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मंगलवार, जुलाई 01, 2014

झाड़ू-नमक

मेरे बाँये पैर के अंगूठे के ठीक ऊपर एक मस्सा था जो जन्म से नहीं था बल्कि मेरे कुछ बड़े हो जाने के बाद हुआ था। हालाँकि वो मस्सा आकार में चने के बराबर था लेकिन पैर के अंगूठे पर होने के कारण एकदम से सबका ध्यान नहीं जाता था।  उन्हीं दिनों मेरी गर्दन और छाती पर छोटे छोटे तिल-मस्से निकल आये। परिजनों का ध्यान जाता तो मुझे कहा जाता कि किसी डाक्टर वगैरह को दिखाओ। मैं यही मानता था कि कोई हार्मोन कम ज्यादा होने से ऐसा हो गया होगा, सीरियसली नहीं लिया।

ऐसे ही एक बार रिश्ते के एक भैया  ने इस पर गौर किया और मेरी अच्छे से क्लास लगाई। उन्होंने अपना किस्सा बताया कि उनकी गर्दन पर भी इसी तरह बहुत से मस्से हो गये थे और नौबत ये आ गई थी कि शेविंग करते समय टॉवल खून से सन जाया करता था। बताने लगे कि उन्होंने इसीलिये दाढ़ी रखी थी। हालाँकि जब हमारी बात चल रही थी उस समय वो इस समस्या से मुक्ति पा चुके थे। उनका खुद का आजमाया हुआ आसान सा तरीका उन्होंने मुझे भी बताया, "सहारनपुर में नौ गज़ा पीर की मजार पर एक बार झाड़ू और नमक चढ़ाया जायेगा और ठीक होने पर एक बार फ़िर से यही चढ़ाने की मन्नत माँगी जायेगी, कुछ ही दिनों में तिल और मस्से खुद झड़कर गिर जायेंगे। प्रत्यक्ष प्रमाण तुम्हारे सामने मैं खुद खड़ा हूँ।" चूँकि वो आयु में और रिश्ते में मुझसे बड़े थे और मेरी परवाह भी करते थे, उनकी डाँट मैंने गंभीरता से सुनी। हमेशा की तरह इस बार भी इरादा भी सिर्फ़ सुनने का ही था लेकिन शायद वो भी मेरी भावना समझ गये और सिर्फ़ भाषण और परामर्श देकर चुप नहीं बैठ गये बल्कि एक पारिवारिक एकत्रीकरण में सबके सामने वही आजमाया हुआ नुस्खा क्रियान्वयित करने का आदेश पारित करवा करके माने। पारिवारिक पंचायत के सामने मुझे भी झुकना पड़ा कि जब भी सहारनपुर जाना हुआ. ये काम यकीनन निबटाया जायेगा।

सहारनपुर शहर से बाहर निकलते ही ’नौगजा पीर की मजार’ के नाम से एक स्थल है। विशेषतौर पर जुमेरात को माथा टेकने वालों की खासी भीड़ वहाँ होती है और स्वाभाविक रूप से लगभग सभी हिन्दु मतावलंबी होते हैं।  इस स्थल की मुख्य मान्यता वही है जो ऊपर लिखी, ’अवांछित तिल/मस्सों का सूखकर झड़ जाना।’ बाई-प्रोडक्ट्स के रूप में हिन्दु-मुस्लिम एकता, गंगा जमुनी तहज़ीब वगैरह मुलम्मे तो हैं ही। कुछ दिनों के बाद सहारनपुर जाना हुआ तो हम भी रास्ते का आईडिया लेकर गये और अनमने ढंग से नमक-झाड़ू की रस्म अदायगी कर दी गई। ये किसी धार्मिक मजार की अपनी पहली और आखिरी विज़िट थी।

