गुरुवार, अगस्त 23, 2012

विचार-विमर्श


                                                                          
                                                              (चित्र गूगल से साभार)

अचानक ही अमृतसर जाने का प्रोग्राम बन गया था, रिज़र्वेशन  करवाने   का समय  भी  नहीं था और तब ओनलाईन रिज़र्वेशन होते भी नहीं थे| यानी कि  यानी कि  समझ गए न?   फिर वही  कोई पुरानी बात!!   

1991, बैंक का इंटरव्यू दिया ही था,  उसके फ़ौरन बाद की बात है| अमेरिका ने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी कि ये संजय कुमार बेरोजगार रह जाए वरना क्या जरूरी था उसे हमारे इंटरव्यू से एक दिन पहले ही ईराक पर हमला करने की? एक तो वैसे ही बंधी बंधाई पढाई  करने में हमारा दिमाग दिक्कत मानता था, फिर जो तैयारी की थी तो उस हमले के बाद एक बार तो लगा कि गया भैसा पानी में, बस तबसे ही हमें अमेरिका नापसंद हो गया| आप भी कहोगे  अजीब आदमी है ये, अमृतसर जाने की बात करके ईराक और अमेरिका की सुना रहा है  लेकिन मित्रों बैकग्राऊंड मजबूत हो तो अच्छा रहता है|  

Anyway, let us come to the point,  बिना आरक्षण के जाना पड़ रहा था, गनीमत ये थी कि साथ में कोई औरत या बुजुर्ग नहीं थे| एक मैं और एक मेरा प्यारा सा हमउम्र सा चाचाजानी|  सुबह सुबह   घर से परौंठे खाके और लस्सी पीके नई दिल्ली से शान-ए-पंजाब पकड़ने चल दिए| वो हमें और हम उन्हें दिलासा दे रहे थे कि दो जनों को एक भी सीट मिल गई तो कल्लेंगे  फिफ्टी -फिफ्टी| पहुंचे तो देखा कि खूब भीड़ थी, सीट का नो-चांस| अब दिलासे का प्रकार बदल गया, कोई बात नहीं यार जवान बन्दे हैगे, रास्ते में सीट मिल गई तो ठीक न मिली तो भी ठीक| बैठने की जगह तो दूर थी, खड़े होने की जगह के भी लाले पड़ गए| जगह मिली कोच के गेट के पास| 

गाडी चल दी तो धीरे धीरे सब सामान्य सा होने लगा|  समय बिताने का सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ शगल ये है कि किसी भी और हर किसी मुद्दे पर बहस छेड़ दी जाए, वही हुआ| तुसी कित्थे जाना है? से शुरू होकर  गाड़ियों में बढ़ती भीड़ से  होकर बात वहीं आ पहुँची जहां उसे आना था, यानी ईराक पर अमेरिका का हमला| सारी सवारियां दो हिस्सों में बाँट गयी और शुरू हो गए दुनिया के मसले सुलझाने| हर जगह की तरह वहां भी दो गुट बन  गए अमेरिका समर्थक और ईराक समर्थक|  पानीपत आते आते मुद्दा व्यक्तिगत हो गया, बुश Vs सद्दाम|  अम्बाला तक आते आते रह गया सद्दाम हुसैन,  हममें से आधे वार्ताकार सद्दाम हुसैन की तारीफ़ कर रहे थे और आधे  उसका विरोध| सब  पूरी सक्रियता से अपने अपने तर्क पेश कर रहे थे, वहीं भीड़ में खड़े थे एक सरदारजी| छः फुटा कद, पर्सनल्टी नहीं पूरा पर्सनैलटा  था उनका| रात में शायद नींद पूरी नहीं हुई थी, सो खड़े खड़े ही श्रीमानजी अपनी नींद पूरी कर रहे थे| जब गाडी को कभी जोर से झटका लगे तब या जब इधर बहस गरम हो जाती थी तब, धीरे से आँख खोलते और जायजा लेकर धीरे से वाहेगुरू वाहेगुरू बुदबुदाते और फिर से आँखें बंद| 

बहसते बहसते लुधियाना और जालंधर भी पीछे छोड़ दिए, जैसे मोमबत्ती बुझने से पहले जोर से भभकती है हम लोगों की बहस भी जोरों से भड़क गयी|   गाडी अमृतसर के आऊटर सिग्नल पर पहुंचकर झटके से रुक गयी| सरदारजी की आँख खुली, बाहर झांककर देखा और अबकी बार  उन्होंने  आँखें दोबारा बंद नहीं  की | बहस की तरफ ध्यान देने लगे, हम लोगों को भी जैसे एक निष्पक्ष निर्णायक की प्रतीक्षा थी, असली बात ये थी कि स्टेशन पास आ चुका था|  

एक बोला, 'सद्दाम की हिम्मत तो माननी पड़ेगी कि ये जानते हुए भी कि अमेरिका से जीत नहीं सकता, उसने हार नहीं मानी|'  
दूसरी पार्टी में से एक प्रखर वक्ता बोला, 'यही बात है तो सद्दाम की क्या हिम्मत है? हिम्मत तो उसके सिपाहियों की है जो मैदान में लड़ रहे थे|'  इस पार्टी वाले  निरुत्तर, एकदम से इस तर्क का जवाब नहीं सूझा| 
अपने सरदार जी बोले, 'वीरे, तेरी गल्ल सई  है लेकिन इसी गल्ल नूं  अग्गे वधाईये ते असली हिम्मत तां बम्बां दी हैगी जेड़े लड़ाई दे मैदान विच फट रये सी|(भाई, तेरी बात सही है लेकिन तेरी सही बात को ही आगे बढायें तो असली हिम्मत तो बमों की है जो मैदान में फट रहे थे)| चलो भाई, आ गयी गुरू  दी   नगरी, जो बोले सो निहाल,  सत श्री अकाल| ' तर्क में तुक  थी या नहीं थी, लेकिन तेली के सर में कोल्हू वाली बात करके सरदारजी ने हम  सबको अमृतसर पहुंचा दिया|  

थ्योरी में तो  हमारे पिताजी भी कई बार समझा चुके कि बेटा बहस में कोई न कोई जीतेगा ही, ये जरूरी नहीं लेकिन कोई न कोई हारता जरूर है और कभी कभी दोनों भी हार जाते हैं|  कभी हमें भी बहुत शौक चढ़ा था अपना ज्ञान झाड़ने का फिर अपने साथ एक दो वाकये ऐसे हुए कि हम बहस करना भूल गए| समझ गए कि हम बहस करने के लिए नहीं बने, ईश्वर सबको सब गुण नहीं देता| इसका ये मतलब भी नहीं कि बहस विमर्श करते लोगों को  किसी तरह से कमतर समझ   
लिया जाए, इन लोगों में बदलाव की इच्छा तो है| कम से कम इन्होने दुष्यंत जी को पढ़ा तो है 'आग जला तो रखी है' that is great. 


