शनिवार, अप्रैल 11, 2015

KCC - किसान क्रेडिट कार्ड

भारत सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक के नियमों के अनुसार हर भारतीय बैंक को अपने द्वारा दिये जा रहे ऋणों में से कम से कम १८% ऋण कृषि कार्यों के लिये दिये जाने आवश्यक हैं। यह लक्ष्य पूरा न हो पाने की स्थिति में बैंक रिज़र्व बैंक और भारत सरकार के सम्मुख जवाबदेह भी होते हैं और गैप राशि का निवेश उन्हें Rural Infrastructure bonds(जिसपर रिटर्न या कहिये ब्याज दर लगभग नगण्य होती है) में करना होता है। कोई भी जिम्मेदार बैंक ऐसी स्थिति से बचना चाहेगा इसलिये बैंकों की ग्रामीण और अर्धशहरी शाखाओं से उच्चाधिकारियों की इस बारे में विशेष अपेक्षा भी रहती है। इसके बावजूद अनेक बैंक इस न्यूनतम लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाते हैं।
कृषि ऋण में सर्वाधिक प्रचलित ऋण को ’किसान क्रेडिट कार्ड’ या संक्षेप में KCC कहा जाता है। कृषि व संबंधित गतिविधियों के लिये यह ऋण स्वीकृत किया जाता है और यह ओवरड्राफ़्ट की सुविधा होती है। यानि कृषक के द्वारा जोती जाने वाली भूमि के आधार पर ऋणसीमा निर्धारित कर दी जाती है जिसे किसान एक साथ या  आवश्यकतानुसार टुकड़ों में निकाल सकता है। हर जिले के लिये प्रशासन, नाबार्ड व लीडबैंक की एक समिति उस क्षेत्र में उगाई जाने वाली फ़सलों का प्रति एकड़ अनुमानित व्यय तय करती हैं, जिसे ऋण सीमा निर्धारण करने के लिए एक आधार माना जाता है। गौर करने की बात यह है कि यह व्यय राशि ऋण सीमा नहीं है बल्कि उसका आधार है, इसमें और भी कई फ़ैक्टर जोड़कर ऋण सीमा तय की जाती है। पुनर्भुगतान भी फ़सल बिकने के बाद, मोटे तौर पर कहें तो आज लिमिट लेने के बाद लगभग छह महीने में आपको राशि ब्याज सहित चुकानी होती है। और आज जमा करने के बाद अगले दिन फ़िर आप समस्त राशि अपने लिमिट खाते से लगभग बिना किसी औपचारिकता के उठा सकते हैं। अपने अनुभव के आधार पर बता सकता हूँ कि जिस कार्य के लिये यह ऋण योजना बनी है, उसके लिये यह राशि अपर्याप्त नहीं होती। छोटे व सीमांत किसानों के लिये सरकार/RBI अनुदान देती हैं जिससे ३ लाख तक की KCC लिमिट कृषक को 7% वार्षिक की दर से उपलब्ध हो जाती है।         यही नहीं, रेगुलर भुगतान करने वाले कृषकों को सरकार प्रतिवर्ष अतिरिक्त अनुदान देती है। पिछले दो साल से मुझे ध्यान आता है कि यह अतिरिक्त अनुदान 3% था यानि कृषक को अपनी फ़सल उगाने के लिये 4% सालाना की दर से ऋण उपलब्ध हो सकता है। इतनी सस्ती ब्याज पर बैंक के स्टाफ़ को भी ऋण नहीं मिलता है। और याद दिला दूँ कि बैंक आपके बचत खाते में जमा राशि पर जो ब्याज देते हैं, उसकी दर भी 4% वार्षिक ही है।
यह सब बताने का एक उद्देश्य यह है कि सरकार कृषि क्षेत्र को एकदम उपेक्षित मानती है, ऐसा नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि ये सब अभी की सरकार ने किया है, यह स्कीम काफ़ी पहले से ही है। फ़िर क्या वजह हो सकती है कि यह लक्ष्य पूरे नहीं हो पाते?
सरकार का डंडा बैंकों पर, बैंक उच्चाधिकारियों का डंडा शाखाओं पर, ब्याज की दर इतनी कम, एक बार लिमिट बनाने की औपचारिकतायें होने के बाद अगले पांच साल तक कोई अतिरिक्त औपचारिकतायें नहीं, पैसा कभी भी निकालने की सुविधा  और जमा करने के लिये अधिकतम फ़सल बिक्री तक का समय। इतनी सुविधाओं के बावजूद प्रचलन में ये है कि अधिकतर कार्डहोल्डर साल में एक बार सिर्फ़ ब्याज चुकाते  हैं, एक दिन के लिये भी पूरी राशि जमा नहीं करते। और ये सब करने के बाद भी नतीजा ये निकलता है कि अधिकतर जगह कृषि ऋण के टार्गेट पूरे नहीं होते।
क्या कारण हो सकते हैं कि यह लक्ष्य पूरे नहीं हो पाते? किसकी मानसिकता इस सबके लिये जिम्मेदार है, बैंक वालों की या ग्राहकों की?
विस्तार आप देंगे तो अच्छा है, मुझे राय बनाने में सुविधा होगी नहीं तो हम तो अपनी बात कहेंगे ही। जारी रहेगा अगली कड़ी में भी।
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अगली कड़ी में पंजाब का अपना संबंधित अनुभव बताता हूँ। पहले भी कई बार सोचा था लेकिन बात आई गई हो जाती थी। कुछ दिन पहले सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी जी के एक फ़ेसबुक स्टेटस पर कुछ बात निकली तो सोचा कि इस बारे में शेयर किया जा सकता है।