जब तब मुलाकात होने पर भैया द्वारा मेरी गर्दन और आसपास के इलाके का मुआयना किया जाता। चूँकि पूछे जाने पर मैंने कहा था कि मैं वहाँ हो आया हूँ और झाड़ू-नमक भी चढ़ा आया हूँ तो मुझ पर झूठ बोलने का आरोप तो भैया ने नहीं लगाया लेकिन अंतत: घोषित कर दिया कि मैंने वहाँ सच्चे दिल से मन्नत नहीं माँगी होगी। 

उस विज़िट के दस-बारह साल बाद सन २००७ के एक दिन सर्जन ने दस मिनट के एक ऑपरेशन में मेरे अंगूठे का वो मस्सा काट दिया। 

ज्ञानचक्षु अपने अब भी नहीं खुले, आज से पन्द्रह साल पहले उस समय तो खैर क्या ही खुले होने थे। उस समय अपनी सोच ये थे कि पीर ही सही लेकिन जिसे नौ गजा बताया जा रहा है, उसी अनुपात में उसकी शक्तियाँ बखानी जा रही होंगी। अपने को ज्यादा अजीब सा तब लगा जब पंजाब जाते समय अंबाला के पास भी इसी नाम की एक मजार देखी।  हम तो एक पीरजी के कद को लेकर ही गणित लगा रहे थे और ये दूसरे भी? एक ही बंदे की बेशक वो पीर ही क्यूँ न हो, दो जगह मजार कैसे? और अगर अलग अलग पीरों की मजार है तो ऐसे और कितने होंगे?  हालाँकि बाद में कुछ सूचनावर्धन अवश्य हुआ। जो दिखता है, वही संपूर्ण सत्य नहीं है बल्कि नेपथ्य में बहुत कुछ है। नेट पर देखा तो पाया कि अकेले भारत में ऐसी एक दो नहीं बल्कि हजारों मजारें हैं। 




कुछ दिन से शिर्दी वाले साईं बाबा के बारे में भी कई चर्चे हैं। लोग आक्रामक रूप से पक्ष में हैं या विपक्ष में, वहीं कुछ (बहुत से) लोग किंकर्तव्यमूढ़ से हैं। एक मित्र का फ़ोन आया और वो इस मुद्दे पर मेरी राय जानना चाह रहे थे। उस समय तो टाल दिया लेकिन  मैं क्या राय दे सकता हूँ? इतना जरूर है कि बहुत सी बातें सोचने विचारने वाली  हैं। घटनाओं का पैटर्न देखिये, प्रभाव देखिये।  व्यक्तिगत संबंधों में दिल और दिमाग में दिल को वरीयता देना बहुत बार त्याग का सूचक होता है लेकिन जब किसी गतिविधि का प्रभावक्षेत्र व्यष्टि से समष्टि की तरफ़ होता हो तो अपने दिमाग को कुछ कष्ट देना चाहिये।  दूसरों की राय पर आँख मूँदकर न चलें, सोच विचार कर खुद निर्णय लें। 

मैं किसी धार्मिक पीठ पर विराजमान कोई शख्सियत होता तो निश्चित ही इस बात का विरोध कर रहा होता कि सनातन धर्म पर ये छद्म आक्रमण बंद हों और माँग करता कि किसी दूसरे धर्म वाले को पिछले दरवाजे से मेरे भगवान से बड़ा दिखाना बंद किया जाये।

मैं कोई राजनेता होता तो शायद इस बात का विरोध कर रहा होता कि मेरी आस्था पर चोट किया जाना बंद हो। मेरी त्वरित इच्छापूर्ति की गारंटी या आत्मतुष्टि जिससे मिले मैं वो करने को स्वतंत्र बता रहा होता बेशक मेरा वो कदम राष्ट्र हित को खतरे में डाल रहा हो।

मैं भी व्यावहारिक सा फ़ैशनेबल मनुष्य होता तो जिधर भीड़ जाती दिखे, उधर मुँह उठाकर चल देता।

लेकिन मैं ये सब नहीं हूँ, हो भी नहीं सकता।  

आज अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुये अपनी जान न्यौछावर कर देने वाले अमर शहीद अब्दुल हमीद का जन्मदिवस है, उन्हें सादर श्रद्धाँजलि।






शनिवार, मार्च 02, 2013

दो बोरी..