साड्डी दिल्ली के उस्ताद ज़ौक साहब के कलाम की पंक्ति अपने को बहुत पसंद है -
अए ज़ौक  किसको चश्म-ए-हिकारत से देखिये,
सब हमसे हैं ज़ियादा,   कोई हमसे कम नहीं|

विमर्श देखने पढने का आनंद मैं भी भरपूर लेता हूँ|   ब्लॉग पर भी जरूरी-जरूरी बहसें चलती रहती हैं| एक सुझाव या अनुरोध करना चाहता हूँ कि बहस के समापन पर निष्कर्ष  क्या निकला, ये जानकारी जरूर दी जाए|

119 टिप्‍पणियां:

  1. बहस के समापन पर निष्कर्ष क्या निकला, ये जानकारी जरूर दी जाए|


    behas kehaa ho rahii haen aap wo bataa daetae ham bhi padh laetae

    hamae to yahaan kahin behas dikhi nahin

    haan aap ki tippani jahaan dikhi wahaan behas nahin dikhi

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    1. bas haa haa hii hii dikhi :-) beechare serious kamnet karnae waale ko likhna padaa ki dubara kament tab daegaa , jab serious jawab hogaa

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    2. मैं आपको बता देता? आपके सेन्स ऑफ ह्यूमर का भी जवाब नहीं| आपसे क्या छुपा/बचा है यहाँ? :)

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  2. अजी निष्कर्ष क्या निकलना है... निश माने रात और Curse माने शाप... बस जी रात की नींद हराम करने का शाप.. याद आया "मोहन जोशी हाज़िर हो".. हम मोहन जोशी की तरह निष्कर्ष (रात की नींद हराम करना) निकाल रहे हैं और पता चला विमर्श करने वाले अपने मध्य प्रदेश पर हाथ फेरते हुए सुकून के खर्राटे ले रहे हैं. आप पोस्ट लिख रहे हो, मैं कमेन्ट मार रहा हूँ और विमर्श-भूमि में "एतना गोली चला कि विमर्श करने वाला खाली खोखा बेचकर लखपति बन गया!!"

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    1. आप हैं बिहार के रहते गुजरात में है ..कभी मध्यप्रदेश आये या नहीं पता नहीं फ़िर लिखा तो लिखा क्यों....कुछ और लिखना था,और ये मार किसे रहे हैं आप ?...:-)

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    2. अर्चना जी ,
      अब क्या बिहार में 'पैदा हुए' और गुजरात में 'रह रहे' को ख्यालों में भी ना जीने दिया जाएगा :)

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    3. हा हा ...हो गई बहस शुरू....मगर भैया है कहाँ?

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    4. भैया खुद को 'भाई' घोषित कर चुके हैं, बातें भी गोली\खोखा की करने लगे हैं अब तो|
      सलिल भाई, अपनी दुनिया में लौट आओ 'भाई' :)

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    5. भाई! :D
      हा हा हा!
      ये खोखा गोली वाला हिस्सा सुना हुआ लगता है :)

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    6. वाह! मजा तो यहाँ है। बिहारी बाबू का मध्य प्रदेश! भगवान बचाये।:)

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  3. पुरानी यादे भी बरबस याद आती रहती है,
    पर्सनल्टी नहीं पूरा पर्सनैलटा, वाह संजय भाई शब्द तो ऐसे तलाश कर लाते हो जिनका कोई तोड नहीं होता?

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    1. हमारा एक कुलीग था, दुसरे तीसरे रोज हमारी पर्सनैल्टी की तारीफ़(खिंचाई) करता था तो हम उसके पर्स्नैलटे की तारीफ कर देते थे| दर्शक लोग मजे लेते थे हम दोबों के:)
      यहाँ एक बार अपने धीरूभाई अपना खुद का पर्स्नैलटा डेवलप करने की ख्वाहिश जाहिर कर चुके हैं, सो यहाँ इस शब्द का क्रेडिट धीरूभाई को|

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  4. इन बहसों को सुनते अवश्य हैं पर पड़ते नहीं हैं, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना।

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    1. हम भी बऊंसर्स को डक्क करते हैं जी|

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  5. येन-केन-प्रकारेण ट्रैफिक बढ़ाने का मामला लगता है इसलिए निष्कर्ष की बात फिजूल है :)

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    1. ट्रैफिक पर तो बाबे की फूल कृपा हैगी जी, अपडेट्स मिलते रहते हैं:)

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  6. बहस सिर्फ़ और सिर्फ़ बहस के लिये होती है जी। किसी निष्कर्ष के लिये बहस करने वाले लोग स्वार्थी होते हैं।

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  7. athah: is post se ye sabit hota hai ke......kisi baat ko samjhane ke liye..........use vad/vivad ya vichar/vimarsh se pare sahaj/saral
    tarike se hi samjhaya ja sakta hai.......jor dene pe hor mach jata hai.......


    nishkarsh niklne ne ke liye vimarsh v/s bahas jaroori hai.....to larkpan ke ek moujoon kissa yun hai.........ke, ek moulviji ke do bete patang urate urate bahasiyate ja rahe the.....suraj ugta hai ya ugti hai ......... pyar-murabat se larte-jhagarte abbu ke paas
    gaye......abba ne bich-bachav ka nishkarsh nikala, kaha..."suraj na ugta hai na ugti hai"........'uga haye'??????




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  8. areererere........tippani box 'metro-rail' sarikha harkat kar gaya....hamne 'pranam' ka
    dasvand tikaya nahi aur ye tippani le ura...


    pranam.

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    1. सूरज उगने को ही है, ये तो जेंडर निरपेक्ष स्टेटमेंट है न भाई? प्रणाम के प्रत्युत्तर में 'जय हो' नामराशी:)

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  9. बिना आरक्षण के जाना पड़ रहा ...safar to bina aarakshan ke ho gay aur naukari bhee bina aarakashan ke mil gayee...ab padonatti ka masala aa raha tab ye sarakar aarakashan la rahi hai ..promotoion le lo baba ji ke aashirwad ke saath...

    jai baba banaras...

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    1. अभी तो प्रोमोशन छोड़ने पर जुटे हैं कौशल भाई, अच्छे से दिल्ली की गलिया सड़कें चैक कर लेने दो| बेमन से ही आया हूँ लेकिन साल दो साल और रहने दो यार:)

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  10. आज कल विचार-विमर्श नामधारी बहस निष्कर्ष परिणामी होती ही नहीं।
    इसिलिए विकास और सुधार कुंद पडे रहते है।

    एक बार गधे की पूँछ पकड़ ली तो पकड़ ली, अब चाहे लातें पडे या काया गंदी हो। गधे की पूँछ छोडने वाले नहीं।:) दृढता और संघर्ष भी कोई चीज होती है भईए!! :) पूँछ छोड़ दी तो मूँछ न कट जाएगी? :) शायद पूँछ छोड़ने के साथ पूछ ही चली जाय :)

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    1. या फिर निष्कर्ष पहले से ही फिक्स्ड होते है:)
      आप भी स्माईली लगा रहे हैं सुज्ञ जी? बड़ी सीरियस बात है ये तो :)

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    2. क्षमा!! क्षमा!! स्माईली आपके लिए नहीं!! सीरियस न लें, आप पर तो खुद से भी अधिक भरोसा है्। बात को अन्य कोई अनर्थ मोड न दे इसलिए स्माईली :))

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    3. हम कहाँ के सीरियस सुज्ञ जी? :)
      बारम्बार आभार|

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  11. 'यही बात है तो सद्दाम की क्या हिम्मत है? हिम्मत तो उसके सिपाहियों की है जो मैदान में लड़ रहे थे|'

    इस बात पे याद आया:

    "जंग में जब जब कत्ल सिपाही होगें,
    तभी तो सुर्खरू जिल्ले ईलाही होंगें!"

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    1. क्या बात याद आई है कुश भाई, वाह|

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  12. तर्क, वितर्क के रास्‍ते कुतर्क की ओर अग्रसर हो तो सतर्क हो जाएं.

