गुरुवार, फ़रवरी 25, 2010

जब दर्द नहीं था सीने में

आज पता नहीं क्यों वो गाना बहुत याद आ रहा था "जब दर्द नहीं था सीने में तब ख़ाक मजा था जीने में|" जब दो तीन बार लगातार सुना तब एकदम समझदानी के दरवाजे खुल गए| ये बात थी, ..

वाकई, आजकल जीने में बहुत मजा आ रहा है, मजा है कि बढ़ता ही जा रहा है और बढ़ता ही जा रहा है|

सही कहा हुजूर, "जब दर्द नहीं था सीने में तब ख़ाक मजा था जीने में|"

सोमवार, फ़रवरी 22, 2010

एक कदम और


आज सागर नाहर जी की एक पुरानी पोस्ट पढ़कर ये प्रयोग किया है, देखते हैं कैसा नतीजा आता है। सफ़ल हो गये तो बल्ले-बल्ले, नहीं तो हमेशा की तरह थल्ले-थल्ले। बहरहाल, सागर जी तो धन्यवाद के पात्र बनते ही हैं।



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वैसे अपनी पसंद भी शायद निराली ही है।

शनिवार, फ़रवरी 20, 2010

एक दिन या पूरा एक जीवन? भाग ५

गाड़ी पार्किंग में लगाकर दोनों प्रवेश द्वार की और बढ़े| राजीव ने दो टिकट खरीदे और सौम्या से वहीं इन्तजार करने के लिए कहकर एक ओर गया और थोड़ी देर में जब वापिस लौट कर आया तो उसके हाथ में कुछ खाने का सामान और सोफ्ट ड्रिंक्स की पेट बोतलें थीं| सौम्या हँस पड़ी और कहने लगी क़ि आज तो पूरी पिकनिक की तैयारी है| दोनों रॉक -गार्डेन में प्रविष्ट हुए| धीमे-धीमे चहलकदमी करते हुए और हर कलाकृति का ध्यान से अवलोकन करते हुए आगे बढ़ते रहे| राजीव का तो जैसे वहां एक-एक कदम जाना पहचाना था| हर कलाकृति के बारे में सौम्या को जानकारी देते हुए अब तक वह एक गाईड की भूमिका में आ चुका था और सौम्या भी इन क्षणों को पूरे आनंद से भोग रही थी| कैसे एक साधारण से सरकारी कर्मचारी ने अपने जुनून में शहर भर से कबाड़ इकट्ठा किया और एक ऐसी दुनिया रच डाली जो देखने वालों को सम्मोहित कर देती थी| उन्हें इस तरह से घूमते हुए काफी देर हो गयी थी| राजीव ने कुछ देर आराम करने का सुझाव दिया जो सौम्य को बहुत पसंद आया| वहीं एक साफ़ सी जगह पर दोनों बैठ गए और साथ लाये खाने का पैकेट खोल लिया|
सौम्या ने चुप्पी तोड़ते हुए राजीव से फिर उसके परिवार की जानकारी लेनी चाही| राजीव ने उसकी बात ख़त्म होने से पहले ही पूछ डाला, "ये सामने खिला फूल कितना सुंदर लग रहा है, सच कहना तुम्हें इसे देखकर कैसा लग रहा है?" सौम्या का ध्यान सामने खिले गुलाब के फूल पर गया और देखकर उसे अफ़सोस हुआ की उसने पहले यह क्यों नहीं देखा| वो बोली, "सर, फूल तो वाकई बहुत खूबसूरत लग रहा है| वैसे फूल तो प्यारे ही होते हैं, नहीं क्या?" "फूल तो प्यारे होते ही हैं, बात उसे देखने वाले की नजर की और भावना की है| देखो न, इसी गुलाब को देखकर कोई इसे तोड़कर व्यक्तिगत सज्जा के लिए अपने किसी प्रिय को भेंट करना चाह रहा होगा तो कोई इसे भगवान् को अर्पित भी करना चाह रहा होगा| किसी के मन में तो इसे इसकी डाली से अलग करने की इच्छा हो रही होगी और कोई मेरे जैसा यह सोच रहा होगा कि इस गुलाब की सुन्दरता इसी तरह बरकरार रहे ताकि देखने वालों को भी सुख मिले और यह भी अपनी जगह से विस्थापित न हो|" राजीव जैसे एक सांस में ही सारी बात बोल गया| दो पल चुप रहकर वह सौम्या से पूछने लगा, "सौम्या, तुम्हें मैं कई साल से जानता हूँ, परिचय बेशक बहुत प्रगाढ़ ना रहा हो, पर मैं तुमसे बहुत प्रभावित रहा हूँ| मेरा तुमसे इस बारे में बात करने में वही अभिप्राय है जो इस गुलाब के बारे में मेरे विचार है| तुम खुश क्यों नहीं दिखाई देती हो? साफ़ दिखाई देता है क़ि तुम बहुत गंभीर सी होती जा रही हो| जिस सौम्या को मैं जानता था वह एक खुशमिजाज और हंसमुख लडकी थी, बल्कि तुम्हारी शादी के फ़ौरन बाद से ही तुम एकदम बदल गयी हो| बदलाव तो हरेक में आता है लेकिन एक हंसता-खेलता इंसान एकदम संजीदा हो जाए तो हैरानी होती है| मेरा तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं है, आज के बाद शायद हमारी मुलाकात भी न हो, आज तुम इन दो तीन घंटों में मुझसे अपना दुःख-दर्द बाँट सको तो शायद अच्छा रहेगा| मैं तुम्हारा शुभचिंतक हूँ, अगर भरोसा कर सको तो मुझे बताओ क़ि क्या है जो तुम्हें अन्दर ही अन्दर साल रहा है?"