रविवार, अप्रैल 05, 2015

दीवार

टीवी पर मैडम जी ने सिखलाया था,
एक होती है अच्छी दीवार
और एक होती है बुरी दीवार।
और ये भी, कि
तोड़ देनी चाहिये हर बुरी दीवार।
जो आज्ञा सरकार,
अब हमने ठान लिया है
कि आपकी ये बात भी मानेंगे।
दीवार टूटेगी, और 
तय है कि जब भी टूटेगी
बुरी दीवार ही टूटेगी।
क्योंकि जो नालायक 
अपनी दीवार न बचा पाया
वो क्या खाकर सिद्ध करेगा कि
उसकी दीवार अच्छी थी?

पड़ौसी देश के लीडर ने  बयान दिया
कि गुड तालिबान और बैड तालिबान
में कोई फ़र्क नहीं होता।
ये अलग बात है कि ये इलहाम 
लीडर को देर से हुआ। 
तब हुआ, जब अपने चिराग से
घर रोशन हुआ लेकिन जलकर।
हमने तालियाँ बजाईं, 
देखा, बजा फ़रमाया हुज़ूर ने।

फ़िर आया दौर ’माय च्वॉयस’ का,
कपड़े पहनने न पहनने की च्वॉयस
से लेकर बिंदी लगाने न लगाने की च्वॉयस
बच्चा पैदा करने या न करने की च्वॉयस
से लेकर सेक्स शादी से पहले, बाद
या बाहर करने की च्वॉयस।
कहते हैं कि इससे आधी आबादी
जो अब तक दबी कुचली थी,
मजबूत हो जायेगी।
औरत और मर्द के बीच की
दीवार टूटेगी।

इतनी बड़ी अभिनेत्री
करोड़ों में फ़ीस लेने वाली
जो ब्रांडेड कपड़ों और मेकअप
से हरदम लकदक करती हो,
झूठ थोड़े ही  कहती होगी?

तय है कि दीवार फ़िर टूटेगी
और ये भी तय है कि 
बुरी दीवार ही टूटेगी।
हम नालायक, जो अपनी दीवार न बचा सके
क्या खाकर सिद्ध करेंगे कि
हमारी दीवार बुरी नहीं थी?
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रविवार, मार्च 15, 2015

चलें?