ये वो समय था जब लगभग हर  घर में कम्प्यूटर और हर हाथ में मोबाईल नहीं होते थे। अपने देश में तकनीक की हद वी.सी.आर. और वी.सी.पी. तक ही पहुँची थी। कुछ उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों के पास अपने वी.सी.आर.\वी.सी.पी. थे और कुछ नीचे के पायदान के  शौकीन लोग फ़िल्मों के शौक के लिये वीडियो-पार्लर वालों पर निर्भर थे क्योंकि पूरे परिवार को साथ लेकर सिनेमा हॉल तक जाना भी सबके लिये संभव नहीं होता था। रात भर के लिये वी.सी.आर. किराये पर लाये जाते और कीमत वसूली के परंपरागत देशी रिवाज को निभाते हुये कम से कम तीन फ़िल्मों के कैसेट्स लाये जाते थे। बड़े परिवार थे,  अड़ौस-पड़ौस में आना जाना भी रहता ही था। प्राय: पहला शो किसी धार्मिक या पारिवारिक फ़िल्म का होता था, जो सुबह होने तक एक्शन या रोमांस फ़िल्मों के शो में बदल जाता था। उस समय का अपना ही आनंद था। बहुत बार तो शाम होते तक बात फ़ैल जाती थी कि आज फ़लाने के यहाँ वी.सी.आर. आ रहा है और फ़लां फ़लां फ़िल्म लाई जायेगी। कोई ज्यादा ही सीक्रेसी मेन्टेन करने वाला होता था तब भी देर सवेर ही सही बात तो खुल ही जाती थी। जब दो जने तामझाम लेकर आते थे तो सीक्रेट मिशन की चुगली हो ही जाती थी और फ़िर फ़िल्म देखने के न्यौते, अपने परिवार वालों से रात भर किसी दोस्त के यहाँ रहने की स्वीकृति, पूरी राजनीति चलती थी। सौ बात की एक बात, वीडियो पर फ़िल्म देखना एक सामाजिक उत्सव की तरह से होता था।

एक दिन मैं शायद कॉलेज से लौट रहा था तो देखा कई लड़के घेंधू के साथ कुछ मसखरी कर रहे थे और वो जवाब में हमेशा की तरह खिसियाते  हुये और हँसते हुये पार्लियामेंट्री भाषा में  उनकी ऐसी-तैसी कर रहा था। अब तमाशा हो रहा हो और मैं चुपचाप वहाँ से निकल जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता। मैं रुककर तमाशे की वजह पूछने लगा। अब हमारे यहाँ तो हर बात पर कोई न कोई किस्सा है और हर किस्से की कोई न कोई पूर्वकथा तो दोस्तों, भला मानो या बुरा, किस्सा और उसकी पूर्वकथा तो झेलनी ही पड़ेगी। बोलो,   इरशाद...:)

कागजों में तो उसका नाम  प्रेमपाल था लेकिन जानते उसे सब उसके घरेलु नाम ’घेंधू’ से ही  थे। मैं उसे हमेशा प्रेम कहकर ही बुलाता था और बदले में वो उम्र में हमसे बड़ा होता हुये भी मुझे भाई साहब कहकर बुलाता था। बाकी सब उसे घेंधू ही बुलाते थे, वो बदले में अबे तबे करके जवाब देता था।  कुछ साल पहले यू.पी. के एक कस्बे से अपने बड़े भाई के साथ रोजी रोटी की तलाश में शहर-ए-दिल्ली में आया था। पढ़े-लिखे दोनों ही मामूली थे लेकिन मेहनती पूरे थे। एक दो कमरे का मकान किराये पर लेकर उसी में रहते भी थे, खुद ही हाथ से कुछ खिलौने बनाते और फ़िर खुद ही सप्लाई कर आते। मेहनत रंग लाई तो चार पैसे बचाये भी।  इस सब में बड़े भाई का योगदान ही ज्यादा था, शरीर से भी वो घेंधू से कम से कम डेढ गुना था। हमारा घेंधू तो एक सहायक की तरह काम करता रहता था, जितना बड़े ने बताया वो कर देता। 

