गुरुवार, दिसंबर 01, 2011

नशा है सबमें मगर रंग नशे का है जुदा........


"गीत लिखने वाले ने ठीक लिखा है, मतलब निकालने वालों ने भी ठीक मतलब निकाला है। अन्ना का फ़ार्मूला भी ठीक है और इस बात पर अन्ना की खिंचाई करने वाले भी ठीक हैं।
लिखने वाले, कहने वाले इतना कुछ लिख कह गये हैं कि हर कोई अपने मतलब की बात निकाल ही लेता है।
 अनुराग जी का ये कहना "जिन्होने समाज-सुधार में थोड़ा भी योगदान दिया है वे उनसे तो बेहतर ही हैं जिन्होने कुछ नहीं किया" बिल्कुल ठीक है।
8 A.M. वाली हमारी ये टिप्पणी पता नहीं ठीक है या नहीं:)"
ये कमेंट किया था अंशुमाला जी की पोस्ट पर ’नशा शराब में होता तो......’
http://mangopeople-anshu.blogspot.com/2011/11/mangopeople.html?showComment=1322361489913#c6657040222165410415 ,
लेकिन वो फ़ंस गया था स्पैम में तो सोचा कि चलो आज इसी पर सही। मेहनत बरबाद न हो, इसलिये इतनी मेहनत और कर ली। फ़िर  किसी वजह से पोस्ट नहीं कर पाया था और अब तो कमेंट भी दिख रहा है। लिख दिया था तो अब छाप भी देते हैं कौन सा पैसे लग रहे हैं अभी?  :))
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जहाँ तक मेरी जानकारी है, ये गीत प्रकाश मेहरा ने लिखा था। वही प्रकाश मेहरा, जिन्हें हम एक मसाला फ़िल्ममेकर के नाम से जानते हैं। इस गीत से भी ज्यादा लावारिस फ़िल्म के कैबरे डांस वाले गीत ’अपनी तो जैसे-तैसे’ के शब्दों ने मुझे बहुत प्रभावित किया था। उस गीत को अगर आप बिना देखे हुये सुनें तो उसका एक अलग ही प्रभाव पायेंगे।  अवैध रिश्तों के नतीजे के रूप में पैदा हुई, पली बढ़ी इंसानी नस्ल के दर्द को बहुत नफ़ासत से बयान किया गया है। कमर्शियल सिनेमा की मजबूरियों के चलते इस गाने को फ़िल्माते वक्त यकीनन दिल से बहुत बड़ा समझौता किया गया होगा। मैं इस गाने को देखने की जगह ऑडियो फ़ार्मेट में सुनना ज्यादा  पसंद करता हूँ, आखिर दिल तो है दिल, दिल का ऐतबार क्या कीजै:)

बात करें नशे की तो ये भी मजे की तरह किसी का गुलाम नहीं। नशे का मायना सबके लिये अलग अलग है।  शराबी को शराब से नशा होता है तो किसी को सत्ता से नशा होता है। किसी के लिये रूप से बड़ा कोई नशा नहीं तो किसी के लिये धन सबसे बड़ा नशा है। असली बात है नशे का असर, वो असर आपको कहाँ लेकर जा रहा है, ये बात ज्यादा मायने रखती है।   बातों का नशा भी है और मुलाकातों का नशा भी है, और तो और मुक्का लातों का नशा भी होता है। समाजसेवा, परोपकार ये भी तो नशे से कम नहीं? शक्ति का नशा होता है तो भक्ति का भी नशा ही होता है। ये  जो पीर-पैगंबर और हमारे दूसरे नायक हुये हैं, वो भी चाहते तो हम लोगों की तरह लीक पर चलते हुये जिंदगी बिता सकते थे। घर से बेघर होकर कहाँ कहाँ की यात्रायें की, किसी ने जहर पिया, किसी ने गोली खाई, कोई फ़ाँसी चढ़ा। कोई जलते तवों पर बैठाया गया, किसी को हाथी के आगे फ़ेंका गया। उनकी रूह पर भक्ति का नशा न होता तो ये सब संभव हो सकता था?  

