बात पुरानी ही है, हजारों साल पुरानी न सही लेकिन हजारों दिन पुरानी तो होगी ही। हमारे एक बॉस हुआ करते थे, अभी तो रिटायर्ड लाईफ़ बिता रहे हैं। दिल के बहुत वड्डे, कर्मठ, उत्साही, जुगाड़ी। बॉसपना छूकर नहीं गया था उन्हें, सब सहकर्मियों के साथ मित्रवत व्यवहार ही रखते थे । स्वभाव की बात करें तो अपने से एकदम उलट थे, हम न मदद लेने में यकीन रखने वाले न मदद देने में और वो आधी रात को भी कोई साथी फ़ोन कर देता तो कैसी भी मदद करने को तैयार। इसी तरह से जरूरत पड़ने पर मदद मांगने में भी नहीं हिचकते थे। बैक की नौकरी के अलावा पार्टटाईम में प्रापर्टी का काम भी कर लेते थे, उस पुराने जमाने में कमाई का एक अच्छा जरिया एस.टी.डी. कनैक्शन भी किसी के नाम से ले रखा था। दूसरों को भी पैसे कमाने के नुस्खे बिना फ़ीस लिये बताते रहते थे।
एक पियन साथी को एक दिन कहने लगे कि यहाँ से छुट्टी होते ही गांव भाग जाता है, क्या करता है वहाँ?
वो बताने लगा, "करणा के सै जी, जाके हाथ मुंह धोके चार भाईयां गेल बोल बतला ले सैं, हुक्का-पानी पी ले सैं, बस।"
"तो शाम को दो तीन घंटे सब्जी की रेहड़ी लगा लिया कर, सौ-पचास रोज के बन जाया करेंगे बाहर बाहर ही।"
अब हरियाणा के आदमी को आप जानो ही हो, उधार नहीं रखता अपने सिर। वो बोला, "आप एक काम करो जी, एक झोटा बांध लो। दिन में एकाध भैंस भी नई होण तईं ल्याओगा कोई तो सौ पचास आपके भी बन जायेंगे बाहर बाहर से।"
बॉस हमारे बुरा नहीं मानते थे, जानते थे दुनिया ऐसी ही है। इसके बाद भी स्कीमें बनाते रहते थे, बताते रहते थे। हमें भी दो चार स्कीमें बताईं लेकिन हम तो टालते रहे। उन दिनों वो अपने बच्चों को सैट करने के लिये एक गैस्ट हाऊस बनाने के प्रोजैक्ट में जुटे हुए थे। बड़ा प्रोजैक्ट था, खूब पैसा लग रहा था।
उन्हीं दिनों की बात है,एक दिन कहने लगे कि सरसों का सीज़न है। कुछ पैसा उधर लगाया जाये तो अच्छा फ़ायदा होगा। अभी खरीद लेते हैं, दो चार महीने बाद मुनाफ़े पर बेच देंगे। उनके पैतृक शहर में कई आढ़ती उनके जानकार थे, क्वालिटी पहचानने न पहचानने की कोई समस्या नहीं और न ही खरीदने-बेचने के समय मंडी जाने की समस्या। अपनी ही प्रोपर्टी में सरसों रख दी जायेगी, किराया भाड़ा भी कुछ नहीं। पहले उसी बाहर बाहर वाले साथी को तैयार करने का जुगाड़ किया। उस भले आदमी ने गेंद मेरी तरफ़ सरका दी कि संजय भी व्यापार में शामिल हो तो वो भी थोड़ी घणी पूँजी लगा देगा। सच बात तो ये है कि उस सरसों खरीद के विवरण जानकर मैं भी बाहर बाहर से कुछ कमाने के लिये कन्विंस हो चुका था।
घाटे का तो कोई चांस था ही नहीं, संयुक्त परिवार में रहने वाला मैं अब इस सोच में पड़ गया कि ये बंपर मुनाफ़ा मैं अकेले अकेले खा जाऊं तो नैतिक रूप से वो सही होगा या नहीं? ’जहाँ चाह वहाँ राह’ वाली तर्ज पर राह निकाली कि पूँजी पिताजी से ली जाये, मुनाफ़ा जो होगा वो भी पिताजी तक ही पहुँचाया जाये, माल मालिकों का, मशहूरी कंपनी की। डील हो गई और बॉस के पचास हजार और हम दोनों जूनियर पार्टनर्स के पच्चीस-पच्चीस हजार की आरंभिक पूँजी से ’ईर बीर फ़त्ते’ फ़र्म अघोषित रूप से व्यापार में कूद गई।
पहले ही बता चुका कि कई हजार दिन पहले की बात है, इसलिये करबद्ध प्रार्थना है कि हमारे हिस्से की पच्चीस हजार की रकम पर ज्यादा ध्यान न दिया जाये। अरे भई, पुरानी फ़िल्मों में इतनी रकम की फ़िरौती की माँग के कई उदाहरण मिल सकते हैं।
हमारे सामने ही एक आढ़ती से फ़ोनपर सरसों खरीद लेने की पुष्टि हो गई। हालाँकि खरीद दर अखबार में दिये गये रेट से कुछ ज्यादा लगी लेकिन बताया गया कि अखबार में तो स्टैंडर्ड रेट आते हैं, हमारे नाम पर खरीदी गई सरसों हाई क्वालिटी की थी इसलिये रेट ज्यादा है। व्यापार के गुर धीरे धीरे ही आते हैं। अब हम लोग अखबार में ’बलात्कार’, ’हत्या’, ’चार बच्चों की माँ आशिक के साथ भागी’ जैसे समाचार बाद में देखते थे, उससे पहले ’आज के भाव’ में सरसों का रेट देखते थे। आने वाले समय में सरसों की माँग उठ सके, इस मिशन के तहत अपने और अपनों के घरों में सरसों के तेल का और दूसरे उत्पादों का प्रयोग बढ़ाने के तमाम प्रयास शुरू कर दिये गये।
