सोमवार, मई 16, 2011

किये कराये पर पानी..... एक व्यथा हँसते गाते

अपने ब्लॉग प्रोफ़ाईल में मैंने शुरू में ही लिख दिया था कि पुरानी बातें, पुरानी फ़िल्में, पुरानी गीत, पुरानी किताबें, पुरानी यादें, पुरानी… वगैरह वगैरह मुझे बहुत पसंद हैं। कुछ पुराने चुटकुले भी इन वगैरह वगैरह में शामिल हैं। ऐसा ही एक   छोटा सा गंदा सा  चुटकुला था -  मास्टर जी ने बच्चों से पूछा, “किये कराये पर पानी फ़ेरना, इसका वाक्य प्रयोग बताओ।”  बच्चे ने कहा, “फ़्लश में पानी छोड़कर मैंने सब किये कराये पर पानी फ़ेर दिया।”

ये चुटकुला अब मेरे लिये त्रासदी बनकर रह गया है। सिर्फ़ एक पोस्ट ने मेरे डेढ़ साल के किये कराये पर पानी फ़ेर दिया। ब्लॉग नाम देखिये, मेरे काम देखिये। गाली गलौज मैं लिख दिया करता,  अपने बच्चे जवान हो रहे हैं और प्रेम मोहब्बत के गाने मैं सुनवा दिखा  दिया करता, छांटकर महिला ब्लॉगर्स के यहाँ मैं कमेंट किया करता, उल्टे सीधे चुटकुले फ़त्तू के नाम से डाल दिया करता – ये सब किसलिये भला?   अपनी छवि सुधारने के लिये ही तो, और एक गोलमोल सी कविता से पंगा क्या ले लिया, सबने जबरदस्ती  ही धर्मात्मा बना दिया। पिछले जमाने में शरीफ़, आस्तिक  कहलाना बड़ाई की बात होती होगी लेकिन आज के समय में किसी को ये सब खिताब दे देना गाली देने से कम नहीं है।

आप सब बड़े बेमुरव्वत निकले, कूटनीति की चार नीतियों में से पहली अपना ली ताकि ये बंदा अपनी जिंदगी को नीरस कर ले। कोई अद्वैत से जोड़ बैठा इसे, किसी को अध्यात्म दिखाई दे गया, किसी को काव्य रस मिल गया, जुलम भयो रामा जुलम भयो रे। हमारे प्रतुल भाई ने तो उसकी व्याख्या ऐसी शानदार कर दी कि हमारे खानदान् में सात पीढ़ी तक किसी ने  ऐसा  नहीं सोचा होगा। ले देकर एक सतीश सक्सेना जी ने और एक अदा जी ने थोड़ा मेरी भावनाओं की कदर की। बड़े भाईजी ने आगाह किया कि इसे जुनून कहते हैं और  देवीजी  ने समझाईश दी कि पतवार तो कब्जे में रखना था। ये दो कमेंट न मिलते तो मैंने टंकी पर चढ़ ही जाना था। चलो इन दोनों को धन्यवाद दे देता हूं कि समय से कदम उठाकर इन्होंने   ब्लॉग जगत में अपील, विचार, पुनर्विचार जैसे आग्रह होने से बचा लिये।  आप सबकी भी मिन्नतें, चिरौरी बच गईं। वैसे सोचकर मजा बहुत आ रहा है कि कैसे सब मना रहे होते, सब न सही कुछ तो मना ही रहे होते कि वीरू टंकी से नीचे उतर आ।      खैर, फ़िर कभी सही।

पिछले महीने ही सूचना मिल गई थी कि पिछले साल की तरह इस साल फ़िर से बुड्ढे तोते को प्रशिक्षण हेतु नामित किया गया है। कई सालों से यह एक घोषित युद्ध छिड़ा हुआ है प्रबंधन और हमारे बीच। वो कहते हैं चाहे कितना खर्च हो जाये सिखाकर मानेंगे और हम कहते हैं कि चाहे जितना  जोर लगा लो,   ऐसे ही भले हैं हम नासमझ से, बुद्धू से। खुशी इस बात की थी कि हमें अभी चुका हुआ नहीं मान लिया है प्रबंधन ने। जिस दिन पत्र आया था, लौटते ही चहकते हुये ये सूचना दी कि फ़िर से ट्रेनिंग आ गई है।  सुनने को मिला, “उपलों में चाहे घी के कनस्तर उंडेल दिये जायें,  रहेंगे उपले ही।”  एक बार तो ताव देने के लिये मूँछों पर हाथ गया ही था लेकिन धरती पर पैर रहने का ये फ़ायदा रहता है कि इंसान अपनी हैसियत नहीं भूलता। ये सोचकर हाथ जेब में डाल लिया कि हमारा समझौता कौन करवायेगा?