गुरू नानक देव जी द्वारा की गई यात्रायें चार उदासियों  के नाम से जानी जाती हैं। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान वो सिद्धों के इलाके में पहुँचे। अपने वर्चस्व वाले इलाके में एक नये साधु का आना सुनकर उन्होंने एक बर्तन भेजा, जो लबालब दूध से भरा हुआ था।  लाने वाले ने वो बर्तन पेश किया और चुपचाप खड़ा हो गया, गुरू साहब ने उस बर्तन में गुलाब के फ़ूल की पंखुडियाँ डाल दीं जो दूध के ऊपर तैरने लगीं। इन यात्राओं में बाला और मरदाना उनके सहायक के रूप में शामिल थे। ये माजरा उन्हें समझ नहीं आया तो फ़िर गुरू नानक देव जी ने उन्हें समझाया कि सिद्धों ने उस दूध भरे बर्तन के माध्यम से यह संदेश भेजा था कि यहाँ पहले से ही साधुओं की बहुतायत है, और गुंजाईश नहीं है। गुरूजी ने गुलाब की पंखुडि़यों के माध्यम से यह संदेश दिया कि  इन पंखडि़यों की तरह दूध को बिना गिराये अपनी खुशबू उसमें शामिल हो जायेगी, अत: निश्चिंत रहा जाये। उसके बाद दोनों पक्षों में प्रश्नोत्तर भी हुये। सिद्धों ने एक प्रश्न किया था कि आप ध्यान के लिये किन वस्तुओं का प्रयोग करते हैं? उत्तर देते हुये गुरू नानक देव जी ने कहा था, "नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात"  कि प्रभु नाम सिमरन की ये खुमारी दूसरे नशों की तरह नहीं कि घड़ी दो घड़ी के बाद उतर जाये। ये तो वो नशा है जो एक बार चढ़ जाये तो दिन रात का साथी बन जाता है।

अब एक किस्सा शराब और शराबी पर, खुद सुना-सुनाया। हमारे एक भूतपूर्व गार्ड फ़ौज की पेंशन लेने हर महीने एक या दो तारीख को अपने पैतृक गाँव वाले बैंक में  जाया करते थे। उनका कहना था कि इस बहाने कम से कम महीने में एक बार बूढ़े माँ-बाप, भाईयों के परिवार से मिलना हो जाता है। उनका गाँव हरियाणा-राजस्थान  सीमा पर पड़ता था। उस इलाके में एक जाति विशेष रूप से  इस कुटीर उद्योग में संलग्न थी। कई बार इस बात का जिक्र कर चुके थे।  एक बार गार्ड साहब पेंशन लेकर लौटे तो दो तीन दिन तक उनकी तबियत कुछ नासाज़ दिखी। दरियाफ़्त करने पर उन्होंने कुछ इस तरह बताया।

"इस बार पेंशन लेने गया तो बैंक में ही एक पुराना मित्र मिल गया, जो कुछ साल किसी डाक्टर के पास कंपाऊडरी करने के बाद अब  गाँव में  अपनी डाक्टरी पेल रहा था(क्लैरिफ़िकेशन - गीता है नहीं मेरे पास, न तो उस पर हाथ रखकर कसम खा लेता कि  डाक्टरी ही बताया गया था)। बैंक के काम से फ़ारिग होकर दोनों दोस्तों ने जिन्दगी के गम दूर करने की या इस मुलाकात को सेलिब्रेट करने की सोची। डाक्टर ने कहा कि आज तुझे ’झीणी’ के हाथ की खींची हुई शराब पिलाता हूँ। जालिम क्या तो खुद है, और क्या शराब खींचती है..बिना पिये अंदाजा लगाना मुश्किल है। हमने भी सोची कि सरकारी उचित दर वाली दुकान से तो रोज पीते हैं, आज स्वदेशी, स्वावलंबी, कुटीर उद्योग वाली  ही सही।  वैसे भी डाक्टर सिफ़ारिश कर रहा है तो पहुँच गये उस ठीये पर अपने और पूरे जहान के गम गलत करने। पूरी बस्ती में कम से कम बारह पन्द्रह घर थे जिन्होंने घर के पिछवाड़े में गड्डे बना रखे थे और उन गड्डों में शराब बनने बनाने की सतत प्रक्रिया चलती रहती थी।

