शनिवार, अप्रैल 10, 2010

हिसाब चुकता!

आज के दिन ब्लॉग पर आपको हिट होने की लालसा है तो सबसे सहज, सरल और सुलभ फ़ार्मूला है कि विवादास्पद लिखा जाये। कविता, गजल, कहानी, सामाजिक विषयों पर लिखना दिमाग वालों का काम है। हम जैसों को तो वैसे काम पसंद हैं कि जिनमें सामने वाला ये कहकर उकसाये कि ’इसमें भी कोई दिमाग लगता है क्या’। तो जी हमने सोचा था कि कभी किसी विवाद में नहीं फ़ंसेंगे, पर मन का सोचा होता है कहीं? उंगलियां टूट गईं, आंखों से धुंधला दिखने लगा, घर के सदस्य नाराज रहने लगे, बिजली का बिल और इंटरनेट का खर्चा बढ़ गया है पर मजाल है किसी का दिल पसीजा हो। जब टिप्पणियां नहीं आनी थीं तो नहीं आईं बस। अब हमने भी सोच लिया है कि थोड़े दिन और देखेंगे, न सुधरे लोग बाग तो हमीं बिगड़ जायेंगे और फ़िर कुछ ऐसा लिखेंगे कि न चाहते हुये भी लोग आयेंगे और टिप्पणियों से नवाज कर जायेंगे। बेशक गाली देकर जायें, पर कुछ न कुछ देकर ही तो जायेंगे।

अब योजना बनानी शुरू की तो पहला प्रश्न था कि विषय कैसा होगा? ले देकर अपनी रेंज में दो विषय आते दिखाई दिये – दोनों इतने ही प्राचीन और सनातन हैं कि जितनी ये धरती और इतने नये भी हैं कि कभी बासी नहीं होते। एक विषय था, नारी स्वतंत्रता और दूसरा था ’मेरा धर्म महान’। पहले विषय के बारे में सोचते ही पसीने छूटने लगे। गर्मी बहुत है यारों, पहले ’यूरेका’ हो जाता अपने राम को तो मौसम ठीक था उस समय, आजकल तो ये सोचने में ही पसीने छूट रहे हैं। अब कोई ये न समझ ले कि हम किसी से डर गये हैं, बस मूड नहीं बन रहा है, फ़िर देखेंगे। गृहमंत्री बड़े सख्त मूड में हैं और हम इस समय में परेशानी बढ़ाना नहीं चाहते हैं किसी की भी। ये सर्दी का मौसम बहुत देर से आता है वैसे।

अब ये पक्का इरादा कर लिया कि दूसरे विषय पर कोई समझौता नहीं करना है। जिधर देखो, प्रवचन हो रहे हैं, ज्ञान बंट रहा है, चैलेंज लिये दिये जा रहे हैं। इमोशनल, सेंसेशनल, टेंशेसनल पोस्ट्स धड़ाधड़ छप रही हैं। आसान काम है जी, कुछ भी लिख दो। कौन आ रहा है हिसाब मांगने। चेले आ आकर टिप्पणी पे टिप्पणी मारेंगे, धरम का धरम हो गया और करम का करम। इहलोक भी सुधर गया और परलोक भी। यहां भी नाम हो गया और वहां भी हूरें रिज़र्व हो गईं। भाई लोगों, तुम्हारा धर्म वाकई महान है और शायद तुम से ज्यादा हम ये बात मानते हों, पर क्या पड़ी है तुम्हें औरों को सुधारने की। काहे जी हलकान करते हो, अपना भी और दूसरों का भी। हम तो जब रेल में भी जाते हैं तो यही दुआ मांगते हैं कि ज्यादा भीड़ न हो, कहीं सीट शेयर न करनी पड़े। और एक तुम हो, पता नहीं किन किन चीजों में अपना हिस्सा औरों के साथ बांटने के लिये उतावले हो रहे हो। वाकई, तुम सबसे महान हो। कोई देश, समाज, धर्म या जाति ऐसी नहीं है जिसमें अच्छाईयां और बुराईयां न हों। सुधारने का इतना ही बीड़ा उठा रखा है तो पहले अपने आसपास ये अभियान चलाओ। सफ़ल होने के बाद अपना दायरा फ़ैलाओ। ये क्या बात हुई कि जहां कुछ स्कोप देखा, लग गये ऑफ़र बांटने।