 मुझे याद आ गया डीटीसी का हमारा एक ड्राईवर मित्र। एक दिन उन पति पत्नी से मुलाकात हुई तो दोनों खफ़ा खफ़ा से थे। पूछा तो भाभी तो कुछ बोली नहीं, भाई ने बताई ये बात। कहने लगा, रात ग्यारह बजे ड्यूटी करके घर आया तो तेरी भाभी पूछती है, “रोटी खायेगा?” जवाब मिला, “ना, रैण दे। जेवड़ी(रस्सी) ल्या दै, फ़ाँसी खा लूँगा।”  गुस्से में धम धम करती वो रोटी बनाण लगी और मैं सामणे बैठ गया कि गुस्सा ठंडा हो जायेगा इसका। गैलां ही आके बैठ गया हमारा पालतू  काड़ू(कालू)। इब इसनै पैली रोटी बनाई और मन्नै थाली आगै करी तो बोली, डट जा(रुक जा), यो बेचारा भूखा सै। उसके बाद एक रोटी कालू के सामने फ़ैंकी गई और दूसरी मेरी थाली में। तीन रोटी खाकै कालू ने अपना मुँह जीभ से पोंछ लिया और मुझे तीसरी रोटी देके इसनै तवा तलै उतार दिया और न्यूं बोली, “इस बेचारे नै जाणवर होके भी अक्कल सै कि हिसाब से रोटी खानी चाहियें और एक तू सै कि और रोटियों की बाट देखे सै।”  भाई, फ़ेर मेरे ते रया नईं गया और मन्नै एक जड़ दिया इसकै। इब तू ही फ़ैसला कर कि गलती किसकी सै, मेरी अक इसकी?

उस दिन तो मैं हँसता रहा, समझाया अपने दोस्त को कि कुछ बीबियाँ अपने पति को बहुत प्यार करती हैं   और कैसे न कैसे उनका समझौता करवा दिया। तब मेरे ऐसे सलाहकार  दोस्त नहीं थे, अब आपका   इस मामले में  क्या कहना है?    कसूरवार कौन है, वो आदमी जो ड्यूटी करके आधी रात में घर आता है और ऐसा ट्रीटमेंट पाता है और मारपीट  करने वाला कहलाता है      या वो औरत जो आधी रात में अपने पति को खाना बनाकर खिलाती है और फ़िर उससे मार खाती है। बेचारे    कालू कुत्ताजी जी को बैनेफ़िट ऑफ़ डाऊट देने की फ़िक्सिंग पहले ही हो चुकी है, इसलिये अपना जवाब इन दोनों विकल्पों तक ही सीमित रखें। वैसे मुझे मालूम है कि कोई मानने वाला है नहीं, जवाब देंगे तो अपनी मर्जी से। ठीक है यारों, जैसा मन हो वैसा जवाब दे देना, हमारी तो देखी जायेगी।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान एक हाई स्टेटस के प्रशिक्षु से कुछ मजेदार बतचीत हुईं, वो अगली बार। तब तक ये मस्ती भरा गाना सुन लीजिये। काका और किशोर दा, क्या कैमिस्ट्री है..

40 टिप्‍पणियां:

  1. खाद-पानी पा कर फलता-फूलता रहे आपका ब्‍लॉग. प्रशिक्षण में नया कुछ सिखाने के साथ हिडन एजेंडा पुराना भुलाने का भी होता है. आपके पुराने ... वगैरह की खबर, लगता है, प्रबंधन को भी है.

