेस में थे। टीशर्ट में जेब नहीं और ट्रैक पैंट में मोबाईल भी मुश्किल से फ़ँसाया था। इतनी दूर तक आये हैं और जेब में एक पैसा भी नहीं कि मंदिर में कुछ चढ़ा भी सकें। मैं तो ठहरा पलायनवादी आदमी, निंदक जी को सुझाव दिया कि पहाड़ पर ही तो चढ़ना था सो चढ़ लिये। चैलेंज पूरा हुआ, बाकी अपने भगवान जी तो सर्वव्यापक हैं उन्हें यहीं से प्रणाम करके लौटते हैं। निंदक जी बोले, “भगवान की तो कोई बात नहीं लेकिन उन बाबा ने हमें देखा है और हम यहाँ तक आकर बिना मंदिर गये लौट जायेंगे तो वो क्या सोचेंगे? चलो, देखते हैं।“ हम मंदिर की ओर चल दिये।
मंदिर परिसर अच्छा खासा बड़ा है, पहुँचे तो वहाँ एक स्थानीय युवा ने आकर अभिवादन किया और हम कहाँ से आये हैं आदि बात करने लगा। बहुत सभ्य लड़का था, मंदिर का सेवादार ही था। फ़ौरन दो गिलास पानी लाया, “पानी पीजिये, आप थक गये होंगे क्योंकि यह रास्ता थोड़ा कठिन है, लोग दूसरे रास्ते से आते हैं जो थोड़ा लंबा है लेकिन अपेक्षाकृत सरल है।“ हमने पानी पीकर लड़के का धन्यवाद दिया और हँसकर बताया कि हम तो बाहर से लौटने वाले थे। कारण जानकर वो भी हँसने लगा और पैसे न होने के कारण मंदिर से बाहर से ही लौट जाने वाली हमारी सोच की मीठी निंदा की(निंदा यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ रही J ) बल्कि यह जानकर कि मलंग बिल्कुल खाली हाथ हैं, उसने विशेष आग्रह किया कि आप दर्शन कर लें तब तक मंदिर की रसोई में आपके लिये चाय बनवा रहा हूँ। एक तरह से यह आग्रह जबरदस्ती वाला था, दर्शन के पश्चात रसोई में जाकर चूल्हे पर बनी चाय पी। मंदिर के सेवादार अपनी रात की रसोई की तैयारी कर रहे थे, चाय पीने के बाद जब उन लोगों को धन्यवाद दिया तो उनकी तरफ़ से भोजन का भी आग्रह किया गया और रात को सोने का प्रबंध होने का भी। फ़िर कभी दोबारा आने की कहकर हमने उन लोगों से विदा ली।


लौटते समय हम एक जगह गलत मोड़ पर मुड़ गये, अच्छा खासा लंबा रास्ता चलना पड़ा लेकिन लक्ष्य मालूम था तो कोई समस्या नहीं हुई। सही रास्ते से थोड़ा सा विचलन लक्ष्य तक पहुँचने में विलंब कर देता है।तब तक ललित जी उस पहाड़ी परिवार से स्थानीय विषयों की जानकारी लेते रहे। हम लोगों ने चाय पी और गेस्ट हाऊस के लिये चल दिये। यहाँ भी मजे की बात ये हुई कि वो परिवार चाय के पैसे लेने को तैयार नहीं हो रहे थे, एक तरह से जबरन ही देने पड़े। जब उन्हें याद दिलाया कि टी-स्टाल लिख रखा है इसलिए पैसे लेने में संकोच तो बिल्कुल नहीं करना चाहिये, महिला ने बताया कि टी-स्टाल का पोस्टर मंदिर के बाबाजी ने जोर देकर लगवाया था कि आगंतुकों की सहायता तो तुम लोग वैसे भी करते ही हो। 
समाज वही है, जहाँ परस्पर हित की भावना हो।
मंदिरों के पास बहुत धन संपत्ति है, समाज के लिये उसका कुछ उपयोग नहीं होता आदि आदि जैसे प्रलाप सुनकर मुझे आत्मग्लानि नहीं होती बल्कि ’हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊँ’ वाला मुहावरा याद आता है। श्रद्धालुओं द्वारा दान या चढ़ावा धार्मिक भावना से धर्म के कार्य के लिये प्रयुक्त किये जाने के लिये किया जाता है लेकिन वो पैसा किस मद में खर्च होगा ये श्रद्धालु तय नहीं कर सकते क्योंकि बहुसंख्यक समाज के बड़े मंदिरों का स्वामित्व सरकार के हाथ में है। यह राशि सरकारी खजाने का हिस्सा बनती है और सरकारी संसाधनों पर पहला हक उस  वर्ग का नहीं जिसका इसे भरने में सबसे ज्यादा योगदान है।