उन दिनों हम कालेज में पढ़ते थे और ताजे-ताजे बालिग हुये थे मतलब बालिगपने का पहला ही साल था। हमारे बचपन का एक साथी था जो आठवीं के बाद ही शिक्षा से मुक्ति पाकर अपने पिता की कपड़ों की दुकान पर हाथ बँटाने लगा था। हाथ बँटाने के बदले नियमित रूप से दुकान पर हाथ भी साफ़ करता था जिसकी औपचारिक पुष्टि इस घटना के दौरान ही हुई थी। उसकी निजता की सुरक्षा के लिये उसकी पहचान तो नहीं बताऊंगा लेकिन आप लोगों की सुविधा के लिये उसका कुछ नाम तो रखना ही पड़ेगा। उसे इस घटना में नेता के नाम से ही जान लेते हैं। तब तक तीन या चार बार वो सत्य एवम ज्ञान की खोज करने गौतम बुद्ध की तरह गृहत्याग कर चुका था लेकिन  बोधि-वृक्ष के तले पहुँचने से पहले ही जालिम माँ-बाप और दूसरे रिश्तेदार उसे कभी मुंबई से और कभी मसूरी से दुनियादारी में खींच लाते थे। हर बार उसके लौट आने पर हम उसे छेड़ते थे, "हाँ भई, चलें ?"   और एक दो महीने बाद वो हमें पूछता था, "चलें?"
सन 1988 की ठंड का मौसम शुरु हुआ, नेता ने एक दिन मुझे घेरा और मित्र-मंडली के साथ दिल्ली से बाहर कहीं घूमने जाने का वादा लेकर ही छोड़ा। ऐसा नहीं था कि हम बहुत घनिष्ठ मित्र थे, बात सिर्फ़ इतनी थी कि एक तो हमसे जल्दी से ’न’ नहीं कहा जाता था और उससे बड़ी बात ये कि हमारी छवि थोड़ी ठीक-ठाक सी ही थी, जिस ग्रुप में हमारा नाम होता था उस ग्रुप का पेरेंटल पासपोर्ट/वीज़ा अपेक्षाकृत आसानी से जारी हो जाता था। तो साहब लोगों, नेता ने ’चलें’ कहकर फ़ूलप्रूफ़ प्लान तैयार किया और जम्मु स्थित श्री वैष्णो देवी जाने का प्रोग्राम फ़ाईनल कर दिया। उसने बताया कि उसके साथ उसका एक मित्र भी होगा जो स्वाभाविक है उसके जैसा ही था, और किसी को ले जाना है तो मेरी मर्जी और मेरी ही जिम्मेदारी। गंतव्य-स्थान के एक जाने-माने धार्मिक स्थल होने और साथ में मेरे होने के उसके प्लान के चलते उसके माँ-पिताजी ने भी टूर अप्रूव कर दिया। उसके पिताजी ने परमात्मा के आगे हाथ जोड़कर इतना जरूर कहा, "चलो,  मांयवे ने पूछा तो सही।" 
यहाँ तक तो सब हँसी-मजाक  में ही हो गया, अब सोच मुझे होने लगी। संजय कुमार, तू इस नेता की बातों में आकर फ़ँस गया बच्चू। ये दोनों एक जैसे हो गये, अब तेरी रेल बननी पक्की समझना। थोड़ी सी जुगत हमने भी भिड़ाई और अपने जैसा दो साथी और तैयार कर लिये। बंदे हो गये पाँच और छब्बीस दिसंबर को हम पाँच जम्मु के लिये घर से रवाना हो गये। नेता और उसके साथी के घरवालों को बहुत ज्यादा चिंता नहीं थी लेकिन हम तीनों(संयोग से हम तीनों के ही नाम संजय थे/हैं) के परिवार वाले फ़िक्रमंद थे क्योंकि तीनों पहली बार घर से दूर अकेले जा रहे थे। हम लोगों ने अपने परिवार वालों को आश्वस्त किया कि हम 30 या फ़िर ज्यादा से ज्यादा 31 दिसंबर तक घर लौट आयेंगे और रेडी स्टेडी गो हो लिये।
आनन फ़ानन का प्रोग्राम था, कोई रिज़र्वेशन नहीं। शालीमार एक्सप्रेस का नाम सुन रखा था, वही पकड़ने के लिये जब प्लेटफ़ार्म पर पहुँचे तो भीड़ देखकर दम फ़ूल गया। फ़ौजी डिब्बे में चढ़कर और थोड़ी सी अंग्रेजी बोलकर फ़ौजियों के दिल में और कोच में थोड़ी सी जगह बना ही ली लेकिन कष्ट बहुत हुआ। 27  की दोपहर कटरा पहुँचकर पहला काम किया वापिसी की टिकट बुक करवाने का। टिकट मिले 29 तारीख के। मंदिर के दर्शन करके 28 की दोपहर तक हम कटरा लौट आये। नेता उदास होकर कहने लगा, "भैनचो पहली बार घरवालोंं से पूछकर घर से बाहर भी आये और मजा भी नहीं आया। ऐसा लग रहा है जैसे अभी आज ही घर से आये थे और आज ही वापिस पहुँच जायेंगे।  कहीं और चलें?"
