दूसरे शहर में रिश्तेदारी में एक मृत्यु हो गई थी और अंतिम संस्कार में जाने के लिये घर की तरफ़ से मेरी ड्यूटी लगा दी गई थी। अपने उम्र थी लगभग अठारह उन्नीस साल, दुनियादारी का अनुभव तब तक न के बराबर था। संयोग कुछ ऐसा बैठा कि गाड़ी में आठ सवारियाँ थी, छह महिलायें और दो पुरुष। बेमन से जाना पड़ रहा था। चुपचाप जाकर सूमो की पिछली सीट पर बैठ गया। लगभग तीन घंटे का रास्ता था, सारे रास्ते चाचियाँ दादियाँ आपस में हंसी मजाक, निंदा चुगली वगैरह वगैरह करती रहीं। अपन दार्शनिक मुद्रा में जीवन-मृत्यु के बारे में सोच रहे थे और उन सबकी जीवंतता पर गर्व महसूस कर रहे थे। म्रुत्यु वाले घर में जाकर गाड़ी रुकी, दरवाजा खुला और उन्हीं हँसती खिलखिलाती (अ)बलाओं का रुदन वादन देखा तो मुझे एक बार तो लगा कि मैं सारे रास्ते सो रहा था और वो हँसी-ठट्ठे सब मैंने ख्वाब में ही देखे थे, नहीं तो ये जो दोहत्थड़ मार मारकर रो रही हैं ऐसा कैसे कर सकती थीं? कुछ देर बाद वापसी के लिये गाड़ी में बैठे और गाड़ी के चलते ही फ़िर वही हँसी मजाक शुरू, अब लगने लगा सच तो यही है जो अब देख रहा हूँ। बीच का एक घंटा शायद मैं सपना देख रहा था। एक हमारी चाची लगती थीं, जिनसे थोड़ा बहुत मजाक कर लेता था। उनसे पूछा, “चाची, ये एकदम से हँसने से रोने का और रोने से हँसने वाला बटन कहाँ होता है?” चाची ने झिड़क दिया, “चल्ल पागल, ऐहो ज्या कोई बटन नहीं हुंदा। ऐ सब तां मौका देखके करना ही पैंदा है। मौका देख्या जांदा है।” चलो, कोई मरा सो मरा. अपने को कुछ तो ज्ञान प्राप्ति हुई। अब हम कोई गौतम तो थे नहीं कि बुढ़ापा और मौत देखकर बुद्ध बनने निकल पड़ते। इतना ही बहुत है।
महीना भर पहले की बात है, ओफ़िस से लौटकर घर गया तो गोल्डी (छोटा बालक) कहने लगा, “पापा, अर्शी की मम्मी कह रही थी कि जब तुम लोग दिल्ली जाओगे तो अपना बैड हमें बेच देना।” मैंने कहा, “अच्छा, इसीलिये तुझे कभी कभी मैगी खिलाती थी वो? ताकि मौका आने पर औने-पौने दाम पर बैड वगैरह मिल जाये।” अपना बालक नाराज हो गया, उसके दोस्त की मम्मी की निष्ठा पर शक जो किया था मैंने।
उसके बाद पता चला कि ज्यूँ ज्यूँ बच्चों के एग्ज़ाम खत्म होने की और बढ़ रहे हैं, कई आंटियों ने फ़्रिज, अलमारी, टी.वी. वगैरह पर अपना दावा दायर करना शुरू कर दिया है, अगर बेचना हो तो हमें दे देना। अपन भी बालकों को यही कहते रहे कि बेटा आतिथ्य का आनंद उठाते रहो और कहते रहो कि अगर बेचना पड़ा तो आप को ही बेच देंगे:))
अपने को भी घर से बाहर निकलते ही मिलने वाली नमस्ते, सत श्री अकाल की मात्रा बढ़ती हुई लग रही थी। बराबरी का समय है, भाई लोग कैसे पीछे रहते? दो जनों ने हमारी मोटर साईकिल के खरीदार होने की पुष्टि की और उनमें से एक ने तो बाकायदा दूसरी स्टेट के नंबर से पेश आने वाली दुश्वारियों का पूरा नखशिख वर्णन करते हुये सलाह दी कि दूसरी स्टेट के वाहन लेकर जाने की बजाय तो बेशक तौल के हिसाब से बेचनी पड़े, मोटर साईकिल बेचकर ही जाना। घर जाकर नई मोटर साईकिल बल्कि कार ले लेना, आपको तो बैंक से आसानी से लोन मिल ही जायेगा। सतवचन भाईसाहब, आप का कसूर नहीं है, मुझ बावली बूच की शक्ल ही ऐसी है कि ..।