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  2. धरने की क्या जरुरत थी , खुद पका कर खा लेता या बेबी से कह देता ," चल , दोनों मिल कर पका लेते हैं "

    कल ही पढ़ा एक चुटकुला जो इसके आगे की दास्तान है ...
    धरने के बाद जब बीबी को मनाते हुए बोला ," देख , तू ऐसे रूठ मत जाया कर , मैंने तो प्यार से ही धर दिया था , तू जानती हैं न मैं कितना प्यार करता हूँ तुझे "
    बीबी ने भी चार धर दिए ," जी , आप क्या समझते हो , मैं आपसे कम प्यार करती हूँ "

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  3. बेबी ...बीबी , ये गूगल भी क्या से क्या लिख जाता है !

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  4. यह पोस्ट मस्त रही .....हरियाणवी अंदाज़ गज़ब के है...
    शुभकामनायें !

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  5. संजय भाई ,
    क्या घी डाला है उप्प्लों में आपने,
    माचिस दिखाने की देर है बस.
    हमारे बैंक वाले कहते हैं ट्रेनिंग आपको सिखाने के लिए नहीं है,आराम करवाने के लिए है.
    सीखे सिखाये तो पहले ही बहुत हो.
    आपने मना न किया होता तो ढेरों सलाम लिख देता.
    चलिए कोइ बात नहीं.
    आपकी अद्वैत वाली कविता ढूंढ रहा हूँ.

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  6. sanjay jiiiiiiiiiiiiiiiiiii..............kaise hoooooooo............... :) :) :) :) :)

    hmmmm....ye kis kavita ki baat ho rahi thi jisne aapko tanki par chadha diya...poora blog tatolna padega fursat mein....aur blog ke naye rang dhang....wah wah.....pyaara lag raha hai :)

    hmmm....galti kiski.....?? ab kya karein....biwi hoon, biwi ki tarafdaari karne ko ji chaahta hai, parrrrr.......

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  7. अच्छा तो ये बात थी, इसलिए गायब रहे

    सतीश जी व् अदा जी का शुक्रिया जो आपके टंकी पर चढ़ने से बचा लिया नहीं तो एवे ही मनुहार करनी पड़ती

    अब गलती किसकी बतये अपनी जगह दोनों ही सही है,

    @ हाई स्टेटस के प्रशिक्षु से कुछ मजेदार बतचीत हुईं,

    जल्दी से पोस्ट कर दो

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  8. मूल प्रशिक्षण के अतिरिक्त जो भी परिधि में घट रहा है, उसे अपने तीक्ष्ण अवलोकन से व्यक्त करें।

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  9. गलती तो बीवी कि है जी, इतना शौक से कोई फांसी मांग रहा है ... दे देना था ... रोटी बनाने कि क्या ज़रूरत थी ...

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  10. उमड़ ही रही थी आध्यात्मिकता। और आपने किए कराए पर पानी फेर दिया॥

    “इस बेचारे नै जाणवर होके भी अक्कल सै कि हिसाब से रोटी खानी चाहियें और एक तू सै कि और रोटियों की बाट देखे सै।”

    यो ही तो फर्क सै, जाणवर अर इण्साण में……
    आशा और तृष्णा दोनां की बाट ही देखे।

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  11. तो ये है छवि सुधारक मन्त्र, मुझे पहले ही सीखना-पूछना था आपसे।
    पर यदि गलतियाँ ना करूँ तो मैं मैं कहाँ रहूँ?
    और आपके प्रश्न का उत्तर है: "इनमे से कोई नहीं"
    ऐसे कठिन सवाल कोई पूछता है?
    विश्व-मानचित्र पर Honiara कहाँ है, ये कोई पूछता है भला?
    गलती तो ऐसा सवाल पूछने वाले की है।
    ट्रेनिंग आपकी हो, परीक्षा हम दें, ये तो अन्याय है। :))

    P.S. दैनिक जागरण को बधाई हो। आपको नहीं। :)

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  12. aap isara to kare bhaijan hum jawaw usi andaz me denge.......

    pranam.

