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शनिवार, मार्च 01, 2014

चलो एक बार फ़िर से..

"आप खुद को ईमानदारी के इक्कीसवीं सदी के अवतार के समकक्ष तो नहीं समझते जो उनकी हर प्रेस कान्फ़्रेंस की तरह अपनी लगभग हर पोस्ट में कोई न कोई सवाल पूछ लेते हो?"  इस आरोप की प्रबलतम संभावना के बावजूद ये प्रश्न पूछ रहा हूँ, "पोस्ट के शीर्षक से आपको क्या लगता है?"

किसी को फ़िल्मी गाना याद आयेगा, किसी को हीरो या हीरोईन, किसी को साहिर और किसी को इस गाने से जुड़ा एक सांझा फ़ैसला लेकिन इतनी आसानी से हम अपनी खोपड़ी में उपजी बात बता दें तो फ़िर हमें पूछेगा ही कौन? एल्लो, य तो एक और सवाल हो गया :) 

चलिये बहुत दिन हो गये मुद्दों पर उल्टी सीधी बातें करते, आज पुरानी बातें करते हैं। और रिलेक्स रहिये, दिमाग पर ज्यादा जोर देने की कोई जरूरत नहीं, सवाल का जवाब हम खुद ही दिये देते हैं लेकिन देंगे अपने तरीके से, जान लीजिये। वैसे भी आजकल है चुनाव का समय और सब उलझे हैं सरकार बनाने में और हम ठहरे हमेशा से बेमौसमी बात करने वाले, तो आप ये लिंक देखिये तो समझ ही जायेंगे साड्डे  इस ’चलो एक बार फ़िर से’ दा मतबल :)

अब इस मुद्दे पर एक दो बातें वो जो अब तक लिखी नहीं थीं। लिंक में दिये किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम में एक बार अमृतसर के एक बहुत सीनियर साथी मिले, ’थापर साहब’ जिनकी रिटायरमेंट में साल भर ही बचा था। बड़े जिन्दादिल आदमी हैं, हर मौके पर पहली प्रतिक्रिया उन्हींकी होती थी। प्रशिक्षण के पहले सेशन से ही मैंने महसूस किया कि उन्हें लगभग सभी फ़ैकल्टी मेंबर बाकायदा नाम से जानते थे। चायकाल के दौरान मैंने जब उनसे पूछा कि क्या वो पहले ट्रेनिंग सेंटर में रहे हैं तो उन्होंने मना कर दिया। मैंने फ़िर पूछा कि यहाँ का हर स्टाफ़ फ़िर आपको कैसे जानता है? उन साहब ने बताया कि  बड़ी शाखा होने के चलते प्राय: उनकी शाखा से किसी न किसी को ट्रेनिंग के लिये नामांकित किया ही जाता रहता है और उनकी शाखा में अधिकतर महिलायें ही कार्यरत हैं। वो ट्रेनिंग पर जाना असुविधाजकन समझती हैं, सर्विस रूल्स के अनुसार प्रशिक्षण में जाने से मना करना या न जाना एक प्रतिकूल आचरण समझा जाता है। स्टाफ़ की जाने में अनिच्छा और न जाने के लिये झूठे-सच्चे बहाने बनाने की दुविधा के बीच सर्वमान्य हल एक निकलता था - थापर साहब। ब्रांच मैनेजर को कन्विंस करके प्रजातंत्र की दुहाई देते थे कि जैसे प्रजातंत्र में दिमाग नहीं सिर गिने जाते हैं, वैसे ही ट्रेनिंग के लिये व्यक्ति विशेष से मतलब नहीं बल्कि नग गिने जाते हैं।   वो खुद बताने लगे कि ऐसे ही एक मौके पर महिला समूह की तरफ़ से एक बार तो मज़ाक में ये भी कहा गया, "थापर साब चले जाणगे, ऐत्थे रहके वी ऐनां ने करना की हुंदा है?(थापर साहब चले जायेंगे, वैसे भी यहाँ रहके भी इन्होंने करना क्या होता है?)"  सब अपने अपने हिसाब से मतलब निकालकर हँसते रहते हैं और थापर साहब की चिट्ठी तैयार हो जाती है। यही राज बताया थापर साहब ने अपनी पॉपुलैरिटी का। लगे हाथों यह भी स्पष्ट कर दूँ कि ट्रेनिंग पर जाने के अनिच्छुक सिर्फ़ महिलायें ही नहीं होती बल्कि बहुत से पुरुष मित्र भी ऐसे देखे हैं जिनकी ट्रेनिंग की खबर आते ही वो बीमार हो जाते हैं, वहीं बहुत से कर्मचारी ऐसे भी होते हैं जो विभिन्न कारणों से ट्रेनिंग कार्यक्रमों में जाना पसंद करते हैं। मैं किस कैटेगरी में आता हूँ, ये नहीं बताऊँगा वरना मेरी इस बात का भी दूसरा मतलब निकाल जायेगा :) 