सौम्या को यह अंदाजा नहीं था कि राजीव सीधे उससे ऐसे सवाल करेगा लेकिन आज का दिन ही उसके लिए अप्रत्याशित था, सुबह से ही घटनाएं एक के बाद ऐसा रूप ले रही थीं कि वह कुछ तय ही नहीं कर पा रही थी कि क्या करे ओर क्या न करे| फिर राजीव पर उसे इतने भरोसा तो था ही कि उसके हाथों किसी प्रकार का अनिष्ट नहीं हो सकता| थोड़ा सोच कर सौम्या ने अपनी जीवन गाथा कहनी शुरू की|
बचपन बीतने के कुछ बाद ही पापा की मृत्यु ने उसे अपने रिश्तेदारों पर आश्रित कर दिया था, जहां सिर्फ पढाई का खर्च देकर उससे सारा दिन घर के काम करवाये जाते थे ओर फिर बात बात पर इस बात का अहसान जताया जाता था कि वह एक अवांछित बोझ थी| पढाई का शौक उसे जरूर था और यही शौक उसे जिन्दगी में सहायक हुआ| मेधावी छात्रा होने का लाभ यह हुआ कि हाई स्कूल के बाद से ही छात्रवृत्ती जो मिलनी शुरू हुई मानो उसके जीवन को एक लक्ष्य मिल गया| एम.एस.सी. में तो उसने गोल्ड मेडल प्राप्त किया और तब तक उसके पालकों को भी उसमें कुछ गुण दिखने लगे थे| उज्जवल भविष्य को देखते हुए शादी भी अच्छी जगह हो गयी| शादी के बाद तक अनुज भी उसी की तरह ऐड-हाक प्रवक्ता के रूप में एक प्राईवेट कालेज में नियुक्त था और सरकारी नौकरी के लिए प्रयासरत था| शादी के फ़ौरन बाद ही सौम्या को नौकरी के साथ घर-परिवार की पूरी जिम्मेदारी उठानी पड़ गयी ताकि अनुज निश्चिन्त होकर प्रतियोगिता की तैयारी कर सके| घर संभालने में तो खैर सौम्या को कोई परेशानी नहीं आई और अनुज का स्वभाव भी अच्छा ही था लेकिन सौम्या का बोझ बढ़ता ही गया और नौबत यहाँ तक आई कि अनुज ने नौकरी छोड़ दी और घर, समाज और यहाँ तक कि अपनी नव विवाहिता पत्नी की तरफ ध्यान देना भी बंद कर दिया| उसपर सिर्फ एक ही धुन सवार थी, कैरियर बनाना है और यहाँ तक सौम्या को कुछ गलत भी नहीं लगा क्योंकि उम्र के अनुसार यह समय कैरियर बनाने का था| अनुज के लिए आवेदन-पत्र लाना, ड्राफ्ट बनवाना और उन्हें पोस्ट करना, ये सब काम भी सौम्या ही कर रही थी| अनुज की मेहनत और सौम्या का समर्पण रंग लाया और अनुज केंद्र सरकार की ग्रेड १ की परीक्षा में सफल हुआ| इस सफलता का श्रेय मिला अनुज की जीतोड़ मेहनत को और ईश्वर व माता-पिता के आशीर्वाद को| कद्र नहीं हुई तो सौम्या के त्याग की, अनदेखा किया गया तो सौम्या द्वारा दिए गए सहयोग को और उपेक्षा हुई तो सौम्या की इच्छाओं की| अनुज अपनी नई नौकरी में ऐसा व्यस्त हुआ कि भूल ही गया कि सौम्या भी उसीके समकक्ष प्रतिभा रखती है और अपने उस वादे को जो शायद उसने बिना किसी इरादे के ही शादी के फ़ौरन बाद सौम्या से किया था कि एक बार मैं सफल हो गया तो तुम अपनी यह अस्थाई नौकरी छोड़ देना और पूरी तरह अपने कैरियर को स्थाई रूप देना| अब एक राजपत्रित अधिकारी के रूप में उसका वेतन इतना तो था ही कि इन दो जनों का गुजारा अच्छे से चल जाता लेकिन कुछ तो नई नौकरी की जिम्मेदारियां और कुछ प्रेक्टिकल जीवन से वास्ता पड़ा तो जो जिम्मेदारियां सौम्या अब तक संभाल रही थी, उनमें हाथ बंटाना तो दूर वो उनसे एकदम निरपेक्ष हो चुका था| हालांकि सौम्या के साथ उसका बर्ताव कहीं से भी गलत नहीं था लेकिन सौम्या का जो शिक्षा क्षेत्र में कैरियर बनाने का स्वप्न था वह उसे अब व्यर्थ लगने लगा था| एकाध बार सौम्या ने इस बारे में बात करनी भी चाही तो अनुज ने कोई रेस्पोंस नहीं दिखाया| उसके अनुसार जो जॉब सौम्या कर रही थी, वह काफी थी| जिन सुविधाओं की आदत एक बार पड़ जाए, उनसे पीछा छुडाना आसान नहीं होता, शायद अनुज के अवचेतन में ऐसा ही कुछ ख्याल था कि अब यदि सौम्या भी उसके समकक्ष नौकरी पा गयी तो घर की कुछ जिम्मेदारियां उसके सर आ सकती हैं|
सौम्या के सभी बातें राजीव ध्यान से सुन रहा था और उसे याद आ रहा था वो गाना, "कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता"..............
जारी........