जल्दी ही बड़े को दिल्ली का रंग चढ़ने लगा, कई यार दोस्त बन गये थे। शुरू में एक-एक  पैसे की सोचने वाला वो अब किसी किसी मौके पर खुले हाथों से पैसा खर्चने लगा लेकिन अपने और अपने दोस्तों के खाने पीने पर ही। कुछ ही समय बाद उसकी शादी भी हो गई। इधर काम बढ़ रहा था, उधर परिवार भी, खर्च भी और साथ साथ ही भाईयों में थोड़ा सा असंतोष भी। पैसा कुछ आ गया था लेकिन रहन सहन वही पहले जैसा ही था। घेंधू सर्दियों में दिन भर शरीर पर कंबल लपेटकर घूमता और गर्मियों में बनियान और पायजामे में। कई बार देखते थे कि फ़र्श पर ही बोरी बिछाकर सोया रहता था। शेट्टी स्टाईल में सिर घुटा हुआ, तेल चमकता हुआ और चेहरे पर वही सदाबहार हँसी। ये जरूर है कि वो हँसी बड़े भाई को देखकर इधर उधर हो जाती थी।  घेंधू बड़े भाई से डरता भी था, कई बातों से उससे खार भी खाता था लेकिन ये भी जानता था कि वो जो भी है,  बड़े भाई के दम से ही है। छोटी मोटी बदमाशी कर लेता था जैसे बड़ा भाई माल बेचने गया तो वो कच्चे माल  की खाली बोरियों में से दो चार बोरियाँ कबाड़ी को बेच आता था, इतनी ही रेंज थी। कहता था कि बीड़ी के पैसे भाई से माँगूंगा तो अच्छा थोड़े ही लगेगा।

किस्से की कहानी पूरी, अब किस्सा शुरू। लड़कों के साथ चलती नोक-झोंक से किस्सा कुछ यूँ खुला  कि गई रात घेंधू का भाई अपने दोस्त से वी.सी.आर लेकर आया था और फ़िल्म देखने के घेंधू के अरमानों पर पानी फ़िर गया  था जब गिलास में रंगीन पानी डालते हुये बड़े भाई ने धमकाया, "जा बे, सो जा दूसरे कमरे में।" आज्ञाकारी घेंधू चला आया, कमरे में फ़िल्म शुरू हो गई। कुछ देर के बाद बड़े भाई को कुछ शक हुआ और उसने चुपके से अंदर से  दरवाजा खोल दिया।  दरवाजे की झिर्री पर चिपका हुआ घेंधू झटके से दरवाजा खुलने पर मुँह के बल आकर फ़र्श पर गिरा। जब तक उठकर बाहर भागने का जतन करता तबतक जासूसी, ताक झाँक, जलन के कई आरोप और पिछवाड़े पर कई धौल-लातें बरस गईं और  हर लात पर घेंधू चिल्लाता था, "मोकू तो दो बोरी लेनी थी भाई, वाई को ओढ़ बिछा लेता, ठंड बहुत लग रही थी।"

मैं तो खैर पहले भी उसे घेंधू कहकर नहीं बुलाता था,उस दिन के बाद से किसी और ने भी उसे इस नाम से नहीं बुलाया।  उसका नया नाम ’दो बोरी’ हो गया था। 

