गुरुवार, फ़रवरी 10, 2011

बात एक और मायने दो...


एक गज़ल लगाई थी कभी अपनी एक पोस्ट में, ’चमकते चाँद को टूटा  हुआ तारा बना डाला,’  फ़िल्म थी आवारगी और गाने वाले थे गुलाम अली साहब। चाँद, टूटा-फ़ूटा, आवारगी और गुलाम अली, इन चारों में अपनी पसंद के हिसाब से रैंकिंग देनी हो तो चारों संयुक्त विजेता सिद्ध हो जायें। चारों एक से बढ़कर एक पसंदीदा चीजें हैं अपनी।  यही वजह थी कि गज़ल बहुत पसंद थी, है और रहेगी। एक लाईन है इसमें, ’मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ’  - ये जी हमारी पर्सनैल्टी का बड़ा अहम हिस्सा है। देखना और हैरान होते रहना, न देखने से हटते हैं और न हैरान होने से बचते हैं।

पौने तीन साल पहले जब यहाँ आया था तो शायद शुरू के दूसरे तीसरे दिन ही बैंक में एक ग्राहक आया, छ; फ़ुटा बंदा, खड़ी मूंछें,  भरी-भरी दाढ़ी,  भव्य पर्सनैल्टी और जो भी दूसरा ग्राहक आता, ’बाई जी, सत श्री अकाल’  कहकर अभिवादन कर बुलाता  उसे।  हो गये जी हम हैरान कि भाई ये कैसी\कैसा बाईजी?    इससे पहले बाईजी से अपना वास्ता या तो कोठों पर पड़ा था, मेरा मतलब है जी कि इस शब्द से अपना परिचय फ़िल्मों, उपन्यासों में दिखाये गये कोठों की मालकिन को संबोधित किये जाने तक से संबंधित था। समझाया खुद को कि जमाना बदल रहा है, हो सकता है ……। दुनिया इतने में कहाँ रुकने वाली थी, थोड़े दिन में  कोई बंदा  हमें भी बाई जी कहकर बुला गया।   धरे रह गये सारे चरित्र प्रमाणपत्र, शराफ़त का ये अंजाम?  हमें डेली पैसेंजर साथी संजय भाई साहब या संजय भैया कहकर बुलाया करते थे, हमारा प्रेमी स्टाफ़ भोला हमें संजय बाऊ कहकर बुलाया करता था लेकिन ’बाईजी’ ?    लेकिन क्या  कर सकते हैं जी, कहते हैं कि कोई मार पीट कर रहा हो उसका हाथ पकड़ा जा सकता है लेकिन बोलने वाले की जबान नहीं पकड़ी जा सकती। वैसे भी बापू ने बुरा न देखने, सुनने और बोलने के अलावा ऐसा भी कहा बताते हैं कि ’ग्राहक भगवान होता है।’   ठीक है भगवान, बना दो जो बनाना है तुम।  हमारा क्या है, हमने कौन सा यहाँ परमानेंट लंगर डालना है, चले ही जाना है यहाँ से तीन साल बाद।

लेकिन बात खटक तो गई ही थी, शाम को हमारे गार्ड साहब से जिक्र चला। हथियार वाले बंदों से अपनी सैटिंग हमेशा से सही बैठा करती है। जब उनसे बात की तो वो हँस दिये, “साबजी, मैं फ़ौज विच नौकरी दे दौरान राजस्थान रया सी, उत्थे मैं वी इस ’बाईजी’ दे चक्कर विच बड़ा परेशान रया। अलग अलग जगह ते एक ही शब्द दे अलग अलग मायने होंदे ने।” उन्होंने बताया कि पंजाब के इस इलाके में बाई जी, या बाई, या बई अपने से बड़े भाई को कहते हैं। आदरसूचक शब्द है, इसलिये चिंता की कोई बात नहीं।  कुहासा छंट गया, अब याद आया कि एक गाना देखा था ’जी नईं जान नूं करदा रंगली दुनिया तों’ और उसके गायक का नाम लिखा हुआ आता था पम्मी बाई। लो जी,  खुश हो गये हम। हमें खुश या दुखी होने के लिये बहुत बड़ी बातों की दरकार कभी रही भी नहीं, जरा जरा सी बात पर हो जाया करते हैं, हा हा हा।