गुरुवार, फ़रवरी 11, 2010

एक दिन या पूरा एक जीवन? भाग ४

सौम्या को वहीं बेंच पर बैठने के लिये कहकर राजीव प्लेट्फ़ार्म पर ही बने केटरिंग स्टाल पर गया और अपने लिये एक काफ़ी, सौम्या के लिये चाय व बिस्कुट लेकर लौट आया। दोनों अपने-अपने कप से चुस्की लेते हुये बातें करते रहे। चाय खत्म करके सौम्या ने अनायास ही पूछ लिया, “सर, क्या आप मुझे युनिवर्सिटी तक ड्राप कर देंगे, मुझे कुछ काम है और संयोग से समय भी है?” राजीव को तो जैसे बिन मांगे अपार दौलत मिल गई हो, फ़ौरन कह उठा, “सौम्या, तुम्हारे कुछ काम आ सकूं तो यह मेरे लिये सौभाग्य की बात होगी। मैं तुम्हें युनिवर्सिटी भी पहुंचा दूंगा और उसके बाद जहां तुम्हारी अपायंट्मेंट है, वहां तक समझो कि मैं तुम्हारा ड्राईवर हूं।” दोनों स्टेशन से बाहर चल दिये।

बाहर पार्किंग से कार निकालकर राजीव ने कार युनिवर्सिटी की तरफ़ मोड ली। दोनों के बीच अब खामोशी ही थी, गूंज रही थी तो बस किशोर कुमार की आवाज, ’किसी बात पर मैं किसी से खफ़ा हूं, मैं जिंदा हूं पर जिंदगी से खफ़ा हूं।’ सौम्या ने चुप्पी खत्म करते हुये पूछा, “अभी भी यही गाना आपका फ़ेवरेट है?” राजीव ने हंसते हुये इतना ही कहा, “पसंदीदा चीजें बदलना मेरे लिये कभी भी आसान नहीं रहा, जो मुझे पहले पसंद था वो सब हमेशा पसंद रहेगा, लेकिन इतनी छोटी सी बात तुम्हें याद है, मैं हैरान हूं।” सौम्या बोली, “सर, मुझे तो शायद छोटी बातें ही ज्यादा याद रहती हैं। इस गाने को मैने पहली बार आपके फ़ोन पर ही सुना था और एक दो लाईनें ही इतना असर डाल गईं थीं कि मैंने उसी दिन नेट पर ये गाना सर्च किया और मुझे भी यह गाना बहुत पसंद आने लगा। आप अपनी फ़ैमिली के बारे में कुछ बताईये न, बच्चे कौन सी क्लास में हैं?”

