रविवार, दिसंबर 22, 2013

खम्म दा कां ..

नौकरी के सिलसिले में पहली बार अनजान शहर में जा रहा था तो पिताजी ने एक नाम बताया और कहा कि वहाँ जाकर उनसे संपर्क करना, बहुत बड़ी शख्सियत हैं और उनसे संपर्क रखने से नई जगह पर बहुत सहारा मिलेगा। एक तो उस समय हम खुद को हिमालय से ऊंचा और सागर से गहरा समझते थे और दूसरा हमें अपना कुँआ छोड़कर बाहर की दुनिया देखने की जल्दबाजी थी तो चुपचाप मुंडी हिलाकर और बिना बहस किये निकल लिये। नई जगह, नई नौकरी, नये दोस्तों की चकाचौंध में हम ऐसे मगन हुये कि पिताजी के बताये नाम के बारे में किसी से पूछा भी नहीं। 

पन्द्रह-बीस दिन में घर आना होता तो पिताजी ने एक-दो बार उस बारे में पूछा भी लेकिन हम टाल गये, वो समझ गये। कई मौसम बदल गये, उस नाम की हस्ती के पते के बारे में मैंने किसी से पूछा नहीं और खुद से कोई बताता भी क्यों लेकिन मन में एक फ़ांस रह गई कि पिताजी ने कुछ कहा और मैंने किया नहीं। स्वयं ही अपने आप से सवाल-जवाब करता रहता कि पिताजी ने कोई आदेश तो दिया नहीं था, सरसरी तौर पर कहा था। फ़िर उन्होंने अपने लिये तो कुछ मांगा नहीं था, मेरे हित के बारे में सोचकर ही कहा था तो मैं तो यहाँ आकर मस्त हूँ ही फ़िर अगर इस काम में लापरवाही हो भी गई तो कोई बड़ी बात तो नहीं। एक बड़ी वजह और भी थी जो किसी से कह नहीं सकता था, माना कि पिताजी की दृष्टि में जो बहुत बड़ी शख्सियत है, उस अनजान शहर में हो सकता है कि उनसे कोई परिचित न हो। मैं किसी से पूछूँ और जवाब में सुनने को मिले कि हम तो नहीं जानते इस नाम वाले सज्जन को और फ़िर पिताजी तक ये बात पहुँचे तो उन्हें ठेस पहुँचेगी। इससे बेहतर तो यही है कि खुद लापरवाह बने रहो। जिंदगी मस्त गुजर रही थी, जंगल में मंगल हो रहा था जिसके सच्चे-झूठे  किस्से इस ब्लॉग पर शुरू में बहुत सुनाये गये थे और अब भी बीच बीच में जिक्र चलता ही रहता है। 

एक बार ऐसा हुआ कि यही दिसंबर या जनवरी के दिन थे और शाम के समय मैं अकेला ही(अपवादस्वरूप ही) टहलता हुआ शहर के बाहरी हिस्से तक पहुँच गया। जब सब साथ होते थे तो हम शहर में ही घूमते थे लेकिन अकेला था तो आज उधर निकल पड़ा जिधर सब नहीं जाते थे।  अंधेरा घिर आया था और सड़क पर कोई रोशनी भी नहीं थी, सोचा कि वापिस चला जाये। फ़िर पता नहीं क्यूँ मन ही मन फ़ैसला किया कि आगे सड़क जहाँ मुड़ रही है, वहाँ तक जाकर लौटूँगा। मैं चलता रहा, जब उस मोड़ के पास पहुँचा तो पीछे से एक ट्रक आया। मैं सड़क से हटकर साईड में खड़ा हो गया। ट्रक मोड़ से मुड़कर आगे चला गया और मैं सिर्फ़ एक पल के लिये वहीं ठिठककर रह गया। मुड़ते समय ट्रक की हेडलाईट की रोशनी एक पल के लिये सड़क किनारे लगे एक बोर्ड पर से होकर गुजरी थी और उस बोर्ड पर वही नाम लिखा था जो पिताजी ने मुझे बताया था। अगली बार घर लौटा तो पिताजी को सारी बात बताई और बिना कुछ खास किये भी वाहवाही पाई, बिल्कुल वैसे ही जैसे कई बार बिना कुछ खास किये ऐसी-तैसी भी करवाई है।

