मंगलवार, जुलाई 01, 2014

झाड़ू-नमक

मेरे बाँये पैर के अंगूठे के ठीक ऊपर एक मस्सा था जो जन्म से नहीं था बल्कि मेरे कुछ बड़े हो जाने के बाद हुआ था। हालाँकि वो मस्सा आकार में चने के बराबर था लेकिन पैर के अंगूठे पर होने के कारण एकदम से सबका ध्यान नहीं जाता था।  उन्हीं दिनों मेरी गर्दन और छाती पर छोटे छोटे तिल-मस्से निकल आये। परिजनों का ध्यान जाता तो मुझे कहा जाता कि किसी डाक्टर वगैरह को दिखाओ। मैं यही मानता था कि कोई हार्मोन कम ज्यादा होने से ऐसा हो गया होगा, सीरियसली नहीं लिया।

ऐसे ही एक बार रिश्ते के एक भैया  ने इस पर गौर किया और मेरी अच्छे से क्लास लगाई। उन्होंने अपना किस्सा बताया कि उनकी गर्दन पर भी इसी तरह बहुत से मस्से हो गये थे और नौबत ये आ गई थी कि शेविंग करते समय टॉवल खून से सन जाया करता था। बताने लगे कि उन्होंने इसीलिये दाढ़ी रखी थी। हालाँकि जब हमारी बात चल रही थी उस समय वो इस समस्या से मुक्ति पा चुके थे। उनका खुद का आजमाया हुआ आसान सा तरीका उन्होंने मुझे भी बताया, "सहारनपुर में नौ गज़ा पीर की मजार पर एक बार झाड़ू और नमक चढ़ाया जायेगा और ठीक होने पर एक बार फ़िर से यही चढ़ाने की मन्नत माँगी जायेगी, कुछ ही दिनों में तिल और मस्से खुद झड़कर गिर जायेंगे। प्रत्यक्ष प्रमाण तुम्हारे सामने मैं खुद खड़ा हूँ।" चूँकि वो आयु में और रिश्ते में मुझसे बड़े थे और मेरी परवाह भी करते थे, उनकी डाँट मैंने गंभीरता से सुनी। हमेशा की तरह इस बार भी इरादा भी सिर्फ़ सुनने का ही था लेकिन शायद वो भी मेरी भावना समझ गये और सिर्फ़ भाषण और परामर्श देकर चुप नहीं बैठ गये बल्कि एक पारिवारिक एकत्रीकरण में सबके सामने वही आजमाया हुआ नुस्खा क्रियान्वयित करने का आदेश पारित करवा करके माने। पारिवारिक पंचायत के सामने मुझे भी झुकना पड़ा कि जब भी सहारनपुर जाना हुआ. ये काम यकीनन निबटाया जायेगा।

सहारनपुर शहर से बाहर निकलते ही ’नौगजा पीर की मजार’ के नाम से एक स्थल है। विशेषतौर पर जुमेरात को माथा टेकने वालों की खासी भीड़ वहाँ होती है और स्वाभाविक रूप से लगभग सभी हिन्दु मतावलंबी होते हैं।  इस स्थल की मुख्य मान्यता वही है जो ऊपर लिखी, ’अवांछित तिल/मस्सों का सूखकर झड़ जाना।’ बाई-प्रोडक्ट्स के रूप में हिन्दु-मुस्लिम एकता, गंगा जमुनी तहज़ीब वगैरह मुलम्मे तो हैं ही। कुछ दिनों के बाद सहारनपुर जाना हुआ तो हम भी रास्ते का आईडिया लेकर गये और अनमने ढंग से नमक-झाड़ू की रस्म अदायगी कर दी गई। ये किसी धार्मिक मजार की अपनी पहली और आखिरी विज़िट थी।

जब तब मुलाकात होने पर भैया द्वारा मेरी गर्दन और आसपास के इलाके का मुआयना किया जाता। चूँकि पूछे जाने पर मैंने कहा था कि मैं वहाँ हो आया हूँ और झाड़ू-नमक भी चढ़ा आया हूँ तो मुझ पर झूठ बोलने का आरोप तो भैया ने नहीं लगाया लेकिन अंतत: घोषित कर दिया कि मैंने वहाँ सच्चे दिल से मन्नत नहीं माँगी होगी। 

उस विज़िट के दस-बारह साल बाद सन २००७ के एक दिन सर्जन ने दस मिनट के एक ऑपरेशन में मेरे अंगूठे का वो मस्सा काट दिया। 