अब आपको इसीसे संबंधित एक मजेदार बात बताते हैं। पच्चीस छब्बीस साल का जमींदारों का एक लड़का है इसी गांव का, मस्तमौला सा,।  स्वभाव ऐसा सरल है उसका कि कुछ पूछिये नहीं। न उसे किसी की जाति बिरादरी से मतलब है, न किसी की माली हैसियत से।   यारों का यार और स्वभाव वही कि ’दिलबर के लिये दिलदार हैं हम  और दुश्मन के लिये  तलवार हैं हम।  अपनी सही जमने लगी थी उससे।   सारे गांव के जितने छंटे हुये, उभरे और उभरते सितारे, उम्र में चाहे उससे पन्द्रह बीस साल बड़े ही क्यों न हों, उसे बाईजी ही कहकर बुलाते हैं।  तो हमारे इस बाईजी के बापू एक दिन कहीं जा रहे थे और सड़क के दूसरी तरफ़ एक दुकान पर अड्डा जमाये तीन चार क्रीमी लेयर के बंदे  कुछ प्रोग्राम बना रहे थे। प्रोग्राम में बाईजी की शिरकत जरूरी थी, सामने से उसके बापू को आते देखकर एक ने आवाज लगाई, “ओ रूपे......., बाईजी कित्थे है, घर हैगा या खेत ते?”   अब बापू ने बोलना शुरू किया, “भैण दे यारों, इधर आओ तुसी। मैं दसदा हां त्वानूं(मैं बताता हूं तुम्हें),  मुंडे नूं कैंदे ओ बाईजी ते उसदे बापू नूं बुलांदे हो, ओये रूपे?(लड़के को कहते हो बाईजी और उसके बाप को बुलाते हो ओये रूपे?)     

मैं लेट हो गया यारों, मेरा  ब्लॉग बनाने से पहले ही बाईजी चला गया है दूसरे मुल्क।  न तो एक और फ़ौजी आ गया होता अपनी साईड:))

एक और पेंशनर है हमारा,  जब भी पेंशन लेने आता है तो अपनी एंबैसेडर कार में आता है। हर बार कह्ता था, कभी जरूरत हो गाड़ी की तो मुझे फ़ोन कर देना। एक बार सरकारी काम से स्टाफ़ को कहीं जाना था और उस दिन शादियों का मुहूर्त होने के कारण कोई टैक्सी नहीं मिल रही थी, मुझे उसकी याद आई। मैंने कहा कि उस बाई को  फ़ोन कर देता हूँ, वो जरूर आ जायेगा। स्टाफ़वाले बिदक गये,  “न जी, उसकी गाड़ी में कौन बैठे? दिखता तो है नहीं उसे।”  मैंने कहा, “यार, हर महीने तो गाड़ी लेकर आता है वो। अगर दिखाई न देता हो तो कैसे इतने दिन हो गये और कोई एक्सीडेंट वगैरह की बात नहीं सुनी?”  बताया गया कि बचपन से इसी गांव में रहा है तो एक एक रास्ता उसका नापा हुआ है, रही बात सड़क पर चलने वालों की, तो जहाँ दूर से उसकी एंबैसैडर दिखाई देती है, शोर मच जाता है ’आ गई बाई दी गड्डी’ और लोग बाग खुद ही दौड़ कर और भाग कर रास्ते ऑल-क्लियर कर देते हैं।” 

मैं सोचने लगा और महसूस करने लगा वो नजारा और सुगबुगाहटे – एंबैसैडर का घर्घर नाद सुनो,     सड़कें खाली करो कि बाई की एंबैसैडर आती है।  रैप्युटेशन और गुडविल कितनी मुश्किल से बनती है? कितनी मेहनत लगी होगी बाई को अपनी दहशत कायम करने में, शायद बहुत ज्यादा। अगली पेंशन लेने आयेगा तो करूंगा रिक्वेस्ट कि बाई, मेरा फ़ालोवर बन जा न यार। थोड़ा सा संगति का असर हो जाये मुझपर भी कि दूर से कहीं पोस्ट आती दिखे तो शोर सा मच जाये ’आ गई संजय बाई दी पोस्ट, आ गई।’  मेरी गुडविल बन जायेगी और संभावित मठाधीशी की तरफ़ एक कदम और उठ जायेगा:))

शनिवार, फ़रवरी 05, 2011

इक फ़रियाद


एक बहुत पुरानी कहानी पढ़ी थी, न कहानी का नाम ध्यान है और न लेखक का, लेकिन बहुत पसंद है अपने को। उस समय यदि मालूम होता कि किसी को कभी बताने की नौबत आयेगी या कोई हमारी लिखी बात को पढ़ेगा भी, तो  याद भी रखते। खैर, कथासार बताते हैं आपको, लेखक महोदय को हृदय से क्षमा सहित धन्यवाद पहुंचे।

