रविवार, अक्तूबर 11, 2020

नाड़िया बैध उर्फ बड़ा भाई

 कुछ दिन के अवकाश के बाद ड्यूटी गया था। वह आई, नमस्ते आदि के बाद रिक्वेस्ट करती हुई बोली, "सर रिक्वेस्ट है, आज मुझे पाँच हजार चाहिएं। sort of emergency है कुछ, प्लीज़ हेल्प कर देना।" 

मुझे सरल बातें भी देर से समझ आती हैं, यह बात और भी देर से समझ आनी थी। मैं सिर खुजाने लगा। यद्यपि वह पुरानी खातेदार नहीं थी, एकाध महीना पूर्व ही सेलरी खाता खुलवाया था लेकिन अब तक हुई कुछ भेंटों से उसकी अच्छी छवि थी, बहुत अच्छी कह सकते हैं। आज उसकी कही बात से मैं अचकचाया हुआ था। सैटल होने के लिए उससे पूछा कि ऐसी क्या इमरजेंसी आ गई और कम्प्यूटर में उसका एकाउंट चैक करने लगा। देखा तो मेरे अवकाश पर रहते दिनों में उसका वेतन आ चुका था और दो बार वह एक हजार प्रतिदिन की निकासी भी कर चुकी थी। बीते जमाने की बात है इसलिए ध्यान रहे कि तब ATM नहीं आए थे। इस बीच वो बता रही थी कि किराया देना है, और भी खर्च हैं ये है वो है अर्थात वही usual stuff. मेरी धड़कनें, जोकि उसके आने पर धाड़-धाड़ कर रही थीं, भी अब तक लगभग व्यवस्थित हो चुकी थीं। मैंने भी सोचा कि देखते हैं, पेंच कहाँ तक लड़ते हैं। कह दिया, "चलो देखते हैं।"

उसने प्रसन्न होते हुए चेक भरा और थैंक्स बोलते हुए मुझे दिया। मैंने चैक प्रोसेस करना आरम्भ किया लेकिन अंदर से शुचिता के नाग ने मस्तक उठा ही लिया, "सुनो, तुम्हारे खाते में सेलरी तुम्हारी मेहनत की आई है। यह तुम्हारा ही पैसा है, मैं जो कर रहा हूँ मुझे यही करने की सेलरी मिलती है।इसके लिए इतना रिक्वेस्ट और थैंक्स करना आवश्यक नहीं होता।"

वो बोली, "सर, रिक्वेस्ट और थैंक्स तो दोनों otherwise भी आवश्यक हैं। आपने फिर भी मेरी विवशता समझी, आप अवकाश पर थे तो दूसरे सर ने तो साफ यही कहा था कि जब तक खाता एक वर्ष पुराना नहीं होता, एक दिन में एक हजार से अधिक नहीं निकल सकते। so, thanks again."

उसके जाने के बाद मैंने बॉस से पूछा, "मेरी जगह कौन बैठा था?"

उन्होंने हँसकर कहा, "वो आया था आपका 'बड़ा भाई', दूसरी ब्रांच से। क्यों, क्या हो गया?"

'बड़ा भाई' मैं ही बोलता था, शेष सब उसे 'नाड़िया बैध' कहकर पुकारते थे, वो कहानी फिर कभी। मैंने फोन लगाकर उससे पूछा, "बड़े भाई, कस्टमर को उसके खाते से एक दिन में एक हजार से ज्यादा न देने वाला सर्कुलर आया होगा, एक कॉपी भेजियो हमें भी।"

बड़ा भाई, "अच्छा! मतलब फलानी आई थी। और तैने दे भी दिए होंगे सारे पैसे?"

मैं, "क्यूँ न देता, उसके पैसे थे। तेरी तरह झूठ भका देता?"

बड़े भाई ने हँसते-हँसते खूब सुनाईं, "भलाई का टाईम ही नहीं। पागल, सारा दिन टूटफूट झेलो हो और मैं तेरा ही जुगाड़ करके आया था कि हफ्ता-दस दिन में कम से कम एक तो ढंग का कस्टमर रोज आए, तुमसे वो भी न सम्भालते। ऐसे ही नाम खराब करोगे बड़े भाई का।"



2 टिप्‍पणियां:

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