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  13. @अनुज वधु द्वारा चरण स्पर्श पर (पिछले एपिसोड से):
    यह तो मेरे लिए गर्व का विषय और बहुरानी के लिए सौभाग्य का आशीष ही लेकर आएगा!
    @वह प्रश्न जो इस एपिसोड में उठाया गया है:
    इस पर तो एक पूरी पोस्ट मैंने गत वर्ष लिखी थी.. लिंक बिखेरने की बंदिश के कारण लिंक नहीं डे पा रहा हूँ!! वैसे प्रेमका एक उदाहरण ये भी है कि थके पति द्वारा अंडा मांगे जाने पर उबले अंडे दिए जाने पर पिटाई क्योंकि पति को ओम्लेट खाने की इच्छा थी.. अगले दिन ओम्लेट दिए जाने पर पुनः पिटाई,क्योंकि उस दिन उबले अंडे की तबियत थी. उससे अगले दिन दोनों दिए जाने पर पिटाई क्योंकि इलज़ाम ये था कि जिस अंडे को उबालना था उसका ओम्लेट बना दिया और जिसका ओम्लेट बनाया जाना चाहिए था उसे उबाल दिया गया..
    अब और क्या कहूँ..

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  14. सर जी ये मियां बीबी का झगडा सुलझाने का काम तो बस किरण बेदी या अपनी राखी सावंत ही कर सकती हैं. भई अपने रसोई के झगडे तो शयनकक्ष तक जाते जाते खुद ही सुलझ जाते हैं.

    वैसे थोडा सीरियस होकर यही कहूँगा की ऐसे छोटे मोटे घरेलु झगड़े में तो दोनों पक्ष सामान रूप से जिम्मेदार होते हैं.

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  15. वाणी जी और सैल जी ने पहले ही सटीक जवाब दे दिया है फिर भी

    गलती पति की जो ऐसा कुत्ता ला कर घर में रख दिया जो तीन तीन रोटी खा जाता है, उसके हिस्से की भी, दूसरी गलती पत्नी की रात के ग्यारह बजे गरम रोटी बनाने चली जो पति तीन रोटी के बाद भी न रुके तो ऐसे पति के लिए शाम छ बजे ही दस लिट्टिया पाथ कर रख देनी चाहिए उसका एक फायदा और है, जो पति उसके बाद भी हाथ उठा दे तो वही दस मोटी लिट्टिया उसके सर पर दै मारनी चाहिए |

    @ पिछली पोस्ट पर

    पिछली कई बकाया पार्टी तो आज तक मिली नहीं एक और नई पार्टी का वादा जरा ऊपर लगाया अपना गाना एक बार फिर सुन ले !! और इस बार तो MBBS ( मिया बीबी बच्चे सहित ) डिनर का वादा लगता है अगले जन्म में काफी विश्वास है आप का :)))

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  16. @ राहुल सिंह जी:
    सरजी, ये हिडन एजेंडा भी बिटवीन द लाईन्स का भाई बंधु दिखता है:) प्रबंधन को जो खबर है, हमें भी उसकी खबर है तभी तो मजा आता है। धन्यवाद, उत्तम कोटि की खादपानी उपलब्ध करवाने के लिये।

    @ गूगल:
    ये तो बहुत मासूम गलती है।

    @ सतीश सक्सेना जी:
    शुक्रिया भाईजी।

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  17. @ विशाल:
    मेरी मना का मान रखने के लिये आभारी हूँ, विशाल भाई। मुझे पढ़ते समय गुजरे जमाने तो याद आते होंगे, दोधर वाले:)

    @ saanjh:
    वैलकम बैक, अच्छे एग्ज़ाम देने गईं आप। गज़लों को तरस गये हम।

    @ दीपक सैनी:
    एवें ही वाली मनुहार बचाये रखना और बनाये रखना। तुम जैसों के भरोसे ही तो टंकी पर चढ़ना है:)

    @ प्रवीण पांण्डेय जी:
    तीक्ष्णता कहाँ से लायें जी?

