शनिवार, अप्रैल 23, 2022

विचित्र चिंताएं

दिल्ली के साथ भी एक विचित्र सा सम्बन्ध रहा है, न हम बंधें और न ही छूट सके। जीवन में दो ही मुख्य उद्देश्य रह गए लगते हैं, दिल्ली में कुछ वर्ष रहो तो 'चलो दिल्ली से' और कुछ वर्ष दूर रहो तो 'चलो दिल्ली।' एक बार पुनः दिल्ली छूट रही है, एक बार पुनः मैं अनिश्चय की स्थिति में हूँ कि प्रसन्न दिखना चाहिए या अप्रसन्न। मेरी चिंताएं भी तो विचित्र हैं, साथी लोग बताते हैं कि मुम्बई में आवास मिलना बहुत कठिन है और मुझे चिंता है कि छाता तो नहीं खरीदना पड़ेगा?

अन्ततः यही तय पाया गया कि देखें आगे क्या होता है। और कुछ नहीं तो इस बार नॉस्टैल्जिक होने का अभिनय भी सीख लेंगे☺️


शुक्रवार, अप्रैल 15, 2022

विरोधाभास

प्रायः माना जाता है कि सफलता आत्मसंतोष लाती है और असफलता कुण्ठा। मैं इस मान्यता पर प्रश्न नहीं उठाता, मेरा कोई मनोरथ पूरा होने पर मुझे भी प्रसन्नता और आत्मसंतुष्टि मिली लेकिन असफल होने पर(जिसके अवसर भी पर्याप्त मिले) मैंने पाया कि दुःख यदि हुआ भी तो बहुत अल्पकालिक। हिसाब लगाने बैठा जाए तो सफलताओं की दर भी असफलताओं से बहुत कम बैठेगी और जीवन पर उनका प्रभाव भी। समय मिलने पर मैंने इस बात पर मनन किया कि एक ही स्थिति में विभिन्न लोग भिन्न व्यवहार क्यों करते हैं? कुछ हैं जो आपे से बाहर हो आते हैं और कुछ को देखकर लगता ही नहीं कि कुछ विशेष हुआ भी है। मेरी प्रयोगशाला में 'सब्जेक्ट' मैं ही होता हूँ तो मेरे निष्कर्ष भी मुझपर ही आधारित हैं। मैं दो मुख्य कारण समझ पाया और दोनों कारण भी मेरी भांति विरोधाभासी भी हैं, एक कारण तो यह कि मैं लोक व्यवहार, हानि-लाभ, हित-अहित आदि के बारे में अन्यों की भांति स्पष्ट नहीं सोच पाता और दूसरा यह कि बचपन में विद्यालय प्रार्थना के बाद बोले जाने वाले श्रीमद्भागवत गीता के कर्म और फल वाला एकाध श्लोक अवचेतन में कहीं धंसे रह गया। किसी कार्य की सिद्धि के लिए प्रयास करना ही मेरे वश में था, यदि वह मैंने सत्यनिष्ठा से किए थे तो अनुकूल परिणाम न मिलने पर भी मुझे दुःखी रहने का कोई अधिकार नहीं। श्रीमद्भागवत गीता के बारे में उचित ही कहा जाता है कि यह भारत की ओर से विश्व को प्रदत्त सबसे बड़ा उपहार है। 
विरोधाभास का सन्दर्भ यह है कि इस ईशवाणी को अत्यंत प्रभावी मानते हुए भी मैं अब तक इसका पूर्ण लाभ नहीं उठा पाया, मनोरंजन को कुछ अधिक ही महत्वपूर्ण मानता रहा।