एक बात याद आ गई, आओ बांट लें।

जैसे फ़ोर्स्ड बैचलर होते हैं, दो फ़ोर्स्ड ट्रैवलर्स थे जिन्हें रात के समय एक जंगल से होकर गुजरना था। विचारधारा मिलती नहीं थी, जैसे आपकी और दूसरी पार्टी की नहीं मिलती है और रास्ता एक था, जिसपर चल कर मंजिल तक पहुंचना था। ठीक वैसे ही, जैसे हमें इसी देश में साथ साथ रहकर जीवन बिताना है। खैर, दोनों चल रहे थे और कुछ दूर चलकर एक को शौच की आवशयकता महसूस हुई। उसने अपने हमराही से कहा कि तुम यहीं खड़े रहो, मैं निपट कर आता हूं। दूसरे के मन में डर कुछ ज्यादा ही था, रात का समय, शेर का डर, साथी से दूरी मंजर को और खतरनाक बना रहे थे। वो बोला, यार मुझे भी कुछ हाजत महसूस हो रही है, मैं भी निपट लूंगा। दोनों बैठने लगे। दूसरे ने बात बनाई, “यार सावधान तो रहना ही चाहिये, तुम उधर मुंह करके बैठो और मैं इधर मुंह करके बैठूंगा। शेर किसी भी तरफ़ से आयेगा तो पता चल जायेगा।” बैठ गये साहब, पीठ से पीठ जोड़कर। अंधेरे में झींगुर की आवाज भी शेर की आवाज लग रही थी। पहले ने दूसरे को ढांढस बंधाया कि यार डर मत। दूसरा अपनी हेठी कैसे झेलता, बोला, “डरता कौन है यहां?” पहले ने समझाया कि भाई डरता नहीं है तो अपनी धो ले, मेरी क्यों धो रहा है?

दुहाई है महाराज, समझ लेओ समझ में आये तो, सब एक ही जहाज के सवार हैं। जहाज डूबेगा तो कोई भगवान सारे हिंदुओं को, और कोई खुदा सारे मुसलमानों को बचाने नहीं आने वाला है। बचेंगे तो सारे और डूबेंगे तो सारे। खुद सुधर जाओ, और सारे अपना अपना घर सुधार लो, तो बहुत है। तुम्हारी भी जय-जय और हमारी भी जय-जय, बहुत दुश्वार है क्या?

कुछ दिन पहले विचार शून्य वाले दीप महाशय ने हम पर अपनीVICHAAR SHOONYA एक पोस्ट अर्पित कर दी थी। बताओ, कैसे कैसे तो लोग हैं और कैसी कैसी पसंद है लोगों की? पर ये बहुत पुरानी बीमारी है हमारी कि उधारी बाकी नहीं रखते। वैसे तो हम बहुत बदल गये हैं पहले से पर कभी कभी पुराने मर्ज उभर कर आ जाते हैं। ले लो भईया वापिस, जो प्यार तुमने मुझको दिया था, वो प्यार तेरा मैं लौटा रहा हूं। कर दी तुम पर अर्पित।

डिस्क्लेमर:- किसी भी जड़ चेतन की भावनायें आहत करने का उद्देश्य नहीं है, सिर्फ़ एक प्रलाप समझा जाये।

10 टिप्‍पणियां:

  1. यह गीत शायद 'हक़ीकत' फिल्म का है। सुन नहीं पा रहा लेकिन मुझे बहुत पसन्द है।

    आप से थोड़ी असहमति है - नारी स्वतंत्रता का विषय थोड़ा कम प्राचीन है, यही कोई हजार एक बरस :)