ज्ञानचक्षु अपने अब भी नहीं खुले, आज से पन्द्रह साल पहले उस समय तो खैर क्या ही खुले होने थे। उस समय अपनी सोच ये थे कि पीर ही सही लेकिन जिसे नौ गजा बताया जा रहा है, उसी अनुपात में उसकी शक्तियाँ बखानी जा रही होंगी। अपने को ज्यादा अजीब सा तब लगा जब पंजाब जाते समय अंबाला के पास भी इसी नाम की एक मजार देखी।  हम तो एक पीरजी के कद को लेकर ही गणित लगा रहे थे और ये दूसरे भी? एक ही बंदे की बेशक वो पीर ही क्यूँ न हो, दो जगह मजार कैसे? और अगर अलग अलग पीरों की मजार है तो ऐसे और कितने होंगे?  हालाँकि बाद में कुछ सूचनावर्धन अवश्य हुआ। जो दिखता है, वही संपूर्ण सत्य नहीं है बल्कि नेपथ्य में बहुत कुछ है। नेट पर देखा तो पाया कि अकेले भारत में ऐसी एक दो नहीं बल्कि हजारों मजारें हैं। 




कुछ दिन से शिर्दी वाले साईं बाबा के बारे में भी कई चर्चे हैं। लोग आक्रामक रूप से पक्ष में हैं या विपक्ष में, वहीं कुछ (बहुत से) लोग किंकर्तव्यमूढ़ से हैं। एक मित्र का फ़ोन आया और वो इस मुद्दे पर मेरी राय जानना चाह रहे थे। उस समय तो टाल दिया लेकिन  मैं क्या राय दे सकता हूँ? इतना जरूर है कि बहुत सी बातें सोचने विचारने वाली  हैं। घटनाओं का पैटर्न देखिये, प्रभाव देखिये।  व्यक्तिगत संबंधों में दिल और दिमाग में दिल को वरीयता देना बहुत बार त्याग का सूचक होता है लेकिन जब किसी गतिविधि का प्रभावक्षेत्र व्यष्टि से समष्टि की तरफ़ होता हो तो अपने दिमाग को कुछ कष्ट देना चाहिये।  दूसरों की राय पर आँख मूँदकर न चलें, सोच विचार कर खुद निर्णय लें। 

मैं किसी धार्मिक पीठ पर विराजमान कोई शख्सियत होता तो निश्चित ही इस बात का विरोध कर रहा होता कि सनातन धर्म पर ये छद्म आक्रमण बंद हों और माँग करता कि किसी दूसरे धर्म वाले को पिछले दरवाजे से मेरे भगवान से बड़ा दिखाना बंद किया जाये।

मैं कोई राजनेता होता तो शायद इस बात का विरोध कर रहा होता कि मेरी आस्था पर चोट किया जाना बंद हो। मेरी त्वरित इच्छापूर्ति की गारंटी या आत्मतुष्टि जिससे मिले मैं वो करने को स्वतंत्र बता रहा होता बेशक मेरा वो कदम राष्ट्र हित को खतरे में डाल रहा हो।

मैं भी व्यावहारिक सा फ़ैशनेबल मनुष्य होता तो जिधर भीड़ जाती दिखे, उधर मुँह उठाकर चल देता।

लेकिन मैं ये सब नहीं हूँ, हो भी नहीं सकता।  

आज अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुये अपनी जान न्यौछावर कर देने वाले अमर शहीद अब्दुल हमीद का जन्मदिवस है, उन्हें सादर श्रद्धाँजलि।






रविवार, जून 15, 2014

होर वड़ो..

’लाला’ एक ऐसा शब्द है जो कभी किसी जाति का सूचक बन जाता है, कभी किसी व्यवसाय का। पंजाब की तरफ़ हिन्दु परिवारों में घर के मुखिया को लाला कहकर संबोधित किया जाता है और ब्रज में छोटे बच्चे को लाला कहकर बुलाते हैं।  जब कोई काबुली पठान आवाज लगाये ’ओ लाले की जान’ तो पता चलता है कि कानून की तरह लाला की पहुँच भी बहुत लंबी है, सरहद की सीमाओं को पार भी कर जाती है। लेकिन यहाँ हम जिस लाला का किस्सा बताने जा रहे हैं, वो इनमें से किसी से भी संबंधित नहीं। वो खानदानी लाला था, है और रहेगा। पता नहीं कितनी पीढ़ी पहले, क्यों और कैसे ये लेबल उनके साथ लग गया था और हर नई पीढ़ी कर्ण के कवचकूंडल की तरह इस ’लाला’ पदवी के साथ ही अवतार लेती रही।  उसके पिताजी का भी एक भला सा नाम था लेकिन उस नाम से उन्हें कोई नहीं जानता था, ’लाला’ कहने से ही उन्हें पहचान लिया जाता था। इस लड़के का भी सोहणा सा नाम था लेकिन हमारी  मित्र मंडली में ये भी ’लाला’ ही कहलाता था।