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    1. वो एक गज़ल हैगी जी पंकज उधास की गाई हुई, उसमें एक लाईन आती है - हमें सीधी राहों ने रोका बहुत था, कदम लडखडा ही गए....
      सीधी राहें रोकती तो हैं, पर कभी कभी लडखडा जाते ही हैं|

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  13. @ बहस के समापन पर निष्कर्ष क्या निकला
    आप हमेशा उल्टी सीधी बातों से हम भोले जंतुओं को बरगलाने में क्यों लगे रहतें है .............................. क्या आप संसद में बैठे महामहिमों से ज्यादा समझदार समझते है अपने आपको ...................... देखिये हमने तो उन महामहिमों से यह सीखा है की हर बात पर बहस होनी चाहिये जहाँ अपनी बात पिटती दिखे तो सभा भंग करा दो या वाक आउट कर जाओ ......... फिर किसी बात पर वही बेनतीजा हंगामेदार चर्चा/बहस का आयोजन ................... और आप राग अलापते हैं बहस के नतीजो का ..................... वे महामहिम है और आप क्षुद्र ब्लॉगर(मानव) तो आपकी बात किस विध मानी जाए ................... आप ही निराकरण करो क्योंकि "आप सम तो आप ही हो"

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    1. अमां जयपुर नरेश, इतने दिनों के बाद आये हो और आते ही बरगलाने के आरोप| कोइ बात नहीं प्यारे, हम पर न लगाओगे आरोप आक्षेप तो और किसपर लगाओगे? लगाए जाओ, देखी जायेगी :)

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  14. वैसे सद्दाम के तो हम भी कायल थे ... जो भी हो जैसा भी हो बंदे मे दम था !


    मेरा रंग दे बसंती चोला - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे शामिल है आपकी यह पोस्ट भी ... पाठक आपकी पोस्टों तक पहुंचें और आप उनकी पोस्टों तक, यही उद्देश्य है हमारा, उम्मीद है आपको निराशा नहीं होगी, टिप्पणी मे दिये लिंक पर क्लिक करें और देखें … धन्यवाद !

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  15. उत्तर
    1. हर कोई ही unique है, किसी किसी पर लेबल लग जाता है बस:)

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  16. मेरी एक पुरानी पोस्ट में चमेलिया जी ने ये कहा था कि बहस करने के बहुत से फायदे है यदि आप चाहते है की आप की सोच और पुख्ता, मजबूत हो नये तर्कों से अकाट्य बने तो बहस करे, सामने वाले की बात का आप पर असर हो या ना हो किन्तु आप अपनी बात पर और मजबूत हो जायेंगे , बिना बहस के कभी भी आप अपनी बातो के लिए वो तर्क नहीं ढूंढ़ पाएंगे जो आप बहस करते हुए कर लेते है बड़ी आसानी से , ये तो लोगो की गलत फहमी है जो ये सोचते है की एक दूसरे के विचारो को जानने के लिए बहस की जाती है :))))
    युवा होने पर हम सभी बहस करते है मानते है की हमारे विचार बड़े क्रन्तिकारी है और हम दुनिया बदल देंगे , कुछ ही दिनों में कालेज से निकल कर दुनियादारी के थपेड़े में में आते ही सारी क्रांति विचार दुनिया बदलने का जज्बा जुल्हे में चला जाता है |
    बचपन में देखती थी हमारे बनारस में पंडित जी लोगो को बड़ा विद्वान् टाईप का माना जाता था होता ये था की जब पंडित जी के पास कोई जवाब नहीं होता तो फट से किसी ग्रन्थ का कोई श्लोक बांच देते और अपनी मर्जी से जो चाहे अर्थ परिस्थिति के हिसाब से बता देते थे और आप आदमी उनके मुख से बड़े बड़े ग्रथो के श्लोक सुन कर ही धन्य हो जाता और उन्हें बड़ा विद्वान् मान लेता था किन्तु देख रही हूँ की मै तो बड़ी हो गई हूँ किन्तु आज की ब्लॉग जगत में कुछ लोगो का बचपना नहीं गया है किसी को विद्वान् मान लेने में !!!
    हाल में ही संसद में अडवानी ने कहा की यु पी ए २ "नाजायज" है हो हल्ला हुआ कहा गया की "नाजायज" शब्द वापस लीजिये अडवानी ने कहा की "हा मै अपने शब्द वापस लेता हूं" थोडा रुके और कहा की " असल में मुझे यु पी ए २ नहीं बल्कि वन कहना चाहिए था " लोगों ने कहा चलिये अच्छा है उन्होंने अपनी बात वापस ले ली और खुश हो गये और मुझे समझ में नहीं आया की अडवानी ने तो जिस शब्द की बात हो रही थी उसे तो वापस लिया ही नहीं असल में तो उन्होंने दूसरे शब्द को बदला था पता नहीं कौन किसको मुर्ख बना रहा था !!!!
    जिस सारे मामले को लेकर आप ने ये पोस्ट लिखी है वहा बड़ी चालाकी से एक शब्द को ही पकड़ कर खुद को बचाने की नाकाम कोशिश की जा रही है "ये ब्लॉग वालियां ही इतनी हो गयी हैं कि "मैनेज" करना मुश्किल हो गया है !" और प्रतिउत्तर में ये टिप्पणी कि " कुछ ब्लोग्वालियो के नंबर दीजिये "( ये टिप्पणी मिटा दी गई ) आप को क्या लगता है की इस वाक्य में ब्लॉग लिखने वाली महिलाओ को किस शब्द, भावना, सोच, पर आपत्ति है | क्या इसमे आपत्ति करने के लिए बस एक शब्द ही है और कुछ नहीं , पता नहीं कौन किसे क्या बना रहा है !
    कहे के त और भी कुछ रहल लेकिन हाथ पिराये लगल ऐसे जयेंदा !!

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    1. अंशु जी आपने सही पकड़ा। इसीलिए मैंने भी वहां यह लिखा था कि जिस टिप्‍पणी से आपत्ति है वह तो अब भी मौजूद है। और सचमुच में अब भी। ब्‍लाग मालिक भी यह कहकर निकल लिए कि हमें तो निर्विकार ही रहना है।
      और यहां इस बहस में हमें।

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    2. अंशुमाला जी की बात से पूरी तरह सहमत

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    3. स्पष्ट कर दूँ की मुझे इस नए दुखद प्रकरण की पूरी जानकारी अंशुमाला जी के कमेन्ट से ही मिली और मैं यहीं पर अपनी आपति दर्ज करवा रहा हूँ |

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    4. अंशुमाला जी,
      तुलसीदास जी ने अपने पात्रों के माध्यम से कुछ कहा तो उसके लिए उन्हें नारीविरोधी, सामाजिक समरसता विरोधी और पता नहीं क्या क्या मान लिया जाता है तो आप सुश्री चमेलिया जी के माध्यम से इतने ज्ञान की बात बता चुकी हैं, आप को विद्वान क्यों न मान लिया जाए? :)

      गनीमत है कि बहस बेस्ड गलतफहमी से हम आलरेडी दूर हैं|

      @ एक शब्द को केंद्र बनाना -
      मुझे तो लगता है कि ऐसा ही हुआ है लेकिन ये आपत्ति इस एक शब्द पर केन्द्रित कैसे हुई? पता नहीं|

      @ पता नहीं कौन किसे क्या बना रहा है !
      पता नहीं अगेन :)


      कहे के त और भी कुछ रहल लेकिन हाथ पिराये लगल ऐसे जयेंदा !!
      हाथ पिराये लागल त आज किचन का चार्ज श्रीमान जी को सौंप दीजिएगा:)

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    5. @ बेहद साधारण जी
      हो गई जी दर्ज, दूसरों के हिस्से की आपत्ति बेशक यहाँ दर्ज करवा रहे हो लेकिन इस शर्त के साथ कि मेरे हिस्से की आपत्ति(जब भी हो| यहीं दर्ज करवानी होगी|

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    6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    7. नारी ब्लॉग की पोस्ट देखिये http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2012/08/blog-post_20.html
      मैने अपना कमेन्ट वहाँ दिया हैं की मुझे आपत्ति हैं ये कहने पर की ब्लॉग वालियों को मैनेज करना मुश्किल हो गया हैं और फिर की ऐसी वालियों के नबर दे दो
      अरे यहाँ तो बिना पढ़े ही बिदकना आता हैं
      http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2010/11/blog-post_9611.html
      एक बार नारी ब्लॉग पर मैने पहले भी आपत्ति दर्ज की थी जब एक ब्लॉगर मीट में कहा गया था " मूंछ वाले कविराज काहे रचना रचना पुकारते हो असली रचना कही सुन ना ले | और आपकी वो तस्वीर सब भाभीजी को भेजने वाला हूँ जिनमे आप जनानियो के पास बैठ कर बहुत हंस रहे है |तब आपको रचना याद आयेगी | "इस पोस्ट के बाद