अगले दो घंटों में उसने चलें? चलें? लगाकर हमारी हालत खराब कर दी। पैसे तो सिर्फ़ वैष्णो देवी तक के लिये ही लाये थे, घरवालों से तो सिर्फ़ यहीं तक का पूछा था जैसी सारी ओब्जेक्शन नेताजी ने ओवररूल कर दीं। कसम खिलाकर हमसे पूछा गया कि सच बताओ undisclosed पैसे कितने हैं? हम तीनों संजयों के पास शायद मिलाकर बारह तेरह सौ रुपये निकले। नेता अकेले ने कच्छे के नेफ़े में से दो हजार रुपये निकालकर सब इकट्ठे कर दिये, हिसाब बाद में होता रहेगा। इतने पैसे देखकर हमें हैरानी हुई भी तो उसने दुकान पर हाथ बँटाने वाली बात स्वीकार कर ली। "बापू तो जितना मर्जी पीट ले, कबूल नहीं करवा सकता लेकिन दोस्तों से हम कोई राज नहीं रखते।"  यारी की ताकत देखकर हम भी इमोशनल हो गये और  हमने भी कह दी कि चलो।
लो जी, बन गया कश्मीर का कार्यक्रम। तब इतना ही पता था कि जम्मु और कश्मीर एक ही राज्य है। हमारे दिमाग में था कि जम्मु से दो-तीन घंटे की दूरी पर ही कश्मीर होगा।  वापिसी वाली कन्फ़र्म टिकट रिश्वत देकर कैंसिल करवाई और रिज़र्वेशन वाले सरदारजी ने चार्ट देखकर बताया कि अगली उपलब्ध टिकट हैं 2 जनवरी की। अब उंगली नेता को पकड़ा ही चुके थे, क्या करते?  इस बार नया साल कश्मीर में मनेगा। मेरे घर पर टेलीग्राम कर दिया गया कि इस तरह से प्रोग्राम थोड़ा बदल गया है और हम दो जनवरी के आसपास घर पहुंच पायेंगे।
बड़ी लंबी दास्तान है कि कैसे हम लोग कदम-कदम पर ठगे गये। जम्मु से श्रीनगर तक पहुंचने में हम अपनी लाईफ़ किंगसाईज़ जिये। और जब तक श्रीनगर पहुँचे तो पूंजी के नाम पर हम पांच लोगों के पास शायद दो सौ रुपये भी नहीं बचे थे। अगले ही दिन वो भी खत्म और फ़िर  दिल्ली का ही एक और ग्रुप वहाँ मिला जिनसे उधार हमारे नेताजी मैनेज करते थे और उनकी उधारी लौटने के भी तीन महीने बाद चुका पाये। क्या क्या मुसीबतें उस यात्रा में हम पर न आईं लेकिन आज जब अपने प्रिय मित्र संजय के साथ कभी उस टूर की बात होती है तो बहुत हँसी आती है। 
हम लौटकर दिल्ली पहुँचे थे 5 जनवरी को। पिताजी नई दिल्ली स्टेशन पर ही दिख गये, हमें तलाश करने आये  थे। डर और शर्म के मारे उनसे आँख भी नहीं मिला पाया था मैं। एक ही बस में घर तक लौटे लेकिन आपस में एक भी बात न हुई। घर लौटा तो देखा कि मजमा लगा हुआ है, रोना पीटना मचा हुआ है। माँ रो रही हैं, रिश्तेदार महिलायें और पड़ौसिनें उन्हें घेरकर बैठी हैं और सांत्वना दे रही हैं।
हालात सामान्य होने में कई घंटे लगे। टेलीग्राम मिला ही नहीं था और न ही मेरी टेलीग्राम भेजने वाली बात पर किसी को विश्वास आ रहा था। अब ध्यान आ रहा है कि माँ  मेरी पसंद का खाना खिला रही थीं और बता रही थीं कि मिलने आने वाली औरतें कैसे आजकल के खराब माहौल के बारे में बताती जाती थीं और कैसे उनका दिल और ज्यादा घबराता जाता था। मैं गर्दन झुकाये खाना खा रहा था। अभी खीर की कटोरी उठाई ही थी कि डाकिये ने लाकर टेलीग्राम दिया। मेरी गर्दन कुछ डिग्री ऊपर तो उठ ही गई थी।
नेता मिल जाता है अब भी कभी-कभी। हम में से जिसका मौका लग जाता है, वही पूछ बैठता है, "चलें?"  पता दोनों को है कि अब जाना नहीं हो पायेगा।
आम परिवार से होने का ये फ़ायदा तो समझ आता है कि गुमशुदगी राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बन जाती।

