रविवार, जनवरी 19, 2014

यक्ष प्रश्न

केन्द्रीय राज्यमंत्री डा. शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर थरूर की रहस्यमयी परिस्थितियों में हुई मृत्यु ने फ़िर से महाभारत का यक्ष-युधिष्ठिर संवाद वाला प्रसंग याद दिला दिया और साथ में फ़िल्म नमकहराम में आलम(रजा मुराद) का बोला वह शेर भी कि -

’जीने की आरज़ू में रोज मर रहे हैं लोग,
मरने की जुस्तज़ू में जिये जा रहा हूँ मैं’

संभावनायें और परिस्थितियाँ इशारा कर रही हैं कि सुनंदा की मृत्यु स्वाभाविक नहीं है। ताजा ट्विटर-विवाद, आईपीएल जैसे प्रकरणों के चलते लगता तो यही है कि यह आत्महत्या या हत्या का मामला हो सकता है। इस रहस्य से पर्दा उठेगा कि नहीं, वीआईपी लोगों का इस प्रकरण से सीधे जुड़े होने के कारण फ़िलहाल तो यह भी एक रहस्य ही है। 

मृत्यु किसी भी रूप में आये, परिजनों के लिये क्षति रूप में आती है और मृत्यु का आत्महत्या या हत्या होना इस क्षति की मात्रा और प्रकार को कई तरीकों से बढ़ा देता  है। इतना जरूर है कि किसी आम नागरिक के साथ हुई ऐसी दुर्घटना अखबार में चंद लाईनों तक सिमट जाती है और किसी हाई-प्रोफ़ाईल के साथ ऐसा होने पर कई दिन की फ़ुटेज की उपलब्धता निश्चित हो जाती है। 

इस मामले में फ़ेसबुक पर लोगों की अलग अलग तरह की प्रतिक्रियायें देखीं।  हम हिन्दुस्तानियों को हर मामले में निर्णायक बनने का शौक\लत है सो प्रतिक्रियाओं से कोई आश्चर्य नहीं हुआ। सेलिब्रिटी होने का एक पक्ष यह भी है कि आपका व्यक्तिगत कुछ भी नहीं रहने दिया जाता। प्रेस\मीडिया\लोग तो किसी की खाँसी को भी व्यर्थ नहीं जाने देते, यहाँ तो एक जान गई थी तो चूकना असंभव था। प्रतिक्रियाओं से तो आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन इस बात से आश्चर्य जरूर हुआ कि यह नौबत क्यों आई होगी? किसी कमजोर द्वारा ऐसा कदम उठाना फ़िर समझ आता है लेकिन रूप, धन, पद, शक्ति जैसे भौतिक साधनों से संपन्न लोग जब ऐसा कदम उठाते हैं तो आश्चर्यचकित न होना मुझे अजीब लगेगा। 

जीवन कभी भी आसान नहीं रहता। प्राथमिक चिंता रोटी, कपड़ा और मकान की होती है और आर्थिक/सामाजिक स्तर सुधरने के साथ दूसरी चिंतायें इसमें जुड़ती रहती हैं। बहुधा तो हम लोग इन चिंताऒं से जीवन भर जूझते रहते हैं लेकिन सब इतने भाग्यवान भी नहीं होते।वैसे हममें से शायद ही कोई होगा जिसने कभी न कभी आत्महत्या के विकल्प पर विचार नहीं किया होगा। मुझे लगता है कि बहुत बार परिस्थितियाँ इस तरह से प्रतिकूल हो जाती होंगी कि उनसे जूझते हुये जीवन बिताने की अपेक्षा अपने जीवन के अध्याय को स्वयं बंद कर देना कहीं ज्यादा आसान लगने लगता होगा।

अधिकांश और हो सकता है लगभग सभी प्रचलित धर्मों में आत्महत्या को वर्ज्य माना गया है लेकिन मानव सभ्यता कभी भी इससे अछूती नहीं रही होगी। आत्महत्या समस्याओं से मुक्ति नहीं, सिर्फ़ पलायन है। बल्कि ऐसा करके लोग अपने परिजनों को बिल्कुल अकेला कर देते हैं।  कुछ लोग या कुछ घटनाओं को जरूरत से ज्यादा महत्व देना कहीं की समझदारी नहीं है। सकारात्मक विचारों और सकारात्मक सोच से इस आत्मघाती सोच से बचा जा सकता है। 