रविवार, अक्टूबर 10, 2021

मनके

मैं एक मध्यमवर्गीय क्षेत्र का निवासी हूँ जिसे वास्तव में निम्न-मध्यमवर्गीय ही कहना चाहिए। मेरा जन्म 1970 का है, मैं मेरे अनुभव लिखूँ तो यही समझा जाए जो मैंने देखा। उससे पूर्व अर्थात 1948 से लगभग साठ-सत्तर के दशक तक यह क्षेत्र निम्न आयवर्ग वालों का ही रहा होगा। देशविभाजन के बाद विस्थापित होकर आए परिवारों को भारत के विभिन्न स्थानों पर बसाया गया था तो मेरे अनुमान में ऐसे सभी स्थानों पर लगभग ऐसा ही सामाजिक टेक्सचर होना चाहिए। लोगों की आर्थिक स्थितियाँ बदलती रही हैं, उसके साथ ही सामाजिक व अन्य स्थितियाँ भी। 

कुछ व्यक्तियों को नौकरी मिल गई, अधिकाँश ने मजदूरी और छोटे-मोटे व्यवसाय से जीवन की नई पारी आरम्भ की। समय के साथ कुछ ने अपने आरम्भिक धन्धों को विस्तार दिया, कुछ ने स्वयं या उनकी सन्तति ने कार्य बदले भी। यह तथ्य है कि नई पीढ़ी के अधिकाँश बच्चे वर्तमान की वस्तुओं, तकनीकों को पुरानी पीढ़ी की अपेक्षा अधिक व्यवहारिक रूप से जानते हैं। साथ ही यह भी उतना ही सत्य है कि यही पीढ़ी अपने परिवारों की साठ-सत्तर वर्ष पुरानी आर्थिक व सामाजिक पृष्ठभूमि से पर्याप्त परिचित नहीं। इस परिचय न होने में मैं इस पीढ़ी का दोष नहीं देखता, मुझे यह you can't eat the cake and have it too जैसी अवस्था लगती है।

इस परिवर्तन की अवधि में कुछ प्रसंग मुझे रोचक लगते हैं। उस समय हमारे लोगों के पास श्रम से कतराने की लग्जरी नहीं थी। आदमी लोग सुबह अपनी नौकरी अथवा व्यवसाय के लिए निकल जाते थे, स्त्रियाँ घर-गृहस्थी के कामों में जुट जाती थी। कुछ दिनों में मैंने देखा कि अनेक स्त्रियाँ प्रतिदिन 4-5 के समूह में बोलती-बतलाती जाती हैं, कुछ देर में लौटती हैं तो हाथों में थैले-झोले लटकाए। पहले मुझे लगा कि राशन डिपो से चीनी आदि लाती होंगी लेकिन ये तो प्रतिदिन का काम हो गया जबकि कंट्रोल के दिनों में प्रतिदिन चीनी बँटना असम्भव था। इन स्त्रियों में एक कॉमन बात थी कि ये सब 'परले मोहल्ले' की थीं। 'परला मोहल्ला' अर्थात हमारी छोटी सी कॉलोनी के दूसरे छोर पर बसे कुछ घर जिनमें हमारे जैसे विस्थापित परिवार ही रहते थे। वो भी बिल्कुल हमारे जैसे ही लुटपिट कर आए थे लेकिन इधर वाले स्वयं को उनसे श्रेष्ठ(मेरे लिए अज्ञात कारणों से) मानते थे। कुछ जिज्ञासाएं ऐसी होती हैं जिनका त्वरित शमन आवश्यक लगता है, यह उस श्रेणी की न होकर होल्ड की जा सकती थी तो मैंने किसी से पूछा नहीं। जीवन-मरण का प्रश्न न हो और जिनका उत्तर हम स्वयं खोज सकें, उसके लिए औरों पर प्रश्न दागना मुझे प्रिय नहीं। लेकिन जैसाकि बता चुका, 'परला मोहल्ला' कॉलोनी के दूसरे छोर पर था और उधर मेरा नियमित जाना भी नहीं होता था, जिज्ञासा मन में बनी रही। कुछ दिन बाद उस ओर गया तो देखा कि लगभग हर घर के बाहर चबूतरे पर, चारपाई पर या बरामदे में स्त्रियाँ अपने आगे रंग-बिरंगे मनकों(प्लास्टिक के मोती) का ढेर लगाए बैठी हैं। हाथ लगातार सुई, प्लास्टिक की डोर, मनकों से जूझ रहे हैं और चपड़-चपड़ भी चल रही है। ऐसे ही बिन्दुओं को जोड़कर जो चित्र बना तो वो यह था कि उसी मोहल्ले के एक व्यक्ति जो अब कुछ दूर जाकर रहने लगा था, ने जॉबवर्क पर आर्टिफिशल मालाएं आपूर्ति करने का उद्यम आरम्भ किया। ये सब स्त्रियाँ उसके यहाँ से तौलकर मनके और अन्य सामग्री लाती थीं, अपनी दिनचर्या को थोड़ा सा पुनर्व्यवस्थित करते हुए मालाएं बनाती थीं। अगले दिन तैयार माल वापिस, नया कच्चा माल लिया और वही दिनचर्या आरम्भ। स्वाभाविक है कि श्रम का मूल्य अल्प ही सही लेकिन नकद मिलता था। सहकारिता जैसी यह व्यवस्था लम्बे समय तक चली। मेरा अनुमान है कि पारिश्रमिक नाममात्र का ही होता रहा होगा लेकिन उस दौर में इस एक कृत्य ने उन स्त्रियों के साथ उनके परिवारों को आर्थिक रूप से सम्बल दिया होगा। 

