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शुक्रवार, जुलाई 12, 2013

संवैधानिक चेतावनी

कुछ दिन से दिल्ली मेट्रो एमएमएस कांड चर्चा में है।    क्या हुआ, कब हुआ, कैसे हुआ, किसने क्या किया वगैरह-वगैरह। जाँच चलेगी, मुकदमा होगा, कार्यवाही होगी, कानून अपना काम करेगा। मानसिकता बदलने, वर्जनामुक्त होने के साथ संस्कार न छोड़ने की रस्साकशी फ़िर से चलेगी। मेट्रो भी चलती रहेगी, ऐसे कारनामे भी चलते रहेंगे और जिन्दगी यूँ ही गुजरती रहेगी लेकिन कुछ सवाल जरूर खड़े होते रहेंगे  मसलन यह वीडियोज़ सही हैं या इनके साथ छेड़छाड़ की गई है?    

दोष किसका है, उन जोड़ों का जिन्हें फ़िल्माया गया है या उनका जिन्होंने इन वीडियोज़ का दुरुपयोग किया?    

सार्वजनिक स्थान पर की जाने वाली ऐसी क्रीड़ायें क्या वाकई निजता का अधिकार है? 

अगर हाँ तो फ़िर सार्वजनिक स्थानों पर यह सब करने वालों को इसमें गलत नहीं लगता तो फ़िर दिखने में  क्यूँ  गलत लगेगा? 

कुछ दिन पहले मित्र गिरिजेश राव  ने फ़ेसबुक स्टेटस में पूछा था, "सार्वजनिक स्थानों पर प्रेम का प्रदर्शन उचित है कि नहीं?" यह मैं अपनी याद्दाश्त के आधार पर लिख रहा हूँ, हो सकता है कि शब्द अक्षरश: यही न हों लेकिन भाव कुछ ऐसे ही थे। विषय विचारोत्तेजक लगा था, मैंने सुझाया भी था कि इस विषय पर अच्छा विमर्श हो सकता है। वहाँ तो बात आई गई हो गई, फ़ेसबुक वैसे भी कुछ ज्यादा ही त्वरित अभिव्यक्ति का साधन है(यही स्टेटस ढूँढना चाहा तो अभी मिला ही नहीं) लेकिन मेट्रो दीवानों ने दिखा दिया कि यह विषय प्रासंगिक है।

एक और फ़ेसबुक स्टेटस  देखा था जिसमें एक सज्जन ने दिल्ली के पार्कों में ऐसी बातों की तरफ़ इशारा किया था। क्या हम जैसे इन लोगों के पास भी कोई निजता का अधिकार है? 

ब्लॉगिंग में आने के बाद ज्ञानचक्षु काफ़ी खुले हैं, स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं कि मैंने PDA(Public Display of Affection) के बारे में पहले नहीं सुना था। ये अलग बात है कि इसके बारे में सुनने\पढ़ने के बाद भी अपने विचार बहुत आधुनिक नहीं हुये, अब भी पहले जैसे ही हैं कि कुछ काम पर्दे में ही ठीक हैं। लेकिन हमेशा की तरह यह भी मालूम है कि दुनिया सिर्फ़ मेरे सोचने से बदलने से नहीं रुकने वाली।  सदा से बदलाव होता आया है तो समाज में ये बदलाव भी सही। 

जब एक के अधिकार दूसरे से टकराने लगें तो समाधान ढूँढना आवश्यक है।  वर्जनाहीन समाज, सेक्स एजुकेशन, मानसिकता बदलने जैसे सदुपदेश खूब पढ़ लिये, कुछ प्रैक्टिकल उपाय अपनाये जाने चाहियें। आपसे समाधान पूछने की बजाय पहले अपनी राय संक्षेप में  बताता हूँ।

कुछ जनजातीय समाज घोटुल परंपरा   का पालन करके अपनी युवा शक्ति को चैनलाईज़ करते ही रहे हैं।  वैसे ही मेरी राय में अब समय आ गया है कि  सरकार द्वारा कुछ सार्वजनिक स्थान यथा कुछ पार्क या कम्युनिटी सेंटर आदि चिन्हित कर दिये जाने चाहिये और जैसे सिगरेट\तंबाकू आदि के पैकेट पर एक संवैधानिक चेतावनी(अब एक चित्र सहित) रहती है कि ’तंबाकू के सेवन से कैंसर होता है’ वैसे ही इन सरकारी घोटुलों के बाहर एक संवैधानिक  चेतावनी टाईप नोटिस लगा रहे कि यह स्थान सिर्फ़ व्यस्कों के लिये है और यहाँ आप अपनी इच्छा से जा रहे हैं। 

बाकी तो आप सब  समझदार हैं ही,  इस सुझाव पर भी सोच देखियेगा ...

