कुछ दिन पहले की बात है, बुद्धू-बक्से पर फिल्म अभिनेता अक्षय खन्ना का इंटरव्यू आ रहा था| विनोद खन्ना-अक्षय खन्ना और धर्मेन्द्र-सन्नी दयोल ये पिता-पुत्र की वो दो जोडियाँ हैं जो मुझे अच्छी लगती हैं, शायद इसी पसंदगी के चलते उस इंटरव्यू का थोडा सा हिस्सा देख लिया| एंकर ने सवाल किया, "क्या वजह है कि इतना अच्छा एक्टर होने के बावजूद आप उतने सफल नहीं हुए जितने शाहरुख खान, आमिर खान ....?" इसका जवाब देते हुए अक्षय थोडा सोचकर बोला, "एक बात बताईये, अगर मैं व्यापार कर रहा हूँ और मेरे पास पांच सात सौ करोड़ का बिजनेस है| अब मुझे इसलिए सफल न माना जाए कि मेरी वैल्थ अम्बानी से कम है तो क्या ये ठीक है?" बात मुझे तो दमदार लगी| सफल होने का पैमाना सबके लिए एक कैसे हो सकता है? अब एंकर महोदया ने फिर से घुमाकर पूछना शुरू किया, "इसकी वजह क्या ये है कि आप दूसरों की तरह खुद को प्रोमोट नहीं करते? आप अकेले रहना पसंद करते हैं, आप लोगों से मिलना जुलना पसंद नहीं करते, आप के बारे में लोग कहते हैं कि आप सोशल नहीं हैं, वगैरह वगैरह|" अक्षय थोडा सा असहज दिखे भी लेकिन हर बात का उन्होंने बड़े सलीके से जवाब दिया मसलन दूसरों के खुद को प्रोमोट करने को वो बुरा नहीं मानते, जिसे जैसा पसंद है वो वैसा कर सकता है| और दूसरी बातों के जवाब में अक्षय ने कहा, "ऐसा नहीं है कि मुझे लोगों से मिलना जुलना पसंद नहीं है, मैं अपने दोस्तों, अपनी फैमिली और बहुत से दूसरे लोगों की कंपनी भी बहुत एंजाय करता हूँ| हाँ, लोग अकेलेपन से दूर भागते हैं, मुझे दो दिन, चार दिन, हफ्ता अकेला रहना पड़ेगा तो मैं उसे भी बहुत एंजाय करता हूँ| अपने गार्डन में काम करता हूँ, साईकिल लेकर मैं बाहर निकल जाता हूँ और ये सब करने में मुझे बहुत खुशी मिलती है|"
असली बात ये है कि खुशी के मायने सबके लिए एक जैसे नहीं हो सकते| सबके अपने अपने अनुभव, अपने अपने आग्रह, अपनी अपनी खुशी और अपने अपने गम| अपनी पसंद है अक्षय खन्ना, ये तो ऊपर बता ही चुका हूँ लेकिन उस इंटरव्यू के बाद पसंदगी का ये ग्राफ और ऊपर उठा| 6-8 pack-ab बेशक न हों, होंठों पर दोनों हाथ रखकर ooooooooooh की सिस्कारियां भरती छूने छुआने को आतुर फैन्स बेशक न हों, ओछी हरकतों से मीडिया का ज्यादा ध्यान बेशक न खींचता हो, ऐसा जरूर लगा कि एक परिपक्व और सुलझा व्यक्तित्व है इसके पास| मुझे अक्षय एक बहुत ही सहज और सरल चरित्र लगा, ये अलग बात है कि दुनियादार लोग ऐसे मामलों को अजीब या जटिल मानते हैं| लेकिन फिर वही बात सोचता हूँ कि दुनिया ही सरल लोगों के हिसाब से क्यों चले?
