रविवार, नवंबर 24, 2013

हिन्द की चादर

कश्मीर से चलकर आये उन ब्राह्मणों की व्यथा-कथा सुनकर सबके दिल उदास हो रहे थे और आँखें गीली।  क्या विडंबना थी कि स्वर्ग जैसी जन्मभूमि में सुख,शान्ति और समृद्धि से जीवन व्यतीत कर रही एक भूभाग की  जनता इस बात के लिये विवश थी कि या तो अपना धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपनाये नहीं तो हर तरह के जुल्म सहे। त्रस्त होकर उन लोगों को आशा की एक किरण यहीं दिखी थी तो कश्मीरी ब्राह्मणों का एक प्रतिनिधिमंडल सहायता की पुकार लगाने गुरू श्री तेगबहादुर जी के समक्ष प्रस्तुत हुआ था। उपस्थित समूह में सन्नाटा छाया हुआ था। सत्तासीन को निरंकुशता के साथ मजहबी कट्टरपन की सनक सवार हो जाना शेर के मुँह खून लगने से भी खराब होता है, शेर तो सिर्फ़ क्षुधापूर्ति के लिये दूसरों की जान लेता है।

धरती ऊपर से शांत दिखती है लेकिन उसके गर्भ में क्या कुछ चल रहा है, ये हमेशा दिखता नहीं है। जहाँ गुरू साहब विराजमान थे, उसी गद्दी के पास खड़े उनके नौ वर्ष की वय के सुपुत्र बाला प्रीतम(गुरू गोविंद सिंह) ने सबकी उदासी का कारण पूछा। कारण बताये जाने पर उस तेजपुंज ने इसका उपाय पूछा।  पहले से ही आतंकित और त्रस्त नागरिकों के टूट चुके मनोबल को झकझोरने का उपाय क्या हो सकता है? 

विचारमग्न गुरू श्री तेग बहादुर जी ने कहा, "अब किसी महापुरुष को बलिदान के लिये सामने आना होगा।"

बाला प्रीतम ने छूटते ही कहा, "पिताजी, आज के समय में आप से बड़ा महापुरुष कौन है?"

वहीं निर्णय हो गया। गुरू तेग बहादुर जी ने प्रतिनिधिमंडल से दिल्ली के शहंशाह को कहलवा भेजा कि अगर वो गुरू तेग बहादुर जी को इस्लाम स्वीकारने के लिये तैयार कर ले तो सब लोग इस्लाम स्वीकार कर लेंगे अन्यथा नहीं। संदेश दिल्ली पहुँच गया और स्वयं गुरू तेगबहादुर भी अपने कुछ शिष्यों के साथ दिल्ली को रवाना हुये।

औरंगज़ेब के द्वारा इस्लाम स्वीकार किये जाने की बात पर गुरू साहब ने ऐसा करने से स्पष्ट मना कर दिया बल्कि निर्भीकता से उसे कहा कि तुम खुद भी सच्चे मुसलमान नहीं हो जो अत्याचार के द्वारा दूसरों को अपना धर्म छोड़ने के लिये मजबूर करते हो। चमत्कार दिखाने की शर्त से लेकर, लालच और फ़िर कैद का भय दिखाकर भी औरंगज़ेब के मंसूबे पूरे होते नहीं दिखे तो उसने जल्लादों को गुरू तेगबहादुर जी का शीश उतारने का हुक्म दे दिया।

"भै का कऊ देत नहिं, नहिं भै मानत आनि" उचारने वाले भला सिद्धांतों के लिये बलिदान देने से पीछे हटते? वैचारिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मिसाल पेश करते हुये गुरू तेगबहादुर जी  ने हँसते-हँसते अपना बलिदान दे दिया, शीश दिया पर अपना धर्म नहीं दिया।

चाँदनी-चौक, दिल्ली में जिस जगह पर गुरू साहब का शीश उतारा गया, आज वहाँ गुरूद्वारा शीशगंज साहिब है जो हम सबकी श्रद्धा और आस्था का केंद्र है। यह हमें याद दिलाता रहेगा कि भविष्य उन्हीं कौमों का सुरक्षित रहेगा  जिनके पास बलिदान की विरासत है।

’हिन्द की चादर’ श्री गुरू तेगबहादुर जी के चरणों में बारंबार नमन।

संबंधित लिंक - गुरू तेग बहादुर सिमरिए 


रविवार, नवंबर 17, 2013

तटस्थता का झंझट

हमारे पापा के एक दोस्त हैं, सहकर्मी रहे हैं और अब दोनों ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं। सही मायने में अपने को जो थोड़ा बहुत पढ़ने का शौक हुआ, इन्हीं अंकल की बदौलत हुआ। असल में उनकी पोस्टिंग मेरे स्कूल के पास थी और कभी पापा का कोई संदेश पँहुचाने के लिये और कभी-कभार अपने किसी काम से उनके ऑफ़िस में जाना पड़ता था। परिवार इसी शहर में रहते हुये भी एक तरह से मेरे लोकल गार्जियन का कर्तव्य इन्हीं अंकल ने निभाया।