महीना भर हुआ था कि बॉस ने बताया कि उनकी जिस प्रापर्टी में सरसों का भंडारण किया गया था, उस प्रापर्टी को बेचना पड़ गया है। अब एक विकल्प है कि सरसों जिस भाव बिके, बेच दी जाये या फ़िर उसके भंडारण के लिये किराये की जगह ली जाये। चूँकि अभी सीज़न चल रहा था, सरसों ऊंचे भाव पर बिकनी नहीं थी, फ़र्म ने फ़ैसला लिया कि किराये की जगह पर सरसों का भंडारण किया जाये।
चार पांच महीने बीत गये थे, अखबार बता रहे थे कि सरसों के प्रति क्विंटल भाव कम से कम साढ़े चार सौ रुपये ज्यादा हो चुके थे, बिग पार्टनर से कहा गया कि सरसों बिकवा दी जाये। आढ़ती को फ़ोन पर कह दिया गया। ये कहना सुनना कई दिन तक चलता रहा। इधर आढ़ती के यहाँ कभी ये पंगा कभी वो पंगा शुरू हो चला था, उधर अखबार में सरसों के भाव गिरने शुरू हो चुके थे। एक दिन गरमागरमी में कहा गया कि जिस रेट पर निकले, इसे निकलवाओ। वो निकाली गई, बेईज्जत होकर निकली तो उसने भी कसर पूरी निकाली। वैसे भी खरीद के समय अखबार रेट से ज्यादा का आरोप था तो इस बार अखबार रेट से कम पर निकली। कई हिसाब बराबर हो गये। अब वहाँ से पेमैंट और हिसाब आने का इंतजार था, हफ़्ते दो हफ़्ते में वो कयामत की घड़ी भी आ गई, जब सब हिसाब किये जाने थे।
खरीद पर कमीशन, बिक्री पर कमीशन, किराया-भाड़ा, दामी, बारदाना (कई शब्द मैंने पहली बार सुने) वगैरह वगैरह काटकर हिसाब समेटा गया तो अपने हिस्से में सिर्फ़ बाईस सौ रुपये का घाटा आया। पूँजी पिताजी की लगवा रखी थी तो उन्हें घुमाफ़िराकर पच्चीस हजार पर तीन सौ का लाभ दिया क्योंकि अपना रेट तो दस परसेंट का है, घाटा हो या फ़ायदा।
हम सरसों के व्यापारी के रूप में अपने फ़्रेंड्स सर्किल में बहुत मशहूर हुये। कई महीनों तक लोगों के मनोरंजन का साधन बने रहे। लोग चाय सिगरेट मंगवाते थे, आधी पी चुके होते तब जालिम लोग पूछते, "और सरसों का व्यापार कैसा रहा?" न आधी पी जाती, न उगली जाती। सबसे ज्यादा मजे भोला द ग्रेट लेता था, "मैं सौ रुपये मांगता तो देने से पहले मुझे सौ बात सुनाते थे, हुण आया न स्वाद पच्चीस सौ रुपईये दा घाटा खाके? वड्डे ब्योपारी बनण चले सी" और यहीं नहीं, जब जब घर आता तो मेरे लाख मना करने के बाद भी पिताजी के सामने भी बात छेड़ता, "संजय बाऊ, दुबारा सरसों कब लेणी है?" मैं आँखों-आँखों में डाँटता रहता और वो चाय पीता रहता और हँसता रहता।
उस सच्चे सौदे के बाद बॉस की और उस हरियाणवी साथी ’अभय सिंह’ की नोंक-झोंक खूब चलती रही। एक दिन अभय सिंह बॉस पर भारी पड़ रहा था कि आपको आढ़ती की पहचान ही नहीं थी और बॉस ने मायूस सा होकर कहा, "यार, मुझे तो वो आढ़ती एकदम सीधा-सादा लगा था। गोरा-चिट्टा, मासूम सा।" अभय एकदम से भड़क गया, "यो पैहचाण सै सही गलत की? देखण में गोरा चिट्टा था तो हमने के उसकी पप्पी लेणी थी?"
आप भी सोचेंगे कि इस मो सम को ये बात आज कैसे याद आई? अखबार में पूरे पेज पर राहुल की फ़ोटो और प्रोफ़ाईल देखकर माताजी मुझसे कह रही थीं, "ओय संजय, इसका भी जन्म 1970 का ही है, तेरे जितना ही है ये।" माँ है न, नहीं जानती कि इतने से शब्दों से कितना बड़ा मानहानि का केस बन सकता है। फ़िर बात चली तो कहने लगीं कि बच्चा दिखता एकदम से सीधा साधा है, छल कपट से दूर। माँ है न, नहीं जानती कि किसी के दिखने या लगने से जिस जिम्मेदारी की अपेक्षा लगा लेते हैं हम लोग, उसके लिये सीधा-सादा होना या दिखना ही बहुत नहीं होता।
उसके दिखने वाली बात पर मुझे अपने पुराने बॉस, अभय और वो गोरा चिट्टा आढ़ती याद आ गया, माँ ने पूछा भी कि हँसता क्यों है, क्या बताता उसे? ऐसी बातें सिर्फ़ दोस्तों के साथ ही तो हो सकती हैं न...
बहुत दिन हुये गाना नहीं लगाया था, चलो आज यही सही:)