मुझे वह मॉडल बहुत प्रेरक लगा था, 'अमूल' और 'लिज्जत' जैसे प्रकल्पों की जानकारी बहुत बाद में हुई।

प्रश्न ही उठाते रहने वालों के प्रश्न कभी समाप्त नहीं होते। प्रतिबद्धता के मापदण्ड पर देखेंगे तो ऐसे लोग समाधान खोजने वालों से इक्कीस नहीं इकतीस ही होते हैं क्योंकि इन पर समाधान का कर्तव्य/दायित्व नहीं होता।

अब तो वैसे भी टूलकिट जैसी तकनीक आ चुकी है। डिपो से रंग-बिरंगे प्रश्न कच्चे माल के रूप में उठाओ, ट्विटर/फेसबुक/इंस्टा में पिरो दो। अगले दिन डिपो से नया प्रश्न उठाओ & so on..

Show must go on...

शुक्रवार, अक्टूबर 30, 2020

सरदार पटेल - कुछ अनकही बातें

 सरदार पटेल की 145वीं जयन्ती: 31 अक्टूबर 2020 पर विशेष

          लौह पुरूष पर चन्द अनकही बातें


(द्वारा श्री के. विक्रम राव)

         


          आजादी तभी नयी-नयी आयी थी। पश्चिमी सीमा के अरब सागरतट पर उपप्रधान मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल नौसेना के जहाज से यात्रा कर रहे थे। एक बस्ती दिखी मगर जहाज उससे कुछ दूर जाने लगा। पटेल ने कारण पूछा तो कप्तान ने बताया कि वह पुर्तगाली उपनिवेश गोवा है। अन्तर्राष्ट्रीय कानून के मुताबिक सीमा बारह मील तक की होती है अतः तट से जहाज दूर ले जाया जा रहा है। सरदार ने कुछ सोचा, फिर पूछाः ‘‘तुम्हारे पास अभी कितने सैनिक हैं? वे कितना वक्त लेंगे गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराने में ?’’ कप्तान अचंभित हुआ, फिर बोलाः ‘‘करीब तीन घंटे।’’ पटेल इतिहास रचने जा रहे थे। गोवा को तीन सदियों की दासता से तीन घंटों में मुक्त कराकर भारतीय संघ में शामिल करने की तत्परता थी। ठीक वैसी ही जिससे पटेल ने निजामवाले हैदराबाद से लेकर जूनागढ़, पटियाला, जोधपुर, भोपाल आदि राजेरजवाड़ों को भारत में समाविष्ट किया था। कप्तान से सरदार, फिर कुछ रुक कर, बोलेः ‘‘विदेशी विभाग का मामला है, जवाहरलाल नाराज हो जाएंगे। पुर्तगाल से आजादी दिलाना उनका जिम्मा है।’’