ऐसी ही एक और ट्रेनिंग की बात है कि भोपाल जाना हुआ था। रात को साढ़े ग्यारह बजे होंगे कि उस्तादजी का फ़ोन आ गया(हमारे पाले उस्तादजी को तो पुराने पाठक जानते ही हैं)। समय के हिसाब से थोड़ा अजीब लगा, हालचाल पूछा तो वो अपनी कुछ न बताकर मेरे ही हालचाल अलग-अलग कोण से पूछते रहे। जब मैंने इतनी देर से फ़ोन करने की वजह पूछी तो कहने लगे, "थोड़ी देर पहले टीवी पर देखा कि आज भोपाल में बंटी चोर पकड़ा गया है। ध्यान आया कि आपने भी आज ही वहाँ पहुँचना था। अब टीवी पर शक्ल तो उसकी दिखाई नहीं, मैंने सोचा कि कहीं संजय जी..............हिच,.हिच.."  उधर से मैं हैल्लो, हैल्लो करता रहा लेकिन लाईन में शायद कुछ दिक्कत आ गई थी। बाद में लौटकर मैंने पूछा भी कि क्या वाकई मैं उन्हें इस सम्मान के लायक लगा था कि बंटी चोर के समकक्ष समझा जाऊँ? कहाँ वो इतना बड़ा नाम और कहाँ मैं एक साधारण सा बैंककर्मी? उनकी सोच से असहमति जताई और ये भी जताया कि उनके ऐसा सोचने से मेरी जगह कोई और होता तो उसे बुरा भी लग सकता था। ये भी कि कैसे उनकी इस असंभव सी संभावना ने मेरी सेल्फ़-एस्टीम का बंटाधार कर दिया है। उस्तादजी तो ठहरे उस्तादजी, बोले,  "जिसे बुरा लग सकता था, उसकी छोड़ो।  उस दिन आपसे फ़ोन पर बात हो पाई यानि कि आप वो नहीं निकले जो मैंने सोचा था। उससे मुझे कितना बुरा लगा था, ये आपने सोचा? मैं रिश्तेदारी में, रिपोर्टर्स को  सबको बता रहा होता कि इस आदमी को इतना नजदीक से जानता था लेकिन ये हो न सका, बल्कि मेरी सोच का बंटाधार आपने कर दिया।"

बाद में कभी उस ट्रेनिंग कार्यक्रम की बात होने पर उसको हम ’ऑपरेशन बंटाधार’ कहकर याद करते रह्ते थे। 

बताने का मतलब ये है कि हम अब आपसे सप्ताह भर बाद मिलेंगे - बोले तो बंटाधार तो पहले ही हो चुका, अब शायद ’ऑपरेशन धुंआधार’ के बाद। तब तक एक एकदम सेक्यूलर लेकिन शायद कैपिटलिस्टिक सैल्यूटेशन - ’ओके टाटा, बाय-बाय’ या ’ओके टाटा, होर्न प्लीज़’ या फ़िर ’एज़ यू प्लीज़’ क्योंकि ट्रेनिंग हो या जिंदगी, ब्लॉगिंग हो या फ़ेसबुकिंग, खुश हों या दुखी हों,  "ये  तो न्यूए चालैगी" :)

बुधवार, नवंबर 28, 2012

ये बात तो सही है...

"आपने सिगरेट पीना छोड़ा नहीं न अब तक? ये अच्छी चीज नहीं है, आपसे कितनी बार तो कह चुका हूँ।" कश्यप बोला।

"अरे यार, दिमाग खराब मत कर। है तो यहीं हापुड़ का और आप-आप कहकर बात करता है जैसे लखनऊ की पैदाइश हो तेरी।   बराबर के दोस्त और फ़िर एक ही बेल्ट के बंदों से आप-जनाब वाली भाषा अपने से होती नहीं।  फ़िर पैस्सिव स्मोकिंग से इतनी परेशानी है तो आने से पहले टेलीग्राम भेज दिया कर, हम कमरे से बाहर ही मिल लिया करेंगे। अब काम की बात बता, क्यों आया है?"

"नाराज हो जाते हो। पहले एक बात बताओ, मैं सिगरेट के लिये मना करता हूँ तो इसमें मेरा क्या फ़ायदा है? मैं तो दस बीस दिन में एक बार मिलता हूँ,  अब तो वैसे भी...।  छोड़ दोगे तो खुद का ही फ़ायदा होगा न?"