ब्लॉग लिखने के शुरुआती समय की ही बात है, अंदाजन साढ़े तीन साल पहले एक पोस्ट लिखी थी। कुछ दिन पहले किसी मित्र से बात हो रही थी तो ढूँढते-ढूँढते उस पोस्ट तक पहुँचा। गया किसी और सन्दर्भ में था लेकिन वहाँ जाकर ठीक वैसे ही ठिठक गया जैसे उस ट्रक की हेडलाईट की रोशनी पड़ते बोर्ड को देखकर ठिठका था। मसाला फ़िल्म की तरह मसाला पोस्ट बनाने के चक्कर में फ़त्तू का आईटम नंबर पोस्ट में जोड़ देता था तो उस पोस्ट में आईटम नंबर में एक जगह का नाम इस्तेमाल किया था। उस जगह से न अपना कोई वास्ता था न अपने दादा-परदादा का। न कोई मित्र-मित्राणी वहाँ से थे न कोई व्यापारिक या आधिकारिक संबंध। सिर्फ़ आईटम नंबर में दूरी, समय के हिसाब से वो स्थान वहाँ फ़िट होता था और हमने वही कर दिया था। अभी से एक साल पहले तक उस स्थान में हमारे बैंक की जो शाखा थी वो किसी दूसरे प्रशासनिक कार्यालय के अधीन थी। एक साल पहले ही वह शाखा इसी प्रशासनिक कार्यालय के अधीन आई और चारेक महीने पहले एकदम अप्रत्याशित रूप से हम भी उस जगह पर पदस्थापित हो गये। 

अब अपने से अलावा लेकिन अपने ही दो स्टाफ़ सदस्यों की बात। एक स्टाफ़ सदस्य प्रोमोशन पर अक्टूबर में मेरी शाखा में आये तो उन्होंने बताया कि वो अपने पूर्वपरिचित (एक और) संजय जी की ब्रांच में जाना चाहते थे। मैंने हँसकर इसे संयोग ही बताया कि आपको साथ में काम करने के लिये ’संजय’ तो मिल गये लेकिन मनचाहे वाले नहीं बल्कि अनचाहे वाले। एक दूसरे स्टाफ़ सदस्य उन्हें किसी ’संजय’ से मतलब नहीं था बल्कि उन्हें अपनी पोस्टिंग इस स्थान विशेष पर चाहिये थी लेकिन उन्हें मिली दूसरी ब्रांच, जहाँ वही दूसरे वाले ’संजय जी’ हैं। सबके सामूहिक प्रयास से और प्रबंधन की सदाशयता के चलते पिछले सप्ताह दोनों स्टाफ़ सदस्यों का स्थानांतरण कर दिया गया। जिन्हें अपने वाले ’संजय’ चाहिये थे वो ’संजयजी’ के पास और जिन्हें व्यक्तिविशेष से काम नहीं था बल्कि स्थानविशेष से मतलब था, वो अपनी पसंद की जगह पर। मतलब हुण ऑल इज़ वैल :)

