उसका कद रहा होगा, लगभग सवा-पांच फ़ुट। दुबला पतला शरीर, जैसे सर्कस का जिमनास्ट हो, गोरा रंग। सिर पर सफ़ेद पगड़ी, शरीर पर सफ़ेद ही कुरता और सफ़ेद धोती। जूती जरूर काले रंग की होती थी। उम्र करीब साठ साल, लेकिन चाल में इतनी फ़ुर्ती कि लगता जैसे अभी टीन एजर ही हो। हाथ में एक छोटा सा हुक्का, जिसे हुक्की कहते हैं, लगभग हर समय रहती थी। सुबह नहा धोकर घर से निकलता तो रात में अंधेरा होने के बाद ही लौटता। और ये रूटीन बरसों पुराना था। सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना और रात का खाना, सब बाजार से। बाजार में भी अच्छे हलवाईयों के यहाँ ही व्यवहार था उसका। पैसे न वो देता और न कोई माँगता था उससे। पुलिस, प्रशासन सब जगह पैठ बना रखी थी उसने, मुखबिर था। सब ये बात जानते थे तो कोई पंगा नहीं लेता था। गांव देहात में जैसे सांड देवता को खेत में मुंह मारने की छूट रहती है, इन साहब को भी हर दुकानदार यही मानकर झेल रहा था।
शुरू में एक वणिकबुद्धि हलवाई ने उसे कुछ दिन के बाद टोक दिया था, “दस दिन हो गये, रोज पूरियाँ खा रहे हो। हिसाब बढ़ता जा रहा है।” वो उस समय हुक्की गुड़गुड़ा रहा था, सुनकर एक बार गुड़गुड़ की आवाज थोड़ी जोर से आई और फ़िर उसने मुंह ऊपर उठाकर देखा, “कितने रुपये हो गये तेरे?” हलवाई ने हिसाब देखकर बताया, “साठ रुपये।” कुरते की जेब में हाथ डाला और तीन चार भारी भरकम गलियां अपनी घरवाली को दीं, “……… …….. …….., हरामजादी ने जेब में कुछ छोड़ा ही नहीं।” एक दस का नोट निकाला और हलवाई को देते हुये बोला, “ले लाला, दस रुपये जमा कर ले। सीधा पचास का हिसाब रह गया। और यार, अच्छा किया तूने टोक दिया, बल्कि पहले ही बताना था कि दस दिन हो गये। मैं तो ऐसे ही लापरवाह सा बंदा हूँ। तेरे यहाँ पूरियां बहुत खस्ता होती हैं, इसलिये कहीं और मजा नहीं आता। लेकिन कल तेरा पिछला हिसाब साफ़ करूंगा, उसके बाद ही तेरे यहाँ पूरियां खाऊंगा। वैसे यार, तू पहले ही टोक देता तो कितना अच्छा रहता, अब मुझे शर्म आ रही है।” लाला ने दयानतदारी दिखाई, “कोई बात नहीं, तेरी ही दुकान है। मैंने तो इसलिये कहा था कि व्यवहार बना रहे हमारा।” “बेफ़िक्र रह, आज शाम तक या कल तक तेरा हिसाब चुकता कर दूंगा।” कहकर वो चल दिया। उसके जाने के बाद लाला ने अपनी पीठ ठोंकी, ’हिम्मते-मर्दां, मददे खुदा’ ऐसे ही बाजार वाले खम खाये रहते थे इससे। आज जरा सा टाईट किया तो कर गया न अंटी ढीली? मुफ़त का थोड़े ही है हमारा माल, रोज आता था, खापीकर निकल लेता था जैसे बाप का माल है। बल्कि अब पिछले हिसाब में तीन-पांच किया तो थोड़ा सा और टाईट कर देंगे, याद करेगा ये भी कि वास्ता पड़ा है किसी लाला से।
पुराणों में आता है कि भक्त का अहंकार त्याग करने के लिये विष्णु हरि ने खुद भी श्राप लेना स्वीकार किया था। बेशक कलयुग ही सही, लेकिन भारत भूमि से धर्म का लोप अभी इतना भी नहीं हुआ है। लाला के मन में अहंकार आया जान, उसका मान मर्दन करने का ही जैसे सोचा हो ऊपरवालों ने। ऊपरवालों इसलिये कहा कि इंडिया जो कभी भारत था, उसमें भगवान का स्थान इंस्पैक्टर लोगों ने ले लिया है। घंटे भर के अंदर ही ’फ़ूड एंड एडल्टरेशन डिपार्टमेंट’ के दो स्टाफ़ और उनकी सहायता के लिये थाने से दो सिपाही लाला की दुकान में प्रकट हो चुके थे। देसी घी में चर्बी की मिलावट, मिठाइयों में प्रतिबंधित रंगों की मिलावट, दूध में मिलावट, गरज ये कि दुकान में मौजूद हर सजीव निर्जीव चीज में ऐसी मिलावट सिद्ध होनी शुरू हुई कि लाला से जब उसके पिता का नाम पूछा गया तो वो खुद भी कन्फ़्यूज़ हो गया कि बताते ही ये उसमें भी मिलावट सिद्ध कर देंगे। उसे लग रहा था बाजार से गुजरता हर आदमी उसकी दुकान में हो रहे घटनाक्रम पर सी.