रविवार, जनवरी 05, 2014

टीवी-बीवी भाषण-राशन

"यार, पेरेंट्स ने वाईफ़ को यहाँ लाने की इजाजत तो दे दी है लेकिन अब हमें खुद को सोच विचार हो रही है।"
"क्यों, अब क्या चिंता है? मैं तो कहूँगा कि एक परंपरागत परिवार से होते हुये भी तुम्हारे पेरेंट्स ने काफ़ी एडवांस सोच रखी है ।"

"ये तो है, लेकिन मेरी वाईफ़ शुरू से ही गाँव में रही है और उसकी भाषा यहाँ की हिन्दी से बहुत अलग है। अड़ौस-पड़ौस में परिवार तो बहुत हैं लेकिन बातचीत ठीक से न हो पाये तो उसे बहुत अटपटा लगेगा।"

उस समय के हमारे राय मशविरे ब्लॉग बहस की तरह नहीं होते थे कि अपने ज्ञान और तर्क शक्ति की कैटवॉक करके दिखा दी, उसके बाद तुम अपनी जगह और हम अपनी जगह। वैसे भी संत तुलसीदास ’तिनहीं बिलोकत पातक भारी’ लिखकर धमकिया ही चुके थे तो हमने मित्र के रज समान दुख को मेरू समाना मानते हुये नई बीवी की आवभगत नये टीवी से करने की राय दी ताकि हमारी भाभीश्री को एकदम से अकेलापन न महसूस हो। उसी मकान में नीचे के हिस्से में एक पोर्शन राजा बाबू एवं उनकी श्रीमती की गृहस्थी के लिये  फ़ाईनल कर लिया गया। 

फ़ैसला होने के बाद मित्रमंडली में यह खुशखबरी बांट दी गई कि इस छड़ा महल में दूसरी तरह की चहल पहल आने वाली हैं -  टीवी और उसके कुछ दिन बाद ही राजा बाबू की बीवी। राजा का विचार था कि चूँकि इन चीजों से उसका वास्ता नहीं रहा है तो टीवी पहले खरीद लिया जाये। जब तक शादी होगी और बीवी को लाने का समय आयेगा, तब तक टीवी का सिस्टम समझ आ जायेगा वरना एक साथ दो नई चीजें साधने में कहीं दिक्कत न हो जाये। ये प्रस्ताव भी एकमत से पास हुआ क्योंकि इस मदों में जो खर्च होना था वो राजा का ही था तो शुभस्य शीघ्रम।  एकाध दिन में सब दोस्त राजा के साथ जाकर टीवी खरीदवा लाये। पुराने समय की बात है,  ऊंचे ऊंचे एंटीना लगे करते थे और सीमित समय के लिये गिने चुके दो चैनल आते थे एक दूरदर्शन राष्ट्रीय और शायद एक प्रादेशिक राजधानी से। पहले दिन राजा की गृहस्थी का सामान सेट करते और टीवी का एंटीना फ़िट करते कराते प्रसारण समय समाप्त हो चुका था, फ़िर भी टीवी को बार बार चलाकर देखा गया, ब्राईटनेस\कंट्रास्ट और शूँSSSSSS की आवाज करते वॉल्यूम के बटन को भी घुमा घुमाकर चैक किया गया।