इस साल का बजट आ गया। बजट आने के बाद जितने भी नौकरीपेशा थे, सब घेंधू की तरह दिख रहे हैं। हम सब तो सर्दी से बचने के लिये  दो बोरी की उम्मीद बाँधे थे कि उन्हें ही ओढ़-बिछा लेंगे लेकिन वित्तमंत्री जी को लगा होगा कि ये सब छुपकर सरकार की रासलीला देख रहे हैं, लगा दी लात। कोई बात नहीं बड़े भाई, अधिकार है तुम्हारा।

सोमवार, फ़रवरी 04, 2013

पहचान

बात पुरानी ही है, हजारों साल पुरानी न सही लेकिन हजारों दिन पुरानी तो होगी ही। हमारे एक बॉस हुआ करते थे, अभी तो रिटायर्ड लाईफ़ बिता रहे हैं। दिल के बहुत वड्डे, कर्मठ, उत्साही, जुगाड़ी। बॉसपना छूकर नहीं गया था उन्हें, सब सहकर्मियों के साथ  मित्रवत व्यवहार ही रखते थे । स्वभाव की बात करें तो अपने से एकदम उलट थे, हम न मदद लेने में यकीन रखने वाले न मदद देने में और वो आधी रात को भी कोई साथी फ़ोन कर देता तो कैसी भी मदद करने को तैयार। इसी तरह से जरूरत पड़ने पर मदद मांगने में भी नहीं हिचकते थे। बैक की नौकरी के अलावा पार्टटाईम में प्रापर्टी का काम भी कर लेते थे, उस पुराने जमाने में कमाई का एक अच्छा जरिया एस.टी.डी. कनैक्शन भी किसी के नाम से ले रखा था। दूसरों को भी पैसे कमाने के नुस्खे बिना फ़ीस लिये बताते रहते थे।
एक पियन साथी को एक दिन कहने लगे कि यहाँ से छुट्टी होते ही गांव भाग जाता है, क्या करता है वहाँ?  
वो बताने लगा, "करणा के सै जी, जाके हाथ मुंह धोके चार भाईयां गेल बोल बतला ले सैं, हुक्का-पानी पी ले सैं, बस।"
"तो शाम को दो तीन घंटे सब्जी की रेहड़ी लगा लिया कर, सौ-पचास रोज के बन जाया करेंगे बाहर बाहर ही।"
अब हरियाणा के आदमी को आप जानो ही हो, उधार नहीं रखता अपने सिर। वो बोला, "आप एक काम करो जी, एक  झोटा बांध लो। दिन में एकाध भैंस भी नई होण तईं ल्याओगा कोई तो सौ पचास आपके भी बन जायेंगे बाहर बाहर से।"
बॉस हमारे बुरा नहीं मानते थे, जानते थे दुनिया ऐसी ही है। इसके बाद भी स्कीमें बनाते रहते थे, बताते रहते थे। हमें भी दो चार स्कीमें बताईं लेकिन हम तो टालते रहे। उन दिनों वो अपने बच्चों को सैट करने के लिये एक गैस्ट हाऊस बनाने के प्रोजैक्ट में जुटे हुए थे। बड़ा प्रोजैक्ट था, खूब पैसा लग रहा था।
उन्हीं दिनों की बात है,एक दिन कहने लगे कि सरसों का सीज़न है। कुछ पैसा उधर लगाया जाये तो अच्छा फ़ायदा होगा। अभी खरीद लेते हैं, दो चार महीने बाद मुनाफ़े पर बेच देंगे। उनके पैतृक शहर में कई आढ़ती उनके जानकार थे, क्वालिटी पहचानने न पहचानने की कोई समस्या नहीं और न ही खरीदने-बेचने के समय मंडी जाने की समस्या। अपनी ही प्रोपर्टी में सरसों रख दी जायेगी, किराया भाड़ा भी कुछ नहीं। पहले उसी बाहर बाहर वाले साथी को तैयार करने का जुगाड़ किया। उस भले आदमी ने गेंद मेरी तरफ़ सरका दी कि संजय भी व्यापार में शामिल हो तो वो भी थोड़ी घणी पूँजी लगा देगा। सच बात तो ये है कि उस सरसों खरीद के विवरण जानकर मैं भी बाहर बाहर से कुछ कमाने के लिये कन्विंस हो चुका था।