दसवीं की परीक्षा हो चुकी थी और हमारी रोड इंस्पेक्टरी चालू थी। बोर्ड परीक्षा की मानसिक थकान उतारने के बहाने किराये पर वीडियो लाकर फ़िल्में देखने का कार्यक्रम बन चुका था। आयोजन स्थल का फ़ाईनलाईज़ेशन चल रहा था। दो सरदार भाईयों के अलावा लगभग सब लड़़कों ने पैसा कंट्रीब्यूट करने की हामी भर रखी थी। उनकी हामी भी उनके दारजी की हामी के इंतज़ार में रुकी हुई थी लेकिन उम्मीद पर दुनिया कायम थी। इस बार जैसे एक एक वोटर को बूथ तक लाकर  वोट प्रतिशत बढ़ाने का अभियान चला था, हमारे ऐसे सामूहिक कार्यक्रमों में एक एक को शामिल किया जाना आर्थिक कारणों से बहुत आवश्यक था।    ऑनलाईन चंदा तो उस समय आता नहीं था, पॉकेटमनी भी इतनी नहीं होती थी कि रोज रोज ये आयोजन किया जा सके इसलिये आज के समय में फ़ालतू सा लगने वाला वो प्रोग्राम हम लोगों के लिये कामनवेल्थ खेलों जैसा आयोजन ही था। पैसा इकट्ठा हो भी गया तो सारी रात वीडियो कहाँ चलेगा, ये सवाल मुँह बाये हम सबके सामने खड़ा था।

जिस दिन दोनों भाईयों के लिये परमीशन और चंदा उगाही के मकसद से हमारा प्रतिनिधिमंडल दारजी की अदालत में पेश हुआ, हमारी तरफ़ से भूमिका वाला तंबू तानने के बाद उनका प्रैक्टिकल सवाल यही था कि वीडियो किसके घर चलाया जायेगा? बिल्ली के गले में घंटी बांधी थी तो  पहली उंगली इस गरीब की तरफ़ उठनी स्वाभाविक ही था। मैंने कहा कि प्रोग्राम बने तो ठीक और न बने तो और ठीक, मेरे भरोसे ये प्रोग्राम न बनाया जाये। मेरे पिताजी को शोर शराबा पसंद नहीं, इसलिये मेरे यहाँ तो वीडियो चल नहीं सकता{ दोस्तों ने कानाफ़ूसी करके और पीठ पर धौल धप्पे मारके मेरे डिप्लोमैटिक न होने पर दुखी होते हुये प्रोग्राम कैंसिल होने की आशंका जताई लेकिन दारजी ने मेरी पीठ ठोकी, "शाबाश, साफ़ कहना सुखी रहना।" दूसरे से यही सवाल किया गया तो उसने अपने घर में अपनी बुआ और उनके बच्चों के आने का हवाला देकर और जगह की तंगी की वजह बताकर मुक्ति पाई। धीरे धीरे ऐसा हुआ कि एक एक करके जगह मुहैया करवाने से सब पीछे हटते गये और फ़िल्में देखने का प्रोग्राम अब धूल धुसरित होता दिखने लगा। दारजी खुस होते जा रहे थे क्योंकि प्रोग्राम कैंसिल तो डबल टिकट के पैसे देने से वो बिना कोई इल्जाम लिये बचने जा रहे थे। एकदम से ’लाला’ बोला, "वीडियो मेरे घर चला लेंगे, उसकी कोई टेंशन नहीं है।" लड़कों में लाले की शावा-शावा, बल्ले-बल्ले हो गई। कईयों ने उसके गाल चूम लिये, बंदा हो तो ’लाला’ जैसा वरना हो ही नहीं। दारजी का मूड ऑफ़ हो गया, कई तरह से उन्होंने ’लाला’ को डिगाने की कोशिश की। "वड्डे लाले से पूछ तो लेता"  लेकिन हमारा दोस्त ’लाला’ एकदम कूल और रिलेक्सड था। "दारजी, कह दिया तो कह दिया। तुस्सी चिंता न करो, बस इन दोनों को परमीशन दे दो और हमें इन दोनो के हिस्से का पैसा, हमने वीडियो बुक करवा देना है।" मायूस होते हुये दारजी को दोनों चीज देनी पड़ीं, परमीशन भी और डबल फ़ीस का वादा भी। 