कहानी थी एक डाकिया जी की, जो दीन के पाबंद और पांच वक्त के नमाजी थे। वेशभूषा से,  चेहरे पर छोड़ी दाढ़ी से मानो नूर बरसता था।     उम्र अभी छोटी ही थी, लेकिन ध्यान इधर उधर न बिखरा होकर हर वक्त ऊपरवाले की इबादत में मशगूल रहता था। जहाँ रहते थे, जहाँ काम करते थे और जिस इलाके में डाक बांटने का काम करते थे, उन साहब की खासी इज्जत थी। मस्जिद की तामीर होनी हो, कोई और मजहब का काम हो, इंतजामिया कमेटी में उनका शामिल होना इस बात की तसदीक थी कि सब कुछ सही हाथों में है। कहानी की शुरुआत में दिखाया गया कि उनका डाक बांटने का इलाका बदल दिया जाता है और वो डाक विभाग के आला अधिकारी जोकि एक अंग्रेज था, के सामने पेश होकर उनसे वो तबादला रद्द करने की गुजारिश कर रहे हैं। नया इलाका चूँकि ’हुस्न का बाजार’ था, डाकिया बाबू को अपना दीन बिगड़ने का डर था, और इसी वजह से वो तबादला रद्द करवाना चाहते थे। लेकिन कहते हैं कि बेदर्द हाकिम के आगे फ़रियाद का कोई फ़ायदा नहीं होता, उन्हें भी नहीं हुआ। यही सुनने को मिला कि एक बार जाकर काम संभालिये, मौका लगते ही तबादला निरस्त कर दिया जायेगा। अब हमारे नायक ठहरे खुदा के बंदे, और कोई मजहब या धर्म रिज़क और रोजी से नमकहरामी नहीं सिखाता, वे भी बेमन से ही सही अपने काम को संवारने में जुट गये। पुराना डाकिया उन्हें साथ लेजाकर उस बाजार की सारी बसावट की जानकारी देता है, खास खास ठिकानों का खास परिचय देता है और अगले दिन से वे अपने काम में लग गये। बात पुराने जमाने की है, सच की और  सच्चे आदमी की भी इज्जत होती थी। कुछ समय बीतते न बीतते उस इलाके के चुनिंदा अड्डों में उनकी खासी पैठ हो गई।  भीतर तक पहुंच हुई, खतो-किताबत में मदद करते करते नौबत यहाँ तक पहुंची कि खास दावत वगैरह की रसोई की सुपुर्दगारी तक और खास महफ़िलों के इंतजामात तक   उनके हाथ आ गये।  और तो और, घरेलु और बाजारू मुद्दों पर उनकी अहम राय की कदर होने लगी और वक्त दौडने लगा।  कहानी के अंत में वही हाकिम का दफ़्तर, और वही फ़रियादी – साल भर पहले जो  गुहार लगाई थी तबादला निरस्त करने की, वो मंजूर हो चुकी थी।   तो साहब लोगों, वही हाकिम और वही फ़रियादी, हाकिम वैसा ही बेदर्द था जैसा पहले था और फ़रियादी का हुलिया बदला हुआ था। सफ़ाचट चेहरा, कपड़े इत्र से महकते हुये और तुर्रा ये कि इस बार भी  फ़रियाद वही पुरानी  थी कि हुज़ूर मेहरबानी करें और इलाका न बदलें, यहीं रहने दें। जनाब रच बस गये थे रंगीनियों में।

अब आप को मजा बेशक न आया हो, हमने  जब कहानी पढ़ी तो बहुत मजा आया था। लाईव फ़िल्म देखने का, कहानी या उपन्यास पढ़ने का जो मजा आता है वो समीक्षा में नहीं आता। कोई फ़िल्म देखे, साहित्य पढ़े एक जमाना बीत गया है। शहर में ले देकर एक सिनेमाघर है और कोई लाईब्रेरी नहीं। बच्चों को डीवीडी ला देते हैं, लेकिन हमारे लिये सिनेमा के पर्दे का मुकाबला ये इक्कीस इंच की स्क्रीन क्या करेगी?  अपना तो वही पुराना रवैया कायम है, या तो ’नो डिमांड    या   फ़िर नो लिमिट’ ,     बेशक  भूखे मर रहे हैं लेकिन घास नहीं खा रहे।     अकेला सहारा अखबार थे और अब तो अर्सा हो गया अखबार देखने का भी मन नहीं करता।  ये अखबार क्या खाकर हमारे ब्लॉगजगत का मुकाबला करेंगे?  ’कहीं दंगल वीर जवानों के, कहीं करतब तीर कमानों के’ वाले स्टायल में गुटबाजी, पहलवानी, राजनीति के अखाड़े  सक्रिय हैं। भोजन के छहों रस, भाव के नौ रंग, सोलह कलायें, छत्तीस श्रॄंगार, छप्पन भोज का आनंद यहाँ विद्यमान है तो ’कौन जाये ऐ जौक,  इन गलियों को छोड़कर।’