"हाँ यार, ये बात तो सही है।"

"गुड। अब बताता हूँ कि क्यों आया हूँ। मेरा सेलेक्शन स्टेट बैंक पी.ओ. में हो गया है। अगले ही सप्ताह ज्वायनिंग है लेकिन उन्होंने कहा है कि पिछले एम्प्लायर से सैटिस्फ़ैक्शन लेटर लेकर जाना होगा। ब्रांच मैनेजर कहता है कि अब फ़ँसा हूँ मैं उसके पंजे में, अभी पिछली बात भूला नहीं है।"

अब  पिछली बात आप भला  क्या जानें? लेकिन, मैं हूँ न। बस थोड़ा पीछे चलिये मेरे साथ। एक ही बैच के थे हम, फ़ाईनल पोस्टिंग अलग अलग जगह हुई थी। मैं प्रशासनिक कार्यालय में और वो एक ग्रामीण शाखा में। हम यारी दोस्ती में उलझ गये, उसका शुरू से ही सपना था कि प्रोबेशनरी ओफ़िसर बनना है। वो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में उलझा रहता था। न दोस्ती, न फ़ालतू की बातें और न फ़ालतू के शौक। ब्रांच में काम के मामले में अक्सर ब्रांच मैनेजर से उसकी  कहासुनी हो जाती थी। उसका कहना था कि उसे दूसरी परीक्षायें पास करनी हैं तो काम का लोड न डाला जाये, ब्रांच मैनेजर का यह कहना होता था कि आप यहाँ तन्ख्वाह ले रहे हो तो काम करना ही पड़ेगा।  हम प्रशासनिक कार्यालय में थे तो खबरें मिलती ही रहती थीं।  ऐसे ही एक बार कुछ कहासुनी हुई तो भावुक होकर उसने सुसाईड करने की बात कह दी।  घोटालों के अलावा भी दफ़्तरों में बहुत कुछ होता है, उनसे प्राय:  पब्लिक अनभिज्ञ रहती है।

जिस दिन यह बात हुई थी, उस रात हमेशा की तरह उसके दूसरे दो साथी अपने कमरे में  इंतजार कर रहे थे कि कश्यप आये और फ़िर वो लोग उस गाँव के एकमात्र भोजनालय में रात का खाना खाने जायें। वो नहीं आया तो उन्होंने सोचा कि शायद सो गया होगा, हम ही उसे आवाज लगा लेंगे। उसके रूम पर गये तो दरवाजा बाहर से बंद था हालाँकि ताला नहीं लगा था। कश्यप के मकान मालिक जो कि बाहर ही कुर्सी पर बैठे थे, उन्होंने बताया कि वो अभी अभी रेलवे लाईन की तरफ़ गया है। सुनते ही दोनों साथी रेलवे लाईन की तरफ़ भाग लिये।  रेलवे स्टेशन के विपरीत दिशा में एकाध किलोमीटर दूर पटरी पर लेटे हुये कश्यप को वो दोनों लगभग घसीटते हुये, गालियाँ देते-खाते  कमरे पर लाये।

इस बीच मकानमालिक साहब भी गाँव में ही किरायेदार के तौर पर रह रहे ब्रांच मैनेजर को बुला लाये थे। कमरे में मेज पर एक चिट्ठी रखी थी जिसमें ब्रांच मैनेजर साहब का स्तुतिगान कर रखा था। बताते हैं कि सबसे अजीब हालत उन्हीं साहब की थी, एक पल में शुक्र मनाते थे कि ये भी बच गया और वो भी बच गये और दूसरे ही पल इसको सबक सिखाने की बात करते थे। अगले दिन उनके प्रशासनिक कार्यालय पहुँचने से पहले ही फ़ोन पर सब किस्सा हम तक पहुँच गया था। उधर रात को ही फ़ोन पर कश्यप के दोस्तों ने उसकी माताजी को सूचना देकर हैड ओफ़िस पहुंचने के लिये कह दिया था। दिन भर खासी गहमागहमी रही और मामला कहीं दर्ज होने की बजाय सुसाईड नोट और फ़िर उसका एक काऊंटर माफ़ीनामा लिखवाकर और पंचों के हस्ताक्षर करवाकर सुरक्षित हाथों में सौंप दिया गया। दुनिया, देश, बैंक, ब्रांच और जिन्दगी फ़िर से डगर-मगर चलने लगे।

ये थी पिछली बहुत सी बातों में से फ़िलहाल मतलब की बात, ब्रांच मैनेजर साहब के पैर के नीचे अब कश्यपजी की पूँछ आ गई थी। विस्तार से पूछने पर पता चला कि ब्रांच मैनेजर साहब ने वैकल्पिक शर्त जो रखी है, वो है अपना पेंडिंग काम निबटाने की। पेंडिंग काम में अब  एक कोई काम ऐसा था जिसमें कश्यप का हाथ तंग था। चांस की बात है, वो काम मुझे बहुत इंट्रेस्टिंग लगता था और मुझे मालूम था कि मैं वो काम तीन चार घंटे में निबटा भी सकता हूँ  लेकिन मेरी पोस्टिंग अलग जगह थी, उसकी अलग जगह। जब हमने पूछा कि ब्रांच में किसी और की मदद ले ले तो वो कहने लगा कि अब कोई मदद नहीं करता।  सबको मालूम है कि ये जाने वाला है तो फ़िर जिस मैनेजर के साथ अभी दो तीन साल काम करना है, इसके लिये उससे पंगा क्यों लिया जाये? 