आज मैंने कुछ आंकड़े देखे तो पाया कि आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या स्त्रियों से बहुत ज्यादा है बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि कई गुना ज्यादा है।


ज्ञात मामलों की तह में जाने के सीमित प्रयास किये तो पाया कि आत्महत्या करने वाले पुरुषों में अधिकांश संख्या ऐसे लोगों की थी जिन्होंने 'आर्थिक कारणों' के चलते ऐसा कदम उठाया वहीं ऐसा कदम उठाने वाली स्त्रियों के लिये मुख्य वजह 'रिश्ते' रहे। 'आर्थिक कारणों' के चलते आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या ज्यादा होने की वजह तो यह मानी जा सकती है कि अभी तक इस क्षेत्र में आधिपत्य और जिम्मेदारी पुरुषों की ही ज्यादा रही है तो आत्महत्या करने वालों में भी पुरुष ही आगे रहे होंगे लेकिन ’रिश्ते’ वाला कारण तो दोनों के लिये समान महत्व वाला होना चाहिये न?

रिश्तों में तनाव के कारण आत्महत्या करने वालों में पुरुषों से स्त्रियाँ  कहीं आगे हैं। इसकी वजह क्या हो सकती है?

क्या रिश्ते तोड़ने या टूटते रिश्तों से सामंजस्य बिठाने में पुरुष ज्यादा माहिर हैं, ज्यादा प्रैक्टिकल हैं? 

समय गुजरने के साथ क्या स्त्रियाँ रिश्ते में स्वयं को पुरुष पर निर्भर और कमजोर मान लेती है? या फ़िर आम धारणा के विपरीत पुरुष भावनात्मक रूप से ज्यादा मजबूत हैं?  

अगर किसी रिश्ते को लेकर पुरुष गंभीर नहीं है तो क्या स्त्री के लिये जान दे देना ही सर्वोत्तम उपाय रह जाता है? 



बात मृत्यु की और आश्चर्य की हो और मुझे अतिप्रिय प्रसंग का ज़िक्र न आये, बहुत मुश्किल है। और तो और, यहाँ तो लगता है इस श्लोक में पूछे गये चारों प्रश्न और उनके उत्तर आज भी प्रासंगिक हैं।




रविवार, जनवरी 05, 2014

टीवी-बीवी भाषण-राशन

"यार, पेरेंट्स ने वाईफ़ को यहाँ लाने की इजाजत तो दे दी है लेकिन अब हमें खुद को सोच विचार हो रही है।"
"क्यों, अब क्या चिंता है? मैं तो कहूँगा कि एक परंपरागत परिवार से होते हुये भी तुम्हारे पेरेंट्स ने काफ़ी एडवांस सोच रखी है ।"

"ये तो है, लेकिन मेरी वाईफ़ शुरू से ही गाँव में रही है और उसकी भाषा यहाँ की हिन्दी से बहुत अलग है। अड़ौस-पड़ौस में परिवार तो बहुत हैं लेकिन बातचीत ठीक से न हो पाये तो उसे बहुत अटपटा लगेगा।"

उस समय के हमारे राय मशविरे ब्लॉग बहस की तरह नहीं होते थे कि अपने ज्ञान और तर्क शक्ति की कैटवॉक करके दिखा दी, उसके बाद तुम अपनी जगह और हम अपनी जगह। वैसे भी संत तुलसीदास ’तिनहीं बिलोकत पातक भारी’ लिखकर धमकिया ही चुके थे तो हमने मित्र के रज समान दुख को मेरू समाना मानते हुये नई बीवी की आवभगत नये टीवी से करने की राय दी ताकि हमारी भाभीश्री को एकदम से अकेलापन न महसूस हो। उसी मकान में नीचे के हिस्से में एक पोर्शन राजा बाबू एवं उनकी श्रीमती की गृहस्थी के लिये  फ़ाईनल कर लिया गया। 