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  18. @ Indranil Bhattacharjee ........."सैल":
    आपकी भावना सही है, वैसे फ़ाँसी भी नहीं मांगी थी उसने। सिर्फ़ रस्सी ही मांगी थी, वो भी नहीं दी बीबी ने। बेचारा, कैसी बीबी मिली उसे। हम खुशकिस्मत हैं, आज्ञाकारी बीबी मिली है:)

    @ सुज्ञ जी:
    ’कढ़ीबिगाड़’ नाम की लाज भी तो रखनी है मुझे:)

    @ Avinash Chandra:
    गलती सिर्फ़ वो नहीं करता, जो कुछ नहीं करता। कीप मिस्टेकिंग(हिंदीकरण वांछनीय नहीं है) और राज्जा, अन्याय तो झेलना ही पड़ेगा।
    लगे हाथों शुभकामनायें भी दै.जा. को दे देतें:)

    @ सञ्जय झा:
    इशारा कैसे करते नामराशि? लोगों ने सक्रियता क्रमांक बदल लिया है शायद। सिटी ब्यूटीफ़ुल में रहते पांच छह बार नंबर मिलाया, मिला ही नहीं। फ़िर हमारा हाईजैक हो गया और मेरी बात रही मेरे मन में:)

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  19. @ नीरज बसलियाल:
    सत्बचन जी सत्बचन।

    @ चला बिहारी ब्लॉगर बनने:
    हम विपक्ष में बैठना मंजूर करेंगे।
    लिंक वाली बंदिश अपनों के लिये थोड़े ही है, मेहनत करवाने का बहाना मिल गया आपको तो।

    @ VICHAAR SHOONYA:
    और झगड़ा ही यदि राखी की वजह से हो तो? वैसे ये झगड़े न हों तो जिन्दगी बहुत नीरस हो जायेगी:)

    @ anshumala ji:
    कुछ पति ऐसे भी होंगे जो अब लिट्टिया\टिक्कड़ निबटाकर हाथ उठायेंगे, फ़िर की फ़िर देखी जायेगी।
    गाना बढ़िया तो है - बंदा मैं सीधा-सादा:)वादे तो होते ही तोड़ने भुलाने के लिये हैं। हमारा विश्वास अगले नहीं पुराने जन्मों वगैरह वगैरह में रहा है। अगले जन्म की प्लानिंग थी तो नहीं, देखिये क्या होता है।

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  20. कभी-कभी किसी बात पर बहुत हंसी आती है। 'फांसी खा लूँगा' वैसा ही लगा मुझे :)

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  21. ये ट्रेनिंग देने वाले भी बड़ कैड़े होते हैं... पूरा ज़ोर लगा देते हैं बुड्ढे तोतों को रटाने में :)

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  22. पोस्ट पढ़ कर मज़ा आ गया...'बूझो तो जाने' से उलझ कर रंग में भंग डालने का अपना कोई इरादा नहीं!! अगली पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी...

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  23. hum gaon me the jab aap project par panchkula aaye
    ..........waqt ne dhokha diya...... aur hum milne
    se mar-hoom rahe......lekin milenge phir....kabhi
    .......tab-tak khayalon me kya kum hai...........

    pranam.

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  24. @ Abhishek Ojha:
    कभी भी किसी भी बात पर आ जाती थी मुझे भी हँसी, अब इसकी कीमत समझ पा रहा हूँ। नायाब चीज है ये भी।

    @ Kajal Kumar:
    बड़े कैड़े होते हैं जी, खासकर हम जैसे भुरभुरे स्वभाव वालों के लिये:)

    @ SKT:
    त्यागी साहब, हमें ’भंग में रंग’ आता है...

    @ सञ्जय झा:
    शोर नहीं नामराशि, सोर..सोर..सोर आई मीन mar-hoom rahe नहीं mahroom rahe, mahroom rahe:))

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  25. पिछले स्टेशन पर कविता संपर्क में आकर भटकी ट्रेन ने फिर अपनी स्पीड पकड़ ली है। यात्रियों को सावधान किया जाता है कि ट्रेन को भाउक कर देने वाले मुद्दे ना दें। कविता का वायरस अच्छे भले को बेकार बना देता है।

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  26. जमाना ही खराब है जी, किस की शिकायत किस से करेंगे?

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  27. मुझे भी आजकल वक्त से शिकायत है दायां हाथ आजकल छुट्टी पर है बाये से लिखना मुश्किल लगता है ---- फिर भी काम शुरू तो हुया यही आशा है --- जल्दी फिर सक्रिय हो जाऊँगी-- आप सब की शुभकामनाओं से--- जय हिन्द्

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  28. का जाण केस तराह दे लोग हैं जी...जे बीवी नू कूट देंदे हैं...हिक मेरे वो हैं जी, वो तो चपेड अपने ही मुँह पे मार लेंदे हैं जी...हाय रब्बा मैं कित्थों फाँस गया...
    आप तो जी मैनू बताओ..वो किस बस दा ड्राइवर है...मैनू उसकी ऐसी परमिट कटवानी है जी ...कि रोटी छड्डो, रोटी की फोटो भी ना वेखेगा...
    हाँ नहीं तो..!!

