सोमवार, मार्च 12, 2012

मूल्य...

                                                               (चित्र गूगल से साभार)

"श्रवण कुमार ने अपने आसुंओं से अपने माता पिता के चरण भिगो दिये और फिर से उन्हें बहंगी में बिठाकर और बहंगी को अपने कंधे पर  रखकर  तीर्थ यात्रा करवाने निकल पड़ा"  बेटे के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए उन्होंने कहा।

"पापा, उस दिन दादाजी को सत्संग में जाना था तब  आप साथ चले जाते तो उन्हें आसानी होती न?" उनींदी सी आवाज में बेटे ने पूछा।

"अरे मेरे पास छुट्टी नहीं थी, गाडी और ड्राइवर भेज दिया था न.."

दो चार पल के मौन के बाद फिर से बेटे की आवाज आई, "जिन दिनों मम्मी की तबियत खराब थी, तब भी आप ऑफिस से आते समय क्लब होकर ही आते थे।"

अब उनकी आवाज में थोड़ी सी तल्खी आ गयी थी, "तबियत खराब थी तो डॉक्टर, दवा वगैरह करवाया था कि नहीं?  काम काज और सोशल लाइफ छोड़कर सारे बीमार बनकर तो नहीं  बैठ सकते।"

कुछ देर चुप्पी छाई रही। लड़के को फिर से कुछ याद आ गया, "चाचू का फ़ोन आया था, कह रहे थे तेरे पापा तो फ़ोन ही नहीं उठाते। आपको याद दिलाने को कह रहे थे कि प्लाट की रजिस्ट्री वाला काम अभी रहता है।"

"बहुत बोलने लगा है तू, हम छोटे थे तो अपने मां-बाप के आगे जुबान नहीं खुलती थी हमारी। एक ये हैं आजकल के बच्चे, छोटे-बड़े  का लिहाज ही नहीं। अबके तेरे मुंह से आवाज निकली तो फिर देखना। सो जा चुपचाप, तू सोयेगा उसके बाद ही मैं अपना लिखने पढने का काम कर पाऊँगा।"


"ओके पापा, गुड नाईट। आप लिख लीजिये।"


बेड पर लेटे लेटे ही लैपटॉप पर  आनन-फानन में 'पारिवारिक मूल्यों को बचाने में हमारी भूमिका'  शीर्षक से  एक निबंध लिखकर 'व्यास साहब' को मेल कर दिया और टाइम मैनेजमेंट के लिए खुद को शाबाशी दी। कितनी बार इशारा करने के बाद आज  उस साहित्यकार की दुम  'व्यास' ने उनसे एक लेख माँगा था, आज चूक जाते तो जाने फिर कब अखबार में छपने का मौका मिलता।  

55 टिप्‍पणियां:

  1. बस अभी अभी आपकी पोस्ट देखी..और बहुत अच्छी लगी बस...सोच नहीं पाए क्या लिखें....
    आते हैं जी फिर एक बार...फिलहाल हाजिरी दर्ज कर लीजिये...
    H.N.T

    उत्तर देंहटाएं
  2. बच्‍चा अच्‍छी तरह समझ रहा है कहानी का मर्म, शायद याद भी रखे इसे, अपने बच्‍चे को सुनाने के लिए.

    उत्तर देंहटाएं
  3. लिखना , कहना आसान है , निभाना बहुत मुश्किल ...वैसे इतना मुश्किल भी नहीं है , मन हो तो !
    एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ट्रांसफर भी तो ऐसे ही होंगे ये संस्कार !

    उत्तर देंहटाएं
  4. मानवीय मूल्यों को समझाती एक लघुकथा...पठनीय...और ..."श्रवणीय"....

    उत्तर देंहटाएं
  5. yahi sthkiti ho gayi hai...charitra to bahut padhne ko mil jaate hain..anukaran karne ke liye koi nahi mil paata...kathni aaur karni me bahut antar ho gaya hai...sadar bahdayee ke sat

    उत्तर देंहटाएं
  6. न हंसाया न गुदगुदाया आज तो छील कर रख दिया !