फ़ैसला होने के बाद मित्रमंडली में यह खुशखबरी बांट दी गई कि इस छड़ा महल में दूसरी तरह की चहल पहल आने वाली हैं -  टीवी और उसके कुछ दिन बाद ही राजा बाबू की बीवी। राजा का विचार था कि चूँकि इन चीजों से उसका वास्ता नहीं रहा है तो टीवी पहले खरीद लिया जाये। जब तक शादी होगी और बीवी को लाने का समय आयेगा, तब तक टीवी का सिस्टम समझ आ जायेगा वरना एक साथ दो नई चीजें साधने में कहीं दिक्कत न हो जाये। ये प्रस्ताव भी एकमत से पास हुआ क्योंकि इस मदों में जो खर्च होना था वो राजा का ही था तो शुभस्य शीघ्रम।  एकाध दिन में सब दोस्त राजा के साथ जाकर टीवी खरीदवा लाये। पुराने समय की बात है,  ऊंचे ऊंचे एंटीना लगे करते थे और सीमित समय के लिये गिने चुके दो चैनल आते थे एक दूरदर्शन राष्ट्रीय और शायद एक प्रादेशिक राजधानी से। पहले दिन राजा की गृहस्थी का सामान सेट करते और टीवी का एंटीना फ़िट करते कराते प्रसारण समय समाप्त हो चुका था, फ़िर भी टीवी को बार बार चलाकर देखा गया, ब्राईटनेस\कंट्रास्ट और शूँSSSSSS की आवाज करते वॉल्यूम के बटन को भी घुमा घुमाकर चैक किया गया।

वहाँ रहते हुये तब तक दो साल हो गये थे लेकिन कभी टीवी की कमी नहीं महसूस हुई थी, आपस में हँसते-बोलते, लड़ते-झगड़ते कैसे समय बीत जाता था इस बात का पता भी नहीं चलता था। आज टीवी आ गया था तो रह रहकर बात टीवी से शुरू होती थी। आज राजा को जबरदस्ती नीचे भेजा गया कि अब हमसे अलग दूसरे कमरे में सोने की आदत डाल। वो था कि जा नहीं रहा था, उसका कहना था कि जब बीवी आयेगी तो जाना ही होगा लेकिन अभी क्यों अपने से दूर कर रहे हो?  हम अपने इरादों के पक्के, देर रात उसे उसके कमरे में भेजकर ही माने। उसे समझाया गया कि बीवी के आने से पहले तू भी टीवी की आदत डाल लेगा तो दोनों का समय अच्छे से बीतेगा। बहरहाल राजा अच्छा लड़का रहा, मान जाता था। अगले दिन उससे पूछा कि कल रात टीवी चलाया था तो पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से भरे उसने माना कि हाँ चलाया था, कुछ प्रसारण तो नहीं आ रहा था लेकिन सब बटन वटन चैक करता रहा ताकि सब मैकेनिज़्म समझ आ जाये। हम सबने हँसते हुये उसकी पीठ थपथपाई कि ऐसे ही गहरे पानी पैठता रहियो, सब मैकेनिज़्म समझ आ जायेंगे :)

अगले दिन दिनभर ऑफ़िस में भी बात-बेबात टीवी का चर्चा चलता रहा। शाम को ड्यूटी ऑफ़ का टाईम हुआ तो सब घर चलने को तैयार हुये जबकि पहले ड्यूटी के बाद वहीं ऑफ़िस में बैठकर कैरमबोर्ड पर ब्लैक एण्ड व्हाईट खेला करते थे। जल्दी-जल्दी घर पहुँचे और टीवी चलाया तो स्क्रीन ब्लैंक थी।  पता चला कि तीन या पांच दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया जा चुका था और नेपथ्य में शोक ध्वनि चल रही थी। बड़ा धोखा हुआ हमारे साथ।

आने वाले दिन भी यही कार्यक्रम दोहराया गया और उसके अगले दिन भी। अब लौटकर यंत्रवत एक बार टीवी चलाते थे, वही मातमी धुन सुनते थे और टीवी बंद कर देते थे। रिपीट मोड में यह कार्रवाई हर घंटे दो घंटे में दोहराई जाती हालाँकि नतीजा मालूम था। ऐसे ही एक बार टीवी चलाया तो मरहूम  का दूरदर्शन पर एक पुराना इंटरव्यू दिखाया जा रहा था। रेगिस्तान में पानी को तरसते मुसाफ़िर को पानी की थोड़ी सी भी मात्रा मिल जाये तो जो उसकी हालत होगी, वैसे ही कुछ हमें महसूस हुआ - इंटरव्यू ही सही, कुछ तो देखने को मिला। करीब आधे घंटे का वो इंटरव्यू देखने में हमें बहुत मजा आया। सारा इंटरव्यू न बताकर उसका सबसे मस्त पोर्शन आपको बताता हूँ -