घर से दूर का तीन साल का स्टे पूरा होने में लगभग चार महीने बचे हैं, बच्चों का शिक्षा-सत्र समाप्त होने में लगभग एक से डेढ़ महीना। फ़िलहाल की प्लानिंग के अनुसार तब अपन  दो तीन महीने अकेले रहेंगे और बच्चा पार्टी(समेत उनकी मम्मी)  अपने दादा-दादी  और चाचा-चाची के पास। हमारा पी.सी. कश्मीर हुआ पड़ा है, दूसरी पार्टी कहती है हमारा है और हम कहते हैं ये हमारी जान है। वक्त से बड़ा कोई नहीं, देखते हैं किसके हक में फ़ैसला होता है। हमने खुद को नियंत्रित करना शुरू कर दिया है, पिछली कुछ पोस्ट्स से पांच दिन में एक पोस्ट के व्रत का पालन कर रहे हैं।  कहीं ऊपर बताई कहानी के नायक वाला हाल न हो जाये कि बेदर्द हाकिम के आगे फ़रियाद करते दिखाई दें कि तबादला निरस्त कर दो, अब तो मजा आना शुरू हुआ था।

ऐसा नहीं कि will नहीं है, है जरूर है, लेकिन way नहीं दिखता है।  साईबर कैफ़े में जाकर लिख सकते हैं, पढ़ सकते हैं और कमेंट भी कर सकते हैं लेकिन साल भर पहले लुधियाना में एक साईबर कैफ़े में पड़े एक छापे की याद आ जाती है तो पसीने छूट जाते हैं। पार्टीशंड केबिन बने हुये थे, शायद फ़ी घंटा दो सौ से ढाई सौ रुपया चार्ज करते थे। ज्यादा लग रहा है? है ही ज्यादा, ठगी कर रहे थे जी क्योंकि जब छापा पड़ा तो पता चला उस साईबर कैफ़े में पी.सी. ही नहीं थे। अब चढ़ते बुढापे में ढाई सौ रुपया घंटा खर्च भी करें और पी.सी. भी न बरामद हो वहाँ छापे के दौरान तो क्या मुंह दिखायेंगे?

एक दूसरा हाईवे और सूझा था कि शोले फ़िल्म की तर्ज पर कोई सूरमा भोपाली टाईप का जीव पट जाये तो हमारे बड़े भाई साहब सतीश सक्सेना जी की इनाम वाली घोषणा का फ़ायदा उठा लें। बेनामी, छद्मनामी होने का आरोप हम पर लगाकर कोई कर दे केस दर्ज, बड़े भाई तो जबान दे ही चुके हैं फ़ी पेशी पांच हजार का ईनाम।  उनकी मुहिम सफ़ल हो जायेगी, हमें नाम और दाम मिल जायेंगे, ले आवेंगे एक सैकंड हैंड कम्प्यूटर। तो जी, तलाश जारी है, इच्छुक आरोपकर्ता हमारी मेल आई.डी. पर संपर्क कर सकता है, एग्रीमेंट साईन  करना होगा। इनाम सारा हमारा और इकराम उसका जो हमें पकड़वायेगा।

आखिर में वो शेर जो एक कस्बे की नुमाईश में हलवाई की दुकान पर लिखा देखा था.

’लिखा परदेस किस्मत में, वतन को याद क्या करना,
जहाँ बेदर्द हाकिम हो, वहाँ फ़रियाद क्या करना।”

और हम ठहरे एक नंबर के येड़े, फ़िर भी फ़रियाद करते ही जाते हैं कि हुज़ूर, फ़ैसला बदल लो हमारे तबादले का, अभी तो मजा आना शुरू हुआ था:))