राजीव ने तब तक कार युनिवर्सिटी के गेट के अंदर मोड ली थी और कार रोकते हुये सौम्या से पूछा, “पहले तुम बताओ कि तुम्हारा यहां कितनी देर का काम है? मैं साथ चलूं या यहीं इंतजार करूं?” सौम्या ने कहा, “आप यहां अकेले कहां बोर होंगे, आपको कोई काम हो तो बेशक आप चले जाईये, मुझे जरूरत होगी तो आपको काल कर लूंगी। आपने मुझे यहां तक पहुंचा दिया, नहीं तो शायद मुझे कुछ परेशानी होती। मेरे कारण आपको तकलीफ़ हुई, थैंक्स कहूं या सारी?” राजीव कह उठा, “आज तो मैं वैसे भी बिना मकसद के भटकने के मूड में था, ऐसे में मेरा तो दिन तुम्हारे साथ सफ़ल हो गया। और मैं तुम्हें सही जगह पर पहुंचाकर ही आज तुम्हारा पीछा छोडूंगा, इसलिये तुम मेरी तरफ़ से निश्चिंत रहो।” उसकी बात अभी खत्म भी नहीं हो पाई थी कि सौम्या का मोबाईल बज उठा। देखा तो निशा का ही फ़ोन था। निशा ने बताया कि मीटिग कैंसिल हो गई है और सौम्या उनकी तरफ़ से फ़्री है। अब सौम्या असमंजस में आ गई। उसकी रिजर्वेशन शाम की शताब्दी से थी और अभी छ: घंटे से ज्यादा का समय उसके पास था। अब उसे लगने लगा कि इस कम जाने पहचाने शहर में अकेले समय बिताने की सोचना भी मुश्किल काम है। चूंकि राजीव ने उसकी और निशा की बातचीत से स्थिति का अंदाजा लगा लिया था, उसने सोचा कि कुछ समय सौम्या को अपना कार्यक्रम तय करने के लिये मिलना चाहिये। सौम्या को दुविधा से निकालते हुये उसने कहा कि सौम्या अंदर जाकर अपनी मार्कशीट वाला काम निपटाये और वह कार में ही उसका इंतजार करेगा। सौम्या भी यह सोचकर अंदर चली गई कि इस बीच किसी निर्णय पर तो पहुंच ही जायेगी।

लगभग २० मिनट के बाद जब सौम्या बाहर आई तो राजीव की कार वहां नहीं थी। हैरानी से वो इधर-उधर देखने लगी, तभी राजीव की कार सामने से आती दिखाई दी। कार रोककर राजीव बाहर निकला और उसने सौम्या से कहा, “मैंने सोचा कि तुम्हारे आने तक पेट्रोल डलवा लूं, काम हो गया क्या?” “कहां सर, लगता है कि आज के दिन तो कोई काम पूरा नहीं होगा। आज डीलिंग क्लर्क छुट्टी पर है, आवेदन जमा करवा दिया है। कह तो रहे हैं कि डुप्लिकेट मार्कशीट डाक द्वारा भेज देंगे।” सौम्या का चेहरा उदास देखकर राजीव से रहा नहीं गया और वह उसे समझाने लगा,"सौम्या, तुम इस बात की चिंता मत करो। तुम्हारा यह काम मैं खुद करवा दूंगा। आओ चलें।” सौम्या को अपनी जगह से न हिलते देखकर उसकी कशमकश को देखते हुये राजीव ने पूछा, “एक बात एक बार ही पूछ रहा हूं, क्या तुम ऐसा सोच सकती हो कि मैं तुम्हें किसी उलझन वाली स्थिति में डाल सकता हूं?” सौम्या ने दो पल उसकी आंखों में देखा, इंसान झूठ बोल सकता है मगर इतनी स्वच्छ आंखें झूठ नहीं बोला करतीं। वह बोली, “सर, आपके बारे में ऐसा मैने कब कहा और वैसे भी जिंदगी ने इतना अनुभव तो मुझे दे ही दिया है कि मुश्किल परिस्थितिओं में मुझे संभलना कैसे है।” सौम्या कार का दरवाजा खोलकर अंदर बैठ गई।