गुरुवार, फ़रवरी 14, 2013

मेंहदी...



हमारा एक पुरानी साथी भोला उसके गाँव के एक आदमी के बारे में बता रहा था कि वो हमेशा अपनी गर्दन झुकाये रहता था। हमने अपना ज्ञान झाड़ा कि हो सकता है उन साहब ने यह तजुर्बा ले रखा हो -
नज़र  बाग में नज़र मिलाते, नज़र से हमने नज़र को देखा
नज़र पड़ी जब नज़र के ऊपर, नज़र झुकाते नज़र को देखा
वाह वाह करनी तो दूर रही, भोला ने हमारी दलील यह कहकर खारिज कर दी कि ’गर्दन’ और ’नज़र’ विच फ़र्क हुंदा है। और खुलासा करते हुये मामले को और रहस्य प्रदान कर दिया कि एक बार गाँव के लोगों ने उस बंदे को मजबूर करते हुये उसकी गर्दन ऊपर की ओर उठवाई। गाँव में किसी ने अपने मकान की दूसरी मंजिल बनवाई थी जोकि एक नया प्रयोग था, लोगों ने कह कहकर उस आदमी को मजबूर किया कि देख तो सही, नई चीज है। उस बंदे ने ऊपर की तरफ़ देखा और देखते ही देखते दूसरी मंजिल भरभराकर गिर गई। उसके बाद किसी ने ऐसी जिद नहीं की बल्कि उस बंदे को खिलापिलाकर इतना खुश रखते थे कि गर्दन ऊपर उठने ही नहीं देते थे। 

मैंने कहा कि यार तेरे गाँववालों ने तो बंदे को वहीं रोककर उसकी प्रतिभा के साथ बहुत अन्याय किया, दिल्ली जैसी जगह पर ले आते  तो  म्यूनिसिपैलिटी वाले मनचाहे पैकेज पर उसे रख लेते। भोला कहने लगा, "बताने का मेरा मतलब ये है कि आपको देखकर मुझे उस बंदे की याद आ जाती है।" इस वार्तालाप का नतीजा ये निकला  कि हमने उसके बाद से नज़र नीची रखने में और भी भलाई समझी।

तेरह फ़रवरी, शाम लगभग सात बजे - किसी मेट्रो स्टेशन पर मेट्रो के दरवाजे खुले। सवारी उतरीं कम और चढ़ी ज्यादा।  हमारी झुकी नज़र ने एक जोड़ा नंगे पैर देखे और कुछ हैरानी हुई। माना कि मेट्रो में सफ़ाई अपेक्षाकृत ठीक ही है लेकिन फ़िर भी नंगे पैर? पाकीज़ा फ़िल्म का डॉयलाग था कुछ कि आपके पैर बहुत खूबसूरत हैं टाईप, वो क्या हुआ?  रिस्क लेते हुये गर्दन थोड़ी सी उठ ही गई। बिना सैंडिल\जूती वाले पैर, पैरों पर ताजी ताजी लगी मेंहदी। और ऊपर तक देखा तो दोनों हाथ कुहनियों तक डिज़ाईनर मेंहदी  से सजे हुए।मेंहदी अभी एकदम ताज़ी-ताज़ी थी। नहीं समझ पाया कि देखना असभ्यता है या न देखना, लेकिन आज देखे बिना रहा नहीं गया। 