सोमवार, जनवरी 31, 2011

इंतज़ार.......समापन कड़ी



ऑफ़िस में आज सारा दिन सुबीर का मन उखड़ा-उखड़ा सा रहा। रह रह कर आँखों के सामने एक चेहरा नाच उठता था, एक अजीब सा अहसास छोड़ जाता हर झलक में, एक अनूठी महक। पता नहीं क्या हाल होगा शुभ्रा का? आराम आया कि नहीं? आज वैसे भी ऑफ़िस पतझड़ के बगीचे सा लग रहा था, करवाचौथ का दिन जो ठहरा। महिला सहकर्मी कोई भी नहीं थी, और पुरुष कर्मचारी आज मौके का पूरा फ़ायदा उठा रहे थे। सुबीर हमेशा की तरह वहाँ होकर भी नहीं था, लेकिन आज तो जैसे उसे खुद भी अपने होने न होने का फ़र्क नहीं मालूम चल रहा था। दोपहर में उसने शुभ्रा के घर फ़ोन किया, आंटी ने बताया कि सो रही है। सुबह से बिस्तर पर पड़ी है,  दवा तक नहीं ली। बुखार तो नहीं है, लेकिन कमजोरी बहुत है। सुबीर ने कहा कि ऑफ़िस से लौटते समय मिलकर ही जायेगा।

सुबीर शाम को समय से ही ऑफ़िस से निकल लिया था। शुभ्रा अपने कमरे की खिड़की के पास कुर्सी पर बैठी थी, देख रही थी बाहर क्यारियों की तरफ़।  कमरे में नीम अंधेरा पसरा था, बीमार लोग शायद रोशनी से आँख बचाते हैं।     अकेली  रोशनी वही हुई,  जब  सुबीर को देखा और शुभ्रा के चेहरे पर चमक सी आ गई थी।

“आ गये तुम, मुझे मालूम था कि आज बिना बुलाये भी आओगे”  हँसते हुये शुभ्रा बोली।

“मैंने दोपहर में फ़ोन किया था, सो रही थी तुम। कैसी तबियत है अब?”

“ठीक  हो गई हूँ मैं। जब तुम्हारा फ़ोन आया,   मैं बिस्तर में थी. लेकिन सो नहीं रही थी। जानबूझकर बात नहीं की थी मैंने।”

“क्यों, बुरा लगा क्या मेरा फ़ोन करना?”

“तुम न करते फ़ोन तो बहुत बुरा लगता। बात कर लेती तो फ़िर तुम कहाँ आते मिलने। काश, ये मियादी बुखार होता और बिना बुलाये तुम रोज ऐसे ही मुझे मिलने आते।” आवाज कुछ बदल गई थी शुभ्रा की।

“पागल हो तुम, दिनभर हम ऑफ़िस में साथ रहते है फ़िर ये कुछ देर  के लिये मिलने आना क्या मायने रखता है?”

“तुम नहीं समझोगे और समझाने से तुम्हारे दिमाग में बात बैठेगी नहीं, बात का मज़ा भी तो नहीं रहेगा।”

“मत समझाओ फ़िर, वैसे भी मेरे दिमाग में ज्यादा अहम चीजें हैं आजकल। जो हैं,  मैं उसीमें बहुत खुश हूँ।”

आंटी उनके लिये चाय-नाश्ता ले आईं। सुबीर ने  चरण-स्पर्श किये और औपचारिकता के लिये मना किया तो शुभ्रा हँस दी, “माँ, पूछ लेती न  चाय बनाने से पहले, कहीं आज ये  भी व्रत पर हों? ऋषिवर का व्रत भंग न हो जाये कहीं।”

माँ ने लाईट जला दी थी और बेटी को हँसते देखकर उनके चिंतित चेहरे पर इत्मीनान आ गया। पास आकर सुबीर के सर पर हाथ फ़ेरने लगीं। उम्र के अनुभव ने बता दिया होगा कि बीमार बेटी को कौन सी दवा आराम दे रही है।

सुबीर ने फ़ौरन नाश्ते की प्लेट पकड़ी और बोला, “व्रत भंग हो ही चुका है तो खा-पीकर क्यूँ न मरा जाये?”

“ऐ सुबीर, सोच समझकर बोला करो। कुछ भी बक दिया, वो भी आज के दिन। कहीं कोई तुम्हारे लंबे जीवन की कामना करती होगी और तुम ऐसा उल्टा-सीधा बोल रहे हो।” तमतमा उठी थी शुभ्रा।

“अरे, इतना सीरियस क्यों हो रही हो? ये तो एक आम वाक्य है जो मैंने तुम्हारी बात के जवाब में कहा। खैर सॉरी,  लो तुम भी चाय लो।”

