(चित्र गूगल से साभार)
अचानक ही अमृतसर जाने का प्रोग्राम बन गया था, रिज़र्वेशन करवाने का समय भी नहीं था और तब ओनलाईन रिज़र्वेशन होते भी नहीं थे| यानी कि यानी कि समझ गए न? फिर वही कोई पुरानी बात!!
1991, बैंक का इंटरव्यू दिया ही था, उसके फ़ौरन बाद की बात है| अमेरिका ने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी कि ये संजय कुमार बेरोजगार रह जाए वरना क्या जरूरी था उसे हमारे इंटरव्यू से एक दिन पहले ही ईराक पर हमला करने की? एक तो वैसे ही बंधी बंधाई पढाई करने में हमारा दिमाग दिक्कत मानता था, फिर जो तैयारी की थी तो उस हमले के बाद एक बार तो लगा कि गया भैसा पानी में, बस तबसे ही हमें अमेरिका नापसंद हो गया| आप भी कहोगे अजीब आदमी है ये, अमृतसर जाने की बात करके ईराक और अमेरिका की सुना रहा है लेकिन मित्रों बैकग्राऊंड मजबूत हो तो अच्छा रहता है|
Anyway, let us come to the point, बिना आरक्षण के जाना पड़ रहा था, गनीमत ये थी कि साथ में कोई औरत या बुजुर्ग नहीं थे| एक मैं और एक मेरा प्यारा सा हमउम्र सा चाचाजानी| सुबह सुबह घर से परौंठे खाके और लस्सी पीके नई दिल्ली से शान-ए-पंजाब पकड़ने चल दिए| वो हमें और हम उन्हें दिलासा दे रहे थे कि दो जनों को एक भी सीट मिल गई तो कल्लेंगे फिफ्टी -फिफ्टी| पहुंचे तो देखा कि खूब भीड़ थी, सीट का नो-चांस| अब दिलासे का प्रकार बदल गया, कोई बात नहीं यार जवान बन्दे हैगे, रास्ते में सीट मिल गई तो ठीक न मिली तो भी ठीक| बैठने की जगह तो दूर थी, खड़े होने की जगह के भी लाले पड़ गए| जगह मिली कोच के गेट के पास|
गाडी चल दी तो धीरे धीरे सब सामान्य सा होने लगा| समय बिताने का सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ शगल ये है कि किसी भी और हर किसी मुद्दे पर बहस छेड़ दी जाए, वही हुआ| तुसी कित्थे जाना है? से शुरू होकर गाड़ियों में बढ़ती भीड़ से होकर बात वहीं आ पहुँची जहां उसे आना था, यानी ईराक पर अमेरिका का हमला| सारी सवारियां दो हिस्सों में बाँट गयी और शुरू हो गए दुनिया के मसले सुलझाने| हर जगह की तरह वहां भी दो गुट बन गए अमेरिका समर्थक और ईराक समर्थक| पानीपत आते आते मुद्दा व्यक्तिगत हो गया, बुश Vs सद्दाम| अम्बाला तक आते आते रह गया सद्दाम हुसैन, हममें से आधे वार्ताकार सद्दाम हुसैन की तारीफ़ कर रहे थे और आधे उसका विरोध| सब पूरी सक्रियता से अपने अपने तर्क पेश कर रहे थे, वहीं भीड़ में खड़े थे एक सरदारजी| छः फुटा कद, पर्सनल्टी नहीं पूरा पर्सनैलटा था उनका| रात में शायद नींद पूरी नहीं हुई थी, सो खड़े खड़े ही श्रीमानजी अपनी नींद पूरी कर रहे थे| जब गाडी को कभी जोर से झटका लगे तब या जब इधर बहस गरम हो जाती थी तब, धीरे से आँख खोलते और जायजा लेकर धीरे से वाहेगुरू वाहेगुरू बुदबुदाते और फिर से आँखें बंद|
बहसते बहसते लुधियाना और जालंधर भी पीछे छोड़ दिए, जैसे मोमबत्ती बुझने से पहले जोर से भभकती है हम लोगों की बहस भी जोरों से भड़क गयी| गाडी अमृतसर के आऊटर सिग्नल पर पहुंचकर झटके से रुक गयी| सरदारजी की आँख खुली, बाहर झांककर देखा और अबकी बार उन्होंने आँखें दोबारा बंद नहीं की | बहस की तरफ ध्यान देने लगे, हम लोगों को भी जैसे एक निष्पक्ष निर्णायक की प्रतीक्षा थी, असली बात ये थी कि स्टेशन पास आ चुका था|
एक बोला, 'सद्दाम की हिम्मत तो माननी पड़ेगी कि ये जानते हुए भी कि अमेरिका से जीत नहीं सकता, उसने हार नहीं मानी|'
दूसरी पार्टी में से एक प्रखर वक्ता बोला, 'यही बात है तो सद्दाम की क्या हिम्मत है? हिम्मत तो उसके सिपाहियों की है जो मैदान में लड़ रहे थे|' इस पार्टी वाले निरुत्तर, एकदम से इस तर्क का जवाब नहीं सूझा|
अपने सरदार जी बोले, 'वीरे, तेरी गल्ल सई है लेकिन इसी गल्ल नूं अग्गे वधाईये ते असली हिम्मत तां बम्बां दी हैगी जेड़े लड़ाई दे मैदान विच फट रये सी|(भाई, तेरी बात सही है लेकिन तेरी सही बात को ही आगे बढायें तो असली हिम्मत तो बमों की है जो मैदान में फट रहे थे)| चलो भाई, आ गयी गुरू दी नगरी, जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल| ' तर्क में तुक थी या नहीं थी, लेकिन तेली के सर में कोल्हू वाली बात करके सरदारजी ने हम सबको अमृतसर पहुंचा दिया|
थ्योरी में तो हमारे पिताजी भी कई बार समझा चुके कि बेटा बहस में कोई न कोई जीतेगा ही, ये जरूरी नहीं लेकिन कोई न कोई हारता जरूर है और कभी कभी दोनों भी हार जाते हैं| कभी हमें भी बहुत शौक चढ़ा था अपना ज्ञान झाड़ने का फिर अपने साथ एक दो वाकये ऐसे हुए कि हम बहस करना भूल गए| समझ गए कि हम बहस करने के लिए नहीं बने, ईश्वर सबको सब गुण नहीं देता| इसका ये मतलब भी नहीं कि बहस विमर्श करते लोगों को किसी तरह से कमतर समझ लिया जाए, इन लोगों में बदलाव की इच्छा तो है| कम से कम इन्होने दुष्यंत जी को पढ़ा तो है 'आग जला तो रखी है' that is great.
साड्डी दिल्ली के उस्ताद ज़ौक साहब के कलाम की पंक्ति अपने को बहुत पसंद है -
अए ज़ौक किसको चश्म-ए-हिकारत से देखिये,
सब हमसे हैं ज़ियादा, कोई हमसे कम नहीं|
विमर्श देखने पढने का आनंद मैं भी भरपूर लेता हूँ| ब्लॉग पर भी जरूरी-जरूरी बहसें चलती रहती हैं| एक सुझाव या अनुरोध करना चाहता हूँ कि बहस के समापन पर निष्कर्ष क्या निकला, ये जानकारी जरूर दी जाए|