बदनीयत कोई नहीं थी, सिर्फ़ उत्सुकता थी कि शौक से लगवाई गई मेंहदी को इस भीड़-भाड़ वाली जगह पर बचाकर रखने में कितने कौशल की जरूरत होगी? उस कौशल को देखकर लोग कैसे रियेक्ट करेंगे?  असल में खाली दिमाग होना ही नहीं चाहिये, उल्टी सीधी बातें ज्यादा दिमाग में आती हैं। भीड़ में किसी से छू जाने पर मेंहदी का डिज़ाईन बिगड़ना ज्यादा बड़ा मुद्दा होता या किसी के कपड़ों में दाग लगना? मेट्रो घर के पास तो छोड़ सकती है लेकिन घर तक तो नहीं छोड़ सकती। मेट्रो स्टेशन तो फ़िर साफ़ सुथरे हैं लेकिन उससे बाहर सड़क का हाल? और सुरक्षा का मुद्दा, वो भी उस दिल्ली में जहाँ अभी दो महीने भी नहीं गुजरे कि...? और बहुत से सवाल जो दिमाग में तो आ रहे थे लेकिन जिन्हें जुबान पर लाना शायद आधी आबादी के साथ अन्याय हो जायेगा।  अधिकार, आज़ादी, इच्छा जैसे शब्द वैसे भी आजकल अपने  दिमाग में गूंजते ही रहते हैं। 

वैसे मुझे हैरानी ही हुई कि दस पन्द्रह मिनट के सफ़र में कोई हंगामा दिखा नहीं। या तो दिल्ली के सारे (ना)मर्द सभ्य, सुशील हो गये हैं या फ़िर जस्टिस वर्मा की रिपोर्ट आने के बाद और हाल ही के दिनों  में सरकार ने अपराधिक मामले निपटाने में जो इच्छाशक्ति दिखाई है, उससे दिल्ली वाले सकपकाये हुये हैं। सोचा था कि उस लड़की से कुछ साधारण से प्रश्न पूछता हूँ जैसे कि इतना कान्फ़िडेंस कहाँ से लेकर आती हो तुम लड़कियाँ,  फ़िर ख्याल आया कि बेशक मैं उम्र में उसके बाप के बराबर हूँ  लेकिन कुछ पूछने का हकदार नहीं हूँ।  गर्दन फ़िर से नीची करके घर को लौट आया हूँ।

ध्यान आया कि तेरह फ़रवरी के बाद चौदह फ़रवरी आती है:)  हो सकता है अगली मेट्रो यात्रा और भी मेंहदीनुमा मेरा मतलब है खुशनुमा हो। कुछ राज्य सरकारें रक्षा-बंधन वाले दिन अपनी तरफ़ से बहनों को रोडवेज़ में मुफ़्त यात्रा करने का उपहार देती हैं, आने वाले वर्षों में सरकार से चौदह फ़रवरी को वैलेंटाईनों\नियों को  क्या उपहार मिलता है, देखेंगे हम लोग....।
 

शुक्रवार, जुलाई 20, 2012

lost in the metro...

'Look my princess, these are your private body parts.' मेट्रो स्टेशन के प्लेटफार्म पर लगे टीवी सेट्स में  एक महिला उसके सामने रखी टेबल पर एक रबड़ की गुडिया लिटाये हुए अपनी बच्ची को यह जानकारी दे रही थी|   महिला ने गुडिया के पेट के आसपास की जगह को दबाते हुए डेमोंसट्रेट किया,   'Don't let anybody touch these parts and if anybody does so, don't stay mum, you have to tell it to your mom.'

इस विज्ञापन में सब डूब ही गए थे, विक्रम भी मंत्रमुग्ध होकर उस विज्ञापन को बार बार रिपीट होते  देख रहा था|

'ज्यादा फूलो  मत, उधर देखो' वेताल ने कहकर उसके रंग में भंग डाल दिया| विशाल टीवी सेट के ठीक नीचे एक बीस बाईस साल का  लड़का अपनी हम उम्र लड़की की कमर को दोनों हाथों में भरकर उसे अपने से एकदम सटाकर खडा था|  पीक-ऑवर्स चल रहे थे, भीड़ बढ़ती जा रही थी| लड़का और लड़की इन सबसे एकदम बेखबर थे| बीच बीच में लड़की घूमकर कुछ कहने लगती थी और लड़के के हाथ उसकी कमर को छोडकर कभी उसकी गर्दन पर रेंगने लगते थे और कभी उसके हाथों को सहलाने लगते थे| फिर जल्दी ही वो दोनों अपनी उसी पहले वाली मुद्रा में आ खड़े होते थे| आसपास के माहौल की कोई परवाह नहीं,  भीड़ में से बहुत से लोग खुद उन्हें इग्नोर कर रहे थे, कुछ ललचाई आँखों से और कुछ उन्हें हेय  दृष्टि से देख रहे थे|

टीवी अब भी बदस्तूर चल रहा था लेकिन विक्रम का ध्यान अब उधर नहीं था|

वेताल उसके कानों में फुसफुसाया, 'लड़की की आंखों में क्या दिख रहा है?'  