“मुझसे नहीं पी जायेगी। वैसे अब मैं ठीक हूँ, अब खाना ही खाऊँगी। माँ, सुबीर भी हम लोगों के साथ ही खाना खायेगा। नहीं तो खाना बनाने के नाम पर इसे भागने का मौका मिल जायेगा,  बीमार से दूर।  और मैं फ़िर अकेली बैठी बोर होऊँगी।”  ऒफ़िस से बाहर थी, लेकिन किसी किसी को ऒर्डर देने में जगह से ज्यादा सामने वाले इंसान से ज्यादा फ़र्क पड़ता है।

माँ बर्तन लेकर चली गईं रसोई में, पूजा की तैयारी भी करनी थी और रात के खाने की भी।

“रेडियो सुनना था न, बोर होने से बच जातीं। वैसे भी मैं तुम्हारी तरह पढ़ने लगा हूँ, तुम्हें मेरी तरह रेडियो सुनना चाहिये। न आँखों पर जोर और न दिमाग पर बोझ।”

“आज सारा दिन मैंने और किया क्या है?  उठकर तो अभी ही बैठी हूँ।” कहते कहते शुभ्रा उठ खड़ी हुई और खिड़की के बाहर देखने लगी। पेड़ों पर पक्षी भी अपने अपने बसेरों में लौट चुके थे, शायद रात के चूल्हे-चौके की तैयारी चल रही हों। सुबीर ने अब देखा, शुभ्रा ने आज साड़ी पहन रखी थी। पहली बार साड़ी में देखा था उसे।

चलती रही बातें, बातों में से बातें और सुबीर खुद भी हैरन था कि कैसे इतना बोलने लगा है वो। इतनी बातें मालूम भी थीं क्या उसे अब से तीन चार महीने पहले तक? अंकल आ चुके थे और फ़्रेश होकर रोज की तरह  पूजा पाठ में व्यस्त थे। 

बाहर कुछ चहल-पहल की आवाजें सुनाई दीं, चाँद का विशेष इंतजार था आज जैसे सबको।   शुभ्रा ने खिड़की से बाहर देखा, पेड़ की फ़ुनगी के ऊपर चाँद चमक रहा था। उत्साहित होकर उसने माँ को आवाज लगाई और पूजा की थाली हाथ में लेकर आंटी-अंकल छत पर चले गये थे।

“ऐ सुबीर, देखो न चाँद निकल आया।” बच्चों की सी उल्लासित थी शुभ्रा।

“देख रहा हूँ”  खिड़की के पास आ चुके सुबीर ने कहा, शुभ्रा की तरफ़ ही देखते हुये। “पहली   बार देखा है तुम्हें साड़ी में,  बहुत जम रही है तुमपर। कब खरीदी?”

शुभ्रा ने उसकी तरफ़ देखा, झुककर उसके पैर छू लिये और सुबीर हड़बड़ा उठा एकदम से, “ये क्या कर रही हो?”

“जाने  या अनजाने में,  मेरा व्रत हो गया।  जब भी  तुम्हें जन्मदिन पर या किसी और मौके पर अपनी खुशी के लिये कोई गिफ़्ट दिया है तो तुम कितने नखरे दिखाते हो मुझे।   ये साड़ी मैंने खरीदी है अपने लिये, तुम्हारी तरफ़ से। इसके पैसे तुम दोगे, मैं खुद माँग रही हूँ।”

नजरों की भाषा नजरें पढ़ ही लेती हैं, बहुत विद्वान होना कोई लाजिमी नहीं इस भाषा को जानने या समझने के लिये, कोई लिपि नहीं, कोई ककहरा नहीं।  आंखें बोलती हैं, दिल देखता है, कान महसूस करते हैं और ज्ञान-विज्ञान के सब स्थापित नियम उलट पुलट जाते हैं। कुटिल सरल हो जाते हैं और जो सरल हैं, वो हो जाते हैं चंचल। समझ लेना चाहिये उस समय कि वक्त आ गया है एक नई कहानी के जन्म लेने का।

मुश्किल से सुबीर के मुंह से कोई बोल फ़ूटा, “ऐ शुभ्रा, क्या करके मानोगी तुम?”