अंकल एकदम शरीफ़ टाईप के लेकिन हर मर्ज की दवा रहे, निस्सवार्थ और निस्संकोच स्वभाव उनके चरित्र का यू.एस.पी. है। हर विभाग में उनके परिचित निकल आते थे और किसी का भी कोई काम हो तो वो निस्संकोच अपने सिर ले लिया करते थे। किसी अस्पताल में किसी और के काम से गये तो बातों-बातों में पता चलता कि अब उन्हें बिजली दफ़्तर में जाना है और अस्पताल वाले परिचित का कोई काम उस बिजली विभाग से निकल आता। वहाँ जाकर अपने काम करवाये तो पता चला कि बिजली विभाग वाले को बैंक में चेक जमा करवाने या ऐसे ही किसी काम से जाना है तो अगला पड़ाव बैंक होता था और महीने-दो महीने में एकाध बार हम भी उनके साथ संलग्नक बनकर घूमते रहते थे। यूँ समझिये कि रोज का एकाध घंटा उनका इसी सेवाकार्य में गुजरता था। ऐसे ही एकबार किसी की किताबें लौटाने लाईब्रेरी गये तो मैं साथ था और फ़िर मेरे यह पूछने पर कि क्या मैं भी इसका सदस्य बन सकता हूँ, उन्होंने उसी समय मेरा लाईब्रेरी कार्ड बनवा दिया।

अंकल का सादा स्वभाव मुझे बहुत पसंद आता था। एक बार मुझसे पूछने लगे, "किताबें तो पढ़ता है कभी नाटक-वाटक भी देखे हैं अंग्रेजी वाले?"  मैं  भी कौन सा कम सादा था, कह दिया कि देख तो लूँ लेकिन अंग्रेजी के संवाद समझ  नहीं आयेंगे। कहने लगे कि समझने की कोई जरूरत नहीं होती, जब सब ताली बजायें तो ताली बजा दो, जब सब हँसें तो हँस दो। आज्ञा शिरोधार्य करते हुये इसी अंदाज में एकाध नाटक देखा भी, अंकल अपने को आज भी पसंद हैं लेकिन वो आईडिया अपने को उस समय ज्यादा पसंद नहीं आया। फ़िर हमने न देखे अंग्रेजी के नाटक-फ़ाटक। मन में यही सोचा कि इस तरह से अंग्रेजी नाटक देखने से तो सप्रू हाऊस के पंजाबी नाटक देखना ज्यादा बढ़िया रहेगा, कम से कम कुछ पल्ले तो पड़ेगा।

पिछले कुछ दिन से या तो बदली हुई दिनचर्या का असर है या कुछ और बात, अंकल की कही बात थोड़ी-थोड़ी पसंद आने लगी है।  ताजा हालात से अपडेट नहीं रह पाता, हो-हल्ला सुनकर रहा भी नहीं जाता और पूरी जानकारी न होने के चक्कर में कुछ कहा भी नहीं जाता। एक तो जब तक कोई बात समझ आती है, तब तक नई ब्रेकिंग न्यूज़ आ चुकी होती है। इत्ते मामले हो गये, हमने कुछ प्रतिक्रिया ही नहीं दी। आसाराम जी का मामला, खजाने का मामला, मोदी का मामला, राहुल का मामला, नीतिश जी का मामला, और अब सचिन का मामला -  गरज ये कि अपना हाल ऐसा हुआ पड़ा है कि एक चीज की मीमांसा करने की सोचते हैं, तब तक भाई लोग नया हो-हुल्लड़ शुरू कर देते हैं। अबे मिलजुलकर सरकार बना सकते हो, मिलजुलकर घोटाले कर सकते हो, दूसरे उल्टे सीधे काम कर सकते हो मिलजुलकर लेकिन ये नहीं हो सकता कि नया मामला खड़ा करने में मिलजुलकर और आम सहमति से काम ले लो। एक ने कुछ कहा या किया तो तुमसे इतना सब्र नहीं होता कि कम से कम एक हफ़्ता तो इंतजार कर लो? तुम्हारा तो ये फ़ुल्ल टाईम धंधा है लेकिन हम जैसों को तो दो टकेयां दी नौकरी भी देखनी होती है और दूसरी तरह की दुनियादारी भी। वैसे तो हम प्रतिक्रिया न भी दें तो चलेगा, प्रतिक्रियावादियों की कमी तो है नहीं लेकिन कवि लोग जो कह गये हैं कि तटस्थ रहने वाले भी पाप के भागी हैं तो हम चुप कैसे रहें भला? ’जबरा मारे और रोने भी न दे’ वाली बात कर रखी है मुझ जैसे गरीबों के साथ।