आई.ए. की तरह आंख गड़ाये है। इज्जत का फ़लूदा होगा तो होगा, बाजार में जो नाम खराब होगा तो आने वाली पीढियां उबर नहीं पायेंगी। खूब चिरौरी की लाला ने, लेकिन वो सरकारी महकमा क्या जो अपने कर्तव्य से च्युत हो जाये। लाला का अहंकार ऐसे गायब हो गया जैसे गधे के सिर से सींग। कभी इंस्पैक्टर साहब की ठोडी को हाथ लगाता और कभी अपनी टोपी उतारकर उसके पैरों में रखता, लेकिन बर्फ़ नहीं पिघली। द्रौपदी ने भी इतनी आद्रता से कॄष्ण को नहीं पुकारा होगा जैसे लाला मन ही मन परमात्मा को याद कर रहा था।
उसी समय हाथ में अपनी हुक्की लिये वो आ खड़ा हुआ। ’क्या बात हो गई साहब जी, आज लाला की पूरियां आपको भी खींच लाईं?” और वो भी आज दुकान के अंदर ही आ गया। सबसे हाथ मिलाकर जब हंसी मजाक करने लगा तो लाला को उसके हाथ की हुक्की बांसुरी की तरह लगने लगी। उसके दरियाफ़्त करने पर सरकारी अमला मिलावटी चीजों की लिस्ट, और कानून की धारायें गिनवा रहा था और सैंपल की जांच तो जब होगी तब होगी, उससे पहले ही संभावित नतीजों के बारे में बताकर लाला के पैरों तले से जमीन खिसका रहा था। लाला इशारे से उसे परे बुलाकर ले गया और इस मुसीबत से छुटकारा दिलवाने की कहने लगा। उसने बताया कि फ़लां बाजार में जब छापा मारा था तो दस हजार में मामला निबटा था, अपनी गुंजाईश बता दे, मैं कोशिश करता हूं। लाला ने उसे सब अख्तियार दे दिये, बस हैसियत का ध्यान रखने की प्रार्थना की। “आदमी है तो बहुत सख्त, लेकिन अपना लिहाज करता है, चल देखते हैं। तू पूरियां उतरवा इनके लिये।”
लाला के सामने इंस्पैक्टर साहब से कहा उसने कि ये उसकी अपनी दुकान है, बल्कि घर है। नाश्ता रोज यहीं करता है वो, इसका इतना मान तो रखना ही पड़ेगा। साहब लोगों के लिये नाश्ता परोसा जा रहा था, दुकान के अंदर ही और उसने जाकर लाला को बधाई दी कि तेरा मामला पांच हजार में निबटा दिया है, लेकिन बाहर आवाज नहीं निकलनी चाहिये। किसी खास को बताना ही हो तो दस हजार बताईयो, तेरी भी इज्जत बनेगी और इनके पेट पर भी लात नहीं लगेगी. मार्केट रेट ऐसे ही बनते बिगड़ते हैं। लाला ने फ़ट से गिनकर उसे पांच हजार थमाये। उसे जेब के हवाले करके और अपनी हुक्की दुकान पर काम करने वाले एक लड़के के हवाले करके लाला को सबके लिए बढ़िया चाय मंगवाने को कहा उसने। शूगर की बीमारी को शूगर से भी मीठी एक गाली देकर अपने लिये फ़ीकी चाय मंगवाई, “घड़ी घड़ी में पेशाब आता है इस नामुराद बीमारी में, चाय आये तब तक मैं आता हूं पेशाब करके।”
मिलावटी खाद्य पदार्थों का सेवन करके बड़ी सी डकार लेकर टीम चल दी, जाने से पहले उसने लाला से पूछा, “लाला, मेरे हिसाब में कितने बचे हैं, पचास हैं न? कल आता हूँ, दे दूँगा।”
लाला की आँखें भर आईं थीं, क्यों शर्मिंदा करते हो जी, एक तरफ़ कहते हो मेरी दुकान है, फ़िर ऐसा कह्कर क्यों पाप चढ़ाते हो?”