अपने पसंदीदा अड्डे पर पहुँचकर डाक्टर ने आवाज लगाई, "ओ झीणी, देख आज नया बंदा लेकर आया हूँ। तेरी इतनी तारीफ़ की है इसके आगे, नीचा न दिखा दियो मन्नै।" 

चहकती हुई झीणी बाहर आई "कौण डाक्टर सै के?" 

दो ही मिनट में झूलती टेबल और हिलती कुर्सियों के साथ मैचिंग करता एक लबालब भरा हुआ जग और दो गिलास लेकर झीणी हाजिर हो गई। डाक्टर ने जेब से तली मूँगफ़लियों का पैकेट निकाला और हम दोनों शुरू हो गये। डाक्टर घूँट घूँट पीने के बाद ’जियो झीणी रानी’ का नारा लगाता था। मुझे स्वाद अटपटा सा लगा लेकिन डाक्टर को सुरूर में आते देखकर मैं भी धीरे धीरे घूँट भर रहा था। बचपन का दोस्त बहुत दिनों के बाद मिला था, शायद डाक्टर ज्यादा ही जोश में आ गया था। एकदम से पूछने लगा, "मैंने यहाँ सबके ठियों पर चखकर देख रखी है, लेकिन झीणी रानी, तेरी शराब में बात ही कुछ अलग है। कई बार पूछा है तुझसे, आज बता ही दे कि अलग से इसमें  क्या मिलाती है तू? बोल न,  तुझे मेरी कसम है आज। मेरे दोस्त के सामने मन्ने नीचा न दिखा दियो।" अब बात ये है जी, लुगाई जात ऐसी ही होवे है कि जहाँ अपनी कसम दे दो, फ़ट्ट से  पिघल जावै है। झीणी भी पिघल गई और बोली, "डाक्टर, तू भी न बस्स...।  देख, माल मसाला तो सब जगह एक सा ही डले है, मैं तो अपनी जानूँ हूं कि जद से ब्याह के इस घर में आई हूँ, रोजी रोटी की कसम है मुझे अगर मन्ने एक बार भी इस गड्डे के अलावा कहीं और मूता हो।"

मैंने अब तक जो दो चार घूँट भरे थे, सूद समेत टेबल पर उलट दिये और डाक्टर की दिप दिप करती आँखें पता नहीं इस बात से खुश थीं कि झीणी ने उसे नीचा नहीं दिखाया  या  इस बात से कि उसके बचपन का दोस्त शहर  वाला होकर देसी चीजों को पचाने की अपनी शक्ति खो बैठा है। मैं उठ रहा था और वो मेरा हाथ पकड़ कर बैठा रहा था, एक जग और पियेंगे। बार बार कहता था कि झीणी ने उसकी बात का मान रखा है और सीक्रेट फ़ार्मूला बता दिया है।  "बकवास मत कर तू।  आज माँ बाबू से मिले बिना ही वापिस जा रहा हूँ, कह दियो उनसे कि एकदम से कोई जरूरी काम आ गया था।"