ये नमूने हैं कुछ उन बातों और घटनाओं के जिन्हें हम संयोग मानते हैं।  उस रात मेरा अकेले घूमने जाना, अंधेरा घिरने के बावजूद एक पल के लिये बोर्ड पर हेडलाईट की रोशनी पड़ना वगैरह वगैरह, जितना महीन सोचते जायेंगे उतने ही छोर मिलते-छूटते जायेंगे। अब से चार साल पहले किसी अनजान सी जगह का नाम अनायास ही लिख देना और फ़िर कालक्रम में चाहे अनचाहे उसी जगह पहुँच जाना, सब संयोग है या पहले से लिखे किसी घटनाक्रम के अग्रिम संकेत। ज्ञानियों के पास हर सवाल के जवाब होते हैं लेकिन हमारे पास तो  सवाल ही हैं। हम इस ब्रह्मांड के सबसी शक्तिशाली जीव हैं या पहले से लिखी किसी पटकथा के अदना से किरदार? या फ़िर दोनों, बहुतों से शक्तिशाली लेकिन किसी के हाथों विवश, क्या हैं हम?

आप सवाल कर सकते हैं कि पोस्ट-शीर्षक से इसका क्या लेना देना तो इस सवाल का जवाब है मेरे पास। वो क्या है कि हमने सोचा है कि थोड़ा सा भाषा-ज्ञान आपसे साझा कर लेते हैं। कल को आप ये न कहें कि खाली-पीली टाईम खोटी करवाता रहता है।  शीर्षक वाक्य असल में पंजाबी की एक कहावत है। जब हम छोटे थे तो कभी कभार माँ-पिताजी की नोक-झोंक में पिताजी यह वाक्य कहा करते - ’खम्म दा कां बनाना’ - मैं ठेठ पंजाबी नहीं समझता था। खम्म का मतलब नहीं समझ आता था, इसका हिंदी अनुवाद करता तो बनता - खम्भे का कौआ बनाना। लेकिन बात जमती नहीं थी, अभी कुछ दिन पहले पिताजी से इसका मतलब पूछा तो उन्होंने समझाया कि  ’खम्म’ का मतलब है पंख। कहीं पर किसी चिड़िया का पंख देखकर कोई दूसरे को बतायेगा कि वहाँ किसी पखेरू का पंख पड़ा था। तीसरे तक जाते-जाते वो पंख कौए का हो जायेगा और आगे बढ़ते-बढ़ते बताने वाला बतायेगा कि उसने खुद वहाँ बड़े से काले कौए को देखा था। तो इसका सरलार्थ हुआ कि छोटी सी बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताना। 

अब अपने जीवन से संबंधित एक दो घटनाओं पर हमारे गंभीरता से सोचने को आप बात का बतंगड़ बनाने, राई का पहाड़ बनाने, झूठे सच्चे किस्से सुनाने की जगह ठेठ पंजाबी में ’खम्मा दा कां बनाना’ भी कह सकते हैं।  आगे किसी पोस्ट में आप को हमारे एक और तकियाकलाम ’होर वड़ो’ का भी अर्थ सोदाहरण समझाया जायेगा।

डिस्क्लेमर - इस पोस्ट में कई जगह ’आप’ शब्द लिखा गया है, इसका अरविंद केजरीवाल जी की राजनीतिक पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है।


चंद नमूना-ए-झूठे-सच्चे किस्से :)

एक

दो

तीन

चार

पाँच

छह

सात

आठ




गुरुवार, दिसंबर 12, 2013

द आयरन मैन - The Iron Man

ससुराल जाने का चाव सबको होता है बेशक घूम घूम कर और झूम झूम कर गा लें कि ’मैं ससुराल नहीं जाऊँगी, डोली रख दो कहारो।’  पहली बार ससुराल जाने का अवसर आया तो हमारे फ़त्तू को भी पूरा चाव था। सज धज कर मन में भावी सेवा टहल के ख्याल लिये जनाब ससुराल पहुँच गये। पुरजोर मौखिक स्वागत हुआ। भोजन का समय हुआ और जिज्जाजी जीमने के लिये तैयार हुये तो साली ने बथुए की रोटी पेश की। 

फ़त्तू को धीरे से झटका लगा, पूछा, "बथुए की रोटी?’