पूरे सप्ताह लड़कों का उत्साह पूरे जोरों पर रहा। दारजी बीच बीच में हमें भी टोक देते और अपने लड़कों को भी, "इस ’लाले’ दे प्यो नूं मैं बड़ी चंगी तरां जाननां, कट्टी उंगल ते नईं मूत्या उसने ते ऐ भैण दा यार हाँ भर गया? साल्यो अगर ऐ मुकर गया मैं पैसे नईं देणे " (इस लाले के बाप को मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि वो आजतक किसी के काम नहीं आया और ये पता नहीं कैसे जिम्मेदारी ले रहा है? सालों इसने धोखा दिया तो मैंने तुम्हारे पैसे नहीं देने) सारी बच्चा पार्टी दारजी को विश्वास दिलाती कि इसका बाप ऐसा जरूर रहा होगा लेकिन हमारे वाला ’लाला’ धोखा नहीं देगा। रोज ये कहानी छिड़ती, इतना अंतर जरूर आ गया कि अब लाला की इज्जत बहुत होने लगी थी। बैटिंग में उसे अब सेवंथ डाऊन की जगह सैकंड डाऊन पर भेजा जाने लगा, ताड़मताड़ा(गेंद से एक दूसरे को निशाना बनाने का देसी खेल) में जिस लाला के पिछवाड़े को गेंद से सुजाने को लालायित रह्ते थे, लड़के अब उसे बेनेफ़िट ऑफ़ बेनेवोलेंस दे रहे थे। एक दूसरे से छीनकर खाने वाले फ़ल और दूसरे सामान में से लाला को पहले भोग लगवाया जा रहा था, कहने का मतलब ये कि लाला की पांचों घी में थीं और सिर कढ़ाही में था।

नियत दिन से एक दिन पहले दारजी ने अपने दोनों लड़कों की फ़ीस भी चुका दी, अलबत्ता ’लाला’ की हाँ पर उनकी हैरानी अब तक कायम थी।  असल में दारजी को एक बड़ा डर था कि बाल मंडली वीडियो वाला प्रोग्राम कहीं उनके दूसरे प्लॉट पर रखे हमारी कालोनी के सबसे पहले रंगीन टीवी पर देखने का न बन जाये, इसलिये उन्होंने पहले जगह फ़ाईनल करवाई थी और उसके बाद लड़कों का हिस्सा डाला था।

देखते ही देखते कयामत की वो रात आ पहुँची, लाला रिक्शा करके वीडियो लेने चला गया और हम सब लड़के गली के चौक में खड़े होकर इंतज़ार करने लगे कि लाला अपने घर में वीडियो और टीवी की सेटिंग ओके करवाकर आये और फ़िर हम सब उसके घर जायें। घंटे भर बाद लाला आता दिखा, सीधे दारजी के पास गया, "अकलजी सॉरी, मेरा लाला कै रया है कि सारेयां ने बराबर पैसे दित्ते हैं तो  रौला साड्डे घर क्यों पयेगा। या तां तेरे कोल पैसे न लये हुंदे, हुण मैं नईं चलण देना वीडियो ऐत्थे।"(मेरे पिताजी कह रहे हैं कि पैसे सबके बराबर लगे हैं तो शोर शराबा मैं अकेले अपने घर में नहीं होने दूँगा। या तो तुझसे हिस्सा न लिया होता) पीछे रेडियो में मुकेश की आवाज में गाना बज रहा था, "ये न होता तो कोई दूसरा गम होना था’ दारजी  अपने हमउम्र वाले लाले के साथ के अपने पूर्व अनुभव याद कर रहे थे, हम लड़के इस हफ़्ते में लाले को दी हुई रियायतें याद करके पछता रहे थे, वीडियो वाला अलग अल्टीमेटम दे रहा था कि वीडियो चले या न चले वो सुबह तय समय पर वीडियो वापिस ले जायेगा।

डरते डरते दारजी के सामने प्रस्ताव रखा गया कि अब और कोई चारा तो है नहीं, दया करके अपने प्लॉट पर वीडियो देखने की इजाजत दे दें वरना उनकी और हम सबके माँ-बाप की मेहनत से कमाई गई राशि व्यर्थ चली जायेगी। सभी परिवार कमोबेश एक जैसी आर्थिक हालत के थे, जेब तंग लेकिन दिल उतने तंग नहीं। दारजी गुस्से में तो थे ही, कुर्ते की जेब से प्लॉट की चाबी निकालकर अपने लड़कों की तरफ़ फ़ेंकी और बोले, "भैनचोदों, होर वड़ो लाले दी बुंड विच।" 
(होर = और
वड़ो = घुसो)
बाकी तो आप सब विद्वान हैं ही :)

सारी रात हम लड़कों ने दारजी का वो डायलाग उतनी बार दोहराया कि उतनी बार किसी परमात्मा के नाम की माला जपते तो भवसागर से पार पहुँच जाते।

