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बुधवार, दिसंबर 22, 2010

यारी-दोस्ती

दसवीं के बोर्ड की परीक्षायें थीं और परीक्षा केन्द्र मेरे घर से करीब पांच किलोमीटर दूर था। परीक्षा-केन्द्र पर छोड़कर आने की जिम्मेदारी मेरे छोटे मामाजी की लगाई गई, जो लगभग उसी समय अपनी दुकान पर जाया करते थे। अंग्रेजी का पेपर था,  थोड़ी सी टेंशन थी लेकिन जैसा हमारी सरकार हमेशा कहती है कि स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है, वैसे ही अपन भी नियंत्रण में थे। 

उस दिन घर से निकलते निकलते हम लोगों को कुछ देर हो गई, और परीक्षा केन्द्र तक पहुंचे तो शायद दस मिनट लेट तो हो ही गया था। जब मेन रोड से स्कूल की तरफ़ स्कूटर मुड़ा तो मैंने देखा सामने से धनंजय बाहर की तरफ़  आ रहा था। उसने मुझे नहीं देखा और समय की आपाधापी में मैं उसे आवाज भी नहीं लगा सका। स्कूटर से उतर कर लगभग दौड़ता हुआ मैं अपने रूम की तरफ़ भागा। ऐसे समय में वही दूरी मीलों की लग रही थी। तब नहीं समझा था लेकिन बाद में न्यूटन की, सॉरी आईंन्स्टीन(धन्यवाद गिरिजेश जी) की Law of Relaitivity वाली थ्योरी अच्छे से समझी और भुगत रखी है। उतनी ही दूरी, उतना ही समय कभी तो लगता है जैसे कितने ही युग और कितने ही मील और कभी लगता है कि दो कदम की दूरी और एक पल का साथ, होता है न? 

बहरहाल, एग्ज़ामिनेशन हाल में प्रवेश किया तो सांसें उखड़ रही थीं और ड्यूटी पर तैनात मैडम ने ऐसे महत्वपूर्ण मौके पर भी देर से पहुंचने के लिये उखड़ते हुये ताल से ताल मिलाई। मैडमों के आगे शुरू से ही हम हत्थे से जुड़े  रहते थे, सो पूरी इज्जत बरतते हुये(और चारा भी क्या हो सकता था?) आंसर शीट ली और सीट पर बैठकर कागज काले करने शुरू कर ही रहा था कि अचानक ध्यान गया कि जब  एग्ज़ाम शुरू हो चुका है, उस समय धनंजय बाहर क्या करने गया है?  देखा तो अब भी उसकी सीट खाली थी, मुझे लगा कि लापरवाह सा है, हो सकता है पेन वगैरह घर भूल आया हो और इन साथ के लड़कों-लड़कियों से ऐसी उम्मीद करना कि स्पेयर पेन दे देंगे, वो भी बोर्ड के एग्ज़ाम में, ऐसे बुडबक हम भी नहीं थे।

लेकिन मेरा तो दोस्त था वो, सुख दुख का साथी। क्या मैं भी उसकी इतनी मदद नहीं कर सकता? कितने तो लम्हे हमने आपस में बांटे हैं और आज मेरा यार एक पेन के लिये पता नहीं कहां कहां भटक रहा होगा? मेरा दिमाग एकदम से सनक गया और मैं पेपर वहीं छोड़कर बाहर को लपक लिया। मैडम फ़िर से बहकती रही, दहकती रही “कैसा लापरवाह ल़ड़का है? पहले पन्द्रह मिनट देर से आया और अब फ़िर पता नहीं कहाँ……?” फ़ुर्सत किसे थी पूरी बात सुनने की? 

मैं फ़िर से भागता हुआ मेन रोड की तरफ़ आया। बाहर बस-स्टैंड पर देखा तो धनंजय खड़ा हुआ जैसे बस का इंतजार कर रहा था। मैंने दूर से ही उसे आवाज लगाई और वो कमर पर हाथ रखे हुये मुझे अजीब नजरों से देख रहा था। पास जाकर  मैंने पूछा, “यहाँ क्या कर रहा है, पेपर शुरू हुये बीस मिनट हो गये हैं?”  वो कहने लगा, “बस का इंतजार कर रहा था, पेपर शुरू हो गया था और आंसर शीट्स बंट चुके थे और तू अभी तक आया नहीं था। मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ है, इसलिये मैं अब तेरे घर जा रहा था। दस मिनट हो गये, तेरी तरफ़ जाने वाली बस ही नहीं आई है। क्यों लेट हो गया आज इतना?”  ऐसे समय में ऐसे सवालों का जवाब औरों को बेशक सूझ जाये, मैं तो अवाक ही था। उस समय तक शायद रो-धो भी लिया करता था, आंखें गीली भी जरूर हुई होंगी। 

