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गुरुवार, फ़रवरी 21, 2013

धुंधली सी धुंध.....कहानी.(समापन)

हाथ पर और घुटने पर लगी खरोंचों को देखकर कहने लगे, "पुत्तर, बचाव हो गया। केहड़े पिंड जाना है?" अब आगे.....................
 
मैंने बताया तो पूछने लगे कि किसका लड़का हूँ? मैंने  बताया, "बापूजी, मैं यहाँ का रहने वाला तो हूँ नहीं। नौकरी के सिलसिले में यहाँ रहता हूँ, मेरे परिवार को आप नहीं जानते।"  बारिश रुक चुकी थी लेकिन गीली सड़क पर कुछ देर पड़ा रहा था, गीले कपड़ों के कारण ही शायद सिहरन सी लग रही थी। मैंने उनसे पूछा कि वो इस समय  सड़क पर क्या कर रहे थे? हँसकर बताने लगे, "कुछ बंदों के साथ हरमंदिर साहब के दर्शनों के लिये गया था, लौटने में देर हो गई। बाकी सब शहर के थे,  मुझे पिछले मोड़ पर उतारकर गाड़ी से वापिस चले गये थे। थोड़ा सा आगे आकर देखा तो सड़क के बीच में मोटर साईकिल गिरी पड़ी थी, परमात्मा का शुक्र है कि तुम्हें ज्यादा नहीं लगी।" 

मैंने टाईम देखा, शहर से चले हुये  लगभग दो घंटे हो चुके थे। तो क्या मैं इतनी देर तक सड़क पर..? बूँदाबादी फ़िर होने लगी थी और साथ साथ मेरी आँखों के आगे फ़िर वही धुंध। चोट तो ज्यादा लगी नहीं तो क्या थकान के कारण ही मुझे पता नहीं चला..?

सरदारजी ने सहारा देकर मुझे खड़ा किया। आमने सामने खड़े हुये तो मैंने पहली बार उनकी तरफ़ गौर से देखा।  सफ़ेद कुर्ता पायजामा, मजबूत कद काठी के साथ स्नेह बरसाता निश्छल चेहरा। मोटरसाईकिल दो तीन किक खाने के बाद स्टार्ट हो गई, मैंने कहा कि उनको छोड़ दूँगा तो उन्होंने हाथ से इशारा करते हुये कहा कि उनका घर तो ये सामने है। मैंने उधर देखा तो पेड़ों के पीछे सड़क से थोड़ा हटकर बना हुआ एक  दोमंजिला पक्का मकान दिखाई दिया। हैरानी की बात ये है कि अब भी बूँदाबांदी, हवा और चांदनी वही टिपिकल पहाड़ों जैसी धुंध का सा आभास दे रहे थे। पेड़ों के पीछे, एक अकेला मकान, बहती हुई सरकती हुई सी धुंध की चादर एक अजीब सा नशीला सा माहौल बना रहे थे। सरदारजी ने मेरे सिर पर हाथ फ़ेरा और जेब में हाथ डालकर कुछ फ़ूल बाहर निकाले। जरूर गुरुद्वारे से प्रशाद के साथ मिले होंगे।एक फ़ूल मेरी तरफ़ बढ़ाया, दोनों हाथ से मैंने गुरुघर का प्रशाद स्वीकार किया, माथे से लगाकर जेब में रख लिया। बुजुर्गवार ने मेरी  पीठ थपथपाई, बोले, "पुत्तर, ध्यान से जाना।"