हारकर हमने फ़ैसला किया कि अंकल की बात पर अब अमल करेंगे, सब ताली बजायेंगे तो हम भी ताली बजा देंगे और जब दूसरे हँसेंगे तो हम भी हँस देंगे ताकि कम से कम तटस्थ तो न समझे जायें। लेकिन इन धुरंधरों से हमारे साथी ही कौन सा कम हैं? इन मित्रों से अच्छे तो वो दर्शक हैं जो एक दूसरे को देखकर ताली बजाते हैं या हँसते हैं। तुम तो फ़टाफ़ट से हर बात में भारत-पाकिस्तान बना लेते हो। मोदी ने कुछ कह दिया तो समर्थक उसे ही जस्टीफ़ाई करने में लग जायेंगे और विरोधी आरोप लगाने लगेंगे। और अगर राहुल ने कुछ कह दिया तो फ़िर वही करम, आमने-सामने। बात न देखी जायेगी, अपनी प्रतिक्रिया इससे प्रभावित होगी कि बात कही किसने है।

मुजफ़्फ़रनगर दंगों के बाद राहुल के भाषण को लेकर अच्छा खासा बवाल उठ खड़ा हुआ। जहाँ तक मेरी जानकारी है, राहुल ने कहा था कि इन दंगों के बाद आई.एस.आई. कुछ मुस्लिम युवाओं के संपर्क में है। जब तक हम इस बात के लिये तैयार हुये कि चलो भाई ने कोई तो समझदारी की बात की। अब थोड़ी वाहवाही कर ली जाये, तब तक पता चला कि इस बात पर चुनाव आयोग में शिकायत भी हो गई और नेताओं ने राहुल से स्पष्टीकरण भी माँग लिया कि या तो आप उन युवाओं के नाम बताईये या फ़िर मुस्लिम समुदाय से माफ़ी मांगिये। ले भाई संजय कुमार, दे ले प्रतिक्रिया। हम फ़िर से तटस्थ हो गये लेकिन एक बात नहीं समझ आई कि किस बात की माफ़ी मांगी जाये साहब?  इस व्यक्तव्य से पूरे मुस्लिम समुदाय का अपमान कैसे हो गया? आपकी ये माँग किसे क्लीनचिट दे रही है?

उधर पटना भाषण, जोकि मेरे विचार में मोदी के सबसे हल्के भाषणों में से एक था से अपना भी फ़्यूज़ उड़ा हुआ था कि सामने वालों ने उससे भी तगड़ी बातें करनी शुरू कर दीं। सरदारजी ने ज्ञान बघारा कि भाजपा है जो इतिहास और भूगोल बदलती है। सत्वचन महाराज, तुस्सी सच में ग्रेट हो। सब टीवी  पर आने वाले हमारे परिवार के पसंदीदा सीरियल ’तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ का वो सीन याद आ गया जब दया भाभी एक काकरोच को देखकर चीखती है ’कारकोच-कारकोच’ और उसका पति जेठालाल उसकी गलती पर उसे डाँटता है कि पगली इसे कारकोच नहीं कहते। दया के सकुचाकर पूछने पर कि फ़िर इसे क्या कहते हैं, इतराते हुये जेठालाल बताता है, "इसे कहते हैं, ’काचरोच’"

हँसी-मजाक की बात एक तरफ़, लेकिन गंभीरता से इस बात पर क्या हमें नहीं सोचना चाहिये कि ये आरोप-प्रत्यारोप सिर्फ़ सत्ता के लिये लगा रहे हैं और इनके भी कुछ दुष्परिणाम हो सकते हैं?

ऐसा भी हो सकता है कि  मैं इन बातों को संपूर्णता में न समझ पा रहा होऊँ।  अगर ऐसा है तो फ़िर अंकल की बात पल्ले बांध लेने में कोई बुराई नहीं कि सब जैसा करें, वही किया जाये और काकरोच को कारकोच नहीं बल्कि काचरोच कहा जाये :)