बाद का हाल पूछने पर गार्ड साहब ने इस वाकये का सबक ये बताया कि गाँधी बाबा महान थे। उनके बताये तीन बंदर भी महान थे। न बुरा देखो, न बुरा सुनो और न बुरा बोलो। मैंने यूँ ही पूछ लिया कि काम तो एक ही बंदर से चल सकता था जिसकी मार्फ़त ये संदेश मिलता कि बुरा मत करो?  ड्यूटी ऑफ़ किये काफ़ी देर हो चुकी थी, आज सरकारी उचित दर के ठेके के सेवनदार बने हुये गार्ड साहब ने कहा, "इस सारी बात से आपने कोई सबक नहीं सीखा। फ़ालतू के सवाल करने से सेहत को नुकसान पहुँच सकता है, जैसे डाक्टर के सवाल से हुआ। महान लोगों ने जो कह दिया, चुपचाप से उसे मान लो और मान नहीं सकते तो भी संकट के समय में उनके बोले डायलाग बोल दो। बातों का पालन उतना जरूरी नहीं है जितना मौके-बेमौके पर उनका बोला जाना।   

याद आ रही हैं ये सब बातें और लग रहा है कहीं मीडिया ने जरूर वो क्लिपिंग डिस्टार्ट या एडिट कर दी होगी जिसमें एक गाल पर तमाचे के बाद गाँधीजी को याद करते हुये फ़ौरन दूसरा गाल आगे बढ़ाया गया होगा.........।.......सरदारजी ने पद संभालते ही जो टेक लगाई थी ’देहि शिवा वर मोहे इहै, शुभ करमन से कबहुँ न टरूँ’ बराबर पूरी कर रहे हैं। साझीदार के  एक थप्पड़ लगते ही खुद फ़ोन लगाकर हालचाल पूछा,  इससे ज्यादा और क्या कर सकते हैं?........कसाब के 26\11 को तीन साल हो गये हैं, सिल्वर जुबली पता नहीं कितने साल में मानी जाती है आजकल?  कानून अपना काम करेगा -yes, law will take its own course. .........जो हमसे टकरायेगा, चूर चूर हो जायेगा।....... केजरीवाल तो लपेटे में आ ही  गये थे, अब क्रेन बेदी, हो जाओ तैयार, मुकदमेबाजी के लिये।............. रामदेव, बालकिशन, अलानो  फ़लानों, यू आल डिज़र्व दिस ट्रीटमेंट। सबकी फ़ाईलें तैयार हैं।  समझते ही नहीं गाँधीजी के तीन बंदर वाला इशारा...।.......झीणी बाई, तुझे सर्च करता हूँ फ़ेसबुक पर और दूसरी साईट्स पर, हौंसला न छोड़ियो और जारी रहियो अपने कुटीर उद्योग में  वैल्यू एडीशन करने में।   यू.पी. वालों के बाद हरियाणा पंजाब के दलितों पिछड़ों के घर भी सवारी तशरीफ़ ला सकती है,  कभी तो वोट यहाँ भी पड़ेंगे.......हो सकता है झीणी बाई के ठीये पर ही अबकी बार.................... .......सरकार किसानों का भला करके ही मानेगी, एफ़ डी आई पर पीछे नहीं हटना है जी.............जनता साली पागल कहीं की, समझती है नहीं कुछ  और बरगलाये में आ जाती है.................बिचौलियों को उनकी औकात दिखा देनी है इस बार...............कनिमोझी छूट गई.....मालेगांव वाले छूट गये.....law will take its course..............ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर, तेरे पैर न छोड़ेंगे...................और इशारा करो जी आप तो, गद्दी जायेगी तो जाये.................तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा............

इतनी बार नशा नशा लिखा गया है मुझसे कि  गम और भी गलत होता जाता है:)) सरकार राशन कार्ड में कैरोसीन के साथ इसका भी कोटा बाँध दे तो कैसा रहे?  खाओ-पियो करो आनंद  और .....................