      ब्लॉग पर मुझ ये समझाया गया कि जनानी शब्द आपत्तिजनक नहीं हैं लेकिन समझाने वाले मेरी पोस्ट को अगर पढते तो समझते कि मैने जनानी शब्द पर आपत्ति की ही नहीं थी मेरी आपत्ति थी कि मीटिंग के बाद ये कहना "आपकी वो तस्वीर सब भाभीजी को भेजने वाला हूँ जिनमे आप जनानियो के पास बैठ कर बहुत हंस रहे है |" क्या जिन महिला ने ये मीटिंग मे शिरकत कि उनके बारे मे ये कहना कि आप उनके बीच हंस रहे थे और आप का चित्र आपकी पत्नी को दिखाऊंगा सम्मानजनक हैं । ऐसा लगता हैं जैसे कोई टीन एजर अपनी गर्ल फ्रिएंड्स का जिक्र कर रहा हैं
      http://satish-saxena.blogspot.com/2010/11/blog-post_26.html?showComment=1290751355081#c8125806178527377515
      जनानी शब्द जहाँ एक तरफ सामान्य है वहीँ आधुनिक काल में कुछ लोग इसे अपमानजनक मानते हैं !

      हिंदी में ब्लॉग लिखने वाले अपने हिंदी के अज्ञान को ठीक करले और जो जा कर पीठ थपथपा ते हैं वो भी देख सुन पढ़ कर थप थापाये
      ये कमेन्ट पहले ही देना चाहती थी जब इस पोस्ट पर लगा चित्र देखा , क्युकी ये चित्र बता रहा हैं की आपत्ति करने वाली मै और रश्मि केवल चिल्ला मात्र रहे हैं जैसे जो गलत कर रहे हैं वो चिल्ला रहे हैं

      इसीलिये पहले कमेन्ट में पूछा बहस कहाँ हो रही हैं यहाँ बहस कभी होती ही नहीं हैं यहाँ केवल और केवल सोशल नेट्वोर्किंग होती हैं



      सादर लिख रही हूँ ताकि आप को ये ना लगे की आप का अपमान कर रही हूँ पर व्यंगकार के भी कुछ कर्त्तव्य होते ही हैं

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    8. रचना जी,

      जो लिंक आपने दिए हैं, वे मेरे पढ़े हुए हैं| दूसरों के बारे में मेरे जजमेंटल न बनने में कारण मेरी अक्षमता और अरुचि भी है, इसलिए मैं सिर्फ अपनी और अपनी पोस्ट के बारे में लिखी आपकी बात पर कह रहा हूँ| न मैंने किसी का नाम लिखा है और न किसी की तरफ इशारा किया है| चित्र गूगल से लिया गया था, मुझे मेरी पोस्ट के माफिक लगा था| मुझे इस चित्र में कहीं आप, कोई रश्मि या कोई तीसरा प्लांटेड नहीं लगा| अब आप इसमें खुद को और दूसरों को भी शामिल करके कुछ भी समझने-समझाने को स्वतन्त्र हैं| बोलने पर और लिखने पर फिर भी सेंसर हो सकता है लेकिन कोई भी कुछ भी 'सोचने' को स्वतन्त्र है| हमारे अलावा कोई तीसरा जन ही यह निष्पक्ष निर्णय कर सकता है कि मेरी पोस्ट किसी भी individual पर केन्द्रित है कि नहीं|

      उम्र\ ब्लोगिंग\ अनुभव\ ज्ञान में\ समझ में\ उद्देश्य में और इसके अलावा बहुत सी चीजों में आपसे छोटा हूँ इसलिए सादर बिलकुल न लिखा करें|मैं तो खुद ही कहता हूँ कि मेरे हिस्से की आपत्ति(जब भी हो) यहीं दर्ज करवानी होगी| आपके द्वारा मान या अपमान का पात्र मैंने खुद को कभी समझा ही नहीं| ये व्यंग्यकार वाली बात भी भली कही, ध्यान आया कि बहुत पहले कभी एक कमेन्ट आया था 'sarcasm that entertains' मुझे वो अपने लिए appropriate लगा था| At the most, one may term me as an entertainer, लेकिन मुझे व्यंग्यकार कहना सचमुच के व्यंग्यकारों को बुरा लग सकता है:)





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    9. @तुलसीदास जी ने अपने पात्रों के माध्यम........................... आप को विद्वान क्यों न मान लिया जाए? :)
      पहले ये बताइये की ये क्या है ? क्योकि हम लिखे के पीछे कहे को नहीं समझ पाते है :)
      बाकि रही तुलसी जी की बात तो दुल्हे ने शादी के बाद दुलहन को ले जाने से इनकार कर दिया कहा की लोग कहते है की दुल्हन ही दहेज़ है और हमारे गुरु जी ने सिखाया है की दहेज़ लेना पाप है :)
      तो समझ समझ का फेर है सब अपने मतलब के हिसाब से सब समझते है |

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    10. कुछ ख़ास नहीं है जी, आपकी टिप्पणी में चमेलिया जी थीं, विद्वान थे, बचपने वाले थे तो हम भी थोड़ा सा बचपना दिखा गए और आपको विद्वान बता गए| विद्वता पर पंडितों का एकाधिकार हम नहीं मानते, हम तो मानते हैं कि देश के अच्छे नागरिक बनिए, विद्वान बनिए :)
      आपको लिखे की पीछे कहे की नहीं समझ आती तो हमें ही कौन सा आती है? बल्कि हमें तो लाईनों के बीच का भी समझ नहीं आता:)
      अब दहेज़ लेना पाप है तो है ही, सही कहती हैं आप कि सब अपनी अपनी समझ के हिसाब से ही समझते हैं:)

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    11. चलिए अच्छा है आप ने बता दिया नहीं तो हमें लगा रहा था की आप कांग्रेसी हुए जा रहे है खुद पर विद्वान् होने का दाग लग गया तो दूसरो को भी विद्वान् कह उनका दामन भी दागदार बता रहे है ;)
      @विद्वता पर पंडितों का एकाधिकार हम नहीं मानते,
      हम भी नहीं मानते किन्तु उनमे से ज्यादातर यही मानते है :)

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  17. मेरा मानना है, जब बहस शुरू हो तो पंद्रह मिनट में पता चल जाता है कि बहस हो रही है या बस हो रही है।
    और आपको बहस तभी करनी चाहिए जब आपको अपनी मानी बात में कहीं कोई खोट लगता हो और आप उसे कसौटी पर कसना चाहते हों, खूंटा गाड़ के बहस नहीं होती - उसे जुगाली कहते हैं। :)

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    1. @ खूंटा गाड़ के बहस नहीं होती - उसे जुगाली कहते हैं।
      :)

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    2. अब से जुगाली करती गाय, भैंस, बकरी, बैल, भैसा, बकरा को देखते ही ये बात याद आने वाली है, लगेगा कि बहस या बहस की प्रैक्टिस हो रही है:)



      ------------------------------------------------------------------------------------

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    3. एक बात और - पॉइंट टू बी नोटेड - भैंस के आगे बीन बजाये तो भैंस पगुराते ही रहेगी इसकी गारंटी नहीं है. यहाँ कहावत में मिस्केट हो गैला है. भैंस ने दौड़ा लिया तो? :)

      PS : ये कहावत भैंस और भैंसा दोनों के लिए वैलिड है. इन फैक्ट वैलिड फॉर गाय, भैंस, बकरी, बैल, भैसा, बकरा एंड आल :)

