शनिवार, अक्तूबर 02, 2010

जिन्दा या मुर्दा?

उसकी उम्र उस समय पचास साल के करीब थी। सुविधा के लिये कुछ नाम रख लेते हैं उसका, ’प्रताप’  ठीक रहेगा?  सब्ज़ी मंडी में गिने चुने लाईसेंसधारक विक्रेताओं में से एक था, लेकिन घर के हालात के कारण खुद अजीब सी हालत में दिखता था या उसकी उस हालत के कारण ही उसके घर के हालात ऐसे थे, मैं नहीं समझ पाया। उसकी पत्नी कभी तो अलग अलग पैर में अलग तरह की चप्पल पहने दिखती, कभी हम देखते कि उसने सूट या सलवार उलटी तरफ़ से पहन रखा है। हाँ, चेहरे पर हमेशा एक मासूम सी मुस्कुराहत रहती थी। लोग कहते थे, बड़ी सीधी है बेचारी। ये सीधापन तारीफ़ के लायक है या तरस के लायक? बदले में क्या मिलता है इस सीधेपन के – वैसा ही सीधापन या और ज्यादा  शातिराना दबंगई?
प्रताप का बड़ा लड़का कुछ पढ़ा लिखा था नहीं, ऑटो चलाता था और दिन में लॉटरी खेलता। शाम में पैसे बचे रहते तो जुआ खेलता, दारू पीता और घर आकर बीबी को पीटता और माँ-बाप कुछ कहते तो उन्हें गालियाँ निकालता। छोटा बेटा पढ़ता था और पढ़ने में अच्छा भी था। बारहवीं पार करने के बाद उसका एयरफ़ोर्स में सैलेक्शन हो गया और घर का इकलौता व्यावहारिक सदस्य घर छोड़कर चला गया।
छोटे बेटे के चले जाने के शायद साल दो साल के अंदर ही गॄहिणी दुनिया छोड़कर चली गई और घर में रह गये तीन सदस्य – प्रताप, बड़ा बेटा और पुत्रवधू।  छोटे वाला तो अपनी माँ के मरने पर आया था, अब शायद जब मकान में हिस्सा बाँटने की जरूरत महसूस होगी तब आये या एक मौका और हो सकता है, जिसमें एक पंथ दो काज हो जायेंगे। खैर, हालत तो प्रताप की पहले भी बहुत अच्छी नहीं थी, वैसे भी साथ रहते रहते एक दूसरे के गुण इंसान में आ ही जाते हैं। वो भी अपनी बीबी जैसा ही दिखने लगा था। अब लोग उसे बावला कहते थे। घर पर वो भी कभी कभी बेटे के हाथों पिटने का आनंद पाने लगा था। काम धंधे में कुछ तो पूंजी की कमी के चलते और कुछ दूसरे हालात के कारण गुजारे भर लायक कमाता और शाम को लाकर दिन भर की कमाई बेटे या बहू जिसके हत्थे पहले चढ़ जाता, उसकी नजर कर देता बल्कि करनी पड़ती। इसके बदले में सुबह की चाय का पक्का नहीं था, दोपहर को अपने ठिये पर ही कुछ खा पी लेता और रात में तीन रोटी और साथ में दाल या सब्जी पा लेता था। वैसे तो कम खाना, कम सोना, कम बोलना योगियों के लिये अच्छा बताया जाता है लेकिन एक गॄहस्थ आदमी के लिये जो दिन भर बैल की तरह काम में जुटा रहे कम खाना एक सजा से कम नहीं है। प्रताप सो कम ही पाता था क्योंकि सब्जी के काम के चलते  अलसुबह ही घर से निकल जाता था, कम बोलना बिल्कुल नहीं हो पाता था, हाँ कम खाना वाली शर्त बेटा बहू पूरी करवा देते थे। यानि कि ग्रेडिंग सिस्ट्म लागू की जाये तो तीन में से दो शर्तें पूरी होती थीं, और हमारा प्रताप एक योगी की कैटेगरी में फ़र्स्ट डिवीज़नर के तौर पर माना जा सकता है।