साक्षात्कार ले रही महोदया ने पूछा, "सर, आपके भाषण बहुत पॉपुलर होते थे और लोग बहुत शौक से सुनते थे। आपने यह कला कहाँ से सीखी?"

जवाब मिला, "मैं मिडल(या हाई) स्कूल में पढ़ता था तो एक बार देश के बारे में स्टेज पर कुछ बोला। मेरे एक मास्टरजी थे, उन्हें मुझमें कुछ  संभावना दिखाई दी। फ़िर उन्होंने बाकी टिप्स के अलावा सबसे मुख्य टिप ये दी कि आजकल सर्दियों का समय है, सुबह जल्दी उठकर गाँव से बाहर खेतों की तरफ़ घूमने जाना चाहिये। आजकल किसानों ने खेतों में गोभी लगा रखी है। सुबह सुबह खेत में घुसकर गोभियों के बीच खड़े होकर भाषण देना शुरू कर दें। गोभियों के बीच खड़ा भाषण देता आदमी अजीब दिखेगा और शुरू में खुद उसे भी अजीब सा लगेगा लेकिन धीरे धीरे उसके दिमाग में यह बात बैठ जाती है कि जब वो भाषण देता है तो उसके सामने मनुष्य नहीं, गोभी के फ़ूल हैं जिन्हें कोई प्रतिक्रिया नहीं देनी। इस अभ्यास से आत्मविश्वास आ जाता है और फ़िर जब वो स्टेज पर जाकर जनता के बीच कुछ कहना शुरू करता है तब भी इसके दिमाग में यही होता है कि सामने जो सिर दिख रहे हैं, वो गोभी के फ़ूल हैं।"

उस समय हम सब बहुत हँसे थे और उस इंटरव्यू को बहुत एंटरटेनिंग माना था लेकिन उन्होंने जो कहा वो हमारा एंटरटेनमेंट करने के लिये नहीं कहा था बल्कि सादगी से कही गई सच्चाई  थी। हम सब हैं गोभी के फ़ूल ही, लेकिन थोड़ा एडवांस टाईप के। कुछ भाषण सुनकर तालियाँ पीट लेते हैं, कुछ सिर पीट लेते हैं और कुछ अपने अपने मतलब की लकीर पीटते रहते हैं और भाषण देनेवाला किसी दूसरे खेत में गोभी के फ़ूलों को संबोधित करके कह रहा होता है - भाईयो और बहनों,............ 

मजेदार\विवादित भाषणों के अपने अनुभव शेयर करना चाहें तो ये गोभी का फ़ूल भी आपका स्वागत करता है। 

डिस्क्लेमर -  ये पोस्ट किसी की अवमानना के उद्देश्य से नहीं लिखी गई है। 

रविवार, दिसंबर 22, 2013

खम्म दा कां ..

नौकरी के सिलसिले में पहली बार अनजान शहर में जा रहा था तो पिताजी ने एक नाम बताया और कहा कि वहाँ जाकर उनसे संपर्क करना, बहुत बड़ी शख्सियत हैं और उनसे संपर्क रखने से नई जगह पर बहुत सहारा मिलेगा। एक तो उस समय हम खुद को हिमालय से ऊंचा और सागर से गहरा समझते थे और दूसरा हमें अपना कुँआ छोड़कर बाहर की दुनिया देखने की जल्दबाजी थी तो चुपचाप मुंडी हिलाकर और बिना बहस किये निकल लिये। नई जगह, नई नौकरी, नये दोस्तों की चकाचौंध में हम ऐसे मगन हुये कि पिताजी के बताये नाम के बारे में किसी से पूछा भी नहीं। 