घाटे का तो कोई चांस था ही नहीं, संयुक्त परिवार में रहने वाला मैं अब इस सोच में पड़ गया कि ये बंपर मुनाफ़ा मैं अकेले अकेले खा जाऊं तो नैतिक रूप से वो सही होगा या नहीं? ’जहाँ चाह वहाँ राह’ वाली तर्ज पर राह निकाली कि पूँजी पिताजी से ली जाये, मुनाफ़ा जो होगा वो भी पिताजी तक ही पहुँचाया जाये, माल मालिकों का, मशहूरी कंपनी की। डील हो गई और बॉस के पचास हजार और हम दोनों जूनियर पार्टनर्स  के पच्चीस-पच्चीस हजार की आरंभिक पूँजी  से  ’ईर बीर फ़त्ते’ फ़र्म अघोषित रूप से व्यापार में कूद गई।
पहले ही बता चुका कि कई हजार दिन पहले की बात है, इसलिये करबद्ध प्रार्थना है कि हमारे हिस्से की पच्चीस हजार की रकम पर ज्यादा ध्यान न दिया जाये। अरे भई,  पुरानी फ़िल्मों में इतनी रकम की फ़िरौती की माँग के कई उदाहरण मिल सकते हैं।
हमारे सामने ही एक आढ़ती से फ़ोनपर सरसों खरीद लेने की पुष्टि हो गई। हालाँकि खरीद दर  अखबार में दिये गये रेट से कुछ ज्यादा लगी लेकिन बताया गया कि अखबार में तो स्टैंडर्ड रेट आते हैं, हमारे नाम पर खरीदी गई सरसों हाई क्वालिटी की थी इसलिये रेट ज्यादा है। व्यापार के गुर धीरे धीरे ही आते हैं। अब हम लोग अखबार में ’बलात्कार’, ’हत्या’, ’चार बच्चों की माँ आशिक के साथ भागी’ जैसे समाचार बाद में देखते थे, उससे पहले ’आज के भाव’ में सरसों का रेट देखते थे। आने वाले समय में सरसों की माँग उठ सके, इस मिशन के तहत अपने और अपनों के घरों में सरसों के तेल का और दूसरे उत्पादों का प्रयोग बढ़ाने के तमाम प्रयास शुरू कर दिये गये।
महीना भर हुआ था कि बॉस ने बताया कि उनकी जिस प्रापर्टी में सरसों का भंडारण किया गया था, उस प्रापर्टी को बेचना पड़ गया है। अब एक विकल्प है कि सरसों जिस भाव बिके, बेच दी जाये या फ़िर उसके भंडारण के लिये किराये की जगह ली जाये। चूँकि अभी सीज़न चल रहा था, सरसों ऊंचे भाव पर बिकनी नहीं थी, फ़र्म ने फ़ैसला लिया कि किराये की जगह पर सरसों का भंडारण किया जाये।
चार पांच महीने बीत गये थे, अखबार बता रहे थे कि सरसों के प्रति क्विंटल भाव कम से कम साढ़े चार सौ रुपये ज्यादा हो चुके थे, बिग पार्टनर से कहा गया कि सरसों बिकवा दी जाये। आढ़ती को फ़ोन पर कह दिया गया। ये कहना सुनना कई दिन तक चलता रहा। इधर आढ़ती के यहाँ कभी ये पंगा कभी वो पंगा शुरू हो चला था, उधर अखबार में सरसों के  भाव गिरने शुरू हो चुके थे। एक दिन गरमागरमी में कहा गया कि जिस रेट पर निकले, इसे निकलवाओ। वो निकाली गई, बेईज्जत होकर निकली तो उसने भी कसर पूरी निकाली। वैसे भी खरीद के समय अखबार रेट से ज्यादा का आरोप था तो इस बार अखबार रेट से कम पर निकली। कई हिसाब बराबर हो गये। अब वहाँ से पेमैंट और हिसाब आने का इंतजार था, हफ़्ते दो हफ़्ते में वो कयामत की घड़ी भी आ गई, जब सब हिसाब किये जाने थे। 