दुनिया में किसी को आपके दुख दर्द से लेना देना नहीं है, किसे फ़ुरसत है यहाँ कि दूसरे के हालात को समझे। जो ऐसे हैं, अपवाद हैं और उन्हीं के दम पर ये दुनिया टिकी है। सरकार की तरफ़ से एक अपकमिंग प्रोजैक्ट था जिसके तहत सब्जी मंडी को वहाँ से शिफ़्ट किया जाना था। नई जगह पर अलाटमेंट सिर्फ़ लाईसेंसधारक विक्रेताओं या आढ़तियों को ही होनी थी। जब यह योजना अभी फ़ाईलों में ही थी लेकिन फ़ाईनल होने वाली थी, एक  स्थानीय  राजनैतिक सक्रिय  नेता ने प्रताप को हर तरीके से समझाबुझाकर साठ या सत्तर हजार रुपये के बदले वो लाईसेंस अपने नाम करवा लिया। इस बात का खुलासा तो छह महीने के बाद हुआ जब नई जगह एलाट होने की विज्ञप्ति जारी हो गई और लोगों ने प्रताप को बधाई दी कि अब तो उसे काम करने की जरूरत ही नहीं रहेगी क्योंकि उसका लाईसेंस ही तीन से चार लाख में बिक जायेगा। लोग उसे भी अब इज्जत से बुलाने लगे थे, पैसे का प्रताप इस प्रताप से ज्यादा था।  तब तक चिडि़या खेत चुग चुकी थी और बात खुलने के बाद वो रकम भी उसके लड़के ने छीन ली,  छीनना ठीक शब्द नहीं है, कहना चाहिये विनिमय कर ली। बदले में भरसक गालियाँ और मार दी थी प्रताप को। प्रताप फ़िर से बावला कहलाया जाने लगा।
साँप की मणि छिन जाये तो तेज कहाँ से रहेगा?  दिन में रोटी मिलने का टाईम तो एक ही रहा, रोटियाँ  कम हो गईं और गालियाँ मारपीट बढ़ गई।  कुछ दिन ऐसे ही चलता रहा और एक दिन प्रताप घर का बिजली का बिल जमा करवाने जा रहा था तो एक पडौसी ने हाथ में बिल  देखकर बुलाया। एक कप चाय पिलाई और अपना बिल भी थमा दिया। अब हक क्या सिर्फ़ नमक का ही अदा किया जाता है? ले लिया उसने बिल और चल दिया। लौटा तो कोई और ही प्रताप था। उस दिन के बाद से मोहल्ले वालों को बिजली, पानी, टेलीफ़ोन के बिल, गैस बुक कराने जैसे कामों से निजात मिल गई है। एक बिल के बदले दस रुपये लेता है, इतना तो लोगों का पार्किंग में लग जाता था। उभय पक्ष खुश हैं। प्रताप इन दस रुपयों के बदले प्री एंड आफ़्टर सेवायें भी मुफ़्त में देता है। हर घर के हर बिल का रुटीन उसे मालूम है, संभावित तारीख से पहले ही जाकर याद करवा देता है लोगों को, कि बिजली का बिल आने वाला है, किसी किसी का तो एकाध दिन के उधार पर अपने पास से भी जमा करवा देता है, आदि आदि। रोज के दस बीस बिल तो हो ही जाते हैं, अपने पायजामे की जेब में एक पोलीथीन रखी है, एक एक घर में जाता है, बिल और पैसे लेकर उसमें रखता है और चल देता है अगले दरवाजे पर। खाता पीता बाहर ही है लेकिन अब लड़के की और बहू की गालियाँ और मार नहीं खाता।
हमारे घर के बिल भी वही जमा करवाता है। मेरे पिताजी पेंशन की बेशक परवाह न करते हों, एक सामान्य पेंशनर की तरह  पासबुक में एंट्री करवाने की उन्हें भी ज़िद सी रहती है। मैंने कई बार उनसे कहा कि एंट्री की ज्यादा चिंता न करें, छह महीने बाद भी जायेंगे तो बैंक वाले पासबुक अपडेट कर देंगे,  एक दिन कहने लगे कि यार तू क्यों परेशान होता है? मैं कौन सा खुद जाता हूँ, प्रताप के दस रुपये बन जाते हैं मेरा काम हो जाता है। समाज में ऐसे ही एक दूसरे के काम आते हैं हम। इसका मतलब हमारा प्रताप भी बिज़जेस एक्सपैंड कर रहा है, बैंक के काम भी पकड़ लिये हैं उसने।
लेकिन अब आ गया है ईज़ीबिल, हाथों हाथ कम्प्यूटर की रसीद लें। क्या इज़ीबिल जैसी तकनीक प्रताप के रोजगार को खा जायेंगी? नहीं, मुझे तो लगता है कि चलती रहेगी हमेशा – ये ’लड़ाई दिये की तूफ़ान की’ और चलती रहनी भी चाहिये।
एक दिन मेरा एक दोस्त किसी बात पर बोला, “इसे देख, पैंसठ साल की उम्र है, लेकिन पैसे के लिये इधर भाग उधर भाग, क्या जीना है ये भी?”
मैंने कहा, “मेरी नजर में तो इसका जीना ही जीना है।”
मैं कन्फ़्यूज्ड हूँ, प्रताप जिंदा है या मुर्दा?

