रविवार, जुलाई 03, 2016

पार्थ फ़िर गाँडीव में टंकार को पैदा करो.

आज अपना लिखा कुछ नहीं, दो फ़ेसबुक मित्रों की कही बात। 

हमारा अधिष्ठान सनातन है, हम उसी के उत्तराधिकारी है, यह साहस और सत्यता से कहे इसका पुरुषार्थ निरन्तरता का आग्रह रखता है। जो हम करेंगे ही।
हम तो सनातन के साधक है, साधक सदैव विद्यार्थी होता है, सीखना स्वाध्याय सब साथ चलता है। सगुण और निर्गुण भक्ति की धारा सदैव साथ साथ चली है।
पारदर्शिता का प्रश्न आस्था पर चोट लगने से उपजता है। धर्म से इतर, कूटनीति उसी आस्था पर चोट करना है। चोट हुई तो आस्था हिली, और पारदर्शिता की मांग उठी।
यह गीता की भूमि है, योग वाशिष्ठ की भूमि है , यह नचिकेता की भूमि है, यह कबीर दास जी की भूमि है, यह मीरा जी, दादु जी, पीपा जी, रैदास जी, नवल जी महाराज की भूमि है। यहाँ उठाये गए प्रश्नो के उत्तर देने पड़ेंगे, कोई नहीं बच पाया, कोई नहीं बच सकता है।
यहाँ तो स्वयं नारायण ने उत्तर दिया है। जिनकी कठौतीयो में गंगा माँ विराजती है वो भारत है मेरा, प्रश्नो से कोई नहीं भाग सकेगा यहाँ!!
भारत की आत्मा लोकअधिष्ठित है, लोकपोषित है, लोकसंरक्षित है, लोकोन्मुखी है, लोकसंस्कारित है लोकाश्रयी है, जब मेरे रामऔर कृष्ण महलो को छोड़ वन, अरण्य नदी पर्वत लोक के हो विचरते है तो, उनकी देवत्व कीर्ति सहस्त्रो सूर्यो की भांति लोक के आलोक में देदीप्यमान होती है।मेरे महादेव तो है ही, लोक की भस्म में रमे हुए। गंगा जी जब कांवड़ में बैठ बोल बम बोल बम के साथ चलती है तब लोक का साक्षताकार है। तुलसी की रामायण के बीच में निर्गुण राम के उपासक कबीरदासजी के घट घट के राम अक्षर ब्रह्म से प्रकट होते है उसे लोक की थाती ही सहेजती है।
दादू पीपा रैदास साक्षात् भगवत्स्वरूप हो यहाँ लोक में ही अधिष्ठित है, कुम्भ के मेलो ठेलो से लेकर खांडोबा विठोबा की यात्राओं में जो लोक है, वही तो शिवरामकृष्ण का ध्येय है, लोक!!
यह लोक की ही क्षमता सामर्थ्य है जो धर्म के धारण किये हुए है। मैं इसी लोक का अविभाज्य अंश हूँ। मेरा लोक यदि भद्र अभिजात्य नहीं है तो ऐसा भद्र अभिजात्य मुझे नहीं बनना। मेरे अलौकिक के साक्षात्कार के मार्ग की प्रत्येक गली वीथिका इसी लोक के से होकर जाती है और इसी में समाती है। लोक् देवता से लेकर लोक संत सभी लोक को अलौकिक की यात्रा में सबको साथ लेकर चलने का संस्कारित पुरुषार्थ कर देवत्व का संधान कर रहे है। मुझ से यह सब छुड़ा दे ऐसा मुझे भद्र नहीं बनना है। हम राम जी के वानर ही भले... जय श्री राम
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मैं एक बात बोलता हूँ। मैं किसी से प्रभावित हो कर नहीं लिखता। मैं मट्ठा बेचने वालों का कूढ़मगज वैचारिक मानस पुत्र नहीं हूँ। मैं संघी, नव संघी, पुरातन संघी कुछ भी नहीं हूँ। हाँ, महापुरुषों से सीखना मेरे संस्कार हैं। इसके अलावा मेरे विचार मेरे अपने होते हैं जो मेरे अध्ययन पर आधारित होते हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि हिन्दू समाज शक्ति और एकता का 'मात्र' प्रदर्शन ही न करे। शक्ति का अर्थ है ऐसी क्षमता जो कुछ ऐसा करने पर मजबूर कर दे जो अन्यथा सम्भव न हो। यदि भारत सरकार के हस्तक्षेप से तीन तलाक का शरई कानून बदलवाया जा सका तो यह बहुत बड़ी जीत होगी। प्रयोग बहुत हो चुके। सदियां बीत गयीं। मुसलमान कभी भी इफ्तार साथ खाने का मर्म नहीं समझेगा। हम भइया मुन्ना करते सर पटक कर देख चुके हैं। एक बात बताता हूँ। पिछले वर्ष तारेक फतह की किताब का लोकार्पण हुआ। उसमें आरिफ मोहम्मद खान साहब भी आये थे। उन्होंने तारेक फतह से साफ़ कहा कि आपकी किताब कोई पढ़ेगा नहीं क्योंकि मुसलमान अपने दिमाग का इस्तेमाल करना बन्द कर चुका है। आज के समय में कड़ा राजनीतिक हस्तक्षेप जो न्याय सम्मत हो वह करने की आवश्यकता है। जो समाज ISIS के लड़ाकों को अपना हीरो मानने लगा हो उनके साथ आप कब तक इफ्तार खाएंगे साहब?

3 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " भारतीय सेना के दो महानायकों को समर्पित ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. समस्या ये है कि निजी बातचीत में कई मुस्लिम नेता इस बात को मानते हैं पर वोट की राजनीति और काफिर कहलाए जाने का भय उन्हें मुखर होने नहीं देता।

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  3. निजी बातचीत में बहुत से सिकूलर हिंदु भी ये बात मानते हैं लेकिन किसी को अपनी किताबों, गज़लों की तारीफ़ चाहिये और किसी को अपनी हिंदु छवि से शर्म आती है।

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