रविवार, अक्टूबर 20, 2013

an idea can change a lot

उस दिन कोई सार्वजनिक अवकाश था लेकिन बैंक की शाखायें खुली रखने का सर्कुलर भी आ चुका था, शायद टैक्स भुगतान की आखिरी तारीख जैसा मामला था।  सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सरकार चाहे कैसा भी समझौता कर ले लेकिन जब पुरखे ’सर्वेगुणा: कांचनमाश्रयंति’ जैसी भविष्यवाणी कर गये हों तो चाहे उनका मान रखने की बात रही हो या फ़िर डूबती अर्थव्यवस्था को कांधा लगाने के लिये यह मजबूरी हो जाती हो, सरकार ऐसे अवसर पर गन्ने का रस निकालने वालों की तरह व्यवहार करती दिखती है। अर्जुन को मछली की आँख दिखती थी, इन अर्जुनों को रस की  आखिरी बूँद दिखती है।  जिस तरह वो  गन्ने को पहले सीधा मशीन में डालता है, उस पार से निकलते कुचले गये गन्ने को दोहरा करके फ़िर मशीन में पेरता है और गन्ने की तह हर बार मुड़ती- बढ़ती जाती है। हम जैसे कुछ भुक्तभोगी सार्वजनिक अवकाश की ऐसी-तैसी होते देखकर करदाताओं के साथ खुद को भी उस मूक गन्ने की तरह ही मानकर रसवान से रसहीन की गति को प्राप्त होते महसूस करते हैं।

और दिनों में तो अक्सर मौका मिलता नहीं, उस दिन संस्था की आंतरिक mail system में इनबाक्स को तसल्ली से देखने का मौका मिल गया। महीनों पुराना एक मैसेज दिखा जिसमें विषय था - ’अपील - स्टाफ़ श्री ............ के बारे में।’   नाम देखते ही ध्यान आया कि हम एक ही बैच के थे। वैसे तो हम बहत्तर प्रतिभागी थे और एक सप्ताह साथ रहने के बाद सब इधर उधर बिखर गये थे और दोबारा मिलना भी नहीं हुआ लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जो किसी न किसी वजह से दो दशक के बाद याद रह गये थे, यह भी एक ऐसा ही नाम था। अपील पढ़ी तो काफ़ी कुछ पता चला। कैरियर पथ पर भी कमोबेश आसपास ही चल रहा वो साथी उस संदेश के अनुसार एक गंभीर बीमारी से जूझ रहा था और उसकी आर्थिक सहायता के लिये ही ये अपील की गई थी। सब कुछ केन्द्रीयकृत होने के चलते उस संदेश में दिये गये खाते को चैक किया तो मालूम चला कि वो खाता तीन चार महीने पहले ही बंद हो चुका था। स्पष्ट हो गया कि वो साथी अब जा चुके। इस घटना की चर्चा साथियों से की तो लगभग हमेशा की तरह मिश्रित प्रतिक्रियायें मिली। परिचितों में कुछ ऐसे होते हैं जो आपके हर फ़ैसले में और हर राय में आपके साथ होंगे, कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें हमेशा विरोधी राय रखनी होती है और कुछ ’जैसी बहे बयार...’ टाईप के होते हैं। बहरहाल जिन मित्र के बारे में अपील थी, वो जा चुके थे तो बात भी आई गई हो गई वैसे भी किसी के आने या जाने से सबकी दुनिया पर फ़र्क नहीं पड़ता।

बीच में कभी-कभार अकेला होता तो मैं कई पहलुओं पर आकलन करता रहता कि उस दोस्त ने अपनी बीस साल के आसपास की नौकरी में कितनों से परिचय किया होगा, उनमें से कितनों को यह जानकारी मिली होगी, उनमें से कितनों ने इस बारे में कुछ सोचा होगा, उनमें से भी कितने अपनी खुद की परेशानियों के बीच अपने सोचे हुये पर  अमल कर पाये होंगे वगैरह-वगैरह। मेरा समवयस्क ही था तो उसके परिवार की स्थिति के बारे में अंदाजा लगाने में बहुत नहीं सोचना पड़ा। कुछ समय के लिये मन में एक कसक सी जरूर रह गई। यह कसक इसलिये और भी ज्यादा थी कि बहुत पहले से, जबसे ग्रुप इंश्योरेंस कंसेप्ट के बारे में पहली बार जाना था, एक अनगढ़ सा विचार अपने दिमाग में आता रहा था।  कुछ मित्र ऐसा एक फ़ंड खुद शुरू करें जिसमें एक छोटी सी राशि नियमित रूप से डालते रहें और किसी दुर्घटना या आपद्स्थिति में यह फ़ंड एक कुशन का काम करे लेकिन शायद विचार का बीज कमजोर था या फ़िर ऐसे ही उद्देश्यों को लेकर शुरू हुये कुछ प्रोजेक्ट्स की विफ़लता की जानकारी(अधिकतर मामलों में कर्ताधर्ताओं की नीयत पर प्रश्नचिन्ह लगते रहे) इसकी वजह थी कि बीज एक वृक्ष का रूप नहीं ले पाया। निष्कर्ष वही कि बात आई-गई हो गई।