राजीव ने ड्राईविंग सीट संभालते हुये सौम्या से कहा, “बेशक हमारे दिल साफ़ हैं, लेकिन मैं तुम्हें अपने फ़्लैट पर नहीं लेकर जा रहा हूं। दरअसल मैं इन दिनों यहां अकेला हूं और इसलिये तुम्हें अपना मेहमान बनाकर खातिरदारी नहीं कर सकता। उम्मीद है तुम मेरे फ़ैसले को सही समझोगी। आज मैं तुम्हारा गाईड बनकर तुम्हें इस शहर की मेरी पसंदीदा जगह ’राक गार्डन’ लेकर चल रहा हूं। मेरी तुमसे एक रिक्वेस्ट है, आज मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना-सुनना है, फ़िर शायद हमारी मुलाकात हो या न हो। तुम पर कोई दबाव नहीं है, जिन सवालों के जवाब तुम न देना चाहो बेशक मत देना, बस मन में कोई मलाल मत रखना। ट्रीट मी लाइक योर फ़्रेंड फ़ोर टुडे एटलीस्ट, जस्ट फ़ील युअरसेल्फ़ फ़्री लाईक अ बर्ड एंड टेल मी युअर विश इफ़ यू हैप्पन टु डिफ़र विद मी ओन एनी पाईंट।” राजीव ने कार स्टार्ट कर दी और अचानक ही सौम्या जैसे सचमुच एक फ़ाख्ता की तरह हल्की हो गई थी।

जारी…..

सोमवार, फ़रवरी 08, 2010

कुछ बात है कि हस्ती मिटनी नहीं हमारी……जियो सरदार जी

पिछले कुछ दिन बहुत व्यस्त बीते। घर में ४-५ दिन का आवश्यक काम होने के कारण ओफिस से अवकाश लेकर बीबी-बच्चों के साथ अपनी होमटाऊन दिल्ली जाना था। एक घंटा लुधियाना तक और लगभग पांच घंटे दिल्ली तक। कुल मिलाकर होम टू होम सात घंटे। ओफ़िस में स्टाफ़ की कमी होने के कारण छुट्टी मिल पाना भी एक तोहफ़ा सा लगता है। कोई भी चीज जो कठिनाई से प्राप्त होती है, अच्छी ही लगती है। ऐसा भी कह सकते हैं कि जो भी सहज और सुलभ है, उसका हम लोग महत्व नहीं समझते। अब यही छुट्टी की ही बात करें तो पहले राशनिंग नहीं थी तो कोई बात ही नहीं थी, अब कुछ पाबंदी हैं तो हमें भी ध्यान रखना होता है कि प्रोग्राम ऐसा बनायें कि किसी को खटके न। तो छुट्टियां मंजूर हुईं शुक्रवार से लेकर बुधवार तक की यानि रविवार का दिन पेनल्टी में जायेगा। खैर, तदानुसार रिजर्वेशन भी करा लिया।

शुक्रवार को बच्चे स्कूल गये और हम जुट गये पैकिंग में। ग्यारह बजे ओफ़िस से फ़ोन आया, मैनेजर साहब ने कुछ शर्मसार सा होते हुये सूचित किया कि रविवार को जालंधर में एक कार्यशाला है और उसके लिये कंट्रोलिंग-ओफ़िस ने इस खाकसार को नामित किया है और इस कार्यशाला में प्रतिभागिता आवश्यक है। मैनेजर साहब ने बताया कि उन्होंने ऊपरवालों से बात की है लेकिन वहां से यही निर्देश मिला है कि उपस्थिति आवश्यक है। दिमाग तो भन्ना गया लेकिन फ़िर खुद को भी समझाया कि नौकरी को बुजुर्गों ने खेती और व्यापार के बाद वाले पायदान पर ऐसे ही नही रखा था और अपने सह्रदय सीनियर को भी आशवस्त किया कि आदेश पालन किया जायेगा। तो साहब, प्रोग्राम अब ये हो गया कि बजाय ३-४ दिन आराम से घर पर बिताने के बजाय कम से कम २४ घंटे और पंजाब रोडवेज के नाम कुर्बान करेंगे। दिल्ली में घर पहुंचते-पहुंचते ११ बज गये। खाते-पीते और मां-पिताजी व छोटे भाई के परिवार से बातचीत करते हुये रान के तीन तो बज ही गये। आखिर २-३ महीने के बाद पुन: परिवार एकत्रित हुआ था। अगले दिन देर से सोकर उठे और खाने के समय पर मां के हाथ से परांठों का नाश्ता और डिनर के समय से थोडा पहले लंच किया ही था कि फ़िर सफ़र का समय हो गया।