मजेदार समस्या थी। हैड ओफ़िस में होने के नाते हमसे उसकी अपेक्षा थी कि मैनेजर साहब को किसी उच्चाधिकारी से कहला सुनवाकर उसका काम हो जाये। दिल से मैं भी चाहता था कि उसका काम हो जाये लेकिन उसके मैनेजर साहब ने जो पेंडेंसी खत्म करने का विकल्प दे रखा था वो गलत भी नहीं लग रहा था। खैर, उसे विदा किया कि जा भाई अपनी गाड़ी पकड़ और  अपना बैग बिस्तर बांधना शुरू  कर, भली करेंगे राम।

उसे भेजकर फ़िर से फ़िक्र को धुंये में उड़ाया गया। बातों बातों में कश्यप ने बताया था कि अगले दिन उसके ब्रांच मैनेजर छुट्टी पर थे। एल्लो, निकल आया हल। हम मैनेजर नहीं हैं तो ना सही, छुट्टी तो हम भी ले सकते हैं। चार में से दो उस आईडिये से खुश थे और दो नाराज थे कि क्यो छुट्टी ली जाये? फ़िर उन्हें समझाया गया कि जहाँ तीस दिन की विदाऊट पे चल रही है, वहाँ इकतीस दिन की होने में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। सबको खुश करना वैसे भी मुश्किल है। 

अगले दिन मैं और राजीव ग्यारह बजे कश्यप की ब्रांच में पहुँच गये। हमें देखकर वो हैरान हो गया और सिगरेट पीते देखकर हमेशा की तरह परेशान भी। मुश्किल से दो घंटे लगे होंगे हमें, उसकी सारी पेंडेंसी खत्म कर दी। बहुत खुश था वो उस दिन और हम भी। भावुक होकर बार बार कह रहा था, "मैं आप लोगों का कैसे धन्यवाद व्यक्त करूँ?"  मैंने माहौल को हल्का करने के लिये कहा, "मेरे लिये एक सिगरेट मंगवाकर।"  उस दिन उसने सिगरेट के दोष नहीं बताये, खुद भागकर गया और सिगरेट लेकर आया। बाहर जाकर हम लोगों ने  एक साथ लंच किया,  हमारी तरफ़ से फ़ेयरवैल ट्रीट।  स्टेशन पर हमें गाड़ी तक छोड़ने आया।  गाड़ी में अभी टाईम था, हम प्लेटफ़ार्म पर  टहल रहे थे तो मुझे बहुत हँसी आई, जब फ़िर से मेरे लिये सिगरेट लेकर आया। हम लौट आये, कुछ दिन के बाद  वो दूसरे बैंक में प्रोबेशनरी ओफ़िसर बनकर चला गया।

आसपास की शाखाओं में एक नया किस्सा प्रचलित हो गया कि हिन्दुस्तान में मजदूरी बहुत सस्ती है। लोग एक सिगरेट तक में बिक जाते हैं। हैड ओफ़िस में हमेशा की तरह ऐसी खबरें भी पहुंच जाती रहीं। लोग चटखारे ले लेकर हमसे पूछते थे कि क्या ये सच है और मैं और राजीव एक दूसरे को देखते थे और जोर से हँस देते थे। बाकायदा ऑफ़र आते थे कि  फ़लाँ काम पेंडिंग है, आ जाओ किसी दिन। बहुत छेड़ा हम लोगों को जालिम लोगों  ने। 

हाँ, याद आया, आज पूरी बात ही पढ़ लो। शायद दो साल के बाद कश्यप की शादी में जाना हुआ था। तब तक हम सब इधर ट्रांसफ़र होकर आ चुके थे, एक तरह से उसकी शादी को हम उस दौर के बैचमेट्स का  रि-यूनियन समझ लीजिये। उसकी शादी से ज्यादा क्रेज़ सबको एक दूसरे से मिलने का था। खाने-पीने का दौर चला, पिछली बातें निकलीं तो ये बात भी निकल आई। उस दिन पहली बार ऐसा हुआ कि ये एक सिगरेट में बिकने वाला किस्सा उस समय दुहराया गया जब दोनों पक्ष मौजूद थे। किस्सा कहने के बाद जब सच्चाई पूछी गई तो मैं और राजीव फ़िर से एक दूसरे को देखकर जोर से हँस दिये। कश्यप जरूर जोर से बोला, "बकवास है सब।" हम जानते थे कि वो ज्यादा घुमाफ़िराकर बातें नहीं करता, मजाक भी नहीं समझता,  टु द प्वाईंट रहने वाला आदमी है। और कोई मौका होता तो हम भी सबके साथ मिलकर उसे खींचते लेकिन उस समय तो उसी की शादी में गये हुये थे इसलिये उसे शांत रहने की कहने लगे।

वो बोला, "बकवास है ये एक सिगरेट में बिकने वाली बात और आप भी खंडन नहीं करते। आप से ऐसी आशा नहीं थी। चुप रहना भी झूठ को बढ़ावा देना है। दो सिगरेट पिलाईं थी आपको, स्टेशन वाली क्यों भूलते हैं आप?"