अब बात ज्यादा पुरानी नहीं, पिछले महीने की। शायद दस तारीख के आसपास की बात है, मेरे एक युवा साथी ने मुझसे पूछा, "सर, ये डेथ रिलीफ़ फ़ंड क्या होता है?" इस महीने की पे-स्लिप में बीस रुपये की नई कटौती इस नाम से दिख रही है।" मेरे जवाब देने से पहले ही स्टाफ़ सदस्यों में अपनी पे-स्लिप देखने की  होड़ मच गई। अपन ’पता-नहीं’  कहने से बच गये :)   वेतन की तारीख आते-आते ’डेथ रिलीफ़ फ़ंड’ जी कभी दिखते, कभी गायब होते रहे। फ़ाईनल पे-स्लिप में सभी स्टाफ़ सदस्यों के वेतन से एक सौ दस रुपये ’डेथ रिलीफ़ फ़ंड’ में कटे पाये गये। इस बार  "सर, ये डेथ रिलीफ़ फ़ंड क्या होता है?" एक व्यक्तिगत प्रश्न न होकर सामूहिक प्रश्न बनकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ। "पहले बीस रुपये दिखा रहा था, महीना खत्म होते-होते एक सौ दस रुपये हो गये" यह एक के साथ दूसरा फ़्री वाला प्रश्न था।

अब अंधा अंधे को क्या रास्ता दिखायेगा?  ऐसे में संबल दिया पिछली डेली-पैसंजरी के एक साथी के तकिया कलाम ने। हम ताश खेलते थे, वो दर्शक दीर्घा में होता था। वो कहानी फ़िर कभी, लेकिन जब खिलाड़ी-दर्शकों में से लगभग हर आदमी अपना सपोर्टर होता था और इशारेबाजी करता रहता था तो विरोधी को चिढ़ाने के लिये वो हमेशा कहा करता था कि संजय भाई साहब के बंदे हर विभाग में हैं। अचानक ही वो बात याद आई और मैंने खुद को अकेला नहीं पाया। ध्यान आये वो सब पुराने दोस्त जो बेशक अब दूर दूर हैं लेकिन संपर्क में हैं, याद आये वो नये-नये प्रोबेशनरी ओफ़िसर्स जिनसे कभी किसी ट्रेनिंग या सेमिनार में हल्का-फ़ुल्का परिचय होता और फ़िर किसी ऐसी ही जगह अचानक वो आकर टोक देते हैं,  "सर, पहचाना?" मैं जब तक दिमाग दौड़ाऊँ तब तक वो कोई ऐसी बात याद दिला देते कि सर वहाँ भोपाल मे आपने वो अनुभव हम सबके साथ शेयर किया था। दिमाग में बिजली की तरह नाम कौंध जाता था, "भास्कर?" गले लगा लेता हूँ। या फ़िर कभी लोकेश फ़ोन पर बताता है कि मेरी  पोस्ट पढ़ते रहते हैं तो खुशी तो होती है कि दूरी बेशक हो लेकिन कुछ लोग भूलते नहीं हैं। 

अब इसी बात का एक विस्तार ये है कि उम्र और नौकरी के उस पड़ाव पर हूँ कि नई पीढ़ी और पिछली पीढ़ी नदी के दो तीर की तरह हैं और हम जैसे लोग  या तो नदी का पानी हैं या फ़िर पुल। सीनियर लोगों के पास इतराने के लिये उनका अनुभव है और नये लोगों के पास तकनीक। सीनियर पीढ़ी किसी तकनीकी झमेले में उलझते हैं तो अपन अपनी अक्षमता बखूबी जाहिर करके किसी नये वाले का फ़ोन नंबर टिका देते हैं और बता देते हैं कि हमारा रेफ़रेंस दे दीजियेगा और ऐसा ही काम जरूरत पड़ने पर नई पीढ़ी वालों के साथ करते हैं। दोनों का काम हो जाता है, अपनी वाहवाही हो जाती है। इसे मार्केटिंग वाले ’माल मालिकों का, मशहूरी कंपनी की’ भी कहते हैं।  रेफ़रेंस वाली जरूरत भी इसलिये पड़ती है कि मैंने पाया है प्राय: दोनों पीढ़ियों में एक दूसरे के साथ कम्पैटिबिलिटी डेवलपमेंट जितना होना चाहिये, उतना नहीं है। एक कॉमनमैन होने से(बेशक वो कॉनमैन ही क्यों न हो:)) दोनों आपस में एक दूसरे पर सहजता से विश्वास कर लेते हैं कि कुछ गड़बड़ हुई तो कान पकड़ने के लिये संजय महाराज तो हैं ही। खैर, इस कहानी का इतना सा मंतव्य है कि ’डेथ रिलीफ़ फ़ंड’ वाले सवाल का जवाब देने के लिये फ़िर नदी के दोनों किनारों को कुछ फ़ोन करने पड़े। सूत्र आधिकारिक नहीं थे लेकिन जो और जितना मालूम चला, उसे ही सच मानते हुये आपके साथ भी साझा कर लेता हूँ।