पन्द्रह-बीस दिन में घर आना होता तो पिताजी ने एक-दो बार उस बारे में पूछा भी लेकिन हम टाल गये, वो समझ गये। कई मौसम बदल गये, उस नाम की हस्ती के पते के बारे में मैंने किसी से पूछा नहीं और खुद से कोई बताता भी क्यों लेकिन मन में एक फ़ांस रह गई कि पिताजी ने कुछ कहा और मैंने किया नहीं। स्वयं ही अपने आप से सवाल-जवाब करता रहता कि पिताजी ने कोई आदेश तो दिया नहीं था, सरसरी तौर पर कहा था। फ़िर उन्होंने अपने लिये तो कुछ मांगा नहीं था, मेरे हित के बारे में सोचकर ही कहा था तो मैं तो यहाँ आकर मस्त हूँ ही फ़िर अगर इस काम में लापरवाही हो भी गई तो कोई बड़ी बात तो नहीं। एक बड़ी वजह और भी थी जो किसी से कह नहीं सकता था, माना कि पिताजी की दृष्टि में जो बहुत बड़ी शख्सियत है, उस अनजान शहर में हो सकता है कि उनसे कोई परिचित न हो। मैं किसी से पूछूँ और जवाब में सुनने को मिले कि हम तो नहीं जानते इस नाम वाले सज्जन को और फ़िर पिताजी तक ये बात पहुँचे तो उन्हें ठेस पहुँचेगी। इससे बेहतर तो यही है कि खुद लापरवाह बने रहो। जिंदगी मस्त गुजर रही थी, जंगल में मंगल हो रहा था जिसके सच्चे-झूठे  किस्से इस ब्लॉग पर शुरू में बहुत सुनाये गये थे और अब भी बीच बीच में जिक्र चलता ही रहता है। 

एक बार ऐसा हुआ कि यही दिसंबर या जनवरी के दिन थे और शाम के समय मैं अकेला ही(अपवादस्वरूप ही) टहलता हुआ शहर के बाहरी हिस्से तक पहुँच गया। जब सब साथ होते थे तो हम शहर में ही घूमते थे लेकिन अकेला था तो आज उधर निकल पड़ा जिधर सब नहीं जाते थे।  अंधेरा घिर आया था और सड़क पर कोई रोशनी भी नहीं थी, सोचा कि वापिस चला जाये। फ़िर पता नहीं क्यूँ मन ही मन फ़ैसला किया कि आगे सड़क जहाँ मुड़ रही है, वहाँ तक जाकर लौटूँगा। मैं चलता रहा, जब उस मोड़ के पास पहुँचा तो पीछे से एक ट्रक आया। मैं सड़क से हटकर साईड में खड़ा हो गया। ट्रक मोड़ से मुड़कर आगे चला गया और मैं सिर्फ़ एक पल के लिये वहीं ठिठककर रह गया। मुड़ते समय ट्रक की हेडलाईट की रोशनी एक पल के लिये सड़क किनारे लगे एक बोर्ड पर से होकर गुजरी थी और उस बोर्ड पर वही नाम लिखा था जो पिताजी ने मुझे बताया था। अगली बार घर लौटा तो पिताजी को सारी बात बताई और बिना कुछ खास किये भी वाहवाही पाई, बिल्कुल वैसे ही जैसे कई बार बिना कुछ खास किये ऐसी-तैसी भी करवाई है।

ब्लॉग लिखने के शुरुआती समय की ही बात है, अंदाजन साढ़े तीन साल पहले एक पोस्ट लिखी थी। कुछ दिन पहले किसी मित्र से बात हो रही थी तो ढूँढते-ढूँढते उस पोस्ट तक पहुँचा। गया किसी और सन्दर्भ में था लेकिन वहाँ जाकर ठीक वैसे ही ठिठक गया जैसे उस ट्रक की हेडलाईट की रोशनी पड़ते बोर्ड को देखकर ठिठका था। मसाला फ़िल्म की तरह मसाला पोस्ट बनाने के चक्कर में फ़त्तू का आईटम नंबर पोस्ट में जोड़ देता था तो उस पोस्ट में आईटम नंबर में एक जगह का नाम इस्तेमाल किया था। उस जगह से न अपना कोई वास्ता था न अपने दादा-परदादा का। न कोई मित्र-मित्राणी वहाँ से थे न कोई व्यापारिक या आधिकारिक संबंध। सिर्फ़ आईटम नंबर में दूरी, समय के हिसाब से वो स्थान वहाँ फ़िट होता था और हमने वही कर दिया था। अभी से एक साल पहले तक उस स्थान में हमारे बैंक की जो शाखा थी वो किसी दूसरे प्रशासनिक कार्यालय के अधीन थी। एक साल पहले ही वह शाखा इसी प्रशासनिक कार्यालय के अधीन आई और चारेक महीने पहले एकदम अप्रत्याशित रूप से हम भी उस जगह पर पदस्थापित हो गये। 