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  18. बधाई कि आपके सामने अमेरिका की एक न चली चाहे इराक के सामने चली हो ईर्ष्या होनी चाहिए महाशक्ति को आपसे :)
    ट्रेन में सफर की तो क्या कहें एक बार मुझे और पापा को अचानक रात को ही किसी काम से दिल्ली के लिए निकलना पड़ा।हमने ट्रेन ही पकड़ने की सोची लेकिन स्टेशन पर जाकर देखा तो वहाँ जबरदस्त भीड़ थी।लोग खिड़की में से ही अपना छोटा मोटा सामान सीट पर पटक रहे थे ताकि बाद में सीट पर ही दावा ठोक सके।किसी तरह डब्बे में घुसे तो देखा एक हरयाणवी बुजुर्ग और एक लडके में बहस हो रही थी लड़का कह रहा था कि मेरी सीट से उठिए यहाँ मैंने पहले ही बोतल रख दी थी।ताऊ ने अपने अंदाज में कहा की रै छौरा मन्नै नू बता तू तो जाके अपणी बोतल परधानमन्तरी की कुर्सी पर रख देगो तो के वा भी तेरी हो जायगी?
    फिर बस उस लडके ने कुछ नही कहा फिर तो ताऊजी ही बोले और दिल्ली तक बोलते रहे उनके किस्सो में न वक्त का पता चला न थकान हुई हालाँकि बहस उस दौरान नहीं हुई क्योंकि वो तो तब हो न जब ताऊ की बात खत्म हो ।जैसे ताऊ की बातों में सफर कट गया अंदाज आपका भी कुछ वैसा है आप अमृतसर की कह ईराक़ अमेरिका ले जाए क्या फर्क पडता है देखिए न हम तो पोस्ट का विषय पर कहना तो भूल ही गए।

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    1. ताऊजी जब बोलने पर आते हैं तो दूसरों की बोलती बंद होनी बनती ही है:)




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  19. इधर भी एक बहस जारी है जयपुर में बाढ़ को लेकर।प्रशासन कहता है कि मीडिया ने बढ़ा चढ़ा कर दिखाया कि बाढ़ के हालात हो गए है जबकि मीडिया पूछ रहा है की पहले ये बताइए कि बाढ़ की परिभाषा क्या होती है यानी अब हालात कैसे सुधरे इस पर नही बल्कि हालात कितने खराब है इस पर बहस होगी सरकार चाहती है हम बातों से ही लोगों को विश्वास में ले लें लेकिन ऐसा नहीं होता है आपको बहस न कर गलती माननी चाहिए ।मेरा मानना है कि इस खुले मंच पर केवल दो बहस करने वाले ही नही बल्कि उन्हें पढ़ने वाले भी उनके विचार जानते है और उन्हें भी अपनी सोच बनाने में मदद मिलती है पर हमेशा बहस की ही जाए ये जरूरी नही यहाँ माहौल थोड़ा अलग है आपने किसीकि बात को एक बार काट दिया या कोई अच्छा जवाब दे दिया तो बहुत संभव है वह आपसे एक व्यक्तिगत खुन्नस रखने लगेगा और जो आप कहेंगे इसका ठीक उल्टा ही कहेगा आपसे बहस में संबोधित न हो तो कहीं और जाकर भले ही उसकी मूल मानसिकता आपसे ही क्यों न मिलती हो इसीलिए मुझे लगता है दूसरों के विचार बदलने की उम्मीद रखने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि वह तो अपने वास्तविक जीवन में आपके ही विचारों वाला/वाली है लेकिन यहाँ आपके विपरीत मत रखना उसकी जिद है।

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    1. इन मीडिया की बहसों की तो मत पूछो भाया, बहुत बार तो कोफ़्त होती है| विषय थोड़ा बदल जाएगा, विस्तार में फिर कभी पोस्ट में ही लिखूंगा लेकिन बहुत बार तो देश की आतंरिक सुरक्षा को लेकर भी इतने हलके तरीके से रिपोर्टिंग होती है कि खीझ होने लगती है| सांप निकलने के बाद लकीर पीटना, तिल का ताड़ बनाना जैसे कई मुहावरों का मतलब इन बहसों से ज्यादा प्रैक्टिकल तरीकों से समझ आया है| यहाँ भी ऐसा ही है, लेकिन सब जगह और हमेशा नहीं, बीच बीच में अच्छे विचारमंथन भी होते रहते हैं| हिन्दी ब्लोगिंग है तो अभी शैशवावस्था में ही न| व्यक्तिगत खुन्नस और असहमतियों वाले बात से सहमत हूँ, मैं भी यही मानता हूँ कि पर्सनल अजेंडे सर्वोच्च प्राथमिकता वाला क्षेत्र हैं |

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  20. वैसे ऊपर वाली बात हर जगह लागू ही हो जरूरी नहीं आपकी पोस्ट से पाठकों ने ये कैसे पता लगाया कि इसका संबंध दूसरी किसी पोस्ट से है पता नहीं पर बहस की जहाँ तक बात है इस पर केवल सामने वाले का ही नहीं बल्कि माहौल का भी असर होता है तभी बहस का मिजाज उसके निष्कर्ष अलग अलग होते है ट्रेन या बस में अलग तरह की बहस दोस्तों के बीच अलग घर पर अलग पनवाडी के तो सबसे ही अलग और नेट पर अलग यहाँ तक कि नेट पर भी ब्लॉग पर और सोशल साईटो पर अलग अलग तरह की बहस होती है यहाँ का माहौल ही ऐसा है कि बहुत से लोग सार्थक बहस चाहकर भी नही कर पाते सामाजिक नेटवर्क साईटो का तो हाल और बुरा है वहाँ व्यक्ति किसी भी तरह खुद को चर्चा में बनाए रखना चाहता है अब तस्लीमा को ही देख लीजिए साहित्य और लेखन में उन्होंने कितना कुछ सार्थक लिखा है पर यहाँ आते ही पता नहीं उन्हें क्या हो गया है ऐसा लगता है कि उन्हें बेसिर पैर की बहस खडी करने में भी अब आनंद आने लगा है ।

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    1. कुछ समय तक पढ़ते रहने से हम सब एक दुसरे की पसंद, नापसंद, सोच, सर्किल वगैरह के बारे में जानने लगते हैं| कई बार तो कोई पोस्ट या कमेन्ट पढ़ते ही अंदाजा भी लग जाता है कि 'फिर कुरुक्षेत्री समर की भूमिका सजने लगी' :)
      अपनी दौड़ तो भाया हिन्दी ब्लोग्स तक ही, वो भी बहुत सीमित ब्लोग्स तक की है| अपन तो इसी कुंए के मेंढक हैं| दूसरी सोशल साईट्स पर एकाऊंट हैं जरूर, लेकिन जाना तभी होता है जब कुछ सनसनीखेज हुआ, ऐसा कहीं से पता चल जाए|

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  21. [जनसेवा के उद्देश्य से ...] कितनी ही बार सोचा है कि इस ब्लॉग की पॉपुलरिटी के राज़ क्या-क्या हैं! एक तो आज पकड़ में आ गया - उर्दू सर्विस के "तब्सरे" के इधर-उधर फ़रमाइशी गीत बुनने की कला या फिर आत्मकथा में बोधकथा और बोधकथा में आत्मकथा की खूबसूरत जुगलबन्दी!

    @ अमेरिका ने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी कि ये संजय कुमार बेरोजगार रह जाए
    - कोशिश तो हमारे साथ भी यही की थी लेकिन बाद में पता लगा कि इस अमेरिकी साज़िश में भी एक जनतंत्र का दूसरे जनतंत्र से गहरा प्यार छिपा था।

    @ समय बिताने का सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ शगल ये है कि किसी भी और हर किसी मुद्दे पर बहस छेड़ दी जाए, वही हुआ|
    - समय बिताने और सीट पाने के लिये?