साली चहकी, "जिज्जाजी, बथुए में घणा आयरन होय सै।"फ़त्तू आयरन की गोली समझकर जीमने लगा। रात में रोटी तो सादी थी लेकिन साथ में सब्जी जरूर बथुए की थी।

जिज्जाजी के हावभाव देखकर साली ने फ़िर कहा, "जिज्जाजी, बथुए में घणा आयरन होय सै।" फ़त्तू ने वो आयरण सप्लीमेंट भी पेट के हवाले किया। अगले दिन सुबह बथुए के परांठे और दोपहर में रोटी के साथ बथुए का रायता - फ़त्तू ने कुछ कहने के लिये मुँह खोला और जवाब में साली ने फ़िर बथुए में घणा आयरन होने का पुराण खोला।  

फ़त्तू तसल्ली से उसकी बात सुनकर बोला, "बथुए में आयरन की तो मैं जाणूं सूँ पर चार चार बेर बथुआ प्रोडक्ट बनाके खिलाने की तकलीफ़ क्यों करते हो? थारे घर में कोई तीन-चार फ़ुट का आयरन-रॉड रखा हो तो सीधे ही झंझट निबटाओ न, खामेख्वाह बथुए की ऐसी तैसी करण में जुट रहे हो।"



कुर्सी के लिये छीना-झपटी, क्रय-विक्रय, जोड़-तोड़ देखने के अभ्यस्त हम दिल्ली वाले राजनैतिक पार्टियों के बदले अंदाज को देखकर फ़त्तू बने हुये हैं। जिसे देखो वही कह रहा है कि हम सरकार नहीं बनायेंगे और प्रकट यह कर रहे हैं कि इससे भला जनता का होना है।  दिल कर रहा है कि फ़त्तू की तरह कह दूँ ’साली’ पार्टियों से कि लोकतंत्र का जो आयरन सप्लीमेंट हमें देना है वो सीधे तरीके से एक ही बार दे दो न, खामेख्वाह बथुए की ऐसी तैसी करण में जुट रहे हो:)

रविवार, नवंबर 24, 2013

हिन्द की चादर

कश्मीर से चलकर आये उन ब्राह्मणों की व्यथा-कथा सुनकर सबके दिल उदास हो रहे थे और आँखें गीली।  क्या विडंबना थी कि स्वर्ग जैसी जन्मभूमि में सुख,शान्ति और समृद्धि से जीवन व्यतीत कर रही एक भूभाग की  जनता इस बात के लिये विवश थी कि या तो अपना धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपनाये नहीं तो हर तरह के जुल्म सहे। त्रस्त होकर उन लोगों को आशा की एक किरण यहीं दिखी थी तो कश्मीरी ब्राह्मणों का एक प्रतिनिधिमंडल सहायता की पुकार लगाने गुरू श्री तेगबहादुर जी के समक्ष प्रस्तुत हुआ था। उपस्थित समूह में सन्नाटा छाया हुआ था। सत्तासीन को निरंकुशता के साथ मजहबी कट्टरपन की सनक सवार हो जाना शेर के मुँह खून लगने से भी खराब होता है, शेर तो सिर्फ़ क्षुधापूर्ति के लिये दूसरों की जान लेता है।

धरती ऊपर से शांत दिखती है लेकिन उसके गर्भ में क्या कुछ चल रहा है, ये हमेशा दिखता नहीं है। जहाँ गुरू साहब विराजमान थे, उसी गद्दी के पास खड़े उनके नौ वर्ष की वय के सुपुत्र बाला प्रीतम(गुरू गोविंद सिंह) ने सबकी उदासी का कारण पूछा। कारण बताये जाने पर उस तेजपुंज ने इसका उपाय पूछा।  पहले से ही आतंकित और त्रस्त नागरिकों के टूट चुके मनोबल को झकझोरने का उपाय क्या हो सकता है? 

विचारमग्न गुरू श्री तेग बहादुर जी ने कहा, "अब किसी महापुरुष को बलिदान के लिये सामने आना होगा।"

बाला प्रीतम ने छूटते ही कहा, "पिताजी, आज के समय में आप से बड़ा महापुरुष कौन है?"