बैंक में आने के बाद एक बार ऐसा हुआ कि किसी दोस्त से मिलने एक छोटे से कस्बे में गये और वहाँ जाकर पता चला कि वो अपने घर गया हुआ है। वापिसी की ट्रेन थी रात साढे तीन बजे। प्लेटफ़ार्म पर अखबार बिछाकर कभी बैठकर और कभी लेटकर हम किस्सा-ए-चार दरवेश का नाटकीय रूपांतरण करते रहे ताकि नींद न आ जाये। ये किस्सा उस दिन दोस्तों को सुना बैठा। सुनाया तो था मजे के लिये, लेकिन उसके बाद से जब कभी हवन करते हाथ जलने जैसा मौका आया और ऐसे मौके तब आते ही रहते थे, तो कोई न कोई दोस्त धीरे से इतना कहता था, ’होर वड़ो..’ कसम से गुस्सा तो बहुत आता था लेकिन खून के घूँट पीकर रहना पड़ जाता था। किस्सा तो आखिर मैंने ही सुनाया था न, पंगा तो मैंने खुद ही लिया था न...

क्लेमर/डिस्क्लेमर/फ़्लेमर और डिस्फ़्लेमर(whatever it is) - वोट के लिये अपना धर्म-ईमान गिरवी रखते और बाद में अपने ही तथाकथित वोटबैंक से जूते खाते किसी नेता से या ऐसी ही किसी मिलती जुलती घटना से इस पोस्ट का कोई संबंध नहीं है। फ़ेसबुक पर या ब्लॉग पर कभी कभी किसी घटना का पता चलता है तो मुझसे बरबस ही लिखा जाता है ’होर वड़ो’ - मेरा लिखा कई बार हिन्दी में होने के बावजूद भी मुझे ही समझ नहीं आता तो इस पंजाबी जुमले ’होर वड़ो.......’ को पढ़कर बाकी लोग कहीं मुझे एकदम से पागल न समझ बैठें, इसलिये खुलासा कर दिया। कहने का मतलब ये है कि असी पागल हैगे लेकिन एकदम वाले पागल नहीं हैगे, समझ रहे हैं न? समझ गये तो ठीक है नहीं तो .......

रविवार, जून 01, 2014

गलती हो गई जी

किसी कर्मचारी के विरुद्ध एक विभागीय जाँच चल रही थी और उस कार्यवाही में मैं भी एक भूमिका निभा रहा था। विभागीय जाँच वगैरह का जिन्हें अनुभव या अनुमान है, वे जानते ही होंगे कि इनका सेटअप भी कुछ औपचारिकताओं को छोड़कर लगभग भारतीय अदालत की तरह ही रहता है। जज साहब की तरह एक जाँच अधिकारी, प्रबंधन की तरफ़ से पब्लिक प्रोसीक्यूटर की तरह एक अधिकारी, आरोपी,  सफ़ाई वकील की तरह ही आरोपी का प्रतिनिधि, दोनों तरफ़ से गवाह. दस्तावेज और सबसे बड़ी समानता - वही तारीख पर तारीख। प्रबंधन जहाँ जल्दी से जल्दी मामले को एक तरफ़ लगाना चाहता है, बचाव पक्ष की तरफ़ से येन-केन-प्रकारेण मामले को लंबा खींचा जाता है। तो बात कर रहा था उस जाँच की, संयोगवश जाँच अधिकारी, बचाव पक्ष के वकील यानि कि यूनियन के नेताजी और मैं हम तीनों कभी एक ही कार्यालय में रह चुके थे। उन दोनों की जन्म कुंडली शुरू से ही नहीं मिलती थी। वर्तमान में जाँच अधिकारी साहब बड़े ऑफ़िस में कार्यरत थे तो ’स्थानं प्रधानम न बलं प्रधानम’ के चलते उनकी अपनी समझ में उनकी तूती बोल रही थी, बोलनी चाहिये थी और नेताजी ऐसी तूतियों को ठेंगे पर रखते थे।