    @ लेकिन कोई न कोई हारता जरूर है और कभी कभी दोनों भी हार जाते हैं|
    - हार गये तो क्या कहना, जीते भी तो बाज़ी हाथ नहीं! :(

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    1. [ चेतावनी लिखना रह गया है शायद :-) ] जुगलबंदी कुछ नहीं है जी, 'मैं-मैं ही' या 'मैं ही मैं' भी कह सकते हैं, आत्ममुग्धता भी कह सकते हैं दूसरों से पंगा न लेने की अतिशय सावधानी भी कह सकते हैं| बोले तो विकल्प ढेरों हैं :) शेष तो आप लोगों की जर्रानवाजी है|
      विश्व के दो बड़े जनतंत्रों का एक दूसरे से प्रभावित होना बिलकुल हैरानी की बात नहीं, एक दूसरे की अच्छाईयों को आत्मसात कर पायें तो इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता|
      SST फार्मूला वहां तो टाईमपास का ही था, गेट के पास सीट का झगड़ा ही नहीं|
      एल्लोजी, फिर नहले पर दहला मार दिया आपने,
      - किस धज से कोई मकतल में गया, वो शान सलामत रहती है,
      ये जान तो आनी-जानी है, इस जान की कोई 'मात' नहीं :-)

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    2. :) इसे कहते हैं टेलीवार्ता (या टेलीपैथी?)

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    3. अनुराग जी,
      सच में!! ख्याति का मुख्य कारण 'बतियाती बोध कथा' ही है। :)

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  22. टिप्पणियाँ स्पैम में चली गई दिखती हैं
    पर ये शायद नहीं जाएगी ।

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  23. समझ में ज्यादा आया नहीं, क्योंकि background ज्यादा पता नहीं | और न ही जानने की उत्सुकता है |

    इस आभासी दुनिया में कब कहाँ विचार विमर्श चल रहा है. और कब शब्दों की बंदूकें गरज रही हैं समझ में नहीं आता | कभी लगता है यहाँ आना ही शायद एक ग़लती थी, तो कभी लगता है की यहाँ आकर जो मित्रताएं हुईं , they were worth the headaches ....

    आभार | ( अच्छी पोस्ट इसलिए नहीं लिख रही की परिदृश्य के बारे में जानकारी नहीं है | )

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    1. हर चीज हर एक के लिए हर बार जानना जरूरी भी नहीं, sometines Ignorance is bliss.
      जहां गलती लगे वहां सबक सीखा जाए, worth headaches लगे तो stay को एन्जॉय किया जाए|
      आभार स्वीकार करें:)

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  24. अए ज़ौक किसको चश्म-ए-हिकारत से देखिये,
    सब हमसे हैं ज़ियादा, कोई हमसे कम नहीं|

    सन्दर्भ कुछ भी हो लेकिन बातों को आपने जिस अंदाज़ में कहा मज़ा आ गया .

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    1. वैसे एक पोस्ट 'मजे' पर भी लिखी थी कभी, लिंक दे दूंगा तो आप लोग टोकेंगे कि खुद ही लिंक देने से मना करता हूँ| मजा भी मर्जी का गुलाम है, अब आ गया है तो इसका आनंद लीजिये :)

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  25. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  26. .
    .
    .
    कहावत है न, "जहाँ भी चार बर्तन होंगे तो खड़केंगे ही"

    फिर यहाँ पर तो मामला इंसानों का है... बोलेंगे, बतियायेंगे, गपियायेंगे, ज्ञान पेलेंगे, शेखी बघारेंगे, ठंडा होंगे, गर्मायेंगे.. तो कहीं न कहीं कोई खुश होगा तो कोई ऑफेंड होगा... कोई किसी दूसरे के ऑफेंड होने से खुश होगा तो कोई किसी दूसरे के खुश होने से ऑफेंड भी... इसी सब से बहस पैदा होती है... रहा सवाल निष्कर्षों का, तो वह तो हमेशा बहस शुरू होने से पहले ही निकाल लिये जाते हैं... बहस तो विपरीत निष्कर्ष वाले को पटखनी देने के लिये की जाती है... अपना तो फंडा है जब मूड कुछ जोर आजमाईश करने, नया दाँव आजमाने का हो... तो उतर जाओ अखाड़े में... वरना किनारे से देखो... इस अखाड़े मे कोई हारता नहीं है... हरेक को संतुष्टि रहती है सामने वाले को एकाध पटखनी देने की... होती रहने चाहियें बहसें... ब्लॉगवुड की रौनक इन्हीं से बनी रहती है और मस्ती भी...

    मस्त रहो यार !



    ...

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    1. यार मस्त हैं प्रवीण भाई, कभी रोते बिसूरते दिखें तो समझिएगा आईडी हैक हो चुकी है यारों की :)
      अपने साथ मूड से बड़ी समस्या(बहाना) समय है, इसलिए किनारे बैठकर देखना पसंद करते हैं|

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  27. @तेरी बात सही है लेकिन तेरी सही बात को ही आगे बढायें तो असली हिम्मत तो बमों की है जो मैदान में फट रहे थे।

    बहस जिताउ तर्क है ! सरदार जी का जवाब नहीं !

    ‘बहसते-बहसते‘ में भाषा का नव-सौंदर्य दिखा !

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  28. पोस्ट है या टाइम बम! सही समय पर फूट ही जाता है!:)

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    1. उपला बम हो गया ये तो, सुलग सुलग कर फट रहा है :)

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    2. :-) उपला बम ! बहुत दिनों बाद नाम सुना..

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    3. Respected अर्चना जी, यानी कि उपला बम पहले सुन रखा था आपने? मैं मूढ़ खुद को इसका ईजादकार मान रहा था :(

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  29. पोस्‍ट के अन्‍त तक तो आपने भी एम्‍पायरिंग की ही दी। सही है हम भी बहस से डरते हैं और सभी पोस्‍टस का अन्तिम सच भी आना चाहिए।

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    1. एम्पायरिंग तो नहीं, कमेंट्री कह सकते हैं :)

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  30. संजय जी ,
    पोस्ट आपकी बिल्कुल स्मूथ थी मगर इसमें भी दरकचें डाल दी गयीं .टिप्पणियों के साथ यह खुरदुरी हो गयी है ..कुछ लोगों को मैं बिल्कुल तवज्जो नहीं देता खास कर वे लोग जो अपने परिचय के नाम पर पूरा एक विज्ञापन नामा डाले रहते हैं -हू केयर्स.. !मेरा तो परिचय भी बहुत शर्मीला है -क्या कहूं जो अब तक नहीं कही .... :-) आप भी उत्साही लोगों से उत्साहित होते दिख रहे हैं :-) आत्म दीपो भव :-) बनारसी पंडित हूँ तो श्लोक बात बात पर आएगा ही -......अपुन करे भी तो क्या संस्कार ही ऐसे हैं ....
    कहते हैं तो मुस्टंडों में जब हंसी मजाक चल रहा हो तो बीच में नहीं आना चाहिए मगर लोगों को न जाने क्यों कल्लाता है!
    बनारस के पंडित जैसे भी हों आज भी उनके श्रद्धावनत हुआ जाता है -यह अपनी अपनी श्रद्धा की बात है -इतना जरुर कह सकता हूँ जब अपना मन विकार ग्रस्त होता है ,दिल कलुषित रहता है तो हम दुनिया को भी वैसे देख पाते हैं -कुछ लोगों के साथ मेरी गहरी संवेदना है -ईश्वर उन्हें निश्चित ही सदगति देगा ....