वहीं निर्णय हो गया। गुरू तेग बहादुर जी ने प्रतिनिधिमंडल से दिल्ली के शहंशाह को कहलवा भेजा कि अगर वो गुरू तेग बहादुर जी को इस्लाम स्वीकारने के लिये तैयार कर ले तो सब लोग इस्लाम स्वीकार कर लेंगे अन्यथा नहीं। संदेश दिल्ली पहुँच गया और स्वयं गुरू तेगबहादुर भी अपने कुछ शिष्यों के साथ दिल्ली को रवाना हुये।

औरंगज़ेब के द्वारा इस्लाम स्वीकार किये जाने की बात पर गुरू साहब ने ऐसा करने से स्पष्ट मना कर दिया बल्कि निर्भीकता से उसे कहा कि तुम खुद भी सच्चे मुसलमान नहीं हो जो अत्याचार के द्वारा दूसरों को अपना धर्म छोड़ने के लिये मजबूर करते हो। चमत्कार दिखाने की शर्त से लेकर, लालच और फ़िर कैद का भय दिखाकर भी औरंगज़ेब के मंसूबे पूरे होते नहीं दिखे तो उसने जल्लादों को गुरू तेगबहादुर जी का शीश उतारने का हुक्म दे दिया।

"भै का कऊ देत नहिं, नहिं भै मानत आनि" उचारने वाले भला सिद्धांतों के लिये बलिदान देने से पीछे हटते? वैचारिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मिसाल पेश करते हुये गुरू तेगबहादुर जी  ने हँसते-हँसते अपना बलिदान दे दिया, शीश दिया पर अपना धर्म नहीं दिया।

चाँदनी-चौक, दिल्ली में जिस जगह पर गुरू साहब का शीश उतारा गया, आज वहाँ गुरूद्वारा शीशगंज साहिब है जो हम सबकी श्रद्धा और आस्था का केंद्र है। यह हमें याद दिलाता रहेगा कि भविष्य उन्हीं कौमों का सुरक्षित रहेगा  जिनके पास बलिदान की विरासत है।

’हिन्द की चादर’ श्री गुरू तेगबहादुर जी के चरणों में बारंबार नमन।

संबंधित लिंक - गुरू तेग बहादुर सिमरिए 


रविवार, नवंबर 17, 2013

तटस्थता का झंझट

हमारे पापा के एक दोस्त हैं, सहकर्मी रहे हैं और अब दोनों ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं। सही मायने में अपने को जो थोड़ा बहुत पढ़ने का शौक हुआ, इन्हीं अंकल की बदौलत हुआ। असल में उनकी पोस्टिंग मेरे स्कूल के पास थी और कभी पापा का कोई संदेश पँहुचाने के लिये और कभी-कभार अपने किसी काम से उनके ऑफ़िस में जाना पड़ता था। परिवार इसी शहर में रहते हुये भी एक तरह से मेरे लोकल गार्जियन का कर्तव्य इन्हीं अंकल ने निभाया।

अंकल एकदम शरीफ़ टाईप के लेकिन हर मर्ज की दवा रहे, निस्सवार्थ और निस्संकोच स्वभाव उनके चरित्र का यू.एस.पी. है। हर विभाग में उनके परिचित निकल आते थे और किसी का भी कोई काम हो तो वो निस्संकोच अपने सिर ले लिया करते थे। किसी अस्पताल में किसी और के काम से गये तो बातों-बातों में पता चलता कि अब उन्हें बिजली दफ़्तर में जाना है और अस्पताल वाले परिचित का कोई काम उस बिजली विभाग से निकल आता। वहाँ जाकर अपने काम करवाये तो पता चला कि बिजली विभाग वाले को बैंक में चेक जमा करवाने या ऐसे ही किसी काम से जाना है तो अगला पड़ाव बैंक होता था और महीने-दो महीने में एकाध बार हम भी उनके साथ संलग्नक बनकर घूमते रहते थे। यूँ समझिये कि रोज का एकाध घंटा उनका इसी सेवाकार्य में गुजरता था। ऐसे ही एकबार किसी की किताबें लौटाने लाईब्रेरी गये तो मैं साथ था और फ़िर मेरे यह पूछने पर कि क्या मैं भी इसका सदस्य बन सकता हूँ, उन्होंने उसी समय मेरा लाईब्रेरी कार्ड बनवा दिया।