“मैं तुम्हारे आँगन में ठुमक कर मानूँगी, जान लो सिर्फ़ इतना। समय तुम तय करोगे, इंतज़ार मैं करूँगी।”

तब से सुबीर  और उसका आँगन भी उस पल का, उस लम्हे का, उस ठुमक का और उस रात की रानी के महकने का  इंतज़ार कर रहे हैं।

p.s. -   मुझे  भी कुछ इंतज़ार है। ताजा जानकारी मिलने तक आने वाली तीस फ़रवरी को दोनों विवाहसूत्र में बंधने वाले हैं, मैं भी निमंत्रण-पत्र का इंतज़ार कर रहा हूँ। मैं गया तो आप सब भी चलेंगे ही। वैसे भी अब तो सब को खुश होना चाहिये कि हैप्पी एंडिंग दे दी है कहानी को:)  छवि खराब हो तो सुधारने के लिये कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, पत्थर रखने पड़ते हैं दिल पर। तो आप भी फ़िलहाल इंतज़ार कीजिये, इस ब्ल्यू लाईन का अपनी पटरी पर लौटने का, हैंगओवर है लेकिन  जल्दी ही खत्म हो जायेगा। हा हा हा

नाहक सा एक ख्याल आया था दिमाग में, कि प्यार का मासूम रुख भी होता था कभी। लिख देखें, शायद आज के  दिखावटी दौर में भी ये अंदाज  पसंद आ जाये, और लिखना शुरू किया तो खुद को भी अच्छा लगा और आपके कमेंट्स से मान लेता हूँ सीधी सादी कहानी भी पसंद आ सकती है। अब लिखा है तो झेले कौन? हैं न आप सब, झेलो और झेलो...:)) 

बुधवार, जनवरी 26, 2011

इंतज़ार.......(भाग तीन)



“इन पुरानी इमारतों, खंडहरों में पता नहीं तुम्हें क्या आकर्षण दिखता है, जब भी कहीं घूमने की बात करें तो  किसी किले या किसी मंदिर का प्रोग्राम बना लेते हो। दुनिया है कि आगे से और आगे को भाग रही है और तुम हो कि इन वीरान खंडहरों के दीवाने बने हो अब तक।”

“तुम मुझपर प्रोग्राम बनाने की जिम्मेदारी छोड़ा ही मत करो न, कोई दिक्कत नहीं होगी। खुद ही जोर देकर प्रोग्राम बनाती हो बल्कि बनवाती हो, फ़िर कमी निकालती हो।”

“अए सुबीर, बुरा क्यों मानते हो? मैंने कोई कमी नहीं निकाली तुम्हारी, ऐसा कहा कुछ?  मैं तो तुम्हारे अंतर्मन को जानना चाहती थी, इसलिये ऐसा कहा था।  सच कहूँ तो अब तो मुझे भी ये गुजरे ज़माने की निशानियाँ बहुत अच्छी लगती हैं। पहले कभी देखा भी तो सिर्फ़ चमक-दमक पर ध्यान जाता था।  अब दूसरे नजरिये से देखती हूँ तो   मायने बदले दिखते हैं।”

“नये निर्माण से मुझे कोई परहेज नहीं, मैं भी सुंदरता और स्टाईल को नापसंद नहीं करता। लेकिन जो दिखता है, वही तो पूरा सच नहीं। नींव किसी को दिखती है क्या? मगर क्या एक पुख्ता नींव के बिना कोई भी इमारत तामीर हो सकती है?  ये जगह बेशक वीरान हैं, लेकिन मेरे कान तो यहाँ आकर  तलवारों की झंकार को भी सुनते हैं और पायल की झंकार भी, फ़ुसफ़ुसाती दुरभि संधियाँ होती भी महसूस करता हूँ, मंत्रों की ऋचायें भी सुनता हूँ  और मासूम प्यार को भी पलते बढ़ते सुनता हूँ। वो वक्त और उसकी निशानियाँ हमारे उस आज के वक्त की नींव है, जिसे दुनिया देख-सराह रही है। लोगों के पास शायद वक्त नहीं, सबको आगे से आगे निकलना है और सबकुछ पा लेना है। वहीं मेरे पास वक्त भी है और मैं सबकुछ पा लेना भी नहीं चाहता।  शाम हो गई है, चलें अब?”

“चलिये ऋषिवर, इस युग में तो लगता है मेनका ही तपस्विनी बन जायेगी।”  शुभ्रा हँस दी और सुबीर……..।  शुभ्रा ने हैंडबैग से आईना निकाला और लिपस्टिक ठीक करने लगी। सुबीर पर नजर पड़ी तो उसने आज फ़िर वही महसूस किया,  बेहद हल्की सी एक नागवारी।  उसने आज पूछ ही लिया, “सच कहना, जब भी मैं मेक अप ठीक करती हूँ तो तुम कुछ अजीब से अंदाज में  क्यों देखने लगते हो?  झूठ मत बोलना।”

कुछ सोच में पढ़ गया सुबीर, बोला, “मैं बताऊँगा तो सच ही बताऊँगा, लेकिन हो बहुत शार्प, एकदम एक्स-रे की सी नजर। कोई कोर्स किया है क्या, चेहरे पढ़ने का?”  और हँस दिया।“