मैं चल दिया था। दिमाग खाली नहीं रहता है, सोचने लगा कि सरदारजी टाईम पर न आते तो शायद मैं सारी रात वहीं सड़क पर पड़ा रहता। लेकिन एक बात है, सरदारजी निकले बड़े कोरे, एक बार झूठे से भी नहीं कहा कि बेटा, चोट लगी है और अब भी बारिश हो रही है, रात यहीं रुक जा। सामने ही तो था उनका मकान। मैं कौन सा रुकने वाला था? इन्हीं बातों को सोचता विचारता मैं कब कमरे पर पहुँचा, कब सोया - कुछ ध्यान नहीं।
बग्गा सुड़क सुड़क कर अपनी चाय पी रहा था और मेरी बात सुन रहा था। मेरे शरीर में अब भी ओफ़िस जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी, अकड़न-जकड़न ने शरीर पर कब्जा कर रखा था। मैंने बग्गे से कहा कि आज मैं आराम करूँगा, शाम तक सब ठीक हो जायेगा।  अब उसने भी खरोंचों का मुआयना किया और ज्यादा चोट न लगने की बात पर शुक्र मनाया। पूछने लगा कि कौन सी जगह पर मोटर साईकिल स्लिप हुई थी? अब गाँव-खेड़ों की सड़कों पर क्या साईनबोर्ड लगे होते हैं, अंदाजे से उसे लोकेशन बताई। सोचकर कहता है, "है तो नेड़े ही(पास ही है)।" फ़िर जैसे कुछ याद आ गया हो, एकदम से कहने लगा, "चल्लो जी, घर अकेले रहोगे इससे अच्छा है दफ़्तर चलो। वहाँ पीछे सोफ़े पर लेट जाना। टाईम पास हो जायेगा थोड़ा आपका भी।" बस इस टाईप के बंदों की यही आदत है, दबाकर रखो तो कुछ नहीं बोलेंगे और जरा सी छूट दे तो सिर पर हावी होने लगेंगे। मेरे बार बार मना करने के बाद भी जैसे जबरदस्ती ही मुझे कमरे से ओफ़िस ले जाकर ही माना। और तो और पिछले दिन के कपड़े भी लपेटकर ले गया कि घर से धुलवाकर दे जायेगा।

फ़िर ओफ़िस में जाकर सब वही कुछ  पूछ्ते रहे, मैं जितना याद था वो बताता रहा। दफ़्तरों में स्टाफ़ कम हो या ज्यादा हो, अनौपचारिक ग्रुप जरूर बने रहते हैं। बग्गा अपने ग्रुप में बैठा था और धीरे धीरे अपने ग्रुप वालों के साथ गुटर-गूँ कर रहा था। शाम को बॉस कुछ जल्दी निकल गये,  हम भी निकलने की तैयारी कर रहे थे कि बग्गा पार्टी ने आकर बीती रात की घटनाओं के बारे में  फ़िर से सवाल जवाब शुरू कर दिये। उससे पिछली रात कितनी देर सोया था से शुरू हुये सवाल खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। 

अब मुझे खीझ होने लगी थी, "मोटर साईकिल स्लिप होना कौन सी इतनी बड़ी बात हो गई जिसपे कमेटी बैठाओगे? ठीक है यार, मैंने पी रखी थी। चढ़ गई, हजम नहीं हुई इसलिये गिर गया होऊंगा। खुश हो?"

"नईं साबजी, गुस्सा न करो। ये सब हम नहीं कह रहे हैं।"

"फ़िर, क्या कह रहे हो? मैंने झूठमूठ ये ड्रामा किया है?"

सारे चुप। एक बोला, "साबजी, जिस जगह अपकी मोटर साईकिल गिरी थी, वहाँ एक मकान है जरूर लेकिन उस मकान में कई साल से कोई नहीं रहता।"

"वो बाबा तो वही मकान बता रहा था अपना। अब मैंने कौन सा रजिस्ट्री करानी थी उस मकान की जो कागज पत्तर चैक करता? झूठ बोल रहा होगा, खैर हमें क्या लेना देना। खत्म करो ये सब, मुझे वैसे भी आधा अधूरा सा ही ध्यान है वो सब।"

फ़िर भी सब खड़े रहे। सुखदर्शन, जो उन सबमें उम्र में सबसे बड़ा था और मुझपर बहुत स्नेह रखता था, धीरे से बोला, "साबजी, उस मकान में एक बूढ़ा अकेला रहता था। बच्चे उसके बाहर मुल्क में सैट हो गये थे। कई साल पहले एक बार वो बूढ़ा अपने कुछ संगियों के साथ स्वर्ण मंदिर के दर्शन करने अमृतसर गया था। वापिसी में उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया था और वो बेचारा मौके पर ही..।"

