आज छुट्टी का दिन था, सोचा था एक अलग ही पोस्ट लिखने के बारे में, लिख भी ली थी लेकिन आखिर में वो हो गई पेंडिंग और ये लिखी। बहुत पहले एक पोस्ट लिखी थी, रेलवे स्टेशन पर देखे भोगे एक अनुभव की, और एक दूसरी पोस्ट लगभग दो ढाई महीने पहले, आज फ़िर से स्टेशन याद आ गया। मैं जब पहला ट्रांसफ़र लेकर दिल्ली आया तो पंजाब आने से पहले तक लगभग बारह साल डेली पैसेंजरी की। इनमें से ट्रेन के अनुभव तो इतने और इतने जबरदस्त रहे कि पूछिये मत। कितने ही हमराह मिले, कितने छूटे, कुछ अब तक जुड़े हैं। गाहे बगाहे फ़ोन आ जाता ह और मैं भी जब दिल्ली जाता हूँ तो एक दिन जरूर ट्रेन की सवारी करके यादें ताजा करता हूँ।
ये एकदम शुरुआती समय की बात है, कोई दोस्त नहीं बना था। सुबह सुबह स्टेशन पर समय से पहले ही पहुँच जाया करता, अतिरिक्त सावधानी:) प्लेटफ़ार्म पर देख रहा था इधर उधर कि शायद कोई जाना पहचाना चेहरा दिखे। सामने तीन चार लोग हाथ में ताश की गड्डी लेकर फ़ेंट रहे थे और फ़ेंटे ही जा रहे थे। हीरोईन को अंग-प्रदर्शन करते देखकर फ़्रंट सीट के दर्शकों की जो कैफ़ियत होती है कि शायद सिर्फ़ उन्हें रिझाने के लिये, उनके लिये ही यह वस्त्र-त्यागीकरण प्रक्रिया है, ताश के पत्ते फ़हराते देखकर कुछ वैसा ही हाल अपना हो रहा था। शायद हमें ही ललचाने के लिये ये ऐसा कर रहे हैं, संकोच त्यागकर खुद को प्रस्तुत करने ही वाले थे कि एकदम से शोर मच गया, मोती आ गया-मोती आ गया।
जैसे महफ़िल में रौनक आ गई हो, चेहरे चमक उठे थे उपस्थित लोगों के। देखा तो सामने से पैंसठ सत्तर बरस के एक बड़े मियाँ, सफ़ेद शफ़्फ़ाक दाढ़ी, सर पर जालीदार टोपी, सफ़ेद कुर्ता पायजामा, हाथ में एक थैला पकड़े हुये और कमर में हल्का सा खम, फ़ुदकते हुये से चले आ रहे थे। समझ गये हम, यही हैं रौनक-ए-महफ़िल, ’मोती मियाँ।’ बस वो आकर सबसे मिले, तब तक अच्छा खासा जमावड़ा इकट्ठा हो गया था। धीरे धीरे हम भी जान गये सबको। मोती मियाँ थे उस ग्रुप की आँख का तारा, क्या जवान और क्या बूढ़ा, जिसे देखो हर चाल में वाह मोती, अबे मोती की चुटकी लेता। शायद ही कोई बात होती, गड़बड़ होती जिसके लिये उन्हें श्रेय न दिया जाता हो। और बड़े मियाँ अकेले ही सबसे टक्कर लेते रहते। कोई और होता तो फ़ेंक कर मारता ताश के पत्ते, लेकिन तारीफ़ के काबिल थी उनकी शख्सियत। जरा जरा से लौंडे अबे-तबे करके बात करते थे और वो थे कि कोई बुरा नहीं मानते थे। खैर, अपने को तो नागवार ही गुजरता था ये सब। हमने तो लखनऊ में देखा था एक बार कि गाली भी आप कहकर देते थे, वो कहानी फ़िर सही। दो चार बार मैं ही उलझा लोगों से कि यार, बोलने की तमीज तो रखो कुछ, उम्र देखो जरा इनकी। लेकिन औरों से पहले मोती मियाँ ही मुझे चुप करवा देते। शायद उन्हें