ऐसे ही गर्मी के दिन थे, ब्रांच की छत पर बने एक कमरे में, जहाँ पुराना रिकार्ड रखा जाता था, कार्यवाही चल रही थी। अचानक से नेताजी ने कहा कि यहाँ तो गर्मी बहुत है, अब आज की कार्यवाही खत्म कीजिये और अगली तारीख पर कुछ ज्यादा समय दे देंगे। जाँच अधिकारी ने शुरू में मजाक में, फ़िर आग्रह करते हुये और अंत में धौंस दिखाते हुये जाँच को फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट की तर्ज पर खत्म करने की बात कही। मेरे एक फ़ेवरेट पंजाबी गीत ’सुच्चा सूरमा’ में आये एक वाक्य में कहा जाये तो ’कुंडियों दे सिंग लड़ गये’ यानि मरखनी भैंसों के कुंडलियों जैसे सींग आपस में फ़ँस गये थे। मैं नौकरी में नया-नया था, सच कहूँ तो मुझे तो  इस मुठभेड़ का चश्मदीद गवाह होने में मजा आने लगा था। एक तरफ़ प्रबंधन मद में चूर अधिकारी महोदय, दूसरी तरफ़ सर्वहारा के मसीहा जी। दाँव पर दाँव चले जाने लगे। 

कानून की बहुत ज्यादा समझ न रखने वाले भी जानते हैं कि equity, fair play and justice के नाम पर कानून को कैसे हैंडल किया जा सकता है। नेताजी ने गर्म मौसम, बिजली की दिक्कत, पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता के अभाव का ऐसा भावुक प्रसंग कार्यवाही में लिखवाना शुरू किया कि कोई पढ़े तो उसे ऐसा लगे कि जैसे जाँच के नाम पर इस टीम को थार के मरुस्थल में बिना पानी और बिना किसी सायबान के छोड़ दिया गया हो। कागज़ों में गला सूखना शुरू हुआ फ़िर गला चोक हो गया, पसीने धड़ाधड़ बहने लगे, धड़कने कभी तेज और कभी मंद होने लगीं। नौबत यहाँ तक आने लगी कि नेताजी को अभी अस्पताल भिजवाना पड़ेगा। "अरे भाई, कमाल है। आरोप सिद्ध नहीं है तभी तो जाँच की जा रही है न? और बर्ताव ऐसा कि गोरों ने काला पानी में भी किसी से न किया होगा। पीने के लिये पानी तक की सुविधा नहीं, हद है। ये सब उत्पीड़न सिर्फ़ इसलिये कि हम लोग चुपचाप आरोप स्वीकार कर लें वो भी उस गुनाह के जो हमने किये भी नहीं। मैं कार्यवाही में रिकार्ड करवाना चाहता हूँ कि अगर पानी के अभाव में मुझे या किसी को कुछ  हुआ तो इसे प्रबंधन और जाँच अधिकारी की साजिश माना जाना चाहिये।"

जाँच अधिकारी ने आसपास देखा तो उसी कमरे में पुराने रिकार्ड में से कुछ ढूँढता ब्रांच का चपरासी मनोज दिखाई दिया। बवाल खत्म करने के लिये उन्होंने आवाज लगाई, "अरे, मनोज बेटा।"

"हाँ, साहब?"

"अरे बेटा, तेरी ब्रांच में बैठे हैं और पीने के पानी को तरस रहे हैं।"

मनोज ने हाथ के कागज वहीं रखे और हँसकर बोला, "अभी लाता हूँ साहब।"

मुझे थोड़ी सी मायूसी हुई, इतने जोरदार घटनाक्रम का ऐसा पटाक्षेप :(

मनोज मुड़कर दरवाजे तक पहुँचा था कि नेताजी की आवाज आई, "अरे, मनोज।"

"हाँ, दद्दा?"

"तेरी ड्यूटी कहाँ है रे?"

"नीचे हॉल में है, दद्दा।" मनोज आकर जाँच अधिकारी के सामने रुका और आँखों में आँखें डालकर बोला, "हम पानी नहीं लायेंगे, साहब।" मुझे पंक्तियाँ याद आ रही थीं ’राणा की पुतली फ़िरी नहीं, तब तक चेतक मुड़ जाता था..’

जाँच-अधिकारी ने साम,दाम, दंड, भेद सब तरह की नीति अपना ली लेकिन मनोज से पानी लाने की हाँ नहीं भरवा सके। "सस्पेंड करवा दो साहब, पानी नहीं लाऊँगा। मेरे घर आओ, गरीब आदमी हूँ तो जो बन सकेगा वो सेवा कर दूँगा लेकिन यहाँ अभी पानी नहीं लाऊँगा।"

कुछ देर के बाद सब पूर्ववत होना ही था, कार्यवाही के पन्ने फ़ट गये और नई तारीख नेताजी की शर्तों के आधार पर दी गई। पानी-शानी की फ़ुल्ल सेवा भी हुई वो भी अब की बार बिना कहे। अपने को ये सब देखकर बहुत मजा आया। बाद में मेरे पूछने पर नेताजी ने बताया कि मनोज जैसे चेलों को उनपर और उनकी प्रोटेक्शन पावर पर भरोसा है और वो भरोसा नाहक ही नहीं है।