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    1. मिसिर जी,
      स्मूथनेस जाए तो जाए, कुछ अपूर्णता भी तो गई| यूं भी अपन कौन सा चिकना चमेला बने रहना चाहते हैं:)
      आपकी इस बात "जब अपना मन विकार ग्रस्त होता है ,दिल कलुषित रहता है तो हम दुनिया को भी वैसे देख पाते हैं " से असहमत होने का सवाल ही नहीं|

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    2. प्राचीन काल से ही लोग धर्म पर बहसियाने काशी जाया करते थे, और करवत लेने भी :)

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    3. आदरणीय सुज्ञ जी, ध्यान आया कि इसी मिथक को तोड़ने के लिए कबीर मगहर चले गए थे|

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  31. उत्तर
    1. बन्धु, पूनम के चाँद की तरह झलक दिखलाकर गायब हो जाते हो, हमें भी 'जय हो' करने का अवसर मिलना चाहिए|

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    2. पाण्डेय जी की टिप्पणी पढ़ते ही मैं उनके ब्लॉग पर जा कर देखता हूँ की शायद कोई नयी पोस्ट हो

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    3. पाण्डेय जी इस वक्त विचारों को शून्य में झोंकते चले जा रहे हैं। यह बात ठीक नहीं है।:)

      हटाएं

  32. थ्योरी में तो हमारे पिताजी भी कई बार समझा चुके कि बेटा बहस में कोई न कोई जीतेगा ही, ये जरूरी नहीं लेकिन कोई न कोई हारता जरूर है और कभी कभी दोनों भी हार जाते हैं| कभी हमें भी बहुत शौक चढ़ा था अपना ज्ञान झाड़ने का फिर अपने साथ एक दो वाकये ऐसे हुए कि हम बहस करना भूल गए| समझ गए कि हम बहस करने के लिए नहीं बने, ईश्वर सबको सब गुण नहीं देता| इसका ये मतलब भी नहीं कि बहस विमर्श करते लोगों को किसी तरह से कमतर समझ लिया जाए, इन लोगों में बदलाव की इच्छा तो है| कम से कम इन्होने दुष्यंत जी को पढ़ा तो है 'आग जला तो रखी है' that is great. .इस देश को स्सारी वोटिस्तान को चलाने के लिए पांडव चाहिए ,संसदीय द्रौपदी का चीरहरण करने वाले कौरव नहीं .वो देखा है उसको कैसे संसद में बैठके हुश हुश करती है .
    हमारे एक दोस्त मुल्तान से आये वोटिस्तान बनने के बाद ,बतातें हैं वहां गाँव के मुखिया खान होते थे (सरपंच ).जिनका दबदबा रहता था .ये लोग कुत्ते पालते थे .लोग शिकायत लेकर आते थे .खान साहब जिसे पसंद नहीं करते थे उसे देख धीरे से अपने कुत्तों को हुश हुश ...कर देते थे ,कुत्ते भौंकते थे ,वह व्यक्ति भाग खड़ा होता था ,ये कोपभवानी (कोप कैकई )संसद में बैठी सिर्फ हुश हुश करती है बस स्वान भडक जातें हैं नस्ली ,हमारे ब्लोगिये भी यही कर रहें हैं हुश हुश हुश .....परिणाम क्या निकलना है इस बहस का भौं भौं सुन सब भाग जातें हैं .
    बढिया व्यंग्य लायें हैं आप संस्मरण के झरोखे से .
    Hip ,Sacroiliac Leg Problems
    Hip ,Sacroiliac Leg Problems

    आजमाए हुए रसोई घर के नुसखे


    बूँद समाना समुंद में...शेखर जेमिनी

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    उत्तर
    1. आदरणीय वीरू भाई,
      हुश हुश की भी 'जय हो' :)

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  33. अब तो इस सरकार की नानी बदल दो ,
    गोटिया सब मात अब खाने लगें हैं .

    बुधवार, 29 अगस्त 2012
    मिलिए डॉ .क्रैनबरी से
    मिलिए डॉ .क्रैनबरी से

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  34. आपकी प्रस्तुति रोचक है.
    बहस में जल्पना और वितण्डा से बचना चाहिये.

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    उत्तर
    1. आदरणीय राकेश साहब, जल्पना और वितण्डा जैसी चीजें हमें तो पढने तक ही याद रहती हैं इसलिए बहस वगैरह में खुद को अक्षम मानने में ही समझदारी है जैसे सर्फ़ की खरीदारी में समझदारी वाला एक विज्ञापन आता था | याद दिलाने के लिए, पधारने के लिए आभार|

      हटाएं
  35. संजय जी, कोई निष्कर्ष निकल आया तो फिर वो बहस कहाँ रह जाएगी... :)

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    उत्तर
    1. आदरणीय लोकेन्द्र जी, आशा तो कर ही सकते हैं न सो करते हैं|

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  36. किन्हीं...किन्हीं ..किन्हीं..सूत्रों से पता चला कि यहाँ टिप्पणियों में दो बार मेरा नाम लिया गया है...एक बार 'रश्मि' और एक बार 'कोई रश्मि '

    मुझे कोई आपत्ति नहीं...अगर इस कार्टून में मैं भी हूँ,फिर भी..अब बहस तो हमेशा से मेरे ब्लॉग पर होती आई है...कई बार दूसरे ब्लॉग पर भी सामान्य सा एक कमेन्ट कर के आती हूँ..और पता चलता है बहस शुरू हो गयी. अब ना तो कमेन्ट सायास होते हैं...ना पोस्ट..{वरना हर पोस्ट ऐसी ही लिखूं...जिसे सबलोग पढ़ें और गहरा विमर्श हो :)}

    पर इस कार्टून में तो वे लोग झगड़ा करते दिख रहे हैं...बहस/विमर्श और झगड़े में अंतर होता है,...नहीं?? :)

    अब शतक के करीब टिप्पणियाँ पहुँच चुकी हैं...मेरे बोलने को क्या बचा है...पर अंशुमाला की टिप्पणी से शत- प्रतिशत सहमत.

    "बिना बहस के कभी भी आप अपनी बातो के लिए वो तर्क नहीं ढूंढ़ पाएंगे जो आप बहस करते हुए कर लेते है बड़ी आसानी से , ये तो लोगो की गलत फहमी है जो ये सोचते है की एक दूसरे के विचारो को जानने के लिए बहस की जाती है "

    ऐसा हमारे साथ कई बार हो चुका है. बेनामी जी के इस ब्लॉग पर लम्बी बहस हुई थी..ब्लॉगजगत के कई दिग्गजों ने अपनी बात रखी थी. और मुझे वहाँ लोगों के तर्क का उत्तर देते हुए ये आभास हुआ कि मैं विवाह संस्था की इतनी बड़ी पक्षधर हूँ.
    विवाह संस्था को अवैध घोषित किया जाए या मान्यता ना दी जाए


    हाल में ही मेरे ये कहने पर कि सह-शिक्षा से लड़के/लड़कियों के बीच का संकोच कम होता है..और लड़के, लड़कियों को अजूबा नहीं समझते लोगो ने आपत्ति की कि हम भी सहशिक्षा में पढ़े हैं...हम तो अब भी संकोची हैं. अब इस कथन ने सोचने को मजबूर कर दिया और यह बात निकल कर आई कि पहले सह-शिक्षा नाम भर की होती थी..आपस में interaction होता ही नहीं था...संकोच कहाँ से टूटता .

    बहस हमेशा अपने ही विचारों पर मनन करने को उस पर गहराई से सोचने को प्रेरित करती है.
    अब जो तटस्थ रहते हैं..वे ये क्यूँ सोचते हैं कि उन्हें कोई निष्कर्ष निकाल कर थमाएगा.
    विमर्श में भाग लेने वालों की सोच में clarity आती है...हाँ, ये हो सकता है...तटस्थ रहने वाले ज्यादा समझदार हों..उनकी सोच पहले से ही बहुत गहरी हो...पर फिर उन्हें तो किसी निष्कर्ष की अपेक्षा या जरूरत ही क्यूँ??