:) फ़त्तू अपने छोरे से बोल्या, “मेरे दादा ने शादी की और पछताया, मेरे बाबू ने शादी की और पछताया। और तो और मन्ने भी शादी की और पछताऊँ सूं, तेरा के प्रोग्राम सै?”
छोरा बोल्या, “बाबू, चिंता मत न कर। खानदान की रीत कत्ती नी तोडूँगा। शादी करूँगा, फ़ेर पछता ल्यूँगा।”

35 टिप्‍पणियां:

  1. घणी दर्दनाक इस्टोरी सुना दी भाई जी आपने तो - मगर अंत भला तो सब भला, बुढापे में ही सही 10 में से 1 शंख तो मिटाया जोगी ने।

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  2. आज समाज में चारों तरफ़ प्रताप ही प्रताप हैं. जैसा उसके साथ हुआ है वैसा ही अधिकांश प्रतापों के साथ होता है. फ़र्क इतना जरूर आगया है कि आपका प्रताप नये सिरे से खडा हो गया है. इजी बिल से अभी ६५ साल के प्रताप को तो कोई खतरा नही है. बाकी की बाद में देखी जायेगी. आलेख बडा मार्मिक और महत्वपूर्ण है. शुभकामनाएं.

    रामराम

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  3. फ़त्तू तो पक्का ताऊ का चेला है, दिल्ली के लड्डू खाकर ही पछताना अच्छा है.:)

    रामराम

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  4. जिंदगी के बारें में क्या बोलें जनाब, जितनो सोचो, उतना दिमाग ख़राब ... जिंदगी की तो कम ही कर पातें है, आपकी कहानी और लेखन की ही तारीफ़ कर लेतें है ... हमारे आस पास भी एक प्रताप रहता है... मेरे ख़याल से लोगो को इ-बिल वाली मानसिकता से रु-ब-रु होने में वक़्त लगेगा... प्रताप के मरने तक इंतज़ार कर लें तो बेहतर ... या कमबख्त गरीबी को मार दें ..

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  5. मेरा पहला कमेन्ट ये था , अनुराग जी की [पहली ] टिपण्णी देखने से पहले
    अपने पास तो नहीं है जिगरा इस कहानी को पूरा पढने का
    हम तो चले , फिर कभी पढेंगे और सुझाव भी देंगे
    [मतलब कहानी के बीच में ही दिल महादुखी टाइप का हो गया था ]
    और अब ....
    ये हैं विचार

    @मैं कन्फ़्यूज्ड हूँ, प्रताप जिंदा है या मुर्दा?
    उत्तर है
    जिन्दा है जी ..... इसी को जिंदगी कहते हैं ..
    दाम में सस्ते चाइना के मोबाइल आने से रिपेयरिंग वालों की दुकाने बंद हो गयी क्या ??
    मोबाइल आने से "एस टी डी, पी सी ओ " [फोन बूथ ] बंद हो गए क्या ??

    जिंदगी अपना रास्ता खुद ढूंढ लेती है ..