रविवार, अक्टूबर 23, 2011

’द वैरी बैस्ट कस्टमर सर्विस’


“ये ब्रांच बुढ्ढों की ब्रांच है, सूखी ब्रांच।” जबसे इस ब्रांच में आया, श्रीमुख से कई बार यह सुन चुका था। पुरानी ब्रांच से पर्सनल फ़ाईल आने के बाद अपनी जन्मतारीख सुबूत के तौर पर पेश करते हुये हमने निवेदन किया कि ’अभी तो मैं जवान हूँ’  फ़िर यह आक्षेप क्यों और सूखी और हरी भरी ब्रांच का कैसा वर्गीकरण?    उस्तादजी ने स्पष्ट किया कि  इस डायलाग का पूर्वार्ध  उनका नहीं है, कोई दूसरा स्टाफ़ कभी यहाँ आया था और उसने यह रिपोर्ट दी थी। इस डायलाग का उत्तरार्ध भी उनका नहीं है, लेकिन उनकी सहमति दोनों अर्धांशों से है। हमारी उम्र वाली बात ‘age is nothing but a figure’ टाईप कुछ डायलाग बोलकर खारिज कर दी गई  और सूखी-गीली संबंधी विषय पर एक और  होमवर्क   हमें थमा दिया। “बैंक वालों की तरफ़ से सबसे अच्छी कस्टमर सर्विस कब होती है?”  गये थे नमाज पढ़ने और रोज़े गले बँधवा कर उस दिन हम घर लौटे।  रात भर मगजमारी किये और अगले दिन और भी थका हुआ चेहरा लेकर जब बिना जवाब लिये हाजिर हुये तो हमें पकड़ कर आईना दिखा दिया कि देखो, ये किसी जवान का चेहरा है?  फ़िर खुद ही अपने पिछले दिन के  सवाल का जवाब दिया, “बैंक वाले सबसे अच्छी कस्टमर सर्विस दशहरे से दिवाली के बीच देते हैं। और यह जवाब सिर्फ़ इस सवाल का नहीं है बल्कि सूखी ब्रांच क्या और कैसे होती है, इसका भी है। त्यौहार है  कि बस ब्ल्यू लाईन की तरह सिर पर आने को है और यहाँ कोई पार्टी दिखती ही नहीं है।” हमारे ज्ञान चक्षु खुल गये।

आज कुछ छिटपुट किस्से इसी विषय पर हो जायें।

आजकल चैक बुक पर नाम, एकाऊंट नंबर आदि प्रिंट होकर आता है। ग्राहक से चैक बुक रिक्वीज़िशन स्लिप भर कर आ जाने के बाद हम लोग ऑनलाईन डिमांड  दे देते है और लगभग बारह दिन में चैकबुक प्रिंट होकर आ जाया करती है। मुझे हैरानी हुई जब इन दिनों यह समय सीमा बारह दिन की जगह सात-आठ दिन की हो गई। आश्चर्य व्यक्त करने पर इसका श्रेय यह कहकर  दीवाली को दिया गया कि इन दिनों में मुर्दे भी उठकर ड्यूटी पर हाजिर हो जाते हैं। जो स्टाफ़ सदस्य शाम के समय घड़ी की सुईयों को देखकर पैक अप कर लिया करते थे, इन दिनों में स्वेच्छा से देर तक बैठने को तैयार रहते हैं। फ़लस्वरूप कार्य की गति बढ़ जाती है।

उस्तादजी ने पुराना एक वाक्या बताया कि एक बार एक पार्टी सभी स्टाफ़ सदस्यों को दीवाली पर सूट लेंग्थ दे गई थी। अभी वो सज्जन ब्रांच में ही थे कि एक स्टाफ़ सदस्य बोला, “आ गया एक और खर्चा, कपड़ा दे दिया गिफ़्ट में और सिलाई और टाई?” कस्टमर समझदार था या मौके पर बात कहने वाला, ये फ़ैसला आप करें लेकिन  सतना लिफ़ाफ़ा  प्रकरण  हमारे उस्तादजी कई साल पहले ही देख\दिखा चुके हैं। मेरी सरल सी जिज्ञासा कि उस्तादजी वो टोकने वाले सज्जन आप के सिवा …? वैसे हमारे  उस्ताद जी मंद मंद मुस्कुराते हुये बहुत भले दिखते हैं।