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    1. Respeacted Rashmi ji,

      उन किन्हीं ...किन्हीं...किन्हीं सूत्रों तक मेरा धन्यवाद पहुंचाने की कृपा कीजिएगा| लेकिन ऐसे कैसे आप 'कोई आपत्ति नहीं' कह सकती हैं? आपका और दूसरों का अपमान करने के लिए ही तो मैंने ये सब किया था और आप ही 'मुझे कोई आपत्ति नहीं' कह कर निकल ली| ऐसा थोड़े ही होता है:)

      अंशुमाला जी, आप, किन्हीं... सूत्र...... गरज ये कि आप सब से शत-प्रतिशत सहमत हूँ, जैसा आपको उचित लगे वैसा ही सोचिये| आपने कोई कैफियत माँगी ही नहीं, इसलिए मैं सफाई देने से बच गया:)

      आपके प्रश्न के जवाब में जरूर कहना चाहूंगा कि जहां विद्वान, विदूषियों द्वारा चर्चा हो रही हो तो आम जन भी उधर आशा भरी नजरों से देखता ही है| अगर सभी विद्वजन ऐसा सोचते कि जो विमर्श में सक्रिय भागीदारी नहीं करते, unhen लाभान्वित होने का कोई अधिकार नहीं तो फिर चाणक्य, अरस्तू, सुकरात, प्लूटो, कन्फ्यूशियस, दयानंद, विवेकानंद, मार्क्स जैसों की विचारधाराएँ हम तक कैसे पहुँचती?

      एक धन्यवाद आपका और बनता है 'तटस्थ' लेबल देने के लिए, धन्यवाद| निष्कर्ष की जानकारी बहस वाली जगह पर ही देने का सुझाव या अनुरोध था न कि कोई आर्डर, और बाध्यता आदेश की हो सकती है सुझाव या अनुरोध की नहीं|


      ज्यादा समझदार, गहरी सोच - मुझे भी आपके इस कटाक्ष पर कोई आपत्ति नहीं है :)

      हटाएं

    2. @ज्यादा समझदार, गहरी सोच - मुझे भी आपके इस कटाक्ष पर कोई आपत्ति नहीं है :)

      अब आप जब इतने उदार हैं तो हम भी अनुसरण कर लेते हैं... विद्वान, विदूषियों ,चाणक्य, अरस्तू, सुकरात, प्लूटो, कन्फ्यूशियस, दयानंद, विवेकानंद, मार्क्स का उदाहरण देकर कटाक्ष करने पर कोई आपत्ति नहीं .

      बस यही सोच रहे हैं आपका कटाक्ष हमारे कटाक्ष (आपको ऐसा लगा ) से गहरा कैसे ??(तेरी साड़ी,मेरी साड़ी से सफ़ेद कैसे के तर्ज पर...पुराना विज्ञापन कहीं लोग भूल ना गए हों ,इसलिए जिक्र कर दिया )

      @ 'तटस्थ' लेबल देने के लिए, धन्यवाद|

      आपने खुद अपने बारे में निम्न वाक्य कहे हैं...फिर मुझे धन्यवाद कैसा...वो आप खुद को ही दे लीजिये.

      "समझ गए कि हम बहस करने के लिए नहीं बने,"
      "हम भी बऊंसर्स को डक्क करते हैं जी|"
      " इसलिए किनारे बैठकर देखना पसंद करते हैं|"

      और आपने सिर्फ अकेली मुझी को Respected Rashmi Ravija ji, कह कर संबोधित किया (मुझे स्क्रोल कर के बाकी लोगों को दिए गए आपके प्रत्युत्तर देखने पड़े. ) अब इसके पीछे की वजह समझ नहीं आ रही .

      बस कटाक्ष करने में आप कई अंकों से बहुत आगे निकल गए :( :(
      (अब ये टिप्पणी भी स्पैम में ना चली जाए )

      हटाएं
    3. विज्ञापन याद दिलाने के लिए शुक्रिया धन्यवाद.
      तटस्थता वाले मेरे ही धन्यवाद के लिए आभार|
      सिर्फ आपको respected संबोधित करने के पीछे कोई बहुत बड़ी वजह नहीं थी| न तो पोस्ट लिखते समय और न ही चित्र लगाते समय किसी पर कोई व्यक्तिगत कटाक्ष का उद्देश्य था, लेकिन पहले रचना जी और फिर आप ने इसमें खुद को फ्रेम कर लिया| मैं ये मान लेता हूँ कि मेरे ऐसा लिखने में कोई कमी रही होगी, इसलिए अब से सोचा था कि सबको respected लिखा करूंगा, लेकिन लगता है ये भी निरापद नहीं:)

      मैं आगे निकलने वालों में होता तो हर जगह सक्रिय रूप से भाग ले रहा होता, इसलिए ये आरोप खारिज किया जाए:)

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  37. मेरी टिप्पणी स्पैम में गयी....
    अब ये वाली भी ना स्पैम हो जाए :(

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    उत्तर
    1. ये वाली स्पैम में नहीं गयी| ऊपर राजन के साथ भी ऐसा ही हुआ था, भले आदमी ने तीन कमेन्ट किये और तीनों स्पैम में गए और चौथे में स्पैम का जिक्र किया तो वो बच गई| सबक ये कि स्पैम से बचने के लिए स्पैम का जिक्र करना प्रायः लाभदायक, मंगलकारी रहता है:)

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    2. पाण्डेय जी की टिप्पणी पढ़ते ही मैं उनके ब्लॉग पर जा कर देखता हूँ की शायद कोई नयी पोस्ट हो

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    3. ये टिप्पणी गलती से यहाँ आ गयी..... क्षमा

      हटाएं
    4. आदरणीय गौरव जी,
      पाण्डेय जी से हम भी यही आव्हान और अपेक्षा करते हैं लेकिन शायद हमारी मांग पर्याप्त नहीं है| मन होने पर ही बरसने वाले बादल हैं, इच्छा होने पर ही बरसेंगे| क्षमा की अच्छी कही यार, रहने दो छोडो भी जाने दो यार :)

      हटाएं
    5. पाण्डेय जी, दीप है। जब अंधेरा छाएगा प्रकट होंगे :)
      अभी तो वे स्वयं चन्द्रकला से प्रकाशित है :)

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  38. इस तरह की बहसों में भाग लेने वालों की दाद देता हूं

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    उत्तर
    1. आदरणीय काजल भाई, मैं भी तो दाद ही देना चाहता हूँ\ था लेकिन मेरे साथ तो फ़िल्मी गाने चरितार्थ हो जाते हैं, 'जाना था जापान पहुँच गए चीन' :)

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  39. साब हमसे जियादा हैं,कोई हमसे कम नहीं.

    उत्तर देंहटाएं
  40. इतनी टिप्पणियाँ पढ़ डालीं कि पोस्ट भूल गई. अरे हाँ, बमों की हिम्मत की दाद ही देनी होगी.
    घुघूतीबासूती

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  41. कई सारे कमेंट पढ़ना संभव नहीं हो पाया..जहां तक निष्कर्ष की बात है तो जी हम तो सरदार जी की बात से पूरी तरह सहमत हैं। सारी हिम्मत तो जी बमां दी है..जे उत्थे फट रहे सी। हुण तक लेकिन ये पता नहीं चल पाया है जी कि गिरने वाले बम देख-देख कर कूद रहे थे या बिना देखे....।
    वैसे भी जी निष्कर्ष के लिए बहस नहीं होती....बहस बड्डे काम की चीज है...इसमें निषकर्ष के पीछे न पड़कर देखा जाए तो बहस से किसी बात के अनेक पक्ष देखने को मिलते हैं। क्य़ों ठीक कहा न जी..।

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  42. 1. आपके पिताजी सही कहते हैं - बहस में हारता जरूर है कोई, और दोनो भी।
    2. आपने प्रतुत्तर सुविधा का बहुत बढ़िया प्रयोग किया है टिप्पणी-संवाद में।

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