 हालांकि इस घटना के बाद करीब 13 वर्ष लगे गोवा को स्वतंत्र होकर भारतीय प्रदेश बनने में। उसका मुक्ति संघर्ष 19 दिसम्बर 1946 में चला था जब राममनोहर लोहिया ने मारगावों (18 जून 1946) के निकट एक मैदान मे गोवा स्वाधीनता का बिगुल बजाया था। मगर कई बार सत्याग्रह और पुर्तगाली उपनिवेशवादियों द्वारा अमानुषिक अत्याचार के बावजूद भी नेहरू सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। जब तीसरी लोकसभा (1962) का चुनाव होना था तो दक्षिणी मुम्बई से आचार्य जे.बी.कृपालानी ने संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी बनकर कांग्रेस के उम्मीदवार और नेहरू के करीबी वी.के. कृष्ण मेनन (चीन से पराजय के हीरो) को चुनौती दी थी। अपने रक्षा मंत्री की निश्चित हार देखकर नेहरू ने अचानक भारतीय सेना को पुणे से प्रस्थान कर गोवा को बलपूर्वक स्वतंत्र कराने का आदेश दे डाला। दक्षिण मुम्बई में हजारों गोवा प्रवासी वोटर हर्षित हुए। कांग्रेस कठिन सीट निकाल ले गई। जो काम सरदार पटेल तीन घंटो में करा लेते, नेहरू ने तेरह वर्षों बाद कराया। मगर दोनों का निमित्त भी जुदा था।

 पटेल की फौलादी इच्छा शक्ति के दो उदाहरण और हैं। केरल के समीपवर्ती लक्षद्वीप समूह, जहां राजीव गांधी सपरिवार छुट्टी मनाने जाते थे, आबादी के हिसाब से एक मुस्लिम बहुल इलाका है। पाकिस्तान बनते ही मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तानी बेड़े को लक्षद्वीप भेजा था कि उसे कब्जिया कर इस्लामी मुल्क में शामिल कर लें। ठीक वैसी ही सैनिक हरकत जो जिन्ना ने कबाईलियों की पोशाक में पाकिस्तानी सैनिकों को कश्मीर पर हमले के लिए 1948 में भेजा था। नेहरू की असमंजसता भरी नीति के कारण कश्मीर आधा कट गया। आज नासूर बन गया है। उधर जब जिन्ना के आदेश पर पाकिस्तानी नौसेना का बेड़ा लक्षद्वीप पहुँचा तो पाया कि भारतीय नौसेना का रक्षक बेड़ा वहां पहलें ही पहुंच गया था। पटेल को अन्देशा हो गया था कि कश्मीर की भांति लक्षद्वीप को भी पाकिस्तान हथियाना चाहेगा।

 इसी भांति जब अन्तिम ब्रिटिश गवर्नर जनरल लार्ड माउन्ट बैटन ने अण्डमान निकोबार को पाकिस्तान को सौंपने के लिए नेहरू को मना लिया तो, पटेल ने उस प्रस्ताव को ठुकराकर, अण्डमान द्वीप को भारतीय संघ में सुरक्षित रखा। भारत को इन द्वीपों से भावनात्मक लगाव है।  नेताजी सुभाष चन्द्र बोस इन्हें स्वतंत्र करा चुके थे। आज अण्डमान पर चीन की नौसेना की गिद्धदृष्टि लगी है। भारत पर सामुद्रिक आक्रमण के लिए लक्षद्वीप और अण्डमान द्वीप सामरिक तौर पर अत्यन्त सुविधाजनक हैं। 

जवाहरलाल नेहरू की सेक्युलर सोच से तुलना के समय कुछ लोग सरदार पटेल की मुस्लिम-विरोधी छवि निरूपित् करते है तो इतिहास-बोध से अपनी अनभिज्ञता वे दर्शाते हैं, अथवा सोचसमझकर अपनी दृष्टि एंची करते हैं। स्वभावतः पटेल में किसानमार्का अक्खड़पन था। बेबाकी उनकी फितरत रही। लखनऊ की एक आम सभा (6 जनवरी 1948) में पटेल ने कहा था, ‘‘भारतीय मुसलमानों को सोचना होगा कि अब वे दो घोड़ों पर सवारी नहीं कर सकते।’’ इसे भारत में रह गये मुसलमानों ने हिन्दुओं द्वारा ऐलाने जंग कहा था। पटेल की इस उक्ति की भौगोलिक पृष्टभूमि रही थी। अवध के अधिकांश मुसलमान जिन्ना के पाकिस्तानी आन्दोलन के हरावल दस्ते में रहे। उनके पुरोधा थे चौधरी खलिकुज्जमां। जिन्ना के बाद मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बनने वाले नवाब मोहम्मद इस्माइल खान भी मेरठ में ही रह गये। कराची  नहीं गये। पश्चिम यूपी में नवाब बेहिसाब जमीन्दारी थी।

  कभी प्रश्न उठे कि सरदार वल्लभभाई झवेरदास पटेल के बहुगुणी जीवन की एक विशिष्टता गिनाओ ? तो आज के सियासी परिप्रेक्ष्य में उत्तर यही होगा कि ‘‘पटेल द्वारा अपने घर में वंशवाद का आमूल खात्मा।’’ यह भायेगा उन आलोचकों को जो अघाते नहीं है भत्र्सना करते हुए कि वर्तमान चुनाव और सत्ता में परिवारवाद का रूप विकराल होता जा रहा है। आखिर बचा कौन है इस कैकेयी-धृतराष्ट्री मनोवृत्ति से ? महात्मा गांधी के बाद सरदार पटेल ही थे जिनके आत्मजों का नाम-पता शायद ही कोई आमजन जानता हो।

 पटेल का इकलौता पुत्र था डाह्यालाल वल्लभभाई पटेल जिससे उनके पिता ने सारे नाते तोड़ लिये थे। स्वतंत्रता के एक वर्ष बाद ही मुम्बई के एक सार्वजनिक मंच पर से सरदार पटेल ने घोषणा कर दी थी कि उनके पद पर उनके पुत्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः सार्वजनिक जीवन में शुचिता के लिए सत्ता और कुटुम्ब के मध्य रिश्ता नहीं होना चाहिए। सरदार पटेल की एक ही पुत्री थी मणिबेन पटेल जो अविवाहित रही और पिता की सेवा में ही रही। सरदार पटेल का एक ही पोता था विपिन पटेल जो गुमनामी जिन्दगी गुजारता रहा। उसका जब निधन (12 मार्च 2004) दिल्ली में हुआ था तो अंत्येष्टि में चन्द लोग ही थे। लोगों को अखबारों से दूसरे दिन पता चला। 

     अहंकारी अंग्रेजी साम्राज्यवादियों को आजादी के बाद भी प्रत्युत्तर देने का माद्दा लौह पुरुष में भरपूर था। सर विन्स्टन चर्चिल ने नेता विरोधी दल के रूप में ब्रिटिश संसद में सत्तारूढ़ लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री क्लीमेन्ट एटली द्वारा भारत को स्वतंत्रता देनेवाले प्रस्ताव के विरोध में कहा थाः “अंग्रेज जब भारत छोड़ देंगे, तो न तो एक पाई और न एक कुंवारी बच पाएगी।” सरदार पटेल ने इसका जवाब दिया इण्डियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की मुम्बई इकाई की बैठक में चर्चिल को अपनी गरिमा सहेजने की राय दी थी। चर्चिल ने कहा था कि केवल तीस हजार ब्रिटिश सैनिकों ने भारत पर राज किया। पटेल ने जवाब दिया, “अब तीन लाख अंग्रेज भी भारत पर शासन नहीं कर सकते।”


K Vikram Rao

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