ये उन नेताजी की कहानी है जो यूनियन के चार-पाँच सौ मेंबर्स के नेता थे। ये नेताजी के इन पाँच शब्दों की ताकत थी "तेरी ड्यूटी कहाँ है रे?" कि एक मामूली सा सदस्य अपनी जमी जमाई नौकरी पर खतरा लेने को तैयार था। हालाँकि मैं जानता हूँ कि शब्द में बहुत ताकत है। वेद, बाईबिल, गुरबाणी, कुरान सबमें शब्द की महिमा गाई गई है। शब्द की महिमा के उस स्तर को हम शायद ही समझ सकें लेकिन किसी खास मौके पर किसी खास व्यक्ति द्वारे कहे गये कुछ शब्द कितने प्रभावशाली हो सकते हैं, इस बात का अनुमान तो हम प्रत्यक्ष कुछ देखकर ही लगा सकते हैं।

अंत में यही कहना चाहता हूँ कि गलती सिर्फ़ लड़कों से ही नहीं होती .......
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रविवार, मई 11, 2014

’भुड़’


बचपन का समय और गर्मियों की छुट्टियों के दिन रात, यानि सोने पर सुहागा। सारा दिन कोई काम नहीं होता था लेकिन इतनी व्यस्तता कि पूछिये मत। न खाने का कोई तय समय था और न सोने का, नियत समय तो खेलने का भी नहीं था लेकिन वो मैनेज कर ही लेते थे और मन फ़िर भी नहीं भरता था। ऐसे ही एक दिन सुबह-सुबह पार्क में थे और एक दोस्त ने घास से कोई बड़ा सा कीड़ा अपनी मुट्ठी में लिया और बड़े प्यार से आकर ’जीते’ की जेब में डाल दिया। पिछली रात देर तक किये धमाल के चलते ’जीता’ अभी पूरी तरह से चैतन्य नहीं था लेकिन चूँकि ये पाकेटभराई की ही इस तरह से गई थी कि उसे पता चल जाये तो अनमने से होकर जब उसने जेब में हाथ डालकर उस कीड़े को बाहर निकाला तो उसकी नींद कोसों दूर भाग गई। जोर से उछलते हुये उस दोस्त को और कीड़े को एक तगड़ी सी गाली दी। कीड़े ने तो कोई प्रतिक्रिया दी नहीं, चुपके से खिसक लिया लेकिन दोस्तों ने बात को नहीं छोड़ा।  दो ग्रुप बन गये, एक का कहना था कि छोटा सा मजाक ही था और गाली देकर ’जीते’ ने गलत किया है। दूसरे ग्रुप ने उस कीड़े को उस समय की हमारी कल्पनाओं की उड़ान में सबसे खतरनाक कीड़ा सिद्ध करके ’जीते’ को विक्टिम और उसकी गाली को विरोध प्रकट करती एक सामान्य प्रतिक्रिया सिद्ध कर दिया। बहरहाल नूरा कुश्ती में टाईम बढ़िया पास हो गया और लुच्चा-पार्टी लौटकर घर को आ गई। इस सब घटनाक्रम में उस कीड़े का नामकरण हुआ, ’भुड़’..

आने वाले कुछ दिनों में कभी न कभी उस ’भुड़’ की  बात छिड़ ही जाती थी। हमारा ’जीता’ ज्यादा चलता-पुर्जा लड़का नहीं था तो जब भी उस ’भुड़’ के खतरे बताये जाते थे, वो थोड़ा गंभीर होकर सुनने लगता था। बात काफ़ी पुरानी है, घरों में एसी तो क्या कूलर भी नहीं होते थे। इन्वर्टर का सवाल ही नहीं तो सरकारी वाली बिजली आये या जाये, परवाह नहीं। ले देकर पूरी गली में सिर्फ़ एक कार थी, वो भी बेचारी कितनी जगह घेरती? मतलब मौका भी होता था और दस्तूर भी, खासकर छुट्टियों में बच्चा-पार्टी देर रात तक गली में कभी कबड़ी, खो-खो,  घोड़ी(छोटी घोड़ी और वड्डी घोड़ी, लगभग एक ही खेल के दो अलग अलग फ़ार्मेट) खेला करते, खूब हो-हल्ला मचता, झगड़े होते, चोटें भी लगतीं लेकिन ’शो मस्ट गो-ऒन’ होता रहता। थक हारकर घरों के बाहर बिछाई चारपाईयों पर गिरते और सो जाते थे क्योंकि अगली सुबह फ़िर जल्दी से उठकर किसी खेल के मैदान या पार्क में जाना होता था।