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  29. @ देवेन्द्र पाण्डेय:
    लगे हाथ वो वाली उदघोषणा भी कर देनी थी कि ’सवारी अपने सामान की स्वयं जिम्मेदार हैं’ :)

    @ Smart Indian - स्मार्ट इंडियन:
    प्रश्न में ही उत्तर छिपा है जी:)

    @ निर्मला कपिला जी:
    स्वास्थ्य लाभ के लिये शुभकामनायें। आप शीघ्र स्वस्थ हों और आशीर्वाद देती रहें।

    @ 'अदा':
    ऊपर वाले का शुक्रिया करती नहीं कि ऐसा सीधा-सादा ’वो’ दिया है, उल्टे धौंस दिखाती हैं आप। मिल गया होता कौनो ऐसा वैसा तो दुहाई देती दिखतीं आप, हाँ नहीं तो....!:)
    आपजी नूं उसदा पता बता दिया तो रोटी-वोटी के फ़ोटो से भी जायेगा। अत: देवीजी कोप त्यागिये, ठंड रखिये।

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  30. सिक्का उछाला, दुम आयी सो प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दिया, वर्ना विराम लगा देते।

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  31. @ Smart Indian - स्मार्ट इंडियन:
    खुशनसीबी है जी हमारी कि विराम नहीं लगा(कर्टेसी - दुम), हम तो ये मना रहे हैं कि जय वाला सिक्का हो आपके पास ताकि जब भी उछालें तो प्रश्नवाचक चिन्ह आये और संवाद की गुंजाईश बनी रहे।

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  32. क्या आप हमारीवाणी के सदस्य हैं? हमारीवाणी भारतीय ब्लॉग्स का संकलक है.


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  34. हम भी आपको मना रहे हाते कि वीरू, टंकी से नीचे उतर जा।

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  35. kamaal ka likha hai sir ji. -3 ka chashma lagata hun...isliye bata raha hun ki gulabi rang dikkat de raha hai.

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  36. @ mahendra verma ji:
    वर्मा साहब, आपको ह्यूमरस टोन में देखना बहुत अच्छा लगा।

    @ KAVITA:
    शुक्रिया जी।

    @ prkant:
    kindly ........:))

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  37. आपके ब्लॉग पर आकर बहुत अच्छा लगा| आपकी भावाभिव्यक्ति बहुत सुन्दर है और सोच गहरी है! लेखन अपने आप में संवेदनशीलता का परिचायक है! शुभकामना और साधुवाद!

    "कुछ लोग असाध्य समझी जाने वाली बीमारी से भी बच जाते हैं और इसके बाद वे लम्बा और सुखी जीवन जीते हैं, जबकि अन्य अनेक लोग साधारण सी समझी जाने वाली बीमारियों से भी नहीं लड़ पाते और असमय प्राण त्यागकर अपने परिवार को मझधार में छोड़ जाते हैं! आखिर ऐसा क्यों?"

    "एक ही परिवार में, एक जैसा खाना खाने वाले, एक ही छत के नीचे निवास करने वाले और एक समान सुविधाओं और असुविधाओं में जीवन जीने वाले कुछ सदस्य अत्यन्त दुखी, अस्वस्थ, अप्रसन्न और तानवग्रस्त रहते हैं, उसी परिवार के दूसरे कुछ सदस्य उसी माहौल में पूरी तरह से प्रसन्न, स्वस्थ और खुश रहते हैं, जबकि कुछ या एक-दो सदस्य सामान्य या औसत जीवन जी रहे हैं| जो न कभी दुखी दिखते हैं, न कभी सुखी दिखते हैं! आखिर ऐसा क्यों?"

    यदि इस प्रकार के सवालों के उत्तर जानने में आपको रूचि है तो कृपया "वैज्ञानिक प्रार्थना" ब्लॉग पर आपका स्वागत है?

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