राजीव और मैंने दोनों ने एक साथ  कहा, "हाँ यार, ये बात तो सही है।"

क्या कहते हैं आप? गाड्डी पटरी पे ही है न अब :)

(पात्रों के नाम बदले गये हैं)
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पिछले दिनों एक सामूहिक ब्लॉग पर कुछ असहमतियाँ हुई थीं। फ़िर पता चला कि हम  लोगों  ने फ़र्जी ईमेल आई.डी. और ब्लॉग वगैरह बना रखे हैं ताकि दूसरों को गालियाँ दी जा सकें। अलग से पोस्ट लिखकर या जवाब  देने की बजाय यही कहना सही लगता है कि  "हाँ यार, ये बात तो सही है।"       :)

गुरुवार, दिसंबर 01, 2011

नशा है सबमें मगर रंग नशे का है जुदा........


"गीत लिखने वाले ने ठीक लिखा है, मतलब निकालने वालों ने भी ठीक मतलब निकाला है। अन्ना का फ़ार्मूला भी ठीक है और इस बात पर अन्ना की खिंचाई करने वाले भी ठीक हैं।
लिखने वाले, कहने वाले इतना कुछ लिख कह गये हैं कि हर कोई अपने मतलब की बात निकाल ही लेता है।
 अनुराग जी का ये कहना "जिन्होने समाज-सुधार में थोड़ा भी योगदान दिया है वे उनसे तो बेहतर ही हैं जिन्होने कुछ नहीं किया" बिल्कुल ठीक है।
8 A.M. वाली हमारी ये टिप्पणी पता नहीं ठीक है या नहीं:)"
ये कमेंट किया था अंशुमाला जी की पोस्ट पर ’नशा शराब में होता तो......’
http://mangopeople-anshu.blogspot.com/2011/11/mangopeople.html?showComment=1322361489913#c6657040222165410415 ,
लेकिन वो फ़ंस गया था स्पैम में तो सोचा कि चलो आज इसी पर सही। मेहनत बरबाद न हो, इसलिये इतनी मेहनत और कर ली। फ़िर  किसी वजह से पोस्ट नहीं कर पाया था और अब तो कमेंट भी दिख रहा है। लिख दिया था तो अब छाप भी देते हैं कौन सा पैसे लग रहे हैं अभी?  :))
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जहाँ तक मेरी जानकारी है, ये गीत प्रकाश मेहरा ने लिखा था। वही प्रकाश मेहरा, जिन्हें हम एक मसाला फ़िल्ममेकर के नाम से जानते हैं। इस गीत से भी ज्यादा लावारिस फ़िल्म के कैबरे डांस वाले गीत ’अपनी तो जैसे-तैसे’ के शब्दों ने मुझे बहुत प्रभावित किया था। उस गीत को अगर आप बिना देखे हुये सुनें तो उसका एक अलग ही प्रभाव पायेंगे।  अवैध रिश्तों के नतीजे के रूप में पैदा हुई, पली बढ़ी इंसानी नस्ल के दर्द को बहुत नफ़ासत से बयान किया गया है। कमर्शियल सिनेमा की मजबूरियों के चलते इस गाने को फ़िल्माते वक्त यकीनन दिल से बहुत बड़ा समझौता किया गया होगा। मैं इस गाने को देखने की जगह ऑडियो फ़ार्मेट में सुनना ज्यादा  पसंद करता हूँ, आखिर दिल तो है दिल, दिल का ऐतबार क्या कीजै:)

बात करें नशे की तो ये भी मजे की तरह किसी का गुलाम नहीं। नशे का मायना सबके लिये अलग अलग है।  शराबी को शराब से नशा होता है तो किसी को सत्ता से नशा होता है। किसी के लिये रूप से बड़ा कोई नशा नहीं तो किसी के लिये धन सबसे बड़ा नशा है। असली बात है नशे का असर, वो असर आपको कहाँ लेकर जा रहा है, ये बात ज्यादा मायने रखती है।   बातों का नशा भी है और मुलाकातों का नशा भी है, और तो और मुक्का लातों का नशा भी होता है। समाजसेवा, परोपकार ये भी तो नशे से कम नहीं? शक्ति का नशा होता है तो भक्ति का भी नशा ही होता है। ये  जो पीर-पैगंबर और हमारे दूसरे नायक हुये हैं, वो भी चाहते तो हम लोगों की तरह लीक पर चलते हुये जिंदगी बिता सकते थे। घर से बेघर होकर कहाँ कहाँ की यात्रायें की, किसी ने जहर पिया, किसी ने गोली खाई, कोई फ़ाँसी चढ़ा। कोई जलते तवों पर बैठाया गया, किसी को हाथी के आगे फ़ेंका गया। उनकी रूह पर भक्ति का नशा न होता तो ये सब संभव हो सकता था?  