बच्चों के जाने का दिन आ गया, जाने से पहले वो लोग अपनी मम्मी के साथ जाकर अडौस-पड़ौस की सब आंटियों से मिल आये। लौटे तो बताया कि कई आंटियाँ तो सच में रो पड़ी थीं। मैंने समझाया कि बेटा, मौका ही ऐसा है वो बेचारी क्या करतीं? ट्रक में सामान लाद रहे थे तो तीन चार भाभियाँ(मेरी आंटी थोड़े ही हैं?:) बाहर गली में निकल आईं, “वीर जी, जा रहे हो?” तीन साल हो गये एक ही मकान में रहते हुये, किसी ने बात नहीं कि और आज जब जाने का समय आया तो कैसे उदास हो गईं हैं बेचारियाँ? मैं कह देता कि मैं तो आ रहा हूँ लौटकर, ये लोग अब नहीं आयेंगे। बच्चों का नाम लेकर रुआँसी हो गईं सारी, हमारा तो इतना दिल लगा हुआ था आपके बच्चों के साथ वगैरह वगैरह। यही कहा कि खुशकिस्मत हैं बालक, जो आप लोग इतना प्यार करती हैं।
बच्चों को छोड़ आया हूँ (मय उनकी मम्मी) उनके दादा दादी और चाचा चाची के पास और अपन हो गये हैं बैक टु पैविलियन। चार पांच दिन उसी भरे भरे मकान में बिताये, जो अब बिल्कुल सूना हो गया था और आज मेट्रो से जिला मुख्यालय, वहाँ से शहर वाले अपने सफ़र को आगे बढ़ाते हुये आज अपना बोरिया बिस्तर लेकर गाँव में पहुंच गया हूँ। देखते हैं ये सफ़र अब और कहाँ तक पहुंचता है।
आज जब फ़ाईनली अपना सामान लेने गया तो एक भाभीजी फ़िर मिल गईं। उनका फ़िर वही सवाल, आज मेरा जवाब बदला हुआ था, “हाँ जी, आज मैं भी जा रहा हूँ। दो तीन महीने गाँव में ही रहूँगा।” भाभीजी आँखों में आँसू भर लाईं, “गोल्डी को मैं दिन में कई बार याद करती हूँ। मेरी तरफ़ से बहुत बहुत प्यार देना उसे, और उसे कहना आज मुझसे फ़ोन पर बात करेगा। मेरे भतीजों जैसा लगता है मुझे।” मैंने कहा, “भतीजों जैसा क्या, भतीजा ही तो है आपका।” हँसकर आगे बढ़ दिया। उन्होंने फ़िर पीछे से आवाज लगाई, “वीरजी, अगर कम्प्यूटर वाला टेबल आपने न रखना हो तो….”
ऐसे मौके पर मैं कन्फ़्यूज़ हो जाता हूँ, ख्वाब कौन सा है – हँसते खिलखिलाते चेहरे या आँसू भरी आँखें? किसी से नेह-प्रेम मौका देखकर बढ़ाना चाहिये या इन संबंधों में भी मौके की तलाश में रहना चाहिये? उन्हें तो कह दिया कि मुझे खुद के अलावा कुछ नहीं बेचना है, और अपने मन को बहलाया कि इतना बाचली बूच नहीं हुआ कि औने पौने दाम में अपना सामान ऐसे बेच दूँगा। जाओ न किसी ऐंटीक शाप में अकबर का हुक्का, माईकल जैक्सन की पेंट, एल्विस प्रैस्ले का गिटार खरीदने तो पता चल जायेगा तुम्हे। भाव सुनकर गश खा जाओगे और लोग चले हैं मेरा बैड, मोटर साईकिल, कम्प्यूटर टेबल वगैरह खरीदने:)) लोगों को कदर ही नहीं है, हा हा हा।
किराये के नये मकान में आने में कौन सा कम ड्रामा हुआ? कहीं मालिकों को हम पसंद नहीं आये और कहीं मालिक वगैरह हमें पसंद नहीं आये। कहीं एकदम रेगिस्तान सा माहौल और कहीं एक्दम गार्डन गार्डन। अब जाते जाते हाई कमान से हुकम मिला था कि हाथ पाँव समेट कर रहना। तो सिमटा हुआ हूँ फ़िलहाल। देख लो पोस्ट भी बारह दिन के बाद लिखी है। जाने से पहले कुछ न कहा होता तो देखनी थी मेरी चाल:)
गुस्सा तो बहुत आ रहा है और बहुतों पर आ रहा है। अपने ऊपर ऐसी बीत रही है कि चाय तक मिलनी मुहाल हुई पड़ी हैं और हमारे ही यार हैं कि सलाह दे रहे हैं कि हफ़्ते में कम से कम दो दिन अर्थ-ऑवर मनाना चाहिये। भैये, हम तो तैयार हैं पर करें क्या? मौके की बात है:)
आज से नई जगह सैटल हुआ हूँ, अब यहाँ के अनुभव कैसे रहते हैं, जानेंगे आप लोग..