“ना भाई, है तो अपनी ही दुकान लेकिन हिसाब तो हिसाब है। कल को बाजार में किसी के आगे तू कहेगा कि इसने मुफ़्त में मेरे यहाँ इतने दिन माल खाया तो मेरे सफ़ेद कपड़ों का क्या होगा?”
“भाई, जूती मार ले मुझे। ऐसी बात मत करो। मैं भी तेरा हूं और ये दुकान भी तेरी है।”
इतने प्यार को ठुकराना कहाँ आसान है? मन मसोसकर जाना पड़ा उसे। कुछ दूर जाकर फ़िर से एक चाय की दुकान में घुस गये। जेब से पैसे निकाले, पांच-पांच सौ दोनों सिपाहियों को देकर दो हजार इंस्पैक्टर साहब को दिये। बोला, “बड़ा मूँजी आदमी है, दो हजार से ऊपर जाता ही नहीं था। कहता था मैंने मिलावट की ही नहीं तो क्यों दूँ, इज्जत-विज्जत की कदर नहीं है आजकल लोगों को। साहब जी, पचास का नोट दे दो, साला मेरे से भी पैसे लेगा, छोड़ेगा नहीं। कल फ़िर मुँह दिखाना है उसे। आज की मेहनत मुफ़्त में गई, आपका तो मेहनताना शुक्राना मिल गया, काश हम भी होते सरकारी अफ़सर।” इंस्पैक्टर साहब ने सौ रुपये दिये उसे, “ज्यादा ड्रामा मत कर, तेरे कहते ही अ गये न हम दफ़्तर छोड़कर। अगले आसामी की तलाश शुरू कर अब।”
हुक्की की गुड़गुड़ चल रही थी और बाकी सब काम भी, जैसे महंगाई, भ्रष्टाचार पर जनता के बीच दबी दबी सी असंतोष की लहर भी चल रही है और बाकी सब काम चारा, अलकतरा, जाली स्टांप, कामनवैल्थ, स्पैक्ट्रम वगैरह वगैरह। कह गये न हमारे मनीषी ’चरैवेति चरैवेति’ माननी तो पड़ेगी ही उनकी, मन मारकर ही सही लेकिन the show must go on.
ये बातें एक सचमुच के चरित्र की हैं, जिसे मैंने देखा भी है लेकिन चर्चे बहुत सुने थे उसके। एक और बहुत मशहूर जुमला था उसका। किसी सूदखोर से पैसे उधार लिये थे उसने और कई बार तकाजा करने पर भी नहीं लौटाये। एक दिन कुछ ऐसे लोगों के साथ बैठा था जिन्होंने अपनी उधारी चुका दी थी। बात चली तो उन सबको कहने लगा, “तुम लोगों जैसे किसी से लेकर वापिस कर देने वालों के कारण हम जैसों को कितनी परेशानी आती है, तुम्हें क्या पता? तुम्हारा उदाहरण दे देकर लोग हमें झूठ सच बोलने को मजबूर करते हैं।”
अब तो ऊपर हुक्की गुड़गुड़ा रहा होगा, इतना बताता हूँ कि अंत समय बहुत कष्ट में गुजरा था उसका। अपने लड़कों ने ही कमरे में बंद कर दिया था, सुना था कि दिमाग फ़िर गया था उसका। हम छोटे छोटे थे, छुपकर खिड़की से देखते थे कभी कभी, सारे कपड़े उतार देता था और कभी नाचता था कभी अपने बाल नोंचता था। बोलता रहता था कभी गाने तो कभी गालियाँ, चुप नहीं करता था बिल्कुल। एक ही समय में अलग अलग किस्म के लोगों से अलग अलग व्यवहार करने की उसकी कला का शतांश भी ग्रहण कर पाता तो धन्य हो जाता मैं भी। वैसे बोलने तो लग गया हूँ मैं भी अब पहले से बहुत ज्यादा। आप सब जैसे कम और अच्छा बोलने लिखने वालों के कारण हम जैसों को कितनी परेशानी आती है, आपको क्या पता? आपके उदाहरणों के कारण हमें झूठ सच बोलने लिखने को मजबूर होना पड़ता है…
गाना देखना है? देख लो न फ़िर, कौन सा पैसे लगने हैं:)