अब अपने से अलावा लेकिन अपने ही दो स्टाफ़ सदस्यों की बात। एक स्टाफ़ सदस्य प्रोमोशन पर अक्टूबर में मेरी शाखा में आये तो उन्होंने बताया कि वो अपने पूर्वपरिचित (एक और) संजय जी की ब्रांच में जाना चाहते थे। मैंने हँसकर इसे संयोग ही बताया कि आपको साथ में काम करने के लिये ’संजय’ तो मिल गये लेकिन मनचाहे वाले नहीं बल्कि अनचाहे वाले। एक दूसरे स्टाफ़ सदस्य उन्हें किसी ’संजय’ से मतलब नहीं था बल्कि उन्हें अपनी पोस्टिंग इस स्थान विशेष पर चाहिये थी लेकिन उन्हें मिली दूसरी ब्रांच, जहाँ वही दूसरे वाले ’संजय जी’ हैं। सबके सामूहिक प्रयास से और प्रबंधन की सदाशयता के चलते पिछले सप्ताह दोनों स्टाफ़ सदस्यों का स्थानांतरण कर दिया गया। जिन्हें अपने वाले ’संजय’ चाहिये थे वो ’संजयजी’ के पास और जिन्हें व्यक्तिविशेष से काम नहीं था बल्कि स्थानविशेष से मतलब था, वो अपनी पसंद की जगह पर। मतलब हुण ऑल इज़ वैल :)

ये नमूने हैं कुछ उन बातों और घटनाओं के जिन्हें हम संयोग मानते हैं।  उस रात मेरा अकेले घूमने जाना, अंधेरा घिरने के बावजूद एक पल के लिये बोर्ड पर हेडलाईट की रोशनी पड़ना वगैरह वगैरह, जितना महीन सोचते जायेंगे उतने ही छोर मिलते-छूटते जायेंगे। अब से चार साल पहले किसी अनजान सी जगह का नाम अनायास ही लिख देना और फ़िर कालक्रम में चाहे अनचाहे उसी जगह पहुँच जाना, सब संयोग है या पहले से लिखे किसी घटनाक्रम के अग्रिम संकेत। ज्ञानियों के पास हर सवाल के जवाब होते हैं लेकिन हमारे पास तो  सवाल ही हैं। हम इस ब्रह्मांड के सबसी शक्तिशाली जीव हैं या पहले से लिखी किसी पटकथा के अदना से किरदार? या फ़िर दोनों, बहुतों से शक्तिशाली लेकिन किसी के हाथों विवश, क्या हैं हम?

आप सवाल कर सकते हैं कि पोस्ट-शीर्षक से इसका क्या लेना देना तो इस सवाल का जवाब है मेरे पास। वो क्या है कि हमने सोचा है कि थोड़ा सा भाषा-ज्ञान आपसे साझा कर लेते हैं। कल को आप ये न कहें कि खाली-पीली टाईम खोटी करवाता रहता है।  शीर्षक वाक्य असल में पंजाबी की एक कहावत है। जब हम छोटे थे तो कभी कभार माँ-पिताजी की नोक-झोंक में पिताजी यह वाक्य कहा करते - ’खम्म दा कां बनाना’ - मैं ठेठ पंजाबी नहीं समझता था। खम्म का मतलब नहीं समझ आता था, इसका हिंदी अनुवाद करता तो बनता - खम्भे का कौआ बनाना। लेकिन बात जमती नहीं थी, अभी कुछ दिन पहले पिताजी से इसका मतलब पूछा तो उन्होंने समझाया कि  ’खम्म’ का मतलब है पंख। कहीं पर किसी चिड़िया का पंख देखकर कोई दूसरे को बतायेगा कि वहाँ किसी पखेरू का पंख पड़ा था। तीसरे तक जाते-जाते वो पंख कौए का हो जायेगा और आगे बढ़ते-बढ़ते बताने वाला बतायेगा कि उसने खुद वहाँ बड़े से काले कौए को देखा था। तो इसका सरलार्थ हुआ कि छोटी सी बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताना। 