अंकल का सादा स्वभाव मुझे बहुत पसंद आता था। एक बार मुझसे पूछने लगे, "किताबें तो पढ़ता है कभी नाटक-वाटक भी देखे हैं अंग्रेजी वाले?"  मैं  भी कौन सा कम सादा था, कह दिया कि देख तो लूँ लेकिन अंग्रेजी के संवाद समझ  नहीं आयेंगे। कहने लगे कि समझने की कोई जरूरत नहीं होती, जब सब ताली बजायें तो ताली बजा दो, जब सब हँसें तो हँस दो। आज्ञा शिरोधार्य करते हुये इसी अंदाज में एकाध नाटक देखा भी, अंकल अपने को आज भी पसंद हैं लेकिन वो आईडिया अपने को उस समय ज्यादा पसंद नहीं आया। फ़िर हमने न देखे अंग्रेजी के नाटक-फ़ाटक। मन में यही सोचा कि इस तरह से अंग्रेजी नाटक देखने से तो सप्रू हाऊस के पंजाबी नाटक देखना ज्यादा बढ़िया रहेगा, कम से कम कुछ पल्ले तो पड़ेगा।

पिछले कुछ दिन से या तो बदली हुई दिनचर्या का असर है या कुछ और बात, अंकल की कही बात थोड़ी-थोड़ी पसंद आने लगी है।  ताजा हालात से अपडेट नहीं रह पाता, हो-हल्ला सुनकर रहा भी नहीं जाता और पूरी जानकारी न होने के चक्कर में कुछ कहा भी नहीं जाता। एक तो जब तक कोई बात समझ आती है, तब तक नई ब्रेकिंग न्यूज़ आ चुकी होती है। इत्ते मामले हो गये, हमने कुछ प्रतिक्रिया ही नहीं दी। आसाराम जी का मामला, खजाने का मामला, मोदी का मामला, राहुल का मामला, नीतिश जी का मामला, और अब सचिन का मामला -  गरज ये कि अपना हाल ऐसा हुआ पड़ा है कि एक चीज की मीमांसा करने की सोचते हैं, तब तक भाई लोग नया हो-हुल्लड़ शुरू कर देते हैं। अबे मिलजुलकर सरकार बना सकते हो, मिलजुलकर घोटाले कर सकते हो, दूसरे उल्टे सीधे काम कर सकते हो मिलजुलकर लेकिन ये नहीं हो सकता कि नया मामला खड़ा करने में मिलजुलकर और आम सहमति से काम ले लो। एक ने कुछ कहा या किया तो तुमसे इतना सब्र नहीं होता कि कम से कम एक हफ़्ता तो इंतजार कर लो? तुम्हारा तो ये फ़ुल्ल टाईम धंधा है लेकिन हम जैसों को तो दो टकेयां दी नौकरी भी देखनी होती है और दूसरी तरह की दुनियादारी भी। वैसे तो हम प्रतिक्रिया न भी दें तो चलेगा, प्रतिक्रियावादियों की कमी तो है नहीं लेकिन कवि लोग जो कह गये हैं कि तटस्थ रहने वाले भी पाप के भागी हैं तो हम चुप कैसे रहें भला? ’जबरा मारे और रोने भी न दे’ वाली बात कर रखी है मुझ जैसे गरीबों के साथ।