मान लीजिये मेरी संस्था में लगभग 40000(चालीस हजार) कर्मचारी हैं। यह तय किया जाता है कि पिछले महीने में जितने कर्मचारियों की मृत्यु होती है, हर कर्मचारी के वेतन से दस रुपये प्रति मृत कर्मचारी की दर से कटौती की जायेगी। इस प्रकार प्रत्येक मृत कर्मचारी के परिवार के लिये लगभग  चार लाख रुपये (40000 X 10 = 400000) की सहायता राशि एकत्रित हो जायेगी। यह राशि आकस्मिक मृत्यु के दौरान संस्था द्वारा दी जाने वाली अन्य सहायताओं के अतिरिक्त होगी। जाने वाले की कमी पैसे से पूरी नहीं हो सकती लेकिन जीवन की मझधार में रह गये उसके परिवार के लिये यह राशि एक अतिरिक्त सहारा तो बन ही सकती है। दूसरी तरफ़ अंशदान देने वाले कर्मचारी का अंशदान इतना ज्यादा भी नहीं कि उसका खुद का बजट प्रभावित हो और ऐसा इसलिये हुआ कि इस जिम्मेदारी को कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित न रखकर सामूहिक रूप से सबने बाँटा(वैसे तो बँटवाया गया कहना ज्यादा उचित है क्योंकि विकल्प मांगे जाते तो इसमें भी मीनमेख निकालने वालों की कमी नहीं होती)। मुझे इस योजना में फ़िलहाल कोई खोट नहीं दिखा, ब्रांच के मित्रों को जब इसके बारे में विस्तार से बताया तो वो सब भी संतुष्ट दिखे लेकिन इस सूचना के अनुसार एक महीने में ग्यारह लोग वाली बात से कुछ आशंकित भी। 

जीवन है तो ये सब तो चलता ही रहेगा लेकिन ऐसी कुछ घटनायें विश्वास बढ़ाती हैं कि अभी सब कुछ चुका नहीं है।  मुझे तो पहले भी यही लगता रहा है कि सामूहिक कार्यों के लिये यदि हम सब थोड़ा-थोड़ा योगदान करें तो कुछ लोगों पर अनावश्यक बोझ नहीं पड़ेगा। और यह योगदान स्वेच्छा से हो तो उसका कोई मुकाबला नहीं। 

आज मैं सोचता हूँ कि मन में अच्छे और सकारात्मक विचार  आयें तो उन्हें किसी शंका या भय से अपने तक सीमित न रखकर सांझा किया जाना चाहिये।  an idea can change a lot. आपका एक अच्छा विचार किसीके जीवन से अंधेरा दूर करके प्रकाश फ़ैलाने में सहायक हो सकता है। 

अंधेरे और प्रकाश से याद आया कि दीपपर्व आने को है, आप सबको दीप पर्व की अग्रिम शुभकामनायें।

और हाँ,  उससे पहले करवाचौथ की शुभकामनायें। अभी जीना है भाई!!(करवाचौथ वाली शुभकामनाओं का ऑफ़र स्वैच्छिक योगदान वालियों/वालों  के लिये ही सीमित है:)

रविवार, सितंबर 08, 2013

कभी सोचता हूँ...

                                                             



बात लगभग पाँच साल पहले की है, हम लोगों की नये प्रोफ़ाईल में पोस्टिंग  होने को थी।  लगभग तीस रंगरूट एक हॉल में बैठे इंतजार कर रहे थे कि किसे कहाँ पोस्टिंग मिलती है। पोस्टिंग जिन साहब लोगों के हाथ में थी,  वो हम लोगों की उत्कंठा का पूरा मजा ले रहे थे। कुछ चुनिंदा लोगों का उत्साह बढ़ाया गया कि आप लोग खुशकिस्मत हैं जो आपको इसी ज़ोन में रखा जा रहा है। (आपके रेडीरेफ़रेंस के लिये बता दूँ कि प्रशासनिक नियंत्रण के लिये बैंक की  देश भर की शाखाओं को सत्रह ज़ोन में बाँटा गया है और फ़िर हर ज़ोन को चार से छह क्षेत्र में वर्गीकृत किया गया  है)    खुशी, डर, उत्साह वगैरह की मिश्रित भावनाओं के बारे में बाद में सोचा तो तुलना के लायक एक ही चीज मिली। इस चीज के बारे में भी विश्वास के साथ नहीं कह सकता, बस अंदाजा ही है। ऐसी मिश्रित भावनायें शायद पहली ज़चगी के समय होती होंगी। खैर, खुशकिस्मती वाला लिफ़ाफ़ा खुला और मजमून से पता चला कि हमारी पोस्टिंग घर से चार सौ किलोमीटर दूर हुई और जो बेचारे खुशकिस्मत नहीं थे, उनमें से अधिकतर सौ-सवा सौ किलोमीटर दूर पहुँचे। बेचारे बदकिस्मत लोग:(