वहाँ रहते हुये तब तक दो साल हो गये थे लेकिन कभी टीवी की कमी नहीं महसूस हुई थी, आपस में हँसते-बोलते, लड़ते-झगड़ते कैसे समय बीत जाता था इस बात का पता भी नहीं चलता था। आज टीवी आ गया था तो रह रहकर बात टीवी से शुरू होती थी। आज राजा को जबरदस्ती नीचे भेजा गया कि अब हमसे अलग दूसरे कमरे में सोने की आदत डाल। वो था कि जा नहीं रहा था, उसका कहना था कि जब बीवी आयेगी तो जाना ही होगा लेकिन अभी क्यों अपने से दूर कर रहे हो?  हम अपने इरादों के पक्के, देर रात उसे उसके कमरे में भेजकर ही माने। उसे समझाया गया कि बीवी के आने से पहले तू भी टीवी की आदत डाल लेगा तो दोनों का समय अच्छे से बीतेगा। बहरहाल राजा अच्छा लड़का रहा, मान जाता था। अगले दिन उससे पूछा कि कल रात टीवी चलाया था तो पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से भरे उसने माना कि हाँ चलाया था, कुछ प्रसारण तो नहीं आ रहा था लेकिन सब बटन वटन चैक करता रहा ताकि सब मैकेनिज़्म समझ आ जाये। हम सबने हँसते हुये उसकी पीठ थपथपाई कि ऐसे ही गहरे पानी पैठता रहियो, सब मैकेनिज़्म समझ आ जायेंगे :)

अगले दिन दिनभर ऑफ़िस में भी बात-बेबात टीवी का चर्चा चलता रहा। शाम को ड्यूटी ऑफ़ का टाईम हुआ तो सब घर चलने को तैयार हुये जबकि पहले ड्यूटी के बाद वहीं ऑफ़िस में बैठकर कैरमबोर्ड पर ब्लैक एण्ड व्हाईट खेला करते थे। जल्दी-जल्दी घर पहुँचे और टीवी चलाया तो स्क्रीन ब्लैंक थी।  पता चला कि तीन या पांच दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया जा चुका था और नेपथ्य में शोक ध्वनि चल रही थी। बड़ा धोखा हुआ हमारे साथ।

आने वाले दिन भी यही कार्यक्रम दोहराया गया और उसके अगले दिन भी। अब लौटकर यंत्रवत एक बार टीवी चलाते थे, वही मातमी धुन सुनते थे और टीवी बंद कर देते थे। रिपीट मोड में यह कार्रवाई हर घंटे दो घंटे में दोहराई जाती हालाँकि नतीजा मालूम था। ऐसे ही एक बार टीवी चलाया तो मरहूम  का दूरदर्शन पर एक पुराना इंटरव्यू दिखाया जा रहा था। रेगिस्तान में पानी को तरसते मुसाफ़िर को पानी की थोड़ी सी भी मात्रा मिल जाये तो जो उसकी हालत होगी, वैसे ही कुछ हमें महसूस हुआ - इंटरव्यू ही सही, कुछ तो देखने को मिला। करीब आधे घंटे का वो इंटरव्यू देखने में हमें बहुत मजा आया। सारा इंटरव्यू न बताकर उसका सबसे मस्त पोर्शन आपको बताता हूँ -

साक्षात्कार ले रही महोदया ने पूछा, "सर, आपके भाषण बहुत पॉपुलर होते थे और लोग बहुत शौक से सुनते थे। आपने यह कला कहाँ से सीखी?"

जवाब मिला, "मैं मिडल(या हाई) स्कूल में पढ़ता था तो एक बार देश के बारे में स्टेज पर कुछ बोला। मेरे एक मास्टरजी थे, उन्हें मुझमें कुछ  संभावना दिखाई दी। फ़िर उन्होंने बाकी टिप्स के अलावा सबसे मुख्य टिप ये दी कि आजकल सर्दियों का समय है, सुबह जल्दी उठकर गाँव से बाहर खेतों की तरफ़ घूमने जाना चाहिये। आजकल किसानों ने खेतों में गोभी लगा रखी है। सुबह सुबह खेत में घुसकर गोभियों के बीच खड़े होकर भाषण देना शुरू कर दें। गोभियों के बीच खड़ा भाषण देता आदमी अजीब दिखेगा और शुरू में खुद उसे भी अजीब सा लगेगा लेकिन धीरे धीरे उसके दिमाग में यह बात बैठ जाती है कि जब वो भाषण देता है तो उसके सामने मनुष्य नहीं, गोभी के फ़ूल हैं जिन्हें कोई प्रतिक्रिया नहीं देनी। इस अभ्यास से आत्मविश्वास आ जाता है और फ़िर जब वो स्टेज पर जाकर जनता के बीच कुछ कहना शुरू करता है तब भी इसके दिमाग में यही होता है कि सामने जो सिर दिख रहे हैं, वो गोभी के फ़ूल हैं।"