अब अपने जीवन से संबंधित एक दो घटनाओं पर हमारे गंभीरता से सोचने को आप बात का बतंगड़ बनाने, राई का पहाड़ बनाने, झूठे सच्चे किस्से सुनाने की जगह ठेठ पंजाबी में ’खम्मा दा कां बनाना’ भी कह सकते हैं।  आगे किसी पोस्ट में आप को हमारे एक और तकियाकलाम ’होर वड़ो’ का भी अर्थ सोदाहरण समझाया जायेगा।

डिस्क्लेमर - इस पोस्ट में कई जगह ’आप’ शब्द लिखा गया है, इसका अरविंद केजरीवाल जी की राजनीतिक पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है।


चंद नमूना-ए-झूठे-सच्चे किस्से :)

एक

दो

तीन

चार

पाँच

छह

सात

आठ




गुरुवार, दिसंबर 12, 2013

द आयरन मैन - The Iron Man

ससुराल जाने का चाव सबको होता है बेशक घूम घूम कर और झूम झूम कर गा लें कि ’मैं ससुराल नहीं जाऊँगी, डोली रख दो कहारो।’  पहली बार ससुराल जाने का अवसर आया तो हमारे फ़त्तू को भी पूरा चाव था। सज धज कर मन में भावी सेवा टहल के ख्याल लिये जनाब ससुराल पहुँच गये। पुरजोर मौखिक स्वागत हुआ। भोजन का समय हुआ और जिज्जाजी जीमने के लिये तैयार हुये तो साली ने बथुए की रोटी पेश की। 

फ़त्तू को धीरे से झटका लगा, पूछा, "बथुए की रोटी?’

साली चहकी, "जिज्जाजी, बथुए में घणा आयरन होय सै।"फ़त्तू आयरन की गोली समझकर जीमने लगा। रात में रोटी तो सादी थी लेकिन साथ में सब्जी जरूर बथुए की थी।

जिज्जाजी के हावभाव देखकर साली ने फ़िर कहा, "जिज्जाजी, बथुए में घणा आयरन होय सै।" फ़त्तू ने वो आयरण सप्लीमेंट भी पेट के हवाले किया। अगले दिन सुबह बथुए के परांठे और दोपहर में रोटी के साथ बथुए का रायता - फ़त्तू ने कुछ कहने के लिये मुँह खोला और जवाब में साली ने फ़िर बथुए में घणा आयरन होने का पुराण खोला।  

फ़त्तू तसल्ली से उसकी बात सुनकर बोला, "बथुए में आयरन की तो मैं जाणूं सूँ पर चार चार बेर बथुआ प्रोडक्ट बनाके खिलाने की तकलीफ़ क्यों करते हो? थारे घर में कोई तीन-चार फ़ुट का आयरन-रॉड रखा हो तो सीधे ही झंझट निबटाओ न, खामेख्वाह बथुए की ऐसी तैसी करण में जुट रहे हो।"



कुर्सी के लिये छीना-झपटी, क्रय-विक्रय, जोड़-तोड़ देखने के अभ्यस्त हम दिल्ली वाले राजनैतिक पार्टियों के बदले अंदाज को देखकर फ़त्तू बने हुये हैं। जिसे देखो वही कह रहा है कि हम सरकार नहीं बनायेंगे और प्रकट यह कर रहे हैं कि इससे भला जनता का होना है।  दिल कर रहा है कि फ़त्तू की तरह कह दूँ ’साली’ पार्टियों से कि लोकतंत्र का जो आयरन सप्लीमेंट हमें देना है वो सीधे तरीके से एक ही बार दे दो न, खामेख्वाह बथुए की ऐसी तैसी करण में जुट रहे हो:)