गुरू नानक देव जी द्वारा की गई यात्रायें चार उदासियों  के नाम से जानी जाती हैं। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान वो सिद्धों के इलाके में पहुँचे। अपने वर्चस्व वाले इलाके में एक नये साधु का आना सुनकर उन्होंने एक बर्तन भेजा, जो लबालब दूध से भरा हुआ था।  लाने वाले ने वो बर्तन पेश किया और चुपचाप खड़ा हो गया, गुरू साहब ने उस बर्तन में गुलाब के फ़ूल की पंखुडियाँ डाल दीं जो दूध के ऊपर तैरने लगीं। इन यात्राओं में बाला और मरदाना उनके सहायक के रूप में शामिल थे। ये माजरा उन्हें समझ नहीं आया तो फ़िर गुरू नानक देव जी ने उन्हें समझाया कि सिद्धों ने उस दूध भरे बर्तन के माध्यम से यह संदेश भेजा था कि यहाँ पहले से ही साधुओं की बहुतायत है, और गुंजाईश नहीं है। गुरूजी ने गुलाब की पंखुडि़यों के माध्यम से यह संदेश दिया कि  इन पंखडि़यों की तरह दूध को बिना गिराये अपनी खुशबू उसमें शामिल हो जायेगी, अत: निश्चिंत रहा जाये। उसके बाद दोनों पक्षों में प्रश्नोत्तर भी हुये। सिद्धों ने एक प्रश्न किया था कि आप ध्यान के लिये किन वस्तुओं का प्रयोग करते हैं? उत्तर देते हुये गुरू नानक देव जी ने कहा था, "नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात"  कि प्रभु नाम सिमरन की ये खुमारी दूसरे नशों की तरह नहीं कि घड़ी दो घड़ी के बाद उतर जाये। ये तो वो नशा है जो एक बार चढ़ जाये तो दिन रात का साथी बन जाता है।

अब एक किस्सा शराब और शराबी पर, खुद सुना-सुनाया। हमारे एक भूतपूर्व गार्ड फ़ौज की पेंशन लेने हर महीने एक या दो तारीख को अपने पैतृक गाँव वाले बैंक में  जाया करते थे। उनका कहना था कि इस बहाने कम से कम महीने में एक बार बूढ़े माँ-बाप, भाईयों के परिवार से मिलना हो जाता है। उनका गाँव हरियाणा-राजस्थान  सीमा पर पड़ता था। उस इलाके में एक जाति विशेष रूप से  इस कुटीर उद्योग में संलग्न थी। कई बार इस बात का जिक्र कर चुके थे।  एक बार गार्ड साहब पेंशन लेकर लौटे तो दो तीन दिन तक उनकी तबियत कुछ नासाज़ दिखी। दरियाफ़्त करने पर उन्होंने कुछ इस तरह बताया।

"इस बार पेंशन लेने गया तो बैंक में ही एक पुराना मित्र मिल गया, जो कुछ साल किसी डाक्टर के पास कंपाऊडरी करने के बाद अब  गाँव में  अपनी डाक्टरी पेल रहा था(क्लैरिफ़िकेशन - गीता है नहीं मेरे पास, न तो उस पर हाथ रखकर कसम खा लेता कि  डाक्टरी ही बताया गया था)। बैंक के काम से फ़ारिग होकर दोनों दोस्तों ने जिन्दगी के गम दूर करने की या इस मुलाकात को सेलिब्रेट करने की सोची। डाक्टर ने कहा कि आज तुझे ’झीणी’ के हाथ की खींची हुई शराब पिलाता हूँ। जालिम क्या तो खुद है, और क्या शराब खींचती है..बिना पिये अंदाजा लगाना मुश्किल है। हमने भी सोची कि सरकारी उचित दर वाली दुकान से तो रोज पीते हैं, आज स्वदेशी, स्वावलंबी, कुटीर उद्योग वाली  ही सही।  वैसे भी डाक्टर सिफ़ारिश कर रहा है तो पहुँच गये उस ठीये पर अपने और पूरे जहान के गम गलत करने। पूरी बस्ती में कम से कम बारह पन्द्रह घर थे जिन्होंने घर के पिछवाड़े में गड्डे बना रखे थे और उन गड्डों में शराब बनने बनाने की सतत प्रक्रिया चलती रहती थी।

अपने पसंदीदा अड्डे पर पहुँचकर डाक्टर ने आवाज लगाई, "ओ झीणी, देख आज नया बंदा लेकर आया हूँ। तेरी इतनी तारीफ़ की है इसके आगे, नीचा न दिखा दियो मन्नै।" 

चहकती हुई झीणी बाहर आई "कौण डाक्टर सै के?" 