कुछ सीन मुझे दिख रहे थे, कुछ धुंध के पीछे छुप जाते थे। हो सकता है ये बात पहले भी सुन रखी हो, संयोगवश उसी मकान के पास एक्सीडेंट हुआ था तो अवचेतन में से निकलकर  कोई कहानी बन गई हो। खाली दिमाग वैसे भी शैतान का घर होता है। आज बाहर बारिश नहीं हो रही थी लेकिन मेरे दिमाग में जरूर बिजलियाँ चमक रही थीं। क्या-क्या ख्वाब देख लेते हैं हम? और फ़िर उन्हें सही ठहराने के कितने बहाने भी, हद है यार।  जमाना कहाँ से कहाँ पहुँच गया और अपना दिमाग अब भी वही सदियों पुराना।

कुछ काम करने लगूँ तो इस गोरखधंधे से छुटकारा मिले।  घर आकर भूख न होने पर भी खाना बनाने की तैयारी में जुट गया। खूब सारा खाना बनाना है आज, सोच लिया। अकेले बैठकर कैंडललाईट डिनर होगा, और सच में कुछ देर में ही सब भूल गया। क्या हुआ था, कब हुआ था, कैसे हुआ था - सब भूल गया।

सोने की तैयारी कर रहा था कि बग्गे ने आवाज लगाई, "साब, कपड़े ल्याया हूँ।"

"शाबाश शेर। इतनी जल्दी? धुलवा भी लाया और प्रैस भी करवा लाया, वैरी गुड।"

"आहो जी। तबियत ठीक है न हुण?"

"चकाचक। चल जा अब, रात बहुत हो गई।"

"हाँ जी, चलता हूँ। याद आया, कमीज की जेब में से ये फ़ूल निकला था।" 
 
उसकी हथेली पर रखा हुआ गुलाब का सूखा फ़ूल मुझे दिखता था, फ़िर धुंध की चादर आ जाती थी, फ़िर दिखता था, फ़िर धुंध.......।
 
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सोमवार, जनवरी 31, 2011

इंतज़ार.......समापन कड़ी



ऑफ़िस में आज सारा दिन सुबीर का मन उखड़ा-उखड़ा सा रहा। रह रह कर आँखों के सामने एक चेहरा नाच उठता था, एक अजीब सा अहसास छोड़ जाता हर झलक में, एक अनूठी महक। पता नहीं क्या हाल होगा शुभ्रा का? आराम आया कि नहीं? आज वैसे भी ऑफ़िस पतझड़ के बगीचे सा लग रहा था, करवाचौथ का दिन जो ठहरा। महिला सहकर्मी कोई भी नहीं थी, और पुरुष कर्मचारी आज मौके का पूरा फ़ायदा उठा रहे थे। सुबीर हमेशा की तरह वहाँ होकर भी नहीं था, लेकिन आज तो जैसे उसे खुद भी अपने होने न होने का फ़र्क नहीं मालूम चल रहा था। दोपहर में उसने शुभ्रा के घर फ़ोन किया, आंटी ने बताया कि सो रही है। सुबह से बिस्तर पर पड़ी है,  दवा तक नहीं ली। बुखार तो नहीं है, लेकिन कमजोरी बहुत है। सुबीर ने कहा कि ऑफ़िस से लौटते समय मिलकर ही जायेगा।

सुबीर शाम को समय से ही ऑफ़िस से निकल लिया था। शुभ्रा अपने कमरे की खिड़की के पास कुर्सी पर बैठी थी, देख रही थी बाहर क्यारियों की तरफ़।  कमरे में नीम अंधेरा पसरा था, बीमार लोग शायद रोशनी से आँख बचाते हैं।     अकेली  रोशनी वही हुई,  जब  सुबीर को देखा और शुभ्रा के चेहरे पर चमक सी आ गई थी।

“आ गये तुम, मुझे मालूम था कि आज बिना बुलाये भी आओगे”  हँसते हुये शुभ्रा बोली।

“मैंने दोपहर में फ़ोन किया था, सो रही थी तुम। कैसी तबियत है अब?”

“ठीक  हो गई हूँ मैं। जब तुम्हारा फ़ोन आया,   मैं बिस्तर में थी. लेकिन सो नहीं रही थी। जानबूझकर बात नहीं की थी मैंने।”

“क्यों, बुरा लगा क्या मेरा फ़ोन करना?”