बात पुरस्कारों से ही संबंधित है, एक पोस्ट पहले लिख ही चुका हूँ| सोचा था अब इस मामले में नहीं लिखूंगा लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता कि सोचा हुआ हो ही जाए| प्लान ये था कि परिकल्पना वाले उस सुझाव या खिंचाईनुमा उस पोस्ट से समझ जायेंगे कि इस बंदे को अभी वैचारिक नसबंदी नहीं करवानी है और आलसी महाराज के ब्लॉग पर जो परिणाम आया उसकी बिलकुल आशा नहीं थी| वैसे भी परिणाम से ज्यादा निष्कर्ष पर अपना फोकस था| रुझान वगैरह(कितने तो पाठक और कितने मतदाता? लेकिन फिर भी कहा तो रुझान ही जाएगा न:) ) से इतना तो पता चल गया था कि कुछ ने मेरे ब्लॉग को पसंदीदा माना है लेकिन फाईनली जो सामने आया उसकी आशा नहीं थी| मेरे हिसाब से सबसे बड़ा असर उनके यहाँ प्रयोग किये गए निगेटिव मार्किंग वाले नियम से हुआ, अपन दो नम्बरी भये| मुझसे बहुत बहुत अच्छा लिखने वाले इस नियम के चलते सांप-सीढी के खेल की मानिंद सांप के द्वारा(निगेटिव मार्किंग) काटे गए होंगे, ऐसा मेरा अनुमान है|
अब राव साहब ने जो करना था कर दिया, शमा ब्लॉग महफ़िल के अन्य शिरकतकारों के सामने आ गई| आलोचना, प्रत्यालोचना, महालोचना का दौर शुरू हो गया| ये कोई अप्रत्याशित नहीं था, हम भी निस्वार्थ भाव से ये सब करते ही रहे हैं| ये एक ऐसा कर्म है जिसे निभाना हर जागरूक ब्लोगर का धर्म है| ऐसा मौक़ा कौन सा रोज रोज आता है? 'मत चूके चौहान' की तरह जिसे जैसे सुविधा लगी, सब अपनी प्रतिक्रया दे रहे हैं| नौटंकी, किट्टी पार्टी, गोलबंदी, मदारी का तमाशा, एलीट- नॉन एलीट ब्लोगर्स वगैरह कई तरह के नाम इस आयोजन के बाद दिए जा रहे हैं| ये सब जाहिर करता है कि ब्लॉग जगत अभी सोया नहीं है, प्रतिक्रया व्यक्त करता है| कई सवाल उठाये जा रहे हैं लेकिन मेरी राय में रायता अभी ढंग से, तरीके से फैला नहीं है|:) आज अपने पास टाईम था तो इस विषय पर लगाया, सेलिब्रेट करने का अपना तरीका है ये| आईये देखते हैं कुछ बातें -
मेरी सबसे पहली आपत्ति तो उन ब्लोगर्स से है जिन्हें राव साहब ने अपने आयोजन में तीसरे और उसके बाद वाले स्थानों पर आया बताया है| इनमें से एक ने भी विरोध नहीं किया, पुनर्मतदान की मांग नहीं की और शरीफाना ढंग से बधाई सधाई देकर खिसक लिए| सच में एलीट लोग हैं ये सारे, जानते नहीं कि शरीफ दिखना आजकल दब्बूपन की निशानी है| अबे धुरंधरों, मेरे से बाद वाले पायदानों में ला खडा किया आप सबको इस राव साहब ने और इसमें आपको फर्जीवाड़ा नहीं दिखा? 'तुमने चुप रहकर सितम और भी ढाया मुझपर, तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पे हंसने वाले|' हमें इत्ती शर्म आ रही थी और आपमें से किसी ने 'ओब्जेक्शन मी लोर्ड' भी नहीं बोला :(
अब बात करते हैं, हँसने वालों की, ये बंदे अपने को सही लगे| निगेटिव वोट किसे मिले हैं, आयोजक ने ये खुलासा नहीं किया इसलिए आलोचना की जा रही है| खुलासा किया जाता तो विवाद खड़ा करने के नाम पर आलोचना कर लेते| 'बुड्ढा मरे या जवान, ह्त्या से है काम' हम तो आलोचना करेंगे| सोच देखिये कौन सी स्थिति बेहतर होती, निगेटिव वोट प्राप्त ब्लोग्स के नाम बताए जाने वाली या अभी वाली?