विक्रम ने बताया, 'भोलापन, सादगी, विश्वास'

'और लड़के की आंखों में?'

'पशुता, मौकापरस्ती'

'विक्रम, जरा गौर से देखो| लड़के के दांत और नाखूनों  की तरफ देखो|' विक्रम ने गौर से देखा, लड़की की अल्हड हरकतों के साथ साथ लड़के के दांत और नाखून धीरे धीरे बढते जा रहे थे| विक्रम के सर में और ज्यादा सांय सांय होने लगी थी|

वेताल ने फिर से विक्रम को उसके कर्तव्य की याद दिलाई, 'चुप मत रहो, अन्याय को होने देने से रोको|' विक्रम के कानों में गूंजती आवाज तेज, और तेज होती जा रही थी|  'सब समझते बूझते भी तुम कुछ नहीं करोगे तो तुम्हारे सर के सौ टुकड़े हो जायेंगे और  मैं फिर से अपने ठिकाने पर लौट जाऊंगा|'

आंखों के सामने दीखते दृश्य और कानों में सीसे की तरह पिघलते शब्द उसे असहनीय लगने लगे थे|  जोर से चीखते हुए उसने वेताल से कहा, 'अब ज़माना बदल रहा है वेताल, इस स्टेज पर हस्तक्षेप करने वाला खुद सौ जूते खायेगा| आधुनिकता के पक्षधरों के सामने पिछडा,  सामंतवादी, प्रेम का दुश्मन  और जाने क्या क्या कहलायेगा|  आजकल इंतज़ार किया जाता है दुर्घटनाओं के होने का, उसके बाद कटघरों में सबको लाया जाएगा| फिर होगा विमर्श और दिए जायेंगे फतवे|   तुझे रुकना है तो रुक नहीं  तो जा अपने खूंटे पर, मैं फिर से तुझे ले आऊँगा|  उस फटीक की तो मुझे आदत है, झेल लूंगा| बल्कि  ले, तू भी क्या याद रखेगा, मैं ही तुझे यहाँ पटक कर जाता हूँ|' कहकर विक्रम ने वेताल को वहीं मेट्रो प्लेटफार्म पर पटका और जल्दी से मेट्रो के बंद होते दरवाजे के भीतर चला गया|  प्लेटफार्म पर गिरे हुए बेताल को हम सबने सुना, विक्रम को भाई बाप की गालियाँ दे रहा था|  भीड़ आ रही थी, जा रही थी|  टीवी पर वही विज्ञापन फिल्म भी रिपीट हो रही थी, ठीक नीचे प्लेटफ़ार्म पर एक कबूतरी लहक लहक कर अब भी बिलाव पर कुर्बान होती दिख रही थी| 

तब से देर रात वाली मेट्रो पकड़ने वाले कई यात्रियों ने गवाही दी है कि वेताल अपने विक्रम को ढूँढता फिर रहा है|

गूढ़ शब्द:

फटीक            -          (वो वाली ऐसी तैसी जो बिना किसी सार्थक उपलब्धि के करवाई जाती है)



गुरुवार, दिसंबर 09, 2010

कोई चेहरा भूला सा....

उसने घड़ी देखी, साढे छह बजे थे अभी। खूब आराम से भी चले तो छह पचास वाली मैट्रो तो मिल ही जायेगी। चालीस मिनट का रास्ता इस स्टेशन से उसके  स्टेशन, दस मिनट आगे पैदल, यानि पौने आठ बजते न बजते घर पहुंच जायेगा। फ़िर छिन जायेगा अकेलापन उसका।

वो मैट्रो में चुपचाप आकर सीट पर बैठ गया। वही रोज का रूटीन, इंगलिश के अखबार से सुडोकू, हिंदी के अखबार से वर्ग-पहेली, ये हल करते करते रोज उसका स्टेशन आ जाता था  और वो जहमत से बच जाता था लोगों से औपचारिकता निभाने से। उसे बहुत अजीब लगते थे रोज रोज वही सवाल और वही जवाब।  बल्कि सवाल-जवाब ही उसे अजीब लगते थे, बहुत अजीब। कुछ सवाल थे जिनके जवाब नहीं और कुछ ऐसे जवाब थे जिनका कोई सवाल हो ही नहीं सकता था।