उस समय हम सब बहुत हँसे थे और उस इंटरव्यू को बहुत एंटरटेनिंग माना था लेकिन उन्होंने जो कहा वो हमारा एंटरटेनमेंट करने के लिये नहीं कहा था बल्कि सादगी से कही गई सच्चाई  थी। हम सब हैं गोभी के फ़ूल ही, लेकिन थोड़ा एडवांस टाईप के। कुछ भाषण सुनकर तालियाँ पीट लेते हैं, कुछ सिर पीट लेते हैं और कुछ अपने अपने मतलब की लकीर पीटते रहते हैं और भाषण देनेवाला किसी दूसरे खेत में गोभी के फ़ूलों को संबोधित करके कह रहा होता है - भाईयो और बहनों,............ 

मजेदार\विवादित भाषणों के अपने अनुभव शेयर करना चाहें तो ये गोभी का फ़ूल भी आपका स्वागत करता है। 

डिस्क्लेमर -  ये पोस्ट किसी की अवमानना के उद्देश्य से नहीं लिखी गई है। 

43 टिप्‍पणियां:

  1. गोभी के FOOL की भली कही!!

    जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में,
    हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं ।

    अब इसके आगे क्या कहें!! हम तो मिसफिट हैं इस माहौल में... न तीन में - न तेरह में!! सॉरी.. न गोभी के FOOL हैं - न झुनझुने हैं!! हा नहीं तो!!!

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    1. हैं तो हम भी मिसफ़िट ही, लेकिन इस मिफ़ियापे का आनंद अलग ही है भाईजी!

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  2. आचार्य रजनीश उलटे चलते थे और भाषण कला में प्रवीण होते जाते थे -अपने अपने अनुसन्धान!

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  3. सही कहा !
    फैंसी ड्रेस पहन कर, सातों सुरों का पूरा उतार-चढाव, मय मुरकी, अलाप ले तरह-तरह की गर्जना करना भी अब काम नहीं आने वाला, क्योंकि गोभी के fools भी अब समझदार हो रहे हैं । भाषण-राशन वाले अब जान लेवें कि प्याज की तरह, गोभी के fools की भी किल्लत होने वाली है :)

    डिस्क्लेमर - ये टिप्पणी किसी की अवमानना के उद्देश्य से नहीं लिखी गई है।

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    1. फ़िलहाल तो किल्लत का कोई स्कोप नहीं दिखता, जिधर देखो उधर ही दिखते हैं।

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  4. फूल गोभी के बजाय बंद गोभी रहता तो बात और जमती क्‍योंकि‍ बंद गोभी के तो ढक्‍कन भी पूरी तरह बंद होते हैं :-)

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    1. ढक्कन बंद होने के कारण ही शायद, फूल गोभी की तुलना में बंद गोभी में पाला और अधिक् तापमान को सहन करने की विशेष क्षमता भी होती है :)

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    2. बड़ी रोचक जानकारियाँ, धन्यवाद cum आभार :)

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    3. cum हो, बेसी हो, परवा इल्ले ! :)
      थोड़ा है, थोड़े की ज़रुरत है, हम तो आम आदमी हैं न !