दो ही मिनट में झूलती टेबल और हिलती कुर्सियों के साथ मैचिंग करता एक लबालब भरा हुआ जग और दो गिलास लेकर झीणी हाजिर हो गई। डाक्टर ने जेब से तली मूँगफ़लियों का पैकेट निकाला और हम दोनों शुरू हो गये। डाक्टर घूँट घूँट पीने के बाद ’जियो झीणी रानी’ का नारा लगाता था। मुझे स्वाद अटपटा सा लगा लेकिन डाक्टर को सुरूर में आते देखकर मैं भी धीरे धीरे घूँट भर रहा था। बचपन का दोस्त बहुत दिनों के बाद मिला था, शायद डाक्टर ज्यादा ही जोश में आ गया था। एकदम से पूछने लगा, "मैंने यहाँ सबके ठियों पर चखकर देख रखी है, लेकिन झीणी रानी, तेरी शराब में बात ही कुछ अलग है। कई बार पूछा है तुझसे, आज बता ही दे कि अलग से इसमें  क्या मिलाती है तू? बोल न,  तुझे मेरी कसम है आज। मेरे दोस्त के सामने मन्ने नीचा न दिखा दियो।" अब बात ये है जी, लुगाई जात ऐसी ही होवे है कि जहाँ अपनी कसम दे दो, फ़ट्ट से  पिघल जावै है। झीणी भी पिघल गई और बोली, "डाक्टर, तू भी न बस्स...।  देख, माल मसाला तो सब जगह एक सा ही डले है, मैं तो अपनी जानूँ हूं कि जद से ब्याह के इस घर में आई हूँ, रोजी रोटी की कसम है मुझे अगर मन्ने एक बार भी इस गड्डे के अलावा कहीं और मूता हो।"

मैंने अब तक जो दो चार घूँट भरे थे, सूद समेत टेबल पर उलट दिये और डाक्टर की दिप दिप करती आँखें पता नहीं इस बात से खुश थीं कि झीणी ने उसे नीचा नहीं दिखाया  या  इस बात से कि उसके बचपन का दोस्त शहर  वाला होकर देसी चीजों को पचाने की अपनी शक्ति खो बैठा है। मैं उठ रहा था और वो मेरा हाथ पकड़ कर बैठा रहा था, एक जग और पियेंगे। बार बार कहता था कि झीणी ने उसकी बात का मान रखा है और सीक्रेट फ़ार्मूला बता दिया है।  "बकवास मत कर तू।  आज माँ बाबू से मिले बिना ही वापिस जा रहा हूँ, कह दियो उनसे कि एकदम से कोई जरूरी काम आ गया था।"

बाद का हाल पूछने पर गार्ड साहब ने इस वाकये का सबक ये बताया कि गाँधी बाबा महान थे। उनके बताये तीन बंदर भी महान थे। न बुरा देखो, न बुरा सुनो और न बुरा बोलो। मैंने यूँ ही पूछ लिया कि काम तो एक ही बंदर से चल सकता था जिसकी मार्फ़त ये संदेश मिलता कि बुरा मत करो?  ड्यूटी ऑफ़ किये काफ़ी देर हो चुकी थी, आज सरकारी उचित दर के ठेके के सेवनदार बने हुये गार्ड साहब ने कहा, "इस सारी बात से आपने कोई सबक नहीं सीखा। फ़ालतू के सवाल करने से सेहत को नुकसान पहुँच सकता है, जैसे डाक्टर के सवाल से हुआ। महान लोगों ने जो कह दिया, चुपचाप से उसे मान लो और मान नहीं सकते तो भी संकट के समय में उनके बोले डायलाग बोल दो। बातों का पालन उतना जरूरी नहीं है जितना मौके-बेमौके पर उनका बोला जाना।   

याद आ रही हैं ये सब बातें और लग रहा है कहीं मीडिया ने जरूर वो क्लिपिंग डिस्टार्ट या एडिट कर दी होगी जिसमें एक गाल पर तमाचे के बाद गाँधीजी को याद करते हुये फ़ौरन दूसरा गाल आगे बढ़ाया गया होगा.........।.......सरदारजी ने पद संभालते ही जो टेक लगाई थी ’देहि शिवा वर मोहे इहै, शुभ करमन से कबहुँ न टरूँ’ बराबर पूरी कर रहे हैं। साझीदार के  एक थप्पड़ लगते ही खुद फ़ोन लगाकर हालचाल पूछा,  इससे ज्यादा और क्या कर सकते हैं?........कसाब के 26\11 को तीन साल हो गये हैं, सिल्वर जुबली पता नहीं कितने साल में मानी जाती है आजकल?  कानून अपना काम करेगा -yes, law will take its own course. .........जो हमसे टकरायेगा, चूर चूर हो जायेगा।....... केजरीवाल तो लपेटे में आ ही  गये थे, अब क्रेन बेदी, हो जाओ तैयार, मुकदमेबाजी के लिये।............. रामदेव, बालकिशन, अलानो  फ़लानों, यू आल डिज़र्व दिस ट्रीटमेंट। सबकी फ़ाईलें तैयार हैं।  समझते ही नहीं गाँधीजी के तीन बंदर वाला इशारा...।.......झीणी बाई, तुझे सर्च करता हूँ फ़ेसबुक पर और दूसरी साईट्स पर, हौंसला न छोड़ियो और जारी रहियो अपने कुटीर उद्योग में  वैल्यू एडीशन करने में।   यू.पी. वालों के बाद हरियाणा पंजाब के दलितों पिछड़ों के घर भी सवारी तशरीफ़ ला सकती है,  कभी तो वोट यहाँ भी पड़ेंगे.......हो सकता है झीणी बाई के ठीये पर ही अबकी बार.................... .......सरकार किसानों का भला करके ही मानेगी, एफ़ डी आई पर पीछे नहीं हटना है जी.............जनता साली पागल कहीं की, समझती है नहीं कुछ  और बरगलाये में आ जाती है.................बिचौलियों को उनकी औकात दिखा देनी है इस बार...............कनिमोझी छूट गई.....मालेगांव वाले छूट गये.....law will take its course..............ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर, तेरे पैर न छोड़ेंगे...................और इशारा करो जी आप तो, गद्दी जायेगी तो जाये.................तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा............