खरीद पर कमीशन, बिक्री पर कमीशन, किराया-भाड़ा, दामी, बारदाना (कई शब्द मैंने पहली बार सुने) वगैरह वगैरह काटकर हिसाब समेटा गया तो अपने हिस्से में सिर्फ़ बाईस सौ रुपये का घाटा आया। पूँजी पिताजी की लगवा रखी थी तो उन्हें  घुमाफ़िराकर पच्चीस हजार पर तीन सौ का लाभ दिया क्योंकि अपना रेट तो  दस परसेंट का है, घाटा हो या फ़ायदा।
हम सरसों के व्यापारी के रूप में अपने फ़्रेंड्स सर्किल में बहुत मशहूर हुये। कई महीनों तक लोगों के मनोरंजन का साधन बने रहे। लोग चाय सिगरेट मंगवाते थे, आधी पी चुके होते तब जालिम लोग पूछते, "और सरसों का व्यापार कैसा रहा?" न आधी पी जाती, न उगली जाती।  सबसे ज्यादा मजे भोला द ग्रेट लेता था, "मैं सौ रुपये मांगता तो देने से पहले मुझे सौ बात सुनाते थे, हुण आया न स्वाद पच्चीस सौ रुपईये दा घाटा खाके? वड्डे ब्योपारी बनण चले सी"  और यहीं नहीं, जब जब घर आता तो मेरे लाख मना करने के बाद भी  पिताजी के सामने भी बात छेड़ता, "संजय बाऊ, दुबारा सरसों कब लेणी है?" मैं आँखों-आँखों में डाँटता रहता और वो चाय पीता रहता और हँसता रहता।
उस सच्चे सौदे के बाद बॉस की और उस हरियाणवी साथी  ’अभय सिंह’ की नोंक-झोंक खूब चलती रही। एक दिन अभय सिंह बॉस पर भारी पड़ रहा था कि आपको आढ़ती की पहचान ही नहीं थी और बॉस ने मायूस सा होकर कहा, "यार, मुझे तो वो आढ़ती एकदम सीधा-सादा लगा था। गोरा-चिट्टा, मासूम सा।" अभय एकदम से भड़क गया, "यो पैहचाण सै सही गलत की? देखण में गोरा चिट्टा था तो हमने के उसकी पप्पी लेणी थी?"
आप भी सोचेंगे कि इस मो सम को ये बात आज कैसे याद आई? अखबार में पूरे पेज पर राहुल की फ़ोटो और प्रोफ़ाईल देखकर माताजी मुझसे कह रही थीं, "ओय संजय, इसका भी जन्म 1970 का ही है, तेरे जितना ही है ये।" माँ है न, नहीं जानती कि इतने से शब्दों से कितना बड़ा मानहानि का केस बन सकता है। फ़िर बात चली तो कहने लगीं कि बच्चा दिखता एकदम से सीधा साधा है, छल कपट से दूर। माँ है न, नहीं जानती कि किसी के दिखने या लगने से जिस जिम्मेदारी की अपेक्षा लगा लेते हैं हम लोग, उसके लिये सीधा-सादा होना या दिखना ही बहुत नहीं होता। 
उसके दिखने वाली बात पर मुझे अपने पुराने बॉस, अभय और वो गोरा चिट्टा आढ़ती याद आ गया, माँ ने पूछा भी कि हँसता क्यों है, क्या बताता उसे? ऐसी बातें सिर्फ़ दोस्तों के साथ ही तो हो सकती हैं न...
बहुत दिन हुये गाना नहीं लगाया था, चलो  आज यही सही:)