ऐसे ही एक और किस्से में उन्होंने बताया कि एक बार इतने पैकेट इकट्ठे हो गये थे कि मैनेजर साहब से शिकायत करनी पड़ी कि इन डिज़ाईनर पैकेट्स में से  इतने के तो गिफ़्ट नहीं निकलेंगे जितना टैक्सी का किराया  जायेगा। मैनेज करना ही तो मैनेजर का काम है,  मैनेज किया  मैनेजर साहब ने बल्कि करवाया उस्ताद जी ने।
एक स्टाफ़ जो हरित शाखा से  अपेक्षाकृत सूखाग्रस्त शाखा में दीवाली से दो महीने पहले ही स्थानांतरित हुआ था, पहले तो स्थानांतरण स्थगित करवाने में जुटा रहा, असफ़ल रहने पर उसने दीवाली वाले सप्ताह में अवकाश ले लिया। ये किस्सा तो मेरे सामने ही घटा था, अपन समझते थे कि ये उनका प्रोटैस्ट का तरीका है। बाद में पता चला कि वो सप्ताह उन्होंने पुरानी ब्रांच में बिताया।

किसी स्टाफ़ के छुट्टी पर रहने पर उससे जूनियर को अस्थाई रूप से उस पद पर काम करवाने की परिपाटी रही है, ताकि कार्य में व्यवधान न पड़े। बदले में उस स्टाफ़ को कुछ अतिरिक्त भत्ता जिसे ऑफ़िशियेटिंग अलाऊंस या विशेष भत्ता कहते हैं, प्रबंधन की तरफ़ से दिया जाता है। एक शाखा में एक अधिकारी का पद काफ़ी समय से खाली था और एक दूसरा जूनियर कर्मचारी दो तीन महीनों से उस पद पर ऑफ़िशियेट कर रहा था। कुछ ग्राहक ऐसे होते हैं जो पद के हिसाब से गिफ़्ट दिया करते हैं, जब उनका गिफ़्ट पैक उनके मूल पद के हिसाब से मिला तो उन्होंने ये शिकायत मैनेजर से की,  और आवाज उठाने की कीमत केबिन में रखे पैकेट्स की मार्फ़त  मनपसंद पैकेट्स से सवाई-ड्यौढ़ी वसूल की।

बैस्ट फ़ार्मूला लगा अपने को अपने भोला का, दीवाली के मौके पर वो बना देता है अपना छोटा सा चाईना बाजार,  हर माल पचास रुपये। किस डिब्बे से क्या निकले, इस सब से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था। सीधा सा हिसाब, जितने पैकेट      X     रु. 50\-.        उसमें भी  कोई सौ-दो सौ की ऊपर नीचे  कर ले तो अगला हिसाब किताब नहीं रखता था। सैंकड़ों में रकम पहुँचते ही उसका कैल्कुलेटर काम करना बंद कर देता था।

सबकी बता दी, अपने बारे में तो कुछ भी नहीं कहा। ये सब मैं ही तो हूँ, मेरी ही मल्टीपल पर्सनैल्टी के अलग अलग रूप अपने पूरे उरूज पर। जिन लोगों के काल्पनिक किस्से सुना देते हैं, वो सब मेरे ही तो वो रूप हैं जो मैं होना चाहता हूँ लेकिन कभी किसी का मन रखने के लिये, किसी की नाराजगी के डर से हो नहीं पाता।      अपने सुख, अपने लाभ के लिये कभी उस्ताद जी का रोल प्ले करता हूँ, कभी भोला का, कभी इसकी तरह व्यवहार करता हूँ, कभी उसकी तरह। जो अच्छा हो गया, उसका श्रेय अपनी अक्ल को, अपनी हाजिरजवाबी को और जब मनमाफ़िक न हुआ तो किसी दूसरे के सिर पर ठीकरा फ़ोड़ दिया। और तो और उस ऊपर वाले को भी नहीं बख्शता। तकलीफ़ के समय तो खूब याद कर लेता हूँ और जरा सा आराम मिलते ही फ़िर यहीं का होकर रह जाता हूँ।