“तुम न करते फ़ोन तो बहुत बुरा लगता। बात कर लेती तो फ़िर तुम कहाँ आते मिलने। काश, ये मियादी बुखार होता और बिना बुलाये तुम रोज ऐसे ही मुझे मिलने आते।” आवाज कुछ बदल गई थी शुभ्रा की।

“पागल हो तुम, दिनभर हम ऑफ़िस में साथ रहते है फ़िर ये कुछ देर  के लिये मिलने आना क्या मायने रखता है?”

“तुम नहीं समझोगे और समझाने से तुम्हारे दिमाग में बात बैठेगी नहीं, बात का मज़ा भी तो नहीं रहेगा।”

“मत समझाओ फ़िर, वैसे भी मेरे दिमाग में ज्यादा अहम चीजें हैं आजकल। जो हैं,  मैं उसीमें बहुत खुश हूँ।”

आंटी उनके लिये चाय-नाश्ता ले आईं। सुबीर ने  चरण-स्पर्श किये और औपचारिकता के लिये मना किया तो शुभ्रा हँस दी, “माँ, पूछ लेती न  चाय बनाने से पहले, कहीं आज ये  भी व्रत पर हों? ऋषिवर का व्रत भंग न हो जाये कहीं।”

माँ ने लाईट जला दी थी और बेटी को हँसते देखकर उनके चिंतित चेहरे पर इत्मीनान आ गया। पास आकर सुबीर के सर पर हाथ फ़ेरने लगीं। उम्र के अनुभव ने बता दिया होगा कि बीमार बेटी को कौन सी दवा आराम दे रही है।

सुबीर ने फ़ौरन नाश्ते की प्लेट पकड़ी और बोला, “व्रत भंग हो ही चुका है तो खा-पीकर क्यूँ न मरा जाये?”

“ऐ सुबीर, सोच समझकर बोला करो। कुछ भी बक दिया, वो भी आज के दिन। कहीं कोई तुम्हारे लंबे जीवन की कामना करती होगी और तुम ऐसा उल्टा-सीधा बोल रहे हो।” तमतमा उठी थी शुभ्रा।

“अरे, इतना सीरियस क्यों हो रही हो? ये तो एक आम वाक्य है जो मैंने तुम्हारी बात के जवाब में कहा। खैर सॉरी,  लो तुम भी चाय लो।”

“मुझसे नहीं पी जायेगी। वैसे अब मैं ठीक हूँ, अब खाना ही खाऊँगी। माँ, सुबीर भी हम लोगों के साथ ही खाना खायेगा। नहीं तो खाना बनाने के नाम पर इसे भागने का मौका मिल जायेगा,  बीमार से दूर।  और मैं फ़िर अकेली बैठी बोर होऊँगी।”  ऒफ़िस से बाहर थी, लेकिन किसी किसी को ऒर्डर देने में जगह से ज्यादा सामने वाले इंसान से ज्यादा फ़र्क पड़ता है।

माँ बर्तन लेकर चली गईं रसोई में, पूजा की तैयारी भी करनी थी और रात के खाने की भी।

“रेडियो सुनना था न, बोर होने से बच जातीं। वैसे भी मैं तुम्हारी तरह पढ़ने लगा हूँ, तुम्हें मेरी तरह रेडियो सुनना चाहिये। न आँखों पर जोर और न दिमाग पर बोझ।”

“आज सारा दिन मैंने और किया क्या है?  उठकर तो अभी ही बैठी हूँ।” कहते कहते शुभ्रा उठ खड़ी हुई और खिड़की के बाहर देखने लगी। पेड़ों पर पक्षी भी अपने अपने बसेरों में लौट चुके थे, शायद रात के चूल्हे-चौके की तैयारी चल रही हों। सुबीर ने अब देखा, शुभ्रा ने आज साड़ी पहन रखी थी। पहली बार साड़ी में देखा था उसे।