"हाँ, पी.एच.डी. की है मैंने। बात को पलटो मत। सीधी बात करो।”

सुबीर कहने लगा, “वजह पूछोगी तो नहीं बता सकूँगा, मुझे खुद नहीं मालूम।   लेकिन खूबसूरत दिखने के लिये लिपस्टिक लगाना मुझे फ़ूहड़ता के सिवा कुछ नहीं लगता। खैर, मुझे इस बात से और किसी को मेरी इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिये।”

शुभ्रा खिलखिला दी, “तुम जरूर कभी लिपस्टिक के कारण रंगेहाथों पकड़े गये होगे।” और लिपस्टिक का रोल झाडि़यों के पीछे उछाल कर गाड़ी की तरफ़ चल दी, “चलो अब जल्दी से।”

“रंगे  हाथों?  हा हा हा, कभी नहीं। और ये फ़ेंक क्यों दी तुमने?”

“अब वो मेरे किसी काम की नहीं रही।  खत्म हो गई थी।   हा हा हा।        
कहीं भूल से ये न समझ बैठो कि मैं ……..।”  आवाज तो अच्छी हमेशा से ही लगती थी शुभ्रा की, लेकिन सुबीर के कानों को शुभ्रा का आखिरी अधूरा वाक्य रेडियो पर चल रहे गाने की झलक का हिस्सा सा क्यों लगा, वो यही सोच  रहा था।

“तुम सच में एक मिस्ट्री हो। मैं चुप था तो ही अच्छा था।”

शुभ्रा ने आँखें तरेरीं,  “हाँ हाँ, तुम चुप ही करो अब।”

गाड़ी में कुछ देर मौन पसरा रहा। शुभ्रा ने ही बात छेड़ी, “वो कहानी पढ़ी जो मैंने बताई थी, ’उसने कहा था’    या रेडियो के आगे हमारी फ़रमाईश बेकार गई?”

“पढ़ी है, पढ़ता रहता हूँ। पहली बार कुछ खास नहीं लगी थी, लेकिन फ़िर हर बार पढ़ने पर उसके मायने बदलते दिखते हैं। अब बहुत पसंद है और हर बार ये पसंदगी पहले से ज्यादा बढ़ रही है। किताबें भी आदमी से कम नहीं होती,  हर किस्से-कहानी  में जाने कितने चेहरे छिपे रहते हैं।  सुना तो ये था कि every human is an encyclopedia, if you know how to read     लेकिन अब लगता है each book is like a human, different faces at different occassions.  बहुत बोलने लगा हूँ मैं आजकल, है न?”

शुभ्रा ने गाड़ी सुबीर के घर के पास रोक दी,  “No, you need to speak-up more, much more.  गुड   नाईट, सुबीर। और सुनो,  बारिश हो रही है, जल्दी से अंदर चले जाना।  बेमौसम की बरसात है भीगना मत  नहीं तो बीमार हो जाओगे,  कोई है भी तो नहीं जो तुम्हारा ध्यान रखे। बाय, सुबीर,  गुड नाईट”

सुबीर उतर गया,   खिड़की से झाँककर उसने भी गुड नाईट विश कर दी। जाने कैसे आज उसके  मुंह से निकल गया,    “गुड नाईट,  मेनका।” अवाक सी देखती रह गई शुभ्रा, और खुद सुबीर भी हैरान सा खड़ा रह गया। 
वो   कार को जाते देख रहा था और कार में बैठी शुभ्रा का ध्यान रियर-व्यू मिरर में था।  गली के मोड़ तक पहुँच गई थी वो, लेकिन एक साया अब भी अपनी जगह पर खड़ा दिख रहा था, बारिश में भीगता हुआ। बाहर की बारिश, अंदर की बारिश………….. बुदबुदा उठी शुभ्रा, “पागल,  बुद्धू,  ईडियट कहीं का। कितना समझाया कि मत भीगे, जरूर बीमार पड़ेगा अब।“

अगली सुबह शुभ्रा के पापा सुबीर के कमरे पर पहुँचे और शुभ्रा की छुट्टी की एप्लिकेशन सुबीर को देते हुये बताया कि सुबह शुभ्रा को बुखार  लग रहा था,  इसलिये आज वो ऑफ़िस नहीं जायेगी। सुबीर खुद को कोस रहा था,  क्यों शुभ्रा का कहा नहीं माना कल उसने?  क्या जरूरत थी उसे भीगने की?

जा..जा..जारी……:))

भारत के गणतंत्र दिवस की सभी को शुभकामनायें।