    @चलती रहेगी हमेशा – ये ’लड़ाई दिये की तूफ़ान की’ और चलती रहनी भी चाहिये।

    सही कहा है आपने
    निर्बल से लड़ाई बलवान की........ ये कहानी है दिए और तूफ़ान की
    निर्बल = मानव, बलवान = समय

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  6. ज़िन्दगी की अगर कोई मन्ज़िल होती,तो ये डगर कब की सुनसान हो गई होती,क्यों कि सफ़र ही मकसद है,इस लिये चले जा रहा है ये सिलसिला!

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  7. संजय बाऊजी, मन को छू जाते हो यार! लेकिन जवाब देते वक़्त कॉमेडी करनी पड़्ती है शब्दों में ताकि वो टीस छिप सके..वो मुनव्वर भाई कह गए हैंः
    शगुफ़्ता लोग भी टूटे हुए होते हैं अंदर से
    बहुत रोते हैं वो जिनको लतीफे याद होते हैं.
    ज़रूरत ईजाद की माँ हैं और वही इजाद सामने है आपकी पोस्ट में...
    फत्तू इस बार ब्लैक एण्ड वाईट क्यों है, शादी को लेकर!

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  8. अपने ५० वर्ष कि उम्र से प्रताप कि कथा शुरू की. इससे पहले वो कैसा था ये उसकी पत्नी और बच्चों की हालत से थोडा बहुत पता चलता है. इस विषय में मैं अपनी एक ऑफिसर की बातों को दोहराऊंगा. वो कहती थीं की हमारे जीवन में जिस प्रकार हमारी सासों का कोटा बंधा है वैसे ही हमें अपने जीवन काल में कितना कार्य या कितनी मेहनत करनी है इस बात का भी कोटा बंधा है. जो लोग अपने हिस्से का कार्य अपनी जवानी में ही ख़त्म कर लेते हैं उनका बुढ़ापा मजे में कटता है और जो जवानी में अपने हिस्से का कार्य नहीं करते उन्हें बुढ़ापे में उसे ख़त्म करना पढता है. मैं इस बात में पूरी तरह से विश्वाश करता हूँ.

    मुझे लगता है की प्रताप अपने हिस्से का काम कर रहा है और मेहनत करना मुर्दा होना कतई नहीं है. बुढ़ापे में मेहनत करना उसकी अपनी चुनी हुई राह है बस वो इस बात से अनजान है और इसलिए दुखी है.

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  9. शानदार प्रस्तुति.

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    .

    मैंने अभी कुछ लिखा नहीं है... अगर लिख दिया तो पढियेगा जरुर.

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  10. अपने कमेन्ट में मैंने एक गलती कर दी है

    उसे सही पढियेगा.

    सांसों

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  11. ye jeena bhee jeena hee hai.......
    bahut marmik......jhakjhor kar rakh dene walee kahanee.......
    sacchaee to ye hai ki ghire hai hum aise charitro se ..par dekh undekhaa karne kee buree aadat jo hai . Apanee peeda hee apanee lagtee hai .........shesh bhagvan bharose .

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  12. zindagi apni hi chal se chalti hai aur ye khel khelti hi hai bas jo isse ubar gaya wo hi insan ban gaya.

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  13. ये भी जीवन का एक रंग है ...
    जिंदगी की जंग चलती रहे ...जब तक हाथ पैर काम कर रहे हैं ...उसके बाद का सोचकर प्रताप के लिए चिंता हो रही है ...
    मार्मिक कथा या सत्य घटना ...!

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  14. प्रताप जिन्दा है मुर्दा नहीं क्योकि उसने बुढ़ापे में भी आत्मसम्मान की रोटी को चुना है और जिन्दा वही होता है जिसके पास आत्मसम्मान नाम की चीज हो |

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  15. @ स्मार्ट इंडियन जी:
    ये रियल लाईफ़ की स्टोरी है जी, जो मुझे बहुत मशहूर लोगों की जीवनी से ज्यादा प्रेरक लगती है। कभी हार न मानने की जिद, जीवन को जीने की जिद, पलायन न करने की जिद।

    @ ताऊ, बड़ों का आशीर्वाद रहना चाहिये, फ़त्तू कहै सै बस, करके न पछताया करदा(ऊसा काम ही न करदा के पाछम पछताना पड़ै।

    @ मज़ाल साहब:
    आज की तारीफ़ ’प्रताप’ के नाम कर देते हैं,आप का शुक्रगुजार हूँ।

    @ गौरव:
    अरे गौरव बाबू, ये तो बहुत मामूली सी बात है। हम आंख उठाकर देखें तो सही, हर तरफ़ बिखरे पड़े हैं ऐसे पात्र।
    तुम्हारे तर्क हमेशा की तरह लाजवाब।
    और वो पार्टी शार्टी का क्या हुआ?