रात नौ बजे दिल्ली आई.एस.बी.टी. से जालंधर की बस ली और विंडो सीट संभाल ली। आपको बता दूं पंजाब रोडवेज की बसों की गिनती अच्छी बसों में की जाती है(भारतीय स्तरानुसार)। सामने नजर गई हिमाचल रोड्वेज की एक सही मायने में एक शानदार बस पर। वहां मौजूद ५०-६० बसों में वह बस ऐसी लग रही थी जैसी कजरारे-कजरारे वाले गाने में एक्स्ट्रास के साथ हमारी अभिषेक/अमिताभ की पद्म्श्री। बस का पेंट यदि हरा न होकर कुछ और होता तो शायद वह बस और भी सुंदर लगती, लेकिन उस पेंट में भी वह एक नवविवाहिता की तरह लग रही थी। अचानक दिखाई दिया कि सजावटी अंदाज में लिखा था – ’हिमसुत्ता’। हिमाचल प्रदेश की संपत्ति होने के कारण नाम यदि ’हिमसुता’ रखा जाता तो गौरव बढता, लेकिन इस जरा सी गलती ने मखमल में टाट का पैबंद लगा दिया। मुझे ऐसा भी लगा कि हो सकता है क्षेत्रीय भाषा में शायद सुता को सुत्ता ही बोला-लिखा जाता होगा, तो आकर हिमाचल के ब्लोगर बंधु को मेल करके पूछा। भाई काजल कुमार ने फ़ौरन मेल का जवाब दिया और अपनी जानकारी में ऐसा होने से इम्कार किया। इससे तो यही लगता है कि लाखों खर्च करके सरकार ने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया लेकिन किसी भी संबद्ध अधिकारी ने यह देखने की जहमत नहीं उठाई कि कैसे एक छोटी सी गलती करे कराये पर पानी फ़ेर सकती है। सर्दियों की रात बस की सीट पर काटकर पहुंच गये प्रतिभागी सुबह पांच बजे जालंधर। रात भर के जगे बंदे को चार घंटे में ट्रेन्ड करने का ड्रामा दो-ढाई बजे खत्म हुआ और हम बैक टू जालंधर बस-स्टैंड।

जालंधर से ३.३० अपरान्ह की बस ली और सर टिका दिया पीछे को। लगातार जागते हुये लगभग ३० घंटे हो चुके थे। आंखे नींद से भरी हुई थीं और बस के चलने से और सवारियों के शोर से नींद आ नहीं रही थी। दिल्ली पहुंचने में अभी कम से कम आठ घंटे लगने वाले थे। शरीर थका हुआ, मन बोझिल। कब ये सफ़र पूरा हो और जाके लंबी तान के सोने को मिले, उस समय बस एक यही सोच चल रही थी। काफ़ी देर तक आंखें बंद रखकर सोने की कोशिश की पर नींद थी कि दिखती थी पर आती नहीं थी। खन्ना नामक स्टेशन तक तो होश रहा, उसके बाद नींद ने थकान पर विजय पा ली। घंटे भर में जब बस अंबाला पहुंची तो शोर शराबे से आंख खुली। बस अंबाला से चली ही थी और लगभग सभी सीटें भर चुकी थीं। मेरे साथ वाली सीट पर एक सरदार जी अपनी धर्मपत्नी के साथ विराजमान थे, आयु लगभग ५० वर्ष। आंखे फ़िर से मुंदने लगी थीं। अपना हाल ऐसा हो रहा था जैसे सदियों के प्यासे को गला तर करने को तो मिल गया लेकिन प्यास और जयादा तीव्र हो गई हो। बाहर अंधेरा होना शुरू हो गया था और हवा में ठंडक और बढ गई थी। बस के सभी शीशे बंद, अपने पास गरम चादर और नींद दोनों मौजूद थे यानि की कामचलाऊ झपकी का पूर माहौल बन चुका था और शरीर भी बस की गति से तारतम्य बैठा चुका था। कुछ ही पलों में सरदारजी की बुलंद आवाज से नींद उचट गई। सरदारजी फ़ोन पर बात कर रहे थे और मैं भुनभुना रहा था।