हारकर हमने फ़ैसला किया कि अंकल की बात पर अब अमल करेंगे, सब ताली बजायेंगे तो हम भी ताली बजा देंगे और जब दूसरे हँसेंगे तो हम भी हँस देंगे ताकि कम से कम तटस्थ तो न समझे जायें। लेकिन इन धुरंधरों से हमारे साथी ही कौन सा कम हैं? इन मित्रों से अच्छे तो वो दर्शक हैं जो एक दूसरे को देखकर ताली बजाते हैं या हँसते हैं। तुम तो फ़टाफ़ट से हर बात में भारत-पाकिस्तान बना लेते हो। मोदी ने कुछ कह दिया तो समर्थक उसे ही जस्टीफ़ाई करने में लग जायेंगे और विरोधी आरोप लगाने लगेंगे। और अगर राहुल ने कुछ कह दिया तो फ़िर वही करम, आमने-सामने। बात न देखी जायेगी, अपनी प्रतिक्रिया इससे प्रभावित होगी कि बात कही किसने है।

मुजफ़्फ़रनगर दंगों के बाद राहुल के भाषण को लेकर अच्छा खासा बवाल उठ खड़ा हुआ। जहाँ तक मेरी जानकारी है, राहुल ने कहा था कि इन दंगों के बाद आई.एस.आई. कुछ मुस्लिम युवाओं के संपर्क में है। जब तक हम इस बात के लिये तैयार हुये कि चलो भाई ने कोई तो समझदारी की बात की। अब थोड़ी वाहवाही कर ली जाये, तब तक पता चला कि इस बात पर चुनाव आयोग में शिकायत भी हो गई और नेताओं ने राहुल से स्पष्टीकरण भी माँग लिया कि या तो आप उन युवाओं के नाम बताईये या फ़िर मुस्लिम समुदाय से माफ़ी मांगिये। ले भाई संजय कुमार, दे ले प्रतिक्रिया। हम फ़िर से तटस्थ हो गये लेकिन एक बात नहीं समझ आई कि किस बात की माफ़ी मांगी जाये साहब?  इस व्यक्तव्य से पूरे मुस्लिम समुदाय का अपमान कैसे हो गया? आपकी ये माँग किसे क्लीनचिट दे रही है?

उधर पटना भाषण, जोकि मेरे विचार में मोदी के सबसे हल्के भाषणों में से एक था से अपना भी फ़्यूज़ उड़ा हुआ था कि सामने वालों ने उससे भी तगड़ी बातें करनी शुरू कर दीं। सरदारजी ने ज्ञान बघारा कि भाजपा है जो इतिहास और भूगोल बदलती है। सत्वचन महाराज, तुस्सी सच में ग्रेट हो। सब टीवी  पर आने वाले हमारे परिवार के पसंदीदा सीरियल ’तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ का वो सीन याद आ गया जब दया भाभी एक काकरोच को देखकर चीखती है ’कारकोच-कारकोच’ और उसका पति जेठालाल उसकी गलती पर उसे डाँटता है कि पगली इसे कारकोच नहीं कहते। दया के सकुचाकर पूछने पर कि फ़िर इसे क्या कहते हैं, इतराते हुये जेठालाल बताता है, "इसे कहते हैं, ’काचरोच’"

हँसी-मजाक की बात एक तरफ़, लेकिन गंभीरता से इस बात पर क्या हमें नहीं सोचना चाहिये कि ये आरोप-प्रत्यारोप सिर्फ़ सत्ता के लिये लगा रहे हैं और इनके भी कुछ दुष्परिणाम हो सकते हैं?

ऐसा भी हो सकता है कि  मैं इन बातों को संपूर्णता में न समझ पा रहा होऊँ।  अगर ऐसा है तो फ़िर अंकल की बात पल्ले बांध लेने में कोई बुराई नहीं कि सब जैसा करें, वही किया जाये और काकरोच को कारकोच नहीं बल्कि काचरोच कहा जाये :)