रविवार, फ़रवरी 08, 2015

सकारात्मक नजरिया बोले तो ’Positive Attitude’ ...

वंस अपॉन अ टाईम दी गल्ल है जी, हम क्रिकेट के खेल के शौकीन हुआ करते थे।  इस नाचीज के सिवा गली के लगभग सब हमउम्र लड़के एक ही स्कूल में पढ़ते थे। हमारे बालपन के समय में बाप सचमुच के बाप होते थे, औलाद को खिलाते थे जमाई की तरह और देखते थे कसाई की तरह। कान पकड़कर जिस स्कूल में दाखिल करवा दिया, वहीं पढ़ना पड़ता था। अब उनका स्कूल अलग्, हमारा अलग। उनके कोर्स अलग, हमारे अलग। उनकी परीक्षाओं का शेड्यूल अलग, हमारा अलग। जैसे तैसे टाईम मैनेजमेंट करके काशी और काबा दोनों को साधे रखने में सारा बचपन गुजर गया :(   मुझ मासूम का नन्हा सा दिल गली के लड़कों की मस्तियाँ देखकर अपने स्कूल के संस्कार वगैरह भूल जाने को मचलता था, खूब कल्पनायें करता था कि कुछ ऐसा चमत्कार हो जाये कि मुझे भी पिताजी उसी सरकारी स्कूल में दाखिल करवा दें तो दिन रात इन लड़कों का साथ नसीब हो जाये। मगर होनी को ये मंजूर नहीं था तो नहींं था। खींचतान करके शाम का जो थोड़ा सा समय उन समव्यस्कों के साथ निकल पाता था, उसीमें गुजारा करना पड़ता था। कोढ़ में खाज तब पड़ी जब पता चला कि जिन दिनों में क्रिकेट शृंखला होनी है, उन्हीं दिनों में सद्दाम हुसैन के देशी संस्करण(हमारे तत्कालीन प्रिंसिपल साहब ने) पता नहीं कौन सी परीक्षाओं का कार्यक्रम बना रखा था। हमारा पक्का विश्वास था कि ये हमें वक्त के साथ न चलने देने की हिन्दुत्व वालों की साजिश थी।  लेकिन जैसा उस समय के बाप लोगों के बारे में ऊपर बताया, उस समय के प्रिंसिपल भी सचमुच के प्रिंसिपल होते थे इसलिये मन मारने के सिवा कोई चारा नहीं था।

दोस्तों के साथ व्यतीत किये जाने वाले समय में बहुत कटौती हो गई थी। कभी कभार राह चलते टकरा जाने पर छुटपुट जानकारी मिल भर जाती थी। पता चल रहा था कि हमारी टीम में सारे ही खिलाड़ी उस समय कारनामे दिखा रहे थे। यशपाल शर्मा, बिन्नी, मदन लाल, कपिल देव, अमरनाथ - कहने का मतलब ये कि हर मैच में कोई न कोई ऐसा काम कर जाता कि भारतीय टीम की नैया डूबते डूबते भवसागर पार कर ही जाती थी। गली के सब लड़कों ने कोई न कोई अपना फ़ेवरेट क्रिकेटर बाँट रखा था और हर नये मैच के लिये इस खिलाड़ी की परफ़ोर्मेस को लेकर बहसें छिड़ी रहती थीं।