    फूट-फूट के रोई-गाई जब आपन आई बारी
    कथनी औ करनी में जेकरे अंतर होला भारी।

    उत्तर देंहटाएं
  7. जीवन की सच्‍चाई यही हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  8. रोग ग्रसित तन-मन मिरा, संग में रोग छपास ।

    मर्जी मेरी ही चले, नहीं डालनी घास ।

    नहीं डालनी घास, बिठाकर बँहगी घूमूँ ।

    मम्मी तेरी खास, बैठ सारे दिन चूमूँ ।

    चाचा का क्या प्लाट, प्लाट परिवारी पाया ।

    मूल्य बचाते हम, व्यास जी को भिजवाया ।।

    दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक
    dineshkidillagi.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  9. पर उपदेस कुसल बहुतेरे, तुलसी बाबा पहले ही कह चुके हैं. सत्य यह है कि अपनी स्वार्थपूर्ति के हिसाब से नियम-क़ानून-प्रथा को हम मोड़ लेते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  10. काश ये बेटे जाने कि कभी ये भी बूढ़े होंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  11. कहानी कोई भी सुना लें, लेकिन बच्चों ने तो हमसे ही सीखना है ना

    प्रणाम

    उत्तर देंहटाएं
  12. कहने की बातें और होती हैं और रहने की और।

    उत्तर देंहटाएं
  13. इसे मैं लघु कथा नहीं कहूँगा. महा कुछ ....

    उत्तर देंहटाएं
  14. दिल को छू गयी....

    बहुत सार्थक लेखन...
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  15. वोई तो..!
    ऊ कहते हैं ना..हाथी के दाँत, खाने के और, दिखाने के और...
    आप भी कलब जातें हैं ?? वड्डे लोग वड्डी बातें...:)
    हाँ नहीं तो..!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. वोई तो..
      चाँद की बात करने के लिये चाँद पर जाना जरूरी ही होगा, है न?
      एक तरफ़ चाँद, एक तरफ़ कलब - वड्डा कौन?

      हटाएं
  16. 'पारिवारिक मूल्यों को बचाने में हमारी भूमिका'

    पता नहीं क्या लेख लिखा होगा, सी सी टू संजय बाऊ भी कर देते तो अच्छा था.. अब एक अलग मेल से लिंक भेजेंगे. क्या ख़ाक टाइम मनेजमेंट की है. :)

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. ले लो हमारे मजे बाबाजी तुम भी, देखी जायेगी :)

      हटाएं
  17. सच ही तो है - ऐसी ही जिंदगी .... ऐसे ही हम ?

    उत्तर देंहटाएं
  18. सत्यजित रे की फिल्म "शाखा-प्रशाखा" याद हो आयी!! कदवा सच!!

    उत्तर देंहटाएं
  19. सजी मँच पे चरफरी, चटक स्वाद की चाट |
    चटकारे ले लो तनिक, रविकर जोहे बाट ||

    बुधवारीय चर्चा-मँच
    charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  20. बहु सुन्दर. हम आज मानवीय मूल्यों की अवहेलना कर रहे हैं और दिखावा इतना की अवहेलना की ही अवहेलना

    करने पे उतारू हो जाते हैं. सही है हमें दूसरों को उपदेश तभी देने चाहिए जब हम वो अपने जीवन में धारण करलें.

    उत्तर देंहटाएं
  21. कई बार यूँ भी होता है, कि हम जो नहीं हो पाते, या होते वह सब अपनी अगली पीढ़ी में देखना चाहते हैं, और अधिक उम्मीद रखना तो हमने हमेशा से बिन सिखाये सीखा है।
    सटीक!

    उत्तर देंहटाएं
  22. माशा अल्लाह बड़ा ज़हीन बच्चा (और बढिया नसीब) पाया है साहब ने, वर्ना कई ग़रीब ऐसे भी होते हैं जो पढते थे तब मास्साब से मुर्गा बनते थे और जब पढाते थे तब छात्रों के जूते खाते थे।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. ऐसे ही गरीब हम भी हैं जी, बालक थे तो बड़ों से डरते\सीखते थे और अब बालकों से डरते\सीखते हैं.

      हटाएं
  23. ऐसे मुखौटाधारी चेहरे हर जगह हैं।
    हम सब सभ्य और कुलीन होने का स्वांग रचने में कितने माहिर हो गए हैं ?