इतनी बार नशा नशा लिखा गया है मुझसे कि  गम और भी गलत होता जाता है:)) सरकार राशन कार्ड में कैरोसीन के साथ इसका भी कोटा बाँध दे तो कैसा रहे?  खाओ-पियो करो आनंद  और .....................

शुक्रवार, जून 10, 2011

Banks of Bharat(Bharat that is India) क्षोभास्य:)


बैंकों का मुख्य काम(कागजों में)  जनता का पैसा जमा के रूप में स्वीकार करना और उसी पैसे को वैध तरीके से अर्थव्यवस्था के विकास के लिये ऋण के रूप में वितरित करना होता है। ये अलग बात है कि कहीं कहीं कुछ समझदार लोग  ’बिट्वीन द लाईंस’ का मतलब समझकर  फ़ॉड, गबन आदि वीरोचित  कार्य भी कर दिखाते हैं।   पिछले कुछ सालों में महाराष्ट्र(अकेला प्रदेश नहीं है, लेकिन अग्रणी है)  में सहकारी संस्थाओं\बैंकों के जरिये ऐसे सफ़ल प्रयोग हुये हैं और जिस प्रकार हर सफ़ल पुरुष के पीछे कम से कम एक स्त्री का होना बताया जाता है, उसी प्रकार प्राय: इन धोखाधड़ियों के पीछे कम से कम एक कैबिनेट मंत्री या ऐसे ही किसी प्रभावशाली का होना बताया जाता है। 

सरकार अपनी तरफ़ से हर कोशिश करती है कि जी.डी.पी. बढ़ती रहे, अर्थव्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे और इसके लिये बैंकों का इस्तेमाल एक औजार के रूप में किया जाता है। जब सही लगा था, तब राष्ट्रीयकरण किया  गया और जब सही लगा तो निजीकरण किया जा रहा है। सरल शब्दों में सरकार\सत्ता जो भी करती है, उसे सही मान लेना चाहिये इससे  दिन का चैन और रातों की नींद नहीं उड़ती है। यूँ भी हम लोग सरकार के गुलाम हैं, बैंगन के नहीं।(अकबर-बीरबल से साभार)

इसके अतिरिक्त भी सरकार  आवश्यकतानुसार(चुनाव के समय को ध्यान में रखकर)  कर्जमाफ़ी, ब्याज सब्सिडी वगैरह के माध्यम से जनता को राहत पहुँचाती रहती है और    जनता का सद्चरित्र रहना   सुनिश्चित करती है।(वोट डलने तक)

हमें चाहिये कि सरकार के प्रयासों को सही परिपेक्ष्य में लें और  ख्वामख्वाह की चिल्ल-पौं न मचायें। अगर किसी ने मचाई तो हमारा तो कुछ नहीं जायेगा लेकिन  उसपर कट्टरवादी, तमाशेबाज, मजमेबाज, ठग, धोखेबाज आदि होने का आरोप न सिर्फ़ मढ़ा जायेगा बल्कि साबित भी कर दिया जायेगा। और यदि कहीं चिल्ल्पौं(er)  भगवा या मिलते जुलते रंग के कपड़ों से सुसज्जित पाया गया तो उसे भगवा आतंकवादी भी मान लिया जायेगा, फ़िर न कहना कि चेताया नहीं।


DISCLAIMERS:
1.    बैंक में नौकरी करता हूँ, सो बैंक के बारे में लिखा है। सीधे सीधे बोलो तो पायजामे में रहने की कोशिश की है। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि (हर) किसी को मिर्चें नहीं लगेंगी।
2.     भारत का रहने वाला हूँ, इसलिये सिर्फ़ भारतीय बैंकों की बात की है। इसका(और मेरा भी) स्विस बैंकों, कालाधन आदि आदि से कुछ लेना देना नहीं है।
3.     इस लेख की और लेखक(मेरी)  की विश्वसनीयता बिल्कुल भी असंदिग्ध नहीं है, क्योंकि अर्थव्यवस्था में अपना योगदान तीस तारीख से पहले थैला भरकर तनख्वाह लेने और साल छह महीने में एकाध हड़ताल करने तक सीमित है।