जासूस ने जब बताया था कि सामने वाली फ़ौज गिनती में अपनी फ़ौज से कम से कम पांच गुना ज्यादा है, तबसे दिमाग में उधेड़बुन चल रही थी। ऐसा न हो कि सैकड़ों मील घोड़ों की पीठ पर सफ़र करके यहाँ तक आना, रास्ते की मुश्किलें, जीती हुई छोटी बड़ी लड़ाईयाँ सब बेकार चली जायें। सिर झटककर वो अपने खेमे से बाहर निकला और मुकाम का मुआयना करने चल दिया। शाम ढलने लगी थी, जगह जगह मशालों और अलावों की रोशनी आते हुये अंधेरों का मुकाबला करने को तैयार हो रही थी। बड़ी बड़ी देगचियों में सिपाहियों के लिये खाना पक रहा था।
पेशानी पर फ़िक्र की लकीरें सिर्फ़ उसकी ही नहीं थीं, सिपाही भी घबराये हुये थे। बेशक उनके पास सामने वाली फ़ौज की गिनती के बारे में सटीक जानकारी न हो लेकिन इतना अंदाजा तो उन्हें भी हो चुका था कि ये लड़ाई आखिरी लड़ाई हो सकती है।
कुछ मील की दूरी पर डेरा जमाये दुश्मन फ़ौज के बारे में वो सोचने लगा। उधर देखा तो आसमान में धुंए की बहुत सी लकीरें दिखीं। माजरा समझ नहीं आया तो उसने पीछे चलते जासूस की तरफ़ सवालिया नजरों से देखा।
"हुज़ूर, दुश्मन फ़ौज के यहाँ रात का खाना बन रहा है, वही धुँआ है।"
हैरान होते हुये उसने पूछा, "तो इतनी लकीरें?"
जासूस ने खुलासा किया, "हुज़ूर, उस फ़ौज में बड़ी गिनती कन्नौज के सिपाहियों की है, लड़ाई में उनकी हिम्मत का लोहा सब मानते हैं। वहीं खानपान और सफ़ाई के मामले में वो सब बहुत एहतियात बरतते हैं। यहाँ तक कि एक सांझा चूल्हा होने के बावजूद हर कन्नौजिया सिपाही अपना खाना अलग से खुद के चूल्हे पर बनाता है। इसी बात पर इधर एक मसल कहते हैं कि ’आठ कन्नौजिये और नौ चूल्हे’ यही सबब है कि उधर से धुँए की इतनी लकीरें दिख रही हैं।"
उस दूर मुल्क से आये हुये हमलावर के चेहरे से चिंता धुंए की तरह ही उड़ गई, ’वो गिनती में बेशक हमसे ज्यादा हैं, फ़तह हमारी होगी।’ इतिहास बताता है कि ऐसा ही हुआ। बेशक स्थानीय सेना की हार की यह अकेली वजह नहीं थी लेकिन परिणाम की एक अहम वजह तो जरूर रही होगी।
ये कहावत बहुत पहले सुनी थी, शायद आपने भी सुनी हो। बहुत प्रचलित तो नहीं है लेकिन इसके पीछे की कहानी जानने की उत्कंठा थी। फ़िर कहीं ऐसा कुछ सुना कि पानीपत की पहली या दूसरी लड़ाई से इसका कुछ कनेक्शन है तो सोचा आपसे शेयर किया जाये। हो सकता है कोई अधिक विश्वसनीय संस्करण जानने को मिल जाये, न मिला तो भी सोचने लायक मसाला तो इसमें भी है ही। व्यक्तिगत शुचिता ही नहीं, ज्ञान, बल, रूप जैसे कितने ही तत्व ऐसे हैं जो हमारे लिये अलग चूल्हे का उपक्रम बन जाते हैं और परिणाम बदल जाते हैं।
नेट पर इस कहावत से संबंधित तो कुछ नहीं ढूँढ पाया लेकिन पानीपत की लड़ाईयों पर एक रोचक लेख जरूर मिला, पढ़िये आप भी।