खुशी, अफ़सोस, गर्व, संतुष्टि जाने क्या-क्या मेरे ऊपर से गुजर रहा था। खुश था कि मुझे कुछ देर से ही सही, धनंजय को ढूंढ लाने की सूझी तो सही। पछता रहा था कि मैं कैसे पांच मिनट तक बैठा रहा एग्ज़ामिनेशन हाल में? गर्व हो रहा था कि मेरा ऐसा दोस्त है और संतुष्ट था कि शायद पेपर में नंबर कुछ कट जायेंगे लेकिन अपनी आंखों में कद नहीं गिरा मेरा। बोला कुछ नहीं मैं, बस गले लग गया था अपने यार के और फ़िर एक दूसरे का  हाथ पकड़कर फ़िर से वही  हम दौड़ते हुये उखड़ी सांसे लेकर  उन्हीं सिरे से  उखड़ी मैडम की शरण में। पहले तो प्रिंसीपल के आगे हमारी शिकायत लगाने की और परीक्षा में न बैठने देने की धमकी, फ़िर धनंजय के द्वारा स्पष्टीकरण दिये जाने पर हम दोनों को एक से बढ़कर एक पागल की उपाधि देने में मैडम ने दरियादिली खूब दिखाई। इस सब में आधा घंटा नष्ट हो गया।   मेरे अंग्रेजी में बाकी सब विषयों से कम नंबर आये लेकिन फ़िर भी मुझे वो नंबर बहुत ज्यादा लगते रहे।  इस बात पर हम दोनों में बाद में बहुत झगड़ा हुआ और दोनों एक दूसरे पर एक ही आरोप लगाते थे और एक ही स्पष्टीकरण देते थे। बड़ा लुत्फ़ था जब…..।

दसवीं के बाद स्कूल बदला, राहें बदलीं और देखते देखते हम दोनों भी एक दूसरे से बहुत दूर हो गये। मोबाईल बहुत दूर की बात है, तब तो लैंडलाईन फ़ोन भी कहाँ इतने सुलभ थे?  तीन चार साल पहले एक दिन किसी झोंक में आकर उसके घर चला गया मिलने, मुलाकात ही नहीं हो पाई। उसकी पत्नी थीं, पूछने लगी कि क्या बताऊँ?   मुझे जवाब नहीं सूझा, पता नहीं उसे मेरी याद है भी या नहीं? कह दिया कि फ़िर दोबारा आऊँगा मैं खुद, और लौट आया था।  और सोच रखा है, एक बार  फ़िर से मिलने जरूर जाऊँगा, किसी मतलब से नहीं, सिर्फ़ पुराना वक्त याद करने।   कोई बड़ी बात नहीं कि उसे मेरी या उस बात की याद भी न हो, लेकिन मैं नहीं भूल पाया।  वो तो ऐसा ही था, ये कोई बड़ी बात नहीं थी उसके लिये। जब भी मैं याद दिलाता तो कहता, यार, दोस्ती की है तो ये कोई बात है ही नहीं।  मैं इसके बाद शायद इसीलिये दोस्ती से डर गया, कि यार ये दोस्ती तो बहुत खतरनाक चीज है:)   तीसरी कसम के गाड़ीवान की तरह कसम खा ली कि  किसी से दोस्ती नहीं करनी अब, लेकिन पुराने शराबी की खाई कसमों की तरह कितनी ही बार ये कसम टूटी, अब तो याद भी नहीं। दोस्त  आते ही रहे, छाते ही रहे जीवन में।

अब थोड़ी सी ड्रिबलिंग कर लें?  समय बदल गया है, हवा पानी बदल गये, जीवन के मूल्य बदल गये। आज के टाईम में अपन दोस्ती भी करते हैं तो ये सोचकर कि ये मेरे किस काम आ सकता है? मैंने इसके लिये ये काम किया तो अब कहाँ और कैसे इस अहसान का बदला ले सकता हूँ? नये जमाने के दोस्ती के पैमाने भी बाकी सब चीजों की तरह बदल गये हैं। अपन हमेशा की तरह वही असमंजस  में, मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ? आदमी पुराने जमाने के, रहना नये जमाने में, वास्ता नये पुरानों सब के साथ तो क्या नीति निर्धारण किया जाये। फ़िलवक्त तो पिछले कई साल से अपनी पालिसी यही रही है कि अपनी तरफ़ से न दोस्ती की शुरुआत न दुश्मनी की शुरुआत। न हम भगवान और न शैतान, कोशिश इंसान बनने की है, जितने हैं कम से कम उतने तो रह ही सकें।   जो आये उसका स्वागत और जो जाये उसे गुडलक। कभी लौटो तो वहीं खड़े मिलेंगे जहाँ छोड़ा था।