आज की सुडोकू 5 स्टार्स वाली थी, खासी मुश्किल लेकिन इसीमें मजा आता है उसे, मुश्किल काम करने में ही, सो पूरी तन्मयता से लगा हुआ था कागजी सुडोकू हल करने में। “एक्सक्यूज़ मी, अंकल आप का नाम सुशांत है न?”  चौंक कर उसने चेहरा अखबार से ऊपर उठाया तो एक आठ नौ साल की लड़की अपनी आंखों में एक मासूम सवाल लिये खड़ी थी। बच्ची के चेहरे पर नजरें जम ही गई थीं जैसे उसकी। कहाँ देखे हैं ऐसे नैन-नक्श इतने करीब से, कहाँ? शायद जब भी आईना देखा हो उसने, ऐसा ही अक्स दिखता हो।  खुद पर गुस्सा भी आ रहा था उसे कि ऐसा भी क्या अनमनापन कि अपनी सूरत  भी कभी अनजानी सी लगती है उसे और आज इस बच्ची की शक्ल में अपनी सूरत ही तो नहीं दिख रही कहीं?   जब बच्ची ने दोबारा वही पूछा तो उसने आसपास बैठी सवारियों की तरफ़ देखा, कौन है इस खूबसूरत बच्ची के साथ?

उसे लगा जैसे एक जोड़ी आंखें उसके चेहरे पर नजर जमाये हैं, सामने वाली सीट पर उसकी नजर गई तो फ़िर वहाँ से हटी नहीं। वही दिलफ़रेब चेहरा,   वही सितमगर आंखे और चेहरे पर पसरा वही तिलिस्मी सूनापन जो खामोश आवाजें लगाकर उसे खींचता रहा था अपनी ओर।  नौ साल के समय ने उसके अपने चेहरे का भूगोल बेशक बदल दिया था लेकिन शायद उस तिलिस्म में घुसने की हिम्मत वक्त भी नहीं कर सका था। अबकी बार बच्ची ने मानो उसे झकझोरते हुये  फ़िर पूछा, “अंकल. बताईये न आप का नाम सुशांत ही है न? मम्मी ने पूछा है।” वो जैसे नीम बेहोशी की हालत में था, “बेटा, मम्मी को कह देना कि सुशांत को खोये हुये नौ साल बीत चुके हैं। मुझे भी उसकी तलाश है, लेकिन वो शायद अब नहीं मिलेगा।”

बाहर देखा तो उसके स्टेशन से पहला स्टेशन आ गया था। घर की दूरी यहाँ से तीन किलोमीटर थी, गनीमत है कि रास्ता ज्यादा रोशन. ज्यादा चलता हुआ नहीं था।   एक झटके से सीट छोड़ दी थी  उसने। गाड़ी रुकने से पहले वो पलटा, बच्ची के माथे को चूमा और उसके सर पर हाथ फ़ेरा, भगवान से शायद सब खुशियाँ उस बच्ची के लिये मांगी और बाहर निकल गया।

सर्दियों की पहली बारिश, लोग रुकने का इंतज़ार कर रहे थे और वो स्टेशन से बाहर निकल आया। कितना डरते हैं लोग भीगने से, बीमार होने से, जैसे भीगने से बचना ही जिंदगी का सबसे बड़ा काम हो। बीच बीच में बालों में हाथ फ़ेर रहा था और ऊपर बादलों को देख रहा था बहुत हसरत से, कि कहीं रास्ता तय करने से पहले उनका  पानी खत्म न हो जाए।

घर में घुसा तो माँ उसे देखकर चौंक गई, “क्यों भीगा सर्दी में, घर ही तो आना था तो बारिश रुकने का इंतजार कर लेता। और तेरी आंखें कैसे लाल हो रही हैं जैसे रोकर हटा हो अभी?”  वो हंस रहा था, “मैं और रोया होऊँ? क्या माँ, तुम भी बस्स। आंख में कुछ गिर गया है शायद।” और फ़िर से हँस दिया था वो हमेशा की तरह, वादा भी आखिर कोई चीज होता है।