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  16. प्रताप एक प्रेरक प्रसंग है ! ऐसे लोग कभी मरते नहीं हैं वे कथित मृत्यु के बाद भी आप और मुझ जैसों की स्मृतियों में सदैव जीवित रहते हैं /जीवित रहेंगे !

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  17. @ ktheLeo:
    ये सिलसिले चलते ही रहने चाहियें जी, चलेंगे जरूर चलेंगे।

    @ सम्वेदना के स्वर:
    सरजी, हम तो हरदम हंसते रहते हैं, अब ज्यादा न बुलवाओ हमसे, फ़िर हंस देंगे, हा हा हा।
    आजकल नाराजगी का मौसम है तो सुबह आठ बजे से ब्लॉगर बाबा भी नई पोस्ट नहीं डालने दे रहे थे, बाकी सब फ़ंक्शन्स बराबर थे। जब तक मौसम ने करवट ली, समय देखिये पोस्ट का, क्या हो रहा था? अब दूसरी कैफ़ियत, जैसे लतीफ़ा सुनने के दो दिन बाद गधा हंसता है, आज २ अक्टूबर के अवकाश वाले दिन हमें क्लोज़िंग करनी थी। जल्दी जल्दी में रंगीनी रह गई. लेकिन आप भी कयामत की नजर रखते हैं, देखता हूँ कि गई हुई रंगीनी लौट पाती है कि नहीं।
    प्वायंट आऊट करने के लिये एक्स्ट्रा आभार विदाऊट ऐनी एक्स्ट्रा चार्ज। आपकी कल की पोस्ट के एस.एम.एस. कई दिशाओं में पहुंचा दिये, मस्त थे बहुत।

    @ प्रवीण पाण्डेय जी:
    भीख मांगने से या बेबस होकर बैठे रहने से तो ये जीना हमें लाख दर्जे बेहतर लगा।

    @ विचार शून्य:
    आपके कायल तो हम पहले से ही हैं बन्धु, आपकी अधिकारी के भी कायल हो गये। बिल्कुल इसी नजरिये पर एक घटना और है, तुम झेले जाओ, हम फ़ेंके जायेंगे। आजकल ये कौन सा इश्टाईल पकड़ लिये हो भाई, डाक्टर ने लंबा सफ़र करने से मना किया किसी को तो वो उसी बस में बैठे बैठे थोड़ी थोड़ी दूरी का टिकट ले लेता था, वैसाईच कुछ मामला तो नहीं है?
    वैसे तुम्हारी क्लास लगने वाली है किसी दिन, तैयार रहना।(मीठी झिड़की सुनने को मिल सकती है, हा हा हा।)

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  18. @ अपनत्व:
    मैडम, एकदम सही कह रही हैं आप, अपने दायरों से बाहर ही फ़ुर्सत नहीं है हमें। शुक्रिया आपका।

    @ वन्दना जी:
    जो थक कर बैठ गया, वो हार गया।
    आभार आपका।

    @ वाणी गीत:
    हाथ पैर उनके रुकते हैं जी जिनके पेट भरे रहते हैं। प्रताप जैसे लोग जीवन की राह ढूंढ ही लेते हैं।

    @ अन्शुमाला जी:
    ऐसा ही अपना मानना है, तभी ये सच्ची घटना लिखी है।

    @ अली साहब:
    जरूर जीयेंगे साहब। प्रेरणा किसी से भी ली जा सकती हैं, बल्कि अपने बीच के लोगों के मानवोचित गुण ज्यादा प्रभावित करते हैं। ये तो समाज है जो एक बने बनाये फ़्रेम से लोगों को जांचता है, नहीं तो गली गली में ऐसे पात्र दिख जायेंगे।

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  19. जिंदगी चीज़ ही ऐसी है , रास्ता निकाल ही लेती है ज़रूरत थोड़े से प्रयास की है.