पंजाब और पंजाबियों का लोहा  हुकूमते बरतानिया तक ने माना है, आज हम भी उसकी तसदीक कर देते हैं। वो ऐसे कि पंजाब की एक छोटी सी ब्रांच ने तीन साल से ज्यादा हमें झेला, दिल्ली की दो बड़ी  शाखायें हमें दो साल से ज्यादा नहीं झेल सकीं।  एक साल में एक ब्रांच के हिसाब से साल पूरा होते न होते एक गिफ़्ट टिकाकर और ’बड़े अच्छे आदमी थे’ जैसे दो चार जुमले पेलकर अगली ब्रांच का रास्ता दिखा दिया जाता रहा और हम खींसे निपोरते चरैवैति-चरैवैति करते रहे।

इस बार फ़िर वैसा ही हॉल था और वैसे ही रंगरूट थे, नहीं थी तो बस वो पहली डिलीवरी वाली मिक्सड फ़ीलिंग्स।  पोस्टिंग वाले झोले के मालिकों में से एक साहब ने कहा, "कांग्रेच्युलेशंस  संजय जी। यू आर लक्की।"  मेरे एक सहकर्मी धीरे से मुझे कहने लगे, "बधाई हो, पोस्टिंग सही मिलेगी।" मैंने अपना ज्ञान बघारा, "ये बधाई वाला जुमला डॉक्टर के यहाँ जाने पर उम्र के हिसाब से बाजू या पिछवाड़े में मला जानेवाला अल्कोहल में भीगा कॉटन का ठंडा-ठंडा कूल-कूल टुकड़ा है। इस ठंडे और भीने अहसास का मतलब है कि सुई चुभने ही वाली है।" मित्र हँसने लगे। 

हमारे बुजुर्ग सिखाते रहे हैं कि हमेशा शुभ-शुभ बोलना चाहिये, दिन में एक वक्त ऐसा आता है कि हमारे मुँह से निकली बात सच निकलती है। शायद वो वही वक्त था  इसीलिये इस बार हमारी खुशकिस्मती कुछ कम डिग्री की निकली, सिर्फ़ सत्तर किलोमीटर दूर की ब्रांच मिली है। ये अलग बात है कि जो खुशकिस्मत नहीं थे, उन्हें यहीं दिल्ली में चाकरी करनी पड़ेगी।

कुछ साल पहले जब हम ट्रेन से डेली-पैसेंजरी करते थे तो एक साथी के बारे में मशहूर था कि वो चुप नहीं रह सकता। और कुछ टॉपिक न मिले तो यही बताने लगता था कि घरवाली ने सब्जी में नमक ज्यादा डाल दिया या आलू के  टुकड़े बड़े-बड़े काट दिये। मुझे लगता है कि अब मेरा भी यही हाल हो गया है, बस मैं आपको लिखकर बता देता हूँ कि अब ऐसा हुआ या वैसा हुआ लेकिन शायद यह भी जरूरी ही है। हमारा और आपका काफ़ी पुराना साथ है, इतना तो बताने\जानने का रिश्ता बनता ही है। 

इतना तो आप समझ ही गये होंगे कि अपनी नियमितता प्रभावित हो सकती है लेकिन मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई, कुछ और झेलिये। एक सप्ताह पहले नई जगह के आदेश मिले।  पुराने साथी और पुरानी ब्रांच छूट गये, रूटीन भी बदल रहा है। नये रूटीन में खूब व्यस्त(सही मायने में तो अस्त-व्यस्त)  रहने के बाद भी अपने बारे में पहले से ज्यादा सोचने का समय मिल रहा है तो इस स्वावलोकन का आनंद क्यों न लिया जाये? 

एकदम से Odd man out  होने पर एकबारगी तो भौंचक्का सा रह जाता हूँ लेकिन पता नहीं कैसे थोड़ी ही देर में सामान्य हो जाता हूँ। शायद यही वजह है कि कहीं जाने के आदेश मिलते हैं तो पुरानी जगह छोड़ने के नाम से कोई तकलीफ़ नहीं होती। शायद पहले दिन से ही खुद को इस बात के लिये तैयार कर लेता हूँ कि ये ब्रांच मेरी नहीं है, मैं इसका नहीं हूँ। सोचता हूँ कि जैसे यहाँ हमेशा नहीं रहा, वैसे ही वहाँ भी तो हमेशा नहीं रहूँगा। इस सोच से आवाजाही आसानी से हो जाती है।