भी इस चुहलबाजी में मजा आता था, मजे की तो आप जानो ही हो, आ जाये तो…….। पलटवार करने में मोती मियाँ भी कुछ कम नहीं थे, अपनी महीन सी आवाज में दो डायलाग बड़े प्रिय थे उनके, १. अबे, फ़ेवीकोल लगा ले मूं पे, बता रिया हूँ तुझे। २. जबान पर रन्दा फ़िरवाके ही मानेगा तू, ऐसा लगे है। और ऐसे अंदाज में कहते बड़े सीरियस होकर कि हँसी छूट ही जाती थी। हमारी ओब्जर्वर निगाहों ने एक दिन उनके थैले पर गौर किया तो उसमें आरी, हथौड़ी, पेचकस, प्लास जैसे औजार दिखे तो उनके डायलाग्स का सबब समझ आ गया, बड़े मियाँ बढ़ई थे।
अब स्टेशन को छोडि़ये, चलते हैं बैंक में। हमारे इंचार्ज थे निहायत ही दिलेर सिंह। स्वभाव के एकदम मस्त, यारों के यार। ज्यादा ध्यान प्रोपर्टी के धंधे पर और पर्सनल रिलेशन बनाने पर, जैसे यहाँ, जाने दो बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। तो कभी कभी कुछ काम ऐसे कर जाया करते कि उनसे बहुत छोटा और जूनियर होते हुये भी मैं टोक दिया करता, बाबूजी जरा धीरे चलो। मानते बहुत थे मुझे, हँस देते और हमेशा कहा करते, “छोड़ो यार, कौन सा फ़ाँसी फ़िट होने वाली है इसमें?” हमेशा ही हर सीरियस बात को यह कहकर हवा में उड़ा देते, “छोड़ यार, कौन सा फ़ाँसी फ़िट होने वाली है?”
एक दिन मैं घर लौटा तो पिताजी किसी बात पर मेरे छोटे भाई पर नाराज हो रहे थे, और वो सिर झुकाये खड़ा था। बात मालूम की तो भाई से कुछ साधारण सी गलती हुई थी जोकि हमारे पिताजी को बहुत नागवार गुजरी थी। उनका मानना ये है कि छोटी गलती को समय रहते ही न सुधारा जाये तो आगे जाकर वो कभी नहीं सुधरती। अब अपने को भी रौब गांठने का मौका मिल गया, हम भी तो बड़े भाई ठहरे। अपन भी शुरू हो गये, भाषण देने। छोटा बेचारा पहले ही शर्मिंदा हो रहा था, अब दोतरफ़ा आक्रमण से घबराकर रुँआसा सा हो गया। अब हमने दलबदल कर लिया और पिताजी को शांत होने के लिये कहा। वो अपने कथन पर अड़े रहे और हम छोटे के वकील बन गये। अब बहस पिताजी और मुझमें छिड़ गई। मैं अनजाने में बोल बैठा, “हो गई गलती, समझा दिया। अब क्या इस बात पर फ़ाँसी फ़िट करोगे इसके?” पिताजी एकदम से चुप हो गये, मैं अपनी जीत समझकर चुप हो गया और छोटे साहब तो पहले से ही चुप थे। मेरी नजर में मामला खत्म हो गया था। लेकिन पिताजी अब मुझसे बात नहीं कर रहे थे और मैं बात को भूल गया। दो तीन दिन बाद माँ से बात की, पिताजी कुछ नाराज दिख रहे हैं तो उन्होंने उस दिन मेरी कही हुई बात याद दिलाई और हैरान हुईं कि ऐसी बात मुँह से निकली कैसे? शर्म बहुत आई खुद पर, जाकर पिताजी से भी बात की, कैफ़ियत दी और माफ़ी माँगी। अगले दिन ऑफ़िस में जाकर बॉस को भी बता दी सारी बात और आगे के लिये जबान पर काबू पाने की कोशिश शुरू कर दी।