एक दूसरी प्रतिक्रिया कई कमेंट्स में देखी कि 'परिकल्पना सम्मान समारोह' से नाम वापिस ले लिया लेकिन 'आलसी सम्मान समारोह' से नाम वापिस नहीं लिया| इस आपत्ति विशेष को खुद से जोड कर देख रहा हूँ| ये तो कुछ वैसे ही सवाल हैं कि सामान उस दूकान से क्यूं लिया और इस दूकान से क्यूं नहीं लिया? आज आपने काली पैंट के साथ गुलाबी शर्त क्यूं पहनी, नीली क्यूं नहीं पहनी? जिस दिन घर में पनीर बना था उस दिन तीन चपाती क्यूं खाईं और जिस दिन लौकी बनी थी उस दिन दो चपाती क्यूं खाईं आपने? निज विचारों की स्वतंत्रता (जिससे किसी दुसरे का कोई नुकसान न होता हो) के अधिकार के अलावा मेरा एक और स्पष्टीकरण है जो अगले प्वाईंट से और स्पष्ट होगा|
एक अन्य आपत्ति है कि जो पहले परिकल्पना से सम्मान ले चुके हैं, वो अब उसे गाली दे रहे हैं और इधर बहुत ज्यादा उल्लासित दिख रहे हैं| - पहली बात तो गाली किसी ने नहीं दी है, सिर्फ असहमति जताई है, दूसरी बात ये है कि क्या सम्मान इसीलिये दिए गए थे कि भविष्य में मुंह बंद रखा जाएगा? मुझे ब्लोगजगत में आये हुए लगभग ढाई साल हो गए हैं, सुनी-सुनाई की जगह अपने ओब्जर्वेसशंस के आधार पर मेरा अंदाजा था कि यहाँ पुरस्कृत किये जाने का एक hidden effect ये भी हो सकता है, कुछ अन्य बातों के अलावा ये भी एक वजह थी कि मैंने वहाँ से नाम वापिस लिया था|
अलेक्सा रैंकिंग, ये रैंकिंग, वो रैंकिंग वाले पैमाने पर नापकर बड़ा छोटा देखने की कवायद भी हो रही है| इतनी तरह की रैंकिंग है तो एक ये भी सही| टेक्निकल जानकारी मुझे न के बराबर है इसलिए इस विषय पर ज्यादा नहीं कहूँगा लेकिन पोस्ट से असंबंधित लेबल्स लगाकर pageviews को मैनेज करने के खेल के बारे में क्या ख्याल है?
आयोजक मदारी और ब्लोगर बन्दर वाली बात पर 'नो कमेंट्स|' कुछ बातों पर चुप्पी से अच्छा कोई जवाब नहीं हो सकता|
इस बहाने कुछ भ्रांतियों पर ध्यान गया हालांकि इन सबका इस आयोजन से कोई लेना देना नहीं है बल्कि आम जीवन में भी इनका अनुभव करता रहा हूँ, आपने भी जरूर किया होगा| औरों की नहीं, अपने ऊपर लेकर ही बात करता हूँ - मैं किसी बात के होने से खुश हूँ तो इसका शर्तिया मतलब ये नहीं होगा कि इस बात के न होने से मैं दुखी महसूस कर रहा होउंगा| किसी के साथ मेरी दोस्ती नहीं है तो इसका इकलौता मतलब ये नहीं है कि मेरी उसके साथ दुश्मनी है ही| सुख-दुःख, लाभ-हानि, दोस्ती-दुश्मनी के बीच एक और बहुत बड़ी जमीन होती है जिसे कभी break-even-point और कभी no-men's-land और कभी कभी 'निस्पृहता' भी कहा जाता है|
अगर मेरा ब्लॉग गिरिजेश राव की सूची में शुरू के बीस स्थानों पर भी न आता तो भी मुझे कम से कम इतनी ही खुशी होनी थी, आपको क्या लगता है तब मैं दुखी होता? या जो ब्लॉग किसी वजह से पीछे रह गए, वो मेरी पसंद से हट जायेंगे? इस आयोजन से मुझे और मुझ जैसों को ये लाभ हुआ कि कम सक्रियता, ज्यादा जगह पर कमेन्ट न करने वाले लेकिन सार्थक लिखने वाले कुछ नए ब्लोग्स का परिचय मिला और यही इस आयोजन की सकारात्मकता है, मेरे लिए| एक अकेले ने आकाश में पत्थर उछाला है, विरोध करने वाले ऊर्जा ही प्रदान करेंगे|
एक दो किताबें फिर से पढ़ी हैं और उनके बारे में कुछ शेयर करने का मन था लेकिन उस मामले में होमवर्क अभी पूरा नहीं हुआ, फिर कभी सही| यूं भी इंतज़ार करने और करवाने की आदत हो गई है अपुन को, so keep waiting:)
p.s. - ये पोस्ट बिना किसी खिन्नता के, बिना किसी क्रोध या वैमनस्य के बिलकुल सही स्पिरिट और सही तबियत में लिखी गई है इसलिए अपनी असहमति, आपत्ति, नाराजगी, आलोचना या उपदेश बेझिझक यहाँ या कहीं और प्रकट कर सकते हैं| वर्तनी की गलतियों की तो कोई बात नहीं लेकिन भाषा की मर्यादा बरकरार रखी जा सके तो हमारे, आपके और सबके लिए अच्छा होगा क्योंकि आपकी भाषा आपके संस्कारों की, आपकी पारिवारिक, शैक्षणिक पृष्ठभूमि की, आपकी मानसिकता की झलक दिखलाती है|