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  20. प्रताप एक प्रतीक भर है यहाँ कई ज़िंदा- मुर्दा है, और कई मुर्दा जिन्दा होकर जी रहे है .(उलटा भी कह सकते है ----कई मुर्दा- जिन्दा है और कई जिन्दा मुर्दा होकर जी रहे है ) ..शायद कभी न् हारने की जिद ,जिंदगी को जीने की जिद और पलायन न् करने की जिद के कारण

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  21. इन प्रतापों के प्रताप से ही ये दुनिया अब तक टिकी हुई है...वरना तो....

    जय हिंद...

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  22. जिन्दा रहने के लिए जंग करनी ही पड़ती है ...अच्छी कहानी ...

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  23. 'लड़ाई दिये की तूफ़ान की'

    संजय भाई, ज्यादा कन्फ्यूज होने कि जरूरत नहीं. प्रताप जिन्दा हैं - और जिंदादिल है. मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं.

    फत्तू घना दिम्माग वाला बन के छोरे ने कन्फ्यूज कर रहा है. पर छोरा भी तो फत्तू का है..... न कम न ज्यादा.

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  24. @ prkant ji:
    वही थोड़ा सा प्रयास ही स्पार्क का काम करता है। आग तो हरेक के अंदर है।

    @ मनोज कुमार जी:
    धन्यवाद सर।

    @ Archana ji:
    ये जिद अच्छी है, जरूरी है।

    @ खुशदीप सहगल जी:
    पधारने का, कमेंट करने का शुक्रिया जी।

    @ संगीता स्वरूप(गीत) जी:
    शुक्रिया जी, कहानी पसंद आई आपको।

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  25. हम्म बहुत तकलीफ पायों की तकलीफ बयान करदी सरजी आपने. कई वाकियात देख रहां हूँ अभी भी नज़रों के सामने, क्या करें ??
    पर जब रात में बात हो रही थी तब तो ऐसे गंभीर ना लगे थे. उथलपुथल बड़ी आसानी से छिपा लेगए गुरु. बाकि सवाल का जवाब तो अपना भी वही है अब ही जी पा रहा है अपनी जिंदगी.

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  26. जे लिंकन के बैरियर तो शायद काम नहीं कर रहे है, चैक-पोस्ट पे कोई करपटेड हवालदार बैठा मेल्या है क्या

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  27. सही बात है...चले जाने के बाद पछताने वाला कोई तो होना ही चाहिए

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  28. @ दीपक जी:
    ये करी न मर्दां वाली बात, मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं।
    फ़त्तू का छोरा बाबू ते बड़कै ही होगा।

    @ अमित:
    ओ जी करना की है, हिम्मत रखो ते जुट जाओ अपने कम्म विच्च।
    एडीशनल बेनेफ़िट के लिये ’ऑल इज़ वैल’ वाला गाना गा लिया करो।
    कुछ गड़बड़ तो है आज, मेरे यहाँ तो चिट्ठाचर्चा भी नहीं खुल रहा।

    @ काजल कुमार जी:
    स्वागत है श्रीमान जी, कैसा रहा दौरा आपका? आपका ब्लॉग खोलने का जब भी प्रयास कर रहा हूँ हैंग हो जा रहा है कम्प्यूटर।

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  29. "ग्रेडिंग सिस्ट्म लागू की जाये तो तीन में से दो शर्तें पूरी होती थीं, और हमारा प्रताप एक योगी की कैटेगरी में फ़र्स्ट डिवीज़नर के तौर पर माना जा सकता है।"
    क्या कहा जाये, यहाँ तो मेरिट भी उल्टी निकलती है...

    "मेरी नजर में तो इसका जीना ही जीना है।"... कोई भी कन्फ्यूज़न नहीं सर जी, जिन्दगी रोज शुरू होती है, अल्ल सवेरे ही.
    टीश्यू पेपर के अन्दर साँस नहीं, क्रीम रोल रहा करती है.... सूरज इतना अपना अपना सा भी नहीं...

    फत्तू साहब का खानदान प्रगति पर है :)

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  30. "मेरी नजर में तो इसका जीना ही जीना है।"...

    Awesome.. :)

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  31. जीवन और जल, दोनों अपने बहाव के रास्ते खोज ही लेते हैं.....

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