आज की पोस्ट कुछ ज्यादा ही आत्मकेंद्रित लग रही होगी।    हाँ, आत्मकेंद्रित ही है, वो कहते हैं न safe driving is sane driving:)   किसी और को लपेटूँ तो मुझे बचाने यहाँ धनंजय भी नहीं है:)  हा हा हा। हिंदी ब्लॉगिंग तो जैसे  बारूद का ढेर बनी हुए है।  खुद पर कुछ ध्यान देने की बात का श्रेय akaltara.blogspot.com  वाले श्री राहुल सिंह जी को, कुछ टिप्स दिये थे उन्होंने, याद है न राहुल सर? मुझपर स्नेह रखते हैं और मैं सही तरीके से आभार भी नहीं कर पाता। पहले से ही बहुतों का  कर्ज है मुझपर, किस किस का नाम लूँ मैं, मुझे बहुत सारे मित्रों ने संवारा। 

:) फ़त्तू  को सेठ ने ईसी तीसी वाली घटना के बाद निकाल बाहर किया। फ़त्तू को नई नौकरी मिली एक डिपार्टमेंटल स्टोर में। पहले ही ग्राहक ने सिबाका पेस्ट मांगी।  स्टॉक में नहीं थी तो फ़त्तू ने मना कर दिया। फ़्लोर मैनेजर ने समझाया कि ऐसे मना नहीं करना चाहिये था। उसे कह्ते कि सिबाका तो नहीं है  लेकिन कालगेट है, पेप्सोडेंट है, मेसवाक है। कहिये कौन सी दे दूँ?  डिमांड बनाई जाती है, पैदा की जाती है।      फ़त्तू ने सिर हिला दिया।     कुछ देर में एक हाई प्रोफ़ईल ग्राहक वहाँ पहुंची और  टिश्यू पेपर माँगा। फ़त्तू ने इधर उधर देखा, ओफ़्फ़, टिश्यू पेपर भी नहीं है। बड़े अदब से पूछा, “सॉरी मैडम, टिश्यू पेपर तो नहीं है, रेगमार है – कहिये, कौन से नंबर का दे दूँ।”

ब्लॉगजगत भी बहुत कुछ फ़्लोर मैनेजर के कहे के हिसाब से चलता है, डिमांड पैदा की जाती है, बनाई जाती है। या मेरा आईडिया गलत है, हमेशा की तरह?  एग्रीगेटर का पता नहीं क्या हुआ?

शुक्रवार, नवंबर 05, 2010

दिये जलते हैं, फ़ूल खिलते हैं.............

तमस पर प्रकाश की विजय के इस शुभ पर्व पर सभी ब्लॉग मित्रों को हार्दिक शुभकामनायें। आप सबकी प्राप्त और अप्राप्त शुभकामनाओं के लिये बहुत धन्यवाद। पिछले कुछ महीनों में आप सबसे हुये परिचय ने बहुत कुछ दिया है, जिसका प्रत्युत्तर देना अपने वश का नहीं। अपने अंदर का अंधेरा कुछ कम कर सका तो मेरी तो दीवाली वही होगी, और मुझे यकीन है कि मैं कर लूंगा - इतने शुभचिंतक जो हैं मेरे।
ईश्वर से यही कामना है कि आप सबको, आपके परिवार को, इष्ट मित्रों को  हर प्रकार से सुख, सम्रुद्धि और स्वास्थ्य दे। आने वाला समय आप सबके लिये शुभ हो।

p.s. १. एक डायरी में एक रचना पढ़ी थी, आज के मौके के मतलब की। सोचा था वही लिख कर इम्प्रैस करूंगा आप सबको। सुबह से वो डायरी नहीं मिली।
       २. एक घंटे से तस्वीर टांगने की कोशिश कर रहा हूँ, वो नहीं लगी।
तो जी, फ़त्तू ऐंड फ़्रैंड्स की तरफ़ से सीधे सादे शब्दों में ’हैप्पी दीवाली’ स्वीकार करें। गाना सुन लें, जब भी टाईम लगे।