    उत्तर देंहटाएं
  24. प्रिय मो सम कौन जी ?
    टिप्पणी के ख्याल से एक लिंक टिकाये जा रहे हैं ! लगता है चचा ग़ालिब ने भी ऐसे ही हालात में साहित्यकार की दुम व्यास को ये गज़ल लिख भेजी होगी !

    http://ghazalsagar.blogspot.in/2010/12/blog-post.html


    लिंक चिपकाने से नफरत है ,तुम्हें लाख सही
    लेकिन बा-मानी गज़ल मिलती नहीं यूंहीं कहीं :)

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. चचा की ये गज़ल ’हजारों ख्वाहिशें ऐसी..’ के भी ऊपर अपनी सबसे फ़ेवरेट गज़ल रही है और आज तक जानबूझकर सुनी नहीं है, सिर्फ़ पढ़ी है और खुद रेंके हैं:)

      लिंक चिपकाने से कतई नफ़रत नहीं है अली साहब, दिक्कत सिर्फ़ उमड़ते उफ़नते दीन-धरम के बंदों के लिंक से हुआ करती थी। वैसे सुना है कि अब हम बहुत बदल गये हैं तो किसी दिन हम भी विनीत, विनम्र होने ही वाले हैं:)
      बामानी लिंक के लिये तहे दिल से शुक्रिया।

      हटाएं
  25. हम विश्व बन्धुत्व की भावना को अच्छी तरह जानते हैं,
    अपने भाई को छोड सारी दुनिया को भाई मानते हैं!

    लगे हाथों मै भी एक लिंक चिपका ही दूँ,

    पेड! "बरगद" का! http://sachmein.blogspot.in/2010/06/blog-post.html

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत खूब कुश भाई।

      होते हम व्यासजी तो लिंक चिपकाना और भी कार आमद होता:)

      हटाएं
  26. वाह...वाह...वाह...
    सुन्दर प्रस्तुति.....बहुत बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  27. आप भी इस मुद्दे पर एक पोस्ट लिख किनारे हो लिए :)

    उत्तर देंहटाएं
  28. कल 22/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (संगीता स्वरूप जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  29. पारिवारिक मूल्य यह दोमुहें क्या बचायेंगे ...
    शुभकामनायें संजय भाई !

    उत्तर देंहटाएं
  30. आदर्शों की निर्मम हत्या ..
    आदर्श अब केवल किताबों में...या फिर शो-केस में सजने भर के ही रह गए हैं ....यतार्थ से कोसों दूर!
    आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ ...प्रभावशाली प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  31. एक लघु कथा के माध्यम से पारिवारिक मूल्यों पर बहुत कुछ कह गए आप.सार्थक लेखन॥

    उत्तर देंहटाएं
  32. पारिवारिक आदर्श तो बस किताबो और कहानियो में ही अधिक मिलते है
    यथार्थ में बहुत कम

    उत्तर देंहटाएं
  33. कडवी सच्चाई को शिद्दत से रखांकित कर गयी आपकी लघुकथा...
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  34. जीवन के कटु सत्य को दर्शाती रचना..बधाई!!

    उत्तर देंहटाएं
  35. मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन दर्शाती बहुत सटीक लघुकथा...

    उत्तर देंहटाएं
  36. न केवल जीवन मूल्यों का पतन है बल्कि अब उस पतन का अहसास तक जाता रहा। सम्वेदनाएं अब सतर्क भी नहीं करती।

    आपने इस सच्चाई को वेधक मनोभावों में गुंथा है।

    उत्तर देंहटाएं
  37. बड़ी खतरनाक पोस्ट है जी। :)

    उत्तर देंहटाएं

सिर्फ़ लिंक बिखेरकर जाने वाले महानुभाव कृपया अपना समय बर्बाद न करें। जितनी देर में आप 'बहुत अच्छे' 'शानदार लेख\प्रस्तुति' जैसी टिप्पणी यहाँ पेस्ट करेंगे उतना समय किसी और गुणग्राहक पर लुटायें, आपकी साईट पर विज़िट्स और कमेंट्स बढ़ने के ज्यादा चांस होंगे।