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गुरुवार, दिसंबर 09, 2010

कोई चेहरा भूला सा....

उसने घड़ी देखी, साढे छह बजे थे अभी। खूब आराम से भी चले तो छह पचास वाली मैट्रो तो मिल ही जायेगी। चालीस मिनट का रास्ता इस स्टेशन से उसके  स्टेशन, दस मिनट आगे पैदल, यानि पौने आठ बजते न बजते घर पहुंच जायेगा। फ़िर छिन जायेगा अकेलापन उसका।

वो मैट्रो में चुपचाप आकर सीट पर बैठ गया। वही रोज का रूटीन, इंगलिश के अखबार से सुडोकू, हिंदी के अखबार से वर्ग-पहेली, ये हल करते करते रोज उसका स्टेशन आ जाता था  और वो जहमत से बच जाता था लोगों से औपचारिकता निभाने से। उसे बहुत अजीब लगते थे रोज रोज वही सवाल और वही जवाब।  बल्कि सवाल-जवाब ही उसे अजीब लगते थे, बहुत अजीब। कुछ सवाल थे जिनके जवाब नहीं और कुछ ऐसे जवाब थे जिनका कोई सवाल हो ही नहीं सकता था।

आज की सुडोकू 5 स्टार्स वाली थी, खासी मुश्किल लेकिन इसीमें मजा आता है उसे, मुश्किल काम करने में ही, सो पूरी तन्मयता से लगा हुआ था कागजी सुडोकू हल करने में। “एक्सक्यूज़ मी, अंकल आप का नाम सुशांत है न?”  चौंक कर उसने चेहरा अखबार से ऊपर उठाया तो एक आठ नौ साल की लड़की अपनी आंखों में एक मासूम सवाल लिये खड़ी थी। बच्ची के चेहरे पर नजरें जम ही गई थीं जैसे उसकी। कहाँ देखे हैं ऐसे नैन-नक्श इतने करीब से, कहाँ? शायद जब भी आईना देखा हो उसने, ऐसा ही अक्स दिखता हो।  खुद पर गुस्सा भी आ रहा था उसे कि ऐसा भी क्या अनमनापन कि अपनी सूरत  भी कभी अनजानी सी लगती है उसे और आज इस बच्ची की शक्ल में अपनी सूरत ही तो नहीं दिख रही कहीं?   जब बच्ची ने दोबारा वही पूछा तो उसने आसपास बैठी सवारियों की तरफ़ देखा, कौन है इस खूबसूरत बच्ची के साथ?

उसे लगा जैसे एक जोड़ी आंखें उसके चेहरे पर नजर जमाये हैं, सामने वाली सीट पर उसकी नजर गई तो फ़िर वहाँ से हटी नहीं। वही दिलफ़रेब चेहरा,   वही सितमगर आंखे और चेहरे पर पसरा वही तिलिस्मी सूनापन जो खामोश आवाजें लगाकर उसे खींचता रहा था अपनी ओर।  नौ साल के समय ने उसके अपने चेहरे का भूगोल बेशक बदल दिया था लेकिन शायद उस तिलिस्म में घुसने की हिम्मत वक्त भी नहीं कर सका था। अबकी बार बच्ची ने मानो उसे झकझोरते हुये  फ़िर पूछा, “अंकल. बताईये न आप का नाम सुशांत ही है न? मम्मी ने पूछा है।” वो जैसे नीम बेहोशी की हालत में था, “बेटा, मम्मी को कह देना कि सुशांत को खोये हुये नौ साल बीत चुके हैं। मुझे भी उसकी तलाश है, लेकिन वो शायद अब नहीं मिलेगा।”

बाहर देखा तो उसके स्टेशन से पहला स्टेशन आ गया था। घर की दूरी यहाँ से तीन किलोमीटर थी, गनीमत है कि रास्ता ज्यादा रोशन. ज्यादा चलता हुआ नहीं था।   एक झटके से सीट छोड़ दी थी  उसने। गाड़ी रुकने से पहले वो पलटा, बच्ची के माथे को चूमा और उसके सर पर हाथ फ़ेरा, भगवान से शायद सब खुशियाँ उस बच्ची के लिये मांगी और बाहर निकल गया।

सर्दियों की पहली बारिश, लोग रुकने का इंतज़ार कर रहे थे और वो स्टेशन से बाहर निकल आया। कितना डरते हैं लोग भीगने से, बीमार होने से, जैसे भीगने से बचना ही जिंदगी का सबसे बड़ा काम हो। बीच बीच में बालों में हाथ फ़ेर रहा था और ऊपर बादलों को देख रहा था बहुत हसरत से, कि कहीं रास्ता तय करने से पहले उनका  पानी खत्म न हो जाए।

घर में घुसा तो माँ उसे देखकर चौंक गई, “क्यों भीगा सर्दी में, घर ही तो आना था तो बारिश रुकने का इंतजार कर लेता। और तेरी आंखें कैसे लाल हो रही हैं जैसे रोकर हटा हो अभी?”  वो हंस रहा था, “मैं और रोया होऊँ? क्या माँ, तुम भी बस्स। आंख में कुछ गिर गया है शायद।” और फ़िर से हँस दिया था वो हमेशा की तरह, वादा भी आखिर कोई चीज होता है।