ऐसी ही एक रात थी, ’जीता’ सो गया था लेकिन शेष दोस्त सब जाग रहे थे। उसी भुड़ वाले दोस्त को जैसे कुछ याद आ गया हो, जाकर उसने सोते हुये जीते को झिंझोड़ कर उठाया और उसके कान में बोला, "जीते, तेरी बनियान में भुड़"  हड़बड़ाया हुआ जीता कूदकर खाट से उठा और बनियान उतारकर बाजू उठाकर कभी इधर और कभी उधर उस ’भुड़’ को ढूँढ़्ता रहा जो कहीं थी ही नहीं। हममें से दो-चार वालंटियर भी मौका देखकर हाथ साफ़ कर गये और चली गई, चली गई का नारा भी लग गया।  फ़िर से दो ग्रुप बन गये, एक ग्रुप कह्ता था कि बेचारे ’जीते’ की नींद खराब कर दी जबकि कोई ’भुड़’ थी ही नहीं और दूसरा ग्रुप बताता कि ’भुड़’ बिल्कुल थी, वो तो समय पर लिये गये एक्शन के चलते भगा दी गई, इसलिये थोड़ी सी नींद खराबी कोई महंगा सौदा नहीं है। जो ग्रुप कह रहा होता कि ’जीते’ बेचारे को क्यों परेशान करते हो, वो बुरा बना और जो ग्रुप मजे ले रहा था, ’जीते’ की सहानुभूति और निष्ठा उसी ग्रुप के साथ ज्यादा रही। हम तब बच्चे थे, उसकी हालत देखकर हम हँस-हँसकर दोहरे होते जाते थे। फ़िर गाली-पुराण शुरू हुआ, हम सब उसका श्रवण करते रहे और इस तरह अपनी छुट्टियों का सदुपयोग करते रहे। मजे की बात ये थी कि हर चार-पांच दिन के बाद ये सब दोहराया जाता, ’भुड़’ ने एकाध बार तो अपनी जगह भी बद्ली और ’जीते’ के पाजामें में घुसपैठ कर गई। मुझे तो लगता है कि उस दिन हमारे सीधे-सरल मित्र के पाजामे का नाड़ा खुलने में हुई देर के चलते ही दुनिया में पाजामे में इलास्टिक लगाने का चलन शुरू हुआ होगा।

अब हम हो गये हैं बड़े, बाबे दी फ़ुल्ल किरपा है हमारे ऊपर इसलिये वो सब लुच्ची हरकतें नहीं करते। हमारे बच्चे अब गली में नहीं खेलते। खेलने की जगह भी नहीं और खेलने वाले भी नहीं और अगर हों भी तो हम नहीं खेलने देंगे। मैं तो डर ले मारे उन्हें ये किस्से भी नहीं सुनाता कि कहीं मुझे एकदम से टुच्चा या लुच्चा न समझ बैठें।  ’भुड़’ नाम ही कितना अजीब सा लगता है, अल्पज्ञानी तो इसे गाली ही समझ सकते हैं इसलिए न तो इसका नाम आज तक बच्चों के सामने बोला है और न ही आगे कभी बोलना है। मान लेने को दिल करता है कि जमाना बदल गया है, तरीके बदल गये हैं, तकनीकें बदल गई हैं। 

अब कहीं कोई शरारती बच्चा किसी सीधे-सादे दोस्त को सोते से यह कहकर नहीं जगाता होगा कि तेरी बनियान में ’भुड़’। लेकिन अपने इस कुटिल दिल का कुछ नहीं कर सकता जो देखता है और भाँप लेता है कि अगला कदम क्या होगा जब बच्चे नहीं बल्कि बड़े नामी नेता/ठेकेदार किसी एक ’जीते’ को नहीं बल्कि जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को झिंझोड़कर किसी एक पार्टी या नेता का नाम लेकर डरा रहे होते हैं कि वो आ गया तो ऐसा हो जायेगा और वैसा हो जायेगा। वोट बैंक का वो हिस्सा जैसे नींद से जागकर अपेक्षित क्रियायें करता है और फ़िर दो गुट बन जाते हैं, एक कह रहा होता है कि बेकार में बेचारे को क्यों डराते हो और दूसरा गुट कह रहा होता है कि हमने समय पर चौकन्ना कर दिया, इसलिये बच गया नहीं तो...। ये देखकर मुझे अपने बचपन का ये किस्सा याद आ जाता है, ’जीते’ को हम चिल्लाकर उठा रहे हैं, "जीते, तेरी कमीज में भुड़" 

सच है कि अब के बच्चे ’भुड़’ वाली शरारतें नहीं करते, ये टुच्ची हरकतें हम जैसे लोग ही कर सकते हैं।