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रविवार, सितंबर 09, 2012

होता है. होता है...

ट्रेन में डेली पैसेंजरी का जिक्र कई बार कर चुका हूँ, ऐसे ही एक सफ़र की बात है - कोई त्यौहार का दिन था| उस दिन सभी स्कूल, सभी कार्यालय बंद थे लेकिन बैंक खुले थे| लौटते में हमारे ग्रुप में सिर्फ दो मेंबर थे, एक मैं और एक शेर सिंह जी|  एक सहकारी बैंक में मुलाजिम थे और रिटायरमेंट के नजदीक थे, प्यार-दुलार में सब उन्हें 'बड़े मियाँ' बुलाते थे|  हम तो हैं बगुला भगत टाईप के, आसपास कुछ न हो तो आँख बंद करके भगतई का ड्रामा कर लेते हैं जो आगे पीछे काम आ जाता है लेकिन 'बड़े मियाँ'  बिना ताश खेले  जल बिन मछला  हुआ जाते  थे| कोच में बैठे एक एक  बन्दे  से पूछते थे 'सीप खेलनी आती है?' एक पार्टनर मिल गया, एक और की दरकार थी| अगला स्टेशन आया, फिर वही  कवायद    हुई लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ| 

इसी तरह दो तीन स्टेशन गुजर गए आखिरकार उनकी तलाश पूरी हुई  और बाजी जम गई|  ताश का पार्टनर मिलने की जो खुशी उनक चेहरे से छलक रही  थी, इतनी तो  वांछित बहुमत प्राप्त करवा देने वाला पार्टनर दल मिलने  पर  गठबंधन सरकार के मुख्य  घटक दल को भी शायद न मिलती हो| 

बार बार मुझसे कहते थे, 'देखा,  कोशिश की तो मिल गया न खिलाड़ी? नहीं तो सारा रास्ता बोर होते जाते|'  
मैंने कहा, 'ये  तो है| वैसे आधा रास्ता तो कट ही गया था, बाकी आधा भी कट ही जाता|' 
बड़े मियाँ ने अकर्मण्य, सुस्त, कामचोर, निरुत्साही, जाहिल  आदि आदि ढेरों सर्टिफिकेट जारी कर दिए| बहुत प्यार करते थे न हमसे| 


खैर, पत्ते बाँट दिए गए और खेल शुरू हो गया और जिसको वो इतनी शिद्दत से ढूंढकर लाये थे, उस भले आदमी ने इतनी देर में  पत्ते पलट कर रख दिए, "मेरा तो स्टेशन आ गया जी, मैं तो अब उतरूंगा|" 

बड़े मियाँ के चेहरे की ट्यूबलाईट बुझ गयी, पोपले मुंह से अपनी जनाना सी आवाज में बोले, 'धत मेरे यार, अभी तो खेल का मजा आना शुरू हुआ था और तू उतर भी रहा है|'  आसपास जितने बैठे थे और उनकी व्यग्रता का आनंद ले रहे थे, खूब हँसे| 

जुलाई २०११ के लास्ट में पंजाब से ट्रांसफर होकर आया था| एकदम नया माहौल, नयी तरह के ग्राहक, यूं कहिये सब कुछ एकदम नया नया सा, अपरिचित सा था| हमें तो आदत थी गाँव-कस्बों की ब्रांचों की, यहाँ पर आकर  हर चीज को या तो टुकुर टुकुर देखते रहता  था या फिर वही आँख बंद कर लेते थे| अब जाकर धीरे धीरे कुछ पंजे जमने शुरू हुए थे कि अचानक बड़े मियाँ वाला किस्सा याद आ गया, याद दिला दिया गया|  To Cut A Long Story Short , हिस्टरी ने फिर से खुद को रिपीटा|

सफ़र बढ़ गया है जी, दो घंटा रोज| हो सकता है पोस्ट लिखने  की और टिप्पणियों की नियमितता कुछ  प्रभावित हो लेकिन अभी पीछा नहीं छूटेगा आपका,  क्योंकि 'यही कहेंगे हम सदा कि  दिल अभी भरा नहीं|'| 

हाजिर होते रहेंगे नए पुराने किस्सों के साथ, तब तक जय राम जी की|