    विषय तो बहुत अच्छा चुना आप ने और निभाया भी बहुत अच्छे तरीके से ( धुलाई वाला प्रकरण तो बमफाट है ) लेकिन अब इस पोस्ट को शीर्षक ही नहीं दिए तो कैसे लोग आएँगे और कैसे टिप्पणियों की संख्या में वृद्धि होगी ? 'मो सम कौन' पर कौन आएगा। मैं 'धूत कहौ अवधूत कहौ' शीर्षक से पोस्ट कर भुगत चुका हूँ - कुल जमा 5 टिप्पणियाँ !
    शीर्षक कुछ ऐसा होना चाहिए था - "तुम मेरी क्यों धो रहा है?" या " नारी, धर्म और धुलाई" .. अब क्या चूक गए ।
    अब तो एग्रीगेटर शीर्षक दिखाने से रहे।
    "अब पछताए होत क्या जब गदहा चर गया खेत" ( Courtesy : भोजपुरी कहावत काहें गदहा से जरि चरवातल?) -
    अब चलूँ - चरने ;)

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  2. वाह दोस्त, क्या सच्ची बात कही और वो भी "सच-सच"!
    आप को परवाह नही करनी चाहिये,क्यो कि,

    "वो होगें और ’इल्म के सौदागर’ जो डरते है रुसवाई से,
    मै ज़ूनूनी हूं ज़माने के चलन तोड के कह देता हूं."

    सुन्दर भाव, सुन्दर प्रस्तुति!

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  3. बहुत अच्छे। मेरे साथ साथ और सबकी भी अच्छी खबर ली है आपने। अच्छा सच बात यह है की मुझे भी पता नहीं पता था की पोस्ट किसी को समर्पित होने के बाद इतनी टिप्पणिया बटोर लेती है। शायद दुसरे लोग समझते होंगे की अगली पोस्ट उन्हें समर्पित हो जाएगी। लोगों के इतने कमेन्ट पाकर मैं भी चकित हो गया। वैसे इसमें विवादस्पद कुछ भी नहीं था ये तो बस एक छोटा सा मजाक था। अच्छा राव साहब के मशवरे पर भी थोडा ध्यान दीजियेगा और आगे से शीर्षक भी कुछ तडकता भड़कता सा रखियेगा खूब टिप्पणिया आयेंगी।
    अब आप सच का सामना कीजिये। मैं आपकी लेखनी का कायल हूँ । आप का नजरिया एकदम विशिष्ट है। ऐसे ही लिखते रहिये। आज का लेख पढ़कर भी हमेशा की तरह दिल खुश हो गया। और अंत में स्त्री पुरुष के संबंधो पर मेरे एक और लेख को झेलने के लिए अपने आप को तैयार कर लीजिये। भाई मैं तो नहीं सुधारूँगा और उल्टा सीधा लिखता ही रहूँगा ।

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  4. बहुत ही धारदार व्यंग है ...आपकी लेखनी बहुत सशक्त है....
    विचार शून्य साहब अपने नाम को चरितार्थ नहीं कर रहे यहाँ...बहुत सही बात कही है उन्होंने आपके बारे में, बिना लाग-लपेट सहमत हूँ उनसे..
    ये नज़्म रफ़ी साहब की बेहतरीन गायकी की परिचायक है..
    कुल मिला कर सुन्दर प्रस्तुति...
    धन्यवाद...

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  5. बेहतरीन
    निर्बाध गति से पढना पड़ा, इतना प्रभावी जो लिखा है
    गिरजेश राव जी से सहमत शीर्षक तो होना ही चाहिये था.

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  6. बहुत गज़ब की पोस्ट है संजय भाई...अद्भुत!!

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  7. हा-हा-हा
    "अपनी धो मेरी क्यों धो रहा है"
    बेहद मजेदार पोस्ट

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  8. देर से ही सही, सुझा रहा हूं, जोड़ दें- 'संस्‍कृति' या 'विमर्श' फिर यह गहन चिंतनपूर्ण, बौद्धिक, सामयिक सब एक साथ मान लिया जाएगा.

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  9. BAHUT KHOOB SANJAY BHAI SAHAB....!!!!

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