“हां जी, सत श्री अकाल, ठीक-ठाक है जी। खुशखबरी है, किट्टी दे घर एक और किट्टी आ गई है जी। मैं नाना बन गया हां। त्वानूं वी मुबारकां जी, सत श्री अकाल।” स्वाभाविक रूप से खुश होने के कारण और बस के शोर के कारण भी सरदारजी काफ़ी तेज आवाज में बात कर रहे थे और मैं अपनी नींद खराब होने के कारण परेशान हो रहा था। इतने में उन्होंने फ़िर एक नंबर मिलाया और खुशखबरी दी और बधाई ली। फ़िर एक और नंबर, फ़िर एक और नंबर और इस तरह से बस पिपली, कुरुक्षेत्र, करनाल और पानीपत पार कर गई लेकिन फ़ोन काल्स चैन स्मोकिंग की तर्ज पर चैन कालिंग के रूप में जारी रहे। जुमला वही एक, “हां जी, सत श्री अकाल, ठीक-ठाक है जी। खुशखबरी है, किट्टी दे घर एक और किट्टी आ गई है जी। मैं नाना बन गया हां। त्वानूं वी मुबारकां जी, सत श्री अकाल।” मेरी नींद ऐसे भागी जैसे गधे के सर से सींग। मेरा मूड कई शेड्स से होकर गुजर रहा था। पहले झल्लाहट, खीझ, गुस्सा और फ़िर कुछ सहज होते हुये मजा सा आने लगा। इधर सरदार जी नया नंबर मिलाते, बातचीत शुरू करते और मैं भी उनके डायलाग साथ ही साथ बुदबुदाने लगा और मैने मन ही मन उनकी काफ़ी मिमिक्री की। वही वाक्य, वही अंदाज। अब मेरे ध्यान आया कि वो अपनी कन्या की कन्या के पैदा होने पर इतने खुश हैं और मौका मिलते ही मैने पूछ डाला कि दोहता होता तो शायद आप और ज्यादा खुश होते। सरदारजी बोले, “पुत्तर, मेरी बेटी दी शादी नूं कई साल हो गये सी ते उसदी कोइ औलाद नहीं होई सी। जे उसदे व्याह दे फ़ौरन बाद दोहती पैदा हुंदी ते शायद तेरी गल सच हुंदी पर हुण तां असी वाहेगुरू दे शुक्रगुजार हां कि उसने कुडी दित्ती ते यकीन करीं असी वाहेगुरू अगे एही अरदास करदे सी कि देर नाल सही देवीं पर स्वस्थ गुड्डी देवीं। अज दे टाईम विच धीयां दी जरूरत होर वी वध रही है। ऐ जो खून खराबा, नफ़रत दा महौल चल रया है, कल्ली कुढी ढंग नाल पढ-लिख के तीन घरां नूं सुधार सकदी है।” धीरे-धीरे मेरे मन में उन सज्जन के प्रति श्रद्धा सी होने लगी।

भारत में और विशेषकर उत्तरी भारत में लिंगानुपात के बढते फ़र्क के मद्देनजर ऐसी बातें बहुत सुखद हैं। कुछ मिनट पहले मैं अपनी कुछ घंटों की नींद खराब होने पर खीझ रहा था, ऐसे लोगों पर तो दस-बीस रातों की नींद कुर्बान की जायें तो कम हैं। दिल्ली पहुंचने तक मैं मन ही मन उस अनदेखी किट्टी, उसकी नवजात किट्टी को जाने कितनी शुभकमनायें दे चुका था और उन सरदारजी के ऊपर तो मुझे मान सा होने लगा था, जब तक ऐसा सोचने वाले हमारे देश में रह रहे हैं, हम फ़ख्र से कह सकते हैं कि ’कुछ बात है कि हस्ती मिटनी नहीं हमारी, सदियों रहे चाहे दुश्मन दौरे-जहां हमारा।’

’जियो सरदारजी ते जिये त्वाडी सोच"’