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    4. आप आम आदमी? बिल्कुल नहीं, शर्त लगाईये - मैं सिद्ध कर दूँगा:)

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    5. क्या प्रूव कीजियेगा कि हम 'आम आदमी' नहीं 'आम औरत' हैं :)

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  5. नेता वही जो गोभियों को भी कुछ समझा आए।

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  6. ... उससे भी बड़ा नेता वह जिससे समझने गोभियाँ खुद चलकर आयें।

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    1. वो दिन हवा हुए, अब तो गोभियां खुद नेता बन रहीं हैं !! :)

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    2. और अब वो गोभियां उन घिसे-पिटे भ्रष्ट नेताओं से बेहतर नेता साबित हो रही हैं :)

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    3. PAST : "All animals are equal, but some animals WERE more equal than others".

      PRESENT/FUTURE : We are/will be equal.
      :)

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    4. आजकल तो और वड्डे नेता हो गये हैं, गोभियाँ सिर्फ़ सुनने नहीं सुनाने भी आती हैं :)

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  7. रोचक प्रस्तुति.

    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ संजय भाई.

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  8. अच्छे वक्ता-गुण साझा लिए...धन्यवाद...

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  9. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन एक छोटा सा संवाद - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  10. Gobhi k phool/fool par aisi PHd aaj hi padhne ko aur jaan ne ko mili.. :)

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    1. हम ऐसे या वैसे कैसे भी डाक्टर नहीं हैं जी, साधारण से चौकीदार हैं। पी.एच.डी. तो मजाक में भी बड़ी ऊंची सी पदवी लग रही है।

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  11. यह फार्मूला अच्छा रहा, गोभी के फूल !!

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    1. वैसे इस नाम से एक बहुत शानदार व्यंग्य भी पाठ्य-पुस्तक में पढ़ा था जिसमें एक दोस्त दूसरे दोस्त से लखनऊ से गोभी के फ़ूल मंगवाता है, शायद आपने भी पढ़ा हो।

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  12. हमें तो टीवी और बीवी के संवादों से जो समय मिलता है, उसे लिखने पढ़ने में अर्पित कर देते हैं, होईहे वहि जो राम रचि राखा।

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  13. गोभी के खेत में ही भाषण की कला सीख ली नहीं तो लोग आईने के समक्ष सीखते हैं। लगता है कि सामने गधा बैठा है और हम बोल रहे हैं।

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    1. आईने से एकवचन बहुवचन वाला भय पूरी तरह से नहीं निकलता, उससे तो गोभी वाला फ़ार्मूला निस्संदेह ज्यादा व्यावहारिक है।

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  14. प्रशंसनीय - प्रवाह- पूर्ण , परिहास ।

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  15. मानना पड़ेगा भैया जी आपने कह भी दिया और वो भी सहज में

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  16. पंख से पंछी विहार बनाना तो कोई आप से सीखे ,इतनी बड़ी राम कहानी ये बताने के लिए की हम लोग गोभी का फूल है । लो जी अब समझ आया की सरदार जी चुप क्युँ रहते थे , वो तो हम लोगो को बताना चाहते थे कि वो हम लोगो को गोभी का फूल नहीं समझते है और एक हम लोग है जो उनकी बैंड बजाते थे । अब जो जो हम लोगो को गोभी का फूल समझ कर अपने भाषण की प्रेक्टिस करेगा अगले चुनाव में उसका अंगूर से आम बनना तय है :)

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  17. जैसे कि हम ब्लॉगजगत में लिखने की प्रैक्टिस करते हैं :D

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  18. आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (3 से 9 जनवरी, 2014) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,,सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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  19. आपकी पोस्ट को तो पाठकों के कमेंट सजा देते हैं!

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    1. कोई शक नहीं देवेन्द्र भाई, कमेंट के जरिये जबरदस्त सजा\सज़ा देते हैं :)

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  20. .......... और सिंपल- सी गहरी बात ......

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  21. शानदार बॉस.... राहुल के मास्साब को भी उसमे कुछ सम्भावना दिखी थी, बोले कि समझो तुम्हारे सामने गोभी के फूल बैठे हैं... जमकर भाषण पेला है भाई ने

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