चलती रही बातें, बातों में से बातें और सुबीर खुद भी हैरन था कि कैसे इतना बोलने लगा है वो। इतनी बातें मालूम भी थीं क्या उसे अब से तीन चार महीने पहले तक? अंकल आ चुके थे और फ़्रेश होकर रोज की तरह  पूजा पाठ में व्यस्त थे। 

बाहर कुछ चहल-पहल की आवाजें सुनाई दीं, चाँद का विशेष इंतजार था आज जैसे सबको।   शुभ्रा ने खिड़की से बाहर देखा, पेड़ की फ़ुनगी के ऊपर चाँद चमक रहा था। उत्साहित होकर उसने माँ को आवाज लगाई और पूजा की थाली हाथ में लेकर आंटी-अंकल छत पर चले गये थे।

“ऐ सुबीर, देखो न चाँद निकल आया।” बच्चों की सी उल्लासित थी शुभ्रा।

“देख रहा हूँ”  खिड़की के पास आ चुके सुबीर ने कहा, शुभ्रा की तरफ़ ही देखते हुये। “पहली   बार देखा है तुम्हें साड़ी में,  बहुत जम रही है तुमपर। कब खरीदी?”

शुभ्रा ने उसकी तरफ़ देखा, झुककर उसके पैर छू लिये और सुबीर हड़बड़ा उठा एकदम से, “ये क्या कर रही हो?”

“जाने  या अनजाने में,  मेरा व्रत हो गया।  जब भी  तुम्हें जन्मदिन पर या किसी और मौके पर अपनी खुशी के लिये कोई गिफ़्ट दिया है तो तुम कितने नखरे दिखाते हो मुझे।   ये साड़ी मैंने खरीदी है अपने लिये, तुम्हारी तरफ़ से। इसके पैसे तुम दोगे, मैं खुद माँग रही हूँ।”

नजरों की भाषा नजरें पढ़ ही लेती हैं, बहुत विद्वान होना कोई लाजिमी नहीं इस भाषा को जानने या समझने के लिये, कोई लिपि नहीं, कोई ककहरा नहीं।  आंखें बोलती हैं, दिल देखता है, कान महसूस करते हैं और ज्ञान-विज्ञान के सब स्थापित नियम उलट पुलट जाते हैं। कुटिल सरल हो जाते हैं और जो सरल हैं, वो हो जाते हैं चंचल। समझ लेना चाहिये उस समय कि वक्त आ गया है एक नई कहानी के जन्म लेने का।

मुश्किल से सुबीर के मुंह से कोई बोल फ़ूटा, “ऐ शुभ्रा, क्या करके मानोगी तुम?”

“मैं तुम्हारे आँगन में ठुमक कर मानूँगी, जान लो सिर्फ़ इतना। समय तुम तय करोगे, इंतज़ार मैं करूँगी।”

तब से सुबीर  और उसका आँगन भी उस पल का, उस लम्हे का, उस ठुमक का और उस रात की रानी के महकने का  इंतज़ार कर रहे हैं।

p.s. -   मुझे  भी कुछ इंतज़ार है। ताजा जानकारी मिलने तक आने वाली तीस फ़रवरी को दोनों विवाहसूत्र में बंधने वाले हैं, मैं भी निमंत्रण-पत्र का इंतज़ार कर रहा हूँ। मैं गया तो आप सब भी चलेंगे ही। वैसे भी अब तो सब को खुश होना चाहिये कि हैप्पी एंडिंग दे दी है कहानी को:)  छवि खराब हो तो सुधारने के लिये कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, पत्थर रखने पड़ते हैं दिल पर। तो आप भी फ़िलहाल इंतज़ार कीजिये, इस ब्ल्यू लाईन का अपनी पटरी पर लौटने का, हैंगओवर है लेकिन  जल्दी ही खत्म हो जायेगा। हा हा हा

नाहक सा एक ख्याल आया था दिमाग में, कि प्यार का मासूम रुख भी होता था कभी। लिख देखें, शायद आज के  दिखावटी दौर में भी ये अंदाज  पसंद आ जाये, और लिखना शुरू किया तो खुद को भी अच्छा लगा और आपके कमेंट्स से मान लेता हूँ सीधी सादी कहानी भी पसंद आ सकती है। अब लिखा है तो झेले कौन? हैं न आप सब, झेलो और झेलो...:))