’होर वड़ो’ वाले दारजी  के लड़के आपस में भले ही हर समय लड़ते भिड़ते रहते हों, एक मामले में दोनों एकमत थे - फ़ेवरेट खिलाड़ी दोनों ने एक ही फ़िक्स कर रखा था और वो था बलविंदर सिंह संधू। एक बहुत ही इंपोर्टेंट मैच होने वाला था और दोनों सिंह साहबान इस बात
 पर अडिग थे कि इस बार संधू ने कमाल करना ही करना है। "ओये तुस्सी नईं जानदे, संधू एकल्ला ही सामने वाल्यां दी ऐसी तैसी कर देगा, चरस बो देगा।" उनकी बात को वजन इसलिये भी दिया जाता था कि जिस रेडियो पर सब मैच सुनते थे, वो उनका ही था।  लड़के उन्हें बहुत छेड़ते थे कि संधू के नाम में सिंह न होता तो तुमने कभी उसका समर्थन नहीं करना था और दोनों वीर कभी भी इस बात से सहमत नहीं होते थे। संयोग की बात ये हुई कि जिस दिन वो मैच होना था, मेरी आखिरी परीक्षा उसी दिन थी। शाम को अपन रिलेक्स थे, मन में थोड़ी सी उत्कंठा थी तो संधू की परफ़ोर्मेंस और उस पर आने वाली प्रतिक्रियाओं की। पता चला कि संधू ने आते ही पहली गेंद पर चौका लगाया और दूसरी गेंद पर आऊट। मंडली में सिंह शावकद्व्य अभी आये नहीं थे और असिंह लड़के भन्नाये बैठे थे कि हमारे देसी सिंह उसकी इतना तारीफ़ करते थे और सरदार चार रन बनाकर आऊट हो गया।

राह तकते रहे और दोनों वीर प्रकट हुये। जैसे मौसम वाले सुनामी की पूर्वसूचना दे देते हैं, उन्हें भी सूचना मिल गई थी कि आज लड़के भड़के बैठे हैं और संधू ने सामने वाली टीम की ऐसी-तैसी नहीं की इसलिये आज इनकी ऐसी-तैसी होनी तय है। उनके आते ही माचो और भैंचो जैसे सामूहिक स्वस्तिवचन बोले गये और जी भरके भड़ास निकाली गई। दोनों वीर चुपचाप खड़े रहे। जब लड़कों का गुस्सा कम हो गया तो फ़िर बड़े वाले ने कहा, "एक गल्ल त्वानूं सब्नूं मननी पऊगी कि साड्डे संधू ने वनडे मैच दे मह्त्व नूं पूरी तरां समझ्या सी। आंदे ही चौका मारया ते अगली गेंद ते आऊट हो गया, साड्डे शेर ने गेंदां खराब नईं कीत्तियां।" हम सब फ़िर से एकबार हँसते-हँसते गुत्थमगुत्था हुये और फ़िर अगले मैच की बातें शुरु हो गईं। बंदे का सकारात्मक नजरिया जान समझकर लाईव मैच न सुन पाने का अपना सारा अफ़सोस धुल गया।

सीधी सी बात ये है कि नजरिया सकारात्मक होना चाहिये। अब देखिये, दिल्ली के चुनाव हो चुके और एग्ज़िट सर्वे भी आ चुके। चुनाव तो दिलचस्प थे ही, रिज़ल्ट आने के बाद एक बार भसड़ मचनी तय है।   हमें इंतजार रहेगा हारने वालों के पोज़िटिव एटिच्यूड की। अपना बता दूँ कि हमने वोट उसे दिया है जिसे exit polls में बहुमत से बहुत पीछे दिखाया जा रहा है। हम हार गये तो यह सोचकर दिल को बहलायेंगे कि पानी फ़्री, बिजली का बिल आधा, इसके अलावा महीने में डेढ से दो हजार तो नेट का खर्चा ही बचना तय है। आगे के लिये अपने बच्चों को भी यही सिखायेंगे कि मुफ़्तखोरी के जो सबक सीखने में तुम्हारे बाप को पैंतालीस साल लगे, लोकतंत्र के इस महत्व को समझने में तुम गेंदें खराब मत करना। हथेली फ़ैलाना समय से सीख लो, इससे बड़ी ईमानदारी और कोई नहीं।

है न पोज़िटिव एटीच्यूड ?