आज छुट्टी का दिन था। किसी बात पर अपने बड़े UKP को छोटे वाले का ध्यान रखने के लिये कह रहा था, समझाया उसे कि बड़ा होगा तो जिम्मेदारी संभालनी होगी, अभी से तैयार रहना चाहिये, उसका जवाब था, “अच्छा, ठीक है।” मैंने कहा, “इतनी आसान नहीं है। शायद मुझे देखकर ऐसा कह रहा है कि पापा सुबह आराम से बाईक उठाते हैं और चले गये कुर्सी पर बैठने। शाम को घर आये तो बैठ गये कम्प्यूटर के आगे। इतनी आसान नहीं है जिन्दगी, याद करेगा बचपन के इस टाईम को।” जवाब मिला, “देखी जायेगी।” फ़िर टॉपिक चेंज किया, “ध्यान से पढ़ाई कर, सिर्फ़ यही तो काम है तुम्हारा इस समय।” पूछने लगा, “मार्क्स अच्छे आने चाहियें न?” मैंने कहा, “हाँ, यही समझ ले। समझना तो जरूरी है ही लेकिन मार्क्स भी अच्छे आने चाहिए।” फ़िर से जवाब मिला, “ठीक है, देखी जायेगी।”
मोती मियाँ दिन भर जिन हथियारों-औजारों के बीच रहते थे, वही फ़ेवीकोल, रन्दा आदि उनकी जबान का हिस्सा बन गये थे। मैं और मेरे एक्स-बॉस कई साल तक एक टीम के रूप में काम करते रहे, उनका तकियाकलाम मेरी जबान पर चढ़ गया था। मैं अपनी हर परेशानी में अपनी तरफ़ से पूरा प्रयास करता हूँ, लेकिन थक हार कर घबरा जाने की बजाय यूँ कह दिया करता कि ’देखी जायेगी’ तो ये मेरे लड़के का भी स्टाईल बनता जा रहा है। सिर्फ़ प्रयास करना काफ़ी नहीं है, शायद अपनी बोली, अपनी भाषा पर और ध्यान देना पड़ेगा। कहीं ऐसा न हो कि मुँह से निकली इतनी सी बात दूसरों का लाईफ़-स्टाईल ही बन जाये। मेरी करनी पर नजर न डालकर अगर सिर्फ़ कहे पर उसने या किसी ने यकीन बना लिया तो बहुत दिक्कत होने वाली है। क्या कर सकते हैं सिवाय यह कहने के कि, देखी जायेगी……..:))
:) एक शादी में फ़त्तू को कहीं दूर जाना पड़ा। जाते समय बस में फ़त्तू आगे वाली सीट पर बैठा था और नींद के झोंके ले रहा था। थोड़ी थोड़ी देर के बाद ड्राईवर उसे जगा देता, पचास किलोमीटर रह गया, अब पैंतालीस किलोमीटर रह गया, अब बयालीस कि,मी रह गया, क्यों सोवे सै? लब्बो-लुबाब सारे रास्ते फ़त्तू को सोने नहीं दिया। विवाहस्थल पर पहुंच कर ड्राईवर साहब खापीकर बस में ही सो गये। थोड़ी देर में फ़त्तू ने आकर समय पूछा, ड्राईवर ने बताया कि एक बजा है और सो गया। आधे घंटे बाद फ़त्तू फ़िर आया टाईम पूछने, झल्लाते हुये ड्राईवर ने बताया कि डेढ़ बजा है और फ़िर सो गया। अब हर बीस पच्चीस मिनट के गैप पर फ़त्तू उसे उठा दे और टाईम पूछे। तंग आकर ड्राईवर ने टाईम बताया कि सवा तीन बज गये हैं और घड़ी ही उतारकर बाहर फ़ेंक दी, “ले जा इस घड़ी नै, इबके न आ जाईयो टैम पूछण।”
आधे घंटे बाद फ़त्तू ने फ़िर उठाया, “ड्राईवर साब, इबकी टैम पूछण ताईं न आया सूँ, घड़ी तो सै कोणी तेरे धोरे। मैं तो बताण आया सूँ अक पौने चार बज लिये सैं।”