खैर,  बहरहाल. anyway जो भी हो अपनी तो पहली सरकारी दिल्ली वाली दिवाली है,  उम्मीद से हैं :))           जुटे हैं उस्ताद जी के कहे अनुसार ’द वैरी  बैस्ट  कस्टमर सर्विस’ करने में, जो होगा सिर माथे पर।  आगे कभी हो सकता है अपने भी किस्से कोई सुनाकर अपना और दूसरों का टाईम खोटी करें।

:) फ़त्तू  पशु मेले से भैंस  लेकर आया। घर तक पहुँचते पहुँचते जिस किसी से आमना सामना हुआ,  खरीद मूल्य बताते बताते दुखी हो गया। दुखी भी ऐसा कि भैंस बांधते ही कुँए में छलाँग लगा दी। सारा गाँव इकट्ठा होकर फ़त्तू को कुँए से निकलने की पुकार करने लगा, जैसे ब्लॉग जगत में……...। फ़त्तू ने आवाज लगाई और पूछा, “सारे गाम आले आ लिये अक कोई सा रै रया है?”  जब कन्फ़र्म हो गया कि सब आ लिये तो वो भी बाहर निकल आया और फ़िर अपना सवाल दोहराया, “सारे गाम आले आ लिये अक कोई सा रै रया है?”   फ़िर से कन्फ़र्मेशन मिल गई तो जोर से बोला, “भैंस आई सै चालीस हजार की, अबके किसी ने पूछ लिया तो उसने इसी कुँए में गेर दूँगा।”

हैं तो अपन भी कुँए में ही, लेकिन भरोसा है उसपर,  जिसने वादा किया है डूबने न देने का और निभाया भी है। फ़त्तू की तरह  सबको एक साथ ही विश कर देते हैं।
दोस्तों,  सारे ब्लॉग मित्रों को  और उनके परिवार को ’शुभ दीपाभली’  :)) 
भीतर-बाहर का सब अंधेरा दूर हो और चारों तरफ़ खुशियाँ, उल्लास अपना प्रकाश बिखेरें,  दिल से कामना करता हूँ।


गुरुवार, सितंबर 15, 2011

पीयू पीटू - P U P 2



इस पोस्ट का टाईटिल सोचा था ’पाले उस्ताद – पाट्टू (पार्ट टू)’ फ़िर सोचा कि विद्वान जन आऊ, माऊ चाऊ टाईप की ब्लॉगिंग के बारे में फ़िक्र करके वैसे ही हलकान हुये जा रहे हैं, ऐसा शीर्षक देखकर कहीं उन्हें मौका न मिल जाये कि ऐसा भड़काऊ टाईटिल देकर पाठकों के साथ धोखाधड़ी की गई है। वैसे ये टाईटिल भी कैची सा तो है ही:)

अब हम सीरियस टाईप के बंदे होते जा रहे हैं, सोचा है कभी कभार आपसे काम की बात भी शेयर कर लेंगे। बेशक मात्रा में थोड़ी हो, असर में मामूली हो लेकिन हमें तसल्ली रहेगी कि हाँ जी, हमने भी ज्ञान बाँटा है। अब हम अपनी कथा कहानी आगे बढ़ाते हैं, काम की बात  आप ढूँढ लीजियेगा। मिल जाये तो खुद की पारखी नजर की बलैयां उतार लीजिये और न मिले तो हौंसला न छोड़ियेगा, कभी कभी हमसे  मिसफ़ायर भी हो जाता है।
बैंकों के बारे में एक पोस्ट पहले लिखी थी, आज आपको थोड़ा सा अंदरूनी कामकाज के बारे में बताते हैं, सिर्फ़ थोड़ा सा, क्योंकि ज्यादा अपने को भी नहीं पता है। 

जमा के खातों में सबसे ज्यादा प्रचलित खाते हैं सेविंग खाते, करेंट खाते, आवर्ती खाते, सावधि खाते आदि आदि। सेविंग खातों को हमारे यहाँ घरेलु बचत खाता और करेंट खातों को चालू खाता के नाम से जाना जाता है।

बैंक में ड्यूटी करने वाले हम लोