गुरुवार, मई 31, 2018

What is there in a (nick) name .....


कॉलेज समय में हमारा एक नया बना मित्र कई दिन अनुपस्थित रहा। तब मोबाइल फोन होते नहीं थे, लैंडलाइन उसके घर था नहीं और उसका घर हमने देखा नहीं था। जो कुछ छोटी मोटी निशानियां उसने अपने निवासक्षेत्र की बता रखी थी,, उसी आधार पर हम उसे खोजने निकल पड़े। zeroing करते करते एक गली तय की गई कि रविन्द्र रहता है तो इसी गली में। एक माताजी एक घर से निकलती दिखीं, हमने जाकर नमस्ते की और उनसे पूछा कि रविन्द्र का घर कौन सा है। माताजी ने रविन्द्र के पिता का नाम पूछा, वो हमें ज्ञात नहीं था। वो क्या काम करते हैं, वो भी जानकारी नहीं थी। किनमें से है, पीछे कहाँ से है आदि प्रश्नों के उत्तर भी हमारे पास नहीं थे। इस बीच हमारा इंटरव्यू भी होता रहा। १५-२० मिनट के वार्तालाप के बाद भी रविन्द्र के बारे में वो नहीं जान/बता सकीं लेकिन वो हमारी भावनाओं से प्रसन्न थीं कि कॉलेज के एक नए बने मित्र की कुशलता जानने के लिए प्रयास कर रहे थे। अंत में उन्होंने कहा कि रुको, मैं अपने लड़के से पूछती हूँ वो भी तुम लोगों की उम्र का ही है और किसी कॉलेज में ही पढ़ता है। वहीं दरवाजे से उन्होंने आवाज लगाई, "ओ गुल्लू, एक मिनट को बाहर आइयो।" अंदर से रविन्द्र आया और हमें देखकर बहुत खुश हुआ। माताजी थोड़ी अप्रसन्न अवश्य हुईं कि हमने सीधे-सीधे गुल्लू के बारे में क्यों नहीं पूछा। खैर, माताओं का गुस्सा बालकों पर कहाँ भारी पड़ता है, हम उस घटना को अब भी याद करते हैं।
जो भी हो, अब कहानी चल दी है पुकारू नामों की। नाम पर कई पोस्ट पढ़ी हैं, पुकारू नाम या निकनेम पर ऐसा ध्यान नहीं आता। वैसे देखें तो इन नामों के रखने के पीछे कोई बहुत माथापच्ची नहीं होती होगी, बेबो/लोलो/जूजू/डूग्गू मने कुछ भी लेकिन ये भी सार्वभौमिक सत्य नहीं।
हम में से अधिकतर का घर का नाम उनके सरकारी नाम से अलग होगा, जिनका है वो भी बताएं और अपनी जानकारी में आए ऐसे नाम भी बताएं जो आपको किसी कारण से याद रहे हों। चाहें तो अनुमान भी लगा सकते हैं कि फलाने मित्र का निकनेम यह होगा या यह होना चाहिए। 
मुझे अब तक मेरे परिचितों में सबसे मजेदार दो नाम याद आए, चूचू और डोडो। संयोग की बात है कि दोनों लगभग समवयस्क ही थे और दोनों पंछी देहपिंजर से मुक्त हो चुके।
कल रात फोन की बैटरी डाउन हो गई और अचानक ही इस ओर ध्यान चला गया, बहुत सी बातें सोचते हैं लेकिन बाद में किसी कारण से वो लिखी नहीं जाती। अक्षरशः वैसी तो अब भी नहीं लिखी गई जैसी तब नाजिल हो रही थीं पर सोचा था कि इसपर कुछ लिखना अवश्य है तो लिख डाला। 
लिखना था तो लिख डाला
लाइफ न्यूए बनेगी झिंगालाला 😊
वैसे मैं बता दूँ, मेरा कभी कोई निकनेम नहीं रहा।

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति कमजोर याददाश्त - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

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  2. 9 महिने बाद आपकी पोस्ट पढ्ने को मिली, अच्छा लगा
    मुझे सब नीटू कहते है

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    1. जब भी सहारनपुर जाना होता है तो एक बार तो तुम्हारा ध्यान आता ही है 😊

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    2. बस ध्यान आता है, आते कभी नही

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  3. हमारा भी कोई निक नेम नहीं है बस सब मेरे नाम को आधा कर देते है | बिटिया के लिए दो नाम इतने पसंद आये की दोनों ही रख दिया वो निकनेम तो नहीं हुआ , एक घर का एक स्कूल का बन गया | ब्लॉग पर बहुत बार नाम लिया है मैंने मेरी बिटिया का , आप नाम याद करके बताये तब मानु |

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    1. बिटिया का अच्छा सा नाम सच में ध्यान था लेकिन अब अचानक से याद नहीं आया।
      आप न ही मानिये ☺
      बिटिया को बहुत सा प्यार।

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  4. पता नहीं कितने महीने बाद आज आपके ब्लाॅग में आए हैं...हमारे तो जी कई निक नेम हैं...मेरे बाबा हमको मुन्ना कहते थे...आज भी मेरे दादा के घर में सब मुन्ना ही कहते हैं...नानी के घर में सब मँजू कहते हैं..दोस्त मुझे सपना कहते हैं...बच्चे मुझे माॅम या मम्मी कहते हैं, मेरे वो मुझे ए बोलते हैं, ज्यास्ती खुश होते हैं तो और भी नाम कहते हैं और गुस्से वाले भी हमरे बहुते नाम रखे हैं ऊ... ब्लाॅग में मुझे अदा के नाम से जाना जाता है....जबकि हमारा पूरा नाम स्वप्न मँजूषा हैं...:-) :-)

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    1. लोगों को एक नाम का टोटा पड़ा है और आप अनगिनत घेरे बैठी हैं।
      हर जगह आगे ही पाओगी ☺

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  5. आउर का...उ कहते हैं ना..हम जहाँ खड़े होते हैं लाईन वहीं से शुरू होती है....वैसे कउलेज में लोग हमलोगों को टोटा भी बोलते थे...मतलब तो आज तक नहीं मालूम लेकिन ये सोच कर कि कुछ अच्छी ही बात होगी चुप रहते थे....:-) :-) :-)

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  6. हम सोच रहे थे कि फ़ेसबुक वीरान करने वाले कहाँ गये, सोचा ही नहींकि ब्लॉग रोशन किया जा रहा है दिल जलाके ... बधाइयाँ!

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