दो साल पहले जब ट्रांसफ़र पर दिल्ली आया तो सच ये था कि दिल्ली के स्टाफ़ में अपनी जान पहचान का कोई भी नहीं था। उस समय तक सारी नौकरी दिल्ली से बाहर करने और उअसे भी ज्यादा अपने आप में मगरूर रहने का शायद यह परिणाम होगा।  यहाँ आने के बाद थोड़ा बहुत परिचय हुआ भी तो अपने बराबर वालों से, ऊपरवालों के और हमारे कम्फ़र्ट ज़ोन अलग अलग हैं।  अलग अलग ब्रांच से यही मित्र कई दिन से कह रहे थे, ’हमारी ब्रांच में आ जाओ’ और मैं कहता था कि ये क्या अपने हाथ में है? और जब आदेश दिल्ली से बाहर के हुये तो फ़ोन पर इन्हीं दोस्तों से डांट भी मुझे ही खानी पड़ी। किसी ने कहा कि आप ने किसी से कहा ही नहीं होगा, एकाध ने तो बल्कि डपट कर इसे मेरी बहुत बड़ी कमी  बताई। मैं कौन सा कम था, मैंने भी कहा कि मेरे चाहने वाले बड़ी पोस्ट पर नहीं है तो इसमें मेरा क्या कसूर है?  तुम लोग ऊपर होते तो मेरा ध्यान रखते और अब मुझपर ही गुस्सा उतारते हो। 

सोचता हूँ कि ऐसे कितने हैं जिसकी थोड़ी सी तकलीफ़ को सोचकर भी दूसरे दुखी होते होंगे, मुझे खुद को यहाँ भी तो  odd man out मानना चाहिये। देखा है साथ काम करने वालों को कि पिछली ब्रांच से फ़ाईल मंगवाने या छोटे से छोटा काम करवाने के लिये उनलोगों को कितनी मिन्नतें करनी पड़ती हैं और मैं किसी से फ़ोन पर एक बार जिक्र करता हूँ कि मेरे दोस्त वो काम कर देते हैं और करके खुश होते हैं कि मैंने उन्हें इस लायक समझा। यहाँ भी तो odd man out बनता रहा हूँ मैं।  ये भी सोचता हूँ कि सेलेक्शन के टाईम भी तो odd man out जैसा कुछ हुआ ही होगा, तभी तो अपनी नौकरी लगी।  इस बार भी ऐसा ही हुआ, शुरुआती झटके के बाद तनावपूर्ण स्थिति नियंत्रण में आ गई। 

कभी सोचता हूँ  कि शायद मैं इस दुनिया को समझ नहीं पाता हूँ(ये तो खैर हमेशा ही लगता रहता है)। मेरे दोस्त इतना दुखी और परेशान हो रहे हैं और मैं बात की गंभीरता को समझ ही नहीं पा रहा हूँ। उस दिन कोई इंग्लिश मूवी आ रही थी जिसमें एक तलाकशुदा माँ का बच्चा अपनी माँ के मित्र के सामने किसी ऐसी मानसिक बीमारी का जिक्र कर रहा था जिसमें अरुचि, तटस्थता वगैरह लक्षण होते हैं। कहीं ऐसा ही कुछ मेरे साथ तो नहीं हो रहा कि मैं जिसे अपनी महानता समझ रहा हूँ, असल में वो कोई बीमारी हो।

कभी सोचता हूँ किसी अच्छे से डॉक्टर से दिमागी चैकअप करवाऊँ। फ़िर सोचता हूँ कि छुट्टी भी तो आसानी से नहीं मिलती। बीमार होने के बाद तो मेडिकल छुट्टी मिल जाती है लेकिन बीमारी की जाँच करवाने के नाम पर तो मेडिकल छुट्टी भी नहीं मिलने की। बड़ा पंगा है यार नौकरी वाली जिन्दगी में..

कभी सोचता हूँ कि उस्ताद ज़ौक या तो हमारे बैंक का कर्मचारी नहीं था या फ़िर उसका जुगाड़ तगड़ा रहा होगा जो कह गया कि ’कौन जाये अए ज़ौक दिल्ली की गलियाँ छोड़कर’...

कभी सोचता हूँ कि बँधी-बँधाई नौकरी करके देख ली,  क्यूँ न कुछ फ़्रीलांसिंग कर ली जाये? कोई एनजीओ बनाकर थोड़ी सेवा हम भी जनता जनार्दन की कर लें, कम से कम ये लोक तो सुधर जाये। रही बात परलोक की तो वो फ़िर देखी जायेगी.....

कभी सोचता हूँ कि मैं लिख क्यूँ रहा हूँ, और अगर लिख ही रहा हूँ तो किसी ज्वलन्त विषय पर न लिखकर खुद के बारे में ही क्यों लिख रहा हूँ। फ़िर सोचता हूँ कि ऐसा इसलिये सही है क्योंकि अपने बारे में लिखने से किसी वाद\निरपेक्षता\तहज़ीब को चोट नहीं पहुँचेगी।


और कभी-कभी ये भी सोचता हूँ कि सोचने का सारा ठेका मैंने अकेले ने ही ले रखा है क्या? कदे कदार थोड़ा-घणा थम भी सोच ल्या करो.....