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गुरुवार, जून 17, 2010

पूर्णिमा का चांद, श्वान बिरादरी और शांति दूत

                                       आभारी हूँ दोस्त तुम्हारा,  कि इतनी पुरानी पोस्ट को भी याद रखा और एकदम मैचिंग मूड  की तस्वीर  बिना कहे ही ढूंढ कर दी।

सलाम नमस्ते,
हमें सलाम नमस्ते करनी पड़ रही है, इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं  कि समय कैसा चल रहा है हमारा।  न तो था एक जमाना कि हम लिया भी नहीं करते थे नमस्ते वमस्ते किसी की। ये हिन्दी की सेवा करने का व्रत जो न करवा दे थोड़ा है। वैसे भी जब बाजार में उतर ही गये हैं बिकने के लिये तो मार्केटिंग का तकाजा है कि बिकने लायक दिखोगे तभी कोई भाव देगा। अच्छे कूदे भाई इस ब्लॉगिंग की दुनिया में। न दिन को चैन, न रातों का करार।  सपना भी देखें तो लगता है कि कोई फ़ॉलोवर अपनी गलती सुधारने के नाम पर हमें अकेला छोड़ कर लौट गया है। और तो और अखबार भी देख लें कभी मजबूरी में तो आंखें स्टिंग आपरेशन में लगी रहती हैं कि कोई खबर दिख जाये ऐसी कि हमारी एक पोस्ट का मैटीरियल तो बन जाये। तो साहेबानों, कदरदानों और बन्धु-बांधवों, आज की पोस्ट का श्रेय जाता है 8 जून के दैनिक हिन्दुस्तान में छपी एक लघुकथा के लेखक विजय कुमार सिंह जी को(नाम शायद यही है, एकदम पक्का याद  नहीं है)।
एक लघुकथा पढ़ी, मुझे बहुत पसंद आयी। सार कुछ इस तरह से था:-
रात घिर आने के बाद आसमान में पूर्णिमा का चांद अपने पूरे आकार और चमक के साथ दैदीप्यमान था। मनुष्य तो जितने भी थे, सभी उसकी निर्मलता और आलौकिकता के आगे नतमस्तक हो गये और मौन को प्राप्त हुये।  सिर्फ़ कुत्ते थे जो सर उठाकर भौंक रहे थे, बस एक को छोड़कर। जब बहुत देर तक उनका शोर बन्द नहीं हुआ तो जो अब तक चुप था, वह शुरू हो गया। कहने लगा कि तुम सब कितना ही सर उठा कर शोर मचा लो लेकिन ये चांद तुम्हारे लिये जमीन पर नहीं उतरने वाला है। अब सारे बिरादर चुप हो गये, सिर्फ़ वही भौंकता रहा सारी रात। शांति बनाये रखने की अपील करते हुये वह शांति दूत सारी रात शोर मचाता रहा।
अब अपनी बात शुरू।  अगर खुद  को श्वान बिरादरी का सक्रिय कार्यकर्ता मानें तो अपनी कैफ़ियत है कि पता है चांद का मेरे लिये जमीन पर  उतरना असंभव है, अपन तो इस लिये जोर जोर से भौंक रहे थे कि कहीं ये चांद किसी और के लिये नीचे न उतर आये। अपना अपना स्टाईल है जी, मुकेश ने इसी बात को ’तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी’ अपनी खूबसूरत आवाज में गाकर कह दिया, हमारे पास भौं भौं है तो हम अपनी भाषा में गा रहे थे।
वैसे हम सारे खुद ही हाकिम बने रहते हैं और फ़ैसले सुनाते रहते हैं।  होती कोई ग्रह-उपग्रह-जूनियर ग्रह उपग्रह एसोसियेशन, तो शायद चांद को भी अपनी इच्छा बताने का हक मिल जाता।  बनेगी जरूर कभी न कभी चांद तारों की यूनियन भी,  देख लेना।
:) फ़त्तू को तैयार देखकर पंडित जी ने पूछा, “घणा चस(चमक) रया सै भाई, कित की तैयारी सै?”
 फ़त्तू:   हरद्वार जाऊं सूं, गंगा नहान का विचार सै।
पंडित जी ने मस्तक रेखायें देखीं और कहने लगे कि तेरी किस्मत में तो गंगा स्नान है ही नहीं। अब फ़त्तू का इरादा और पक्का हो गया। स्टेशन पर गया तो गाड़ी कैंसिल, बस स्टैंड पर गया तो हड़ताल। जैसे जैसे परेशानी बढ़ रही थी फ़त्तू के दिल में ज़िद भी बढ़ रही थी। कहीं पैदल चलके, कहीं लिफ़्ट लेकर, कहीं बैलगाड़ी में चढ़्कर आखिर अठारह दिन में फ़त्तू हरिद्वार में पहुंच ही गया। चैन उसे पड़ा घाट पर पहुंच कर ही। फ़िर मिलाया उसने फ़ोन पंडित जी को और सारी यात्रा क विवरण दिया।  आखिरी वाक्य आप भी सुन लीजिये।
फ़त्तू:  दादा, देख लै। तन्नै कही थी कि मेरी किस्मत में गंगा नहान की है नहीं। बेशक अठारह दिन लग गये. पर यो रही गंगा मेरी आंखों के सामने। तन्नै झूठा साबित करना हो तो बीस बार नहा लूं, पर जा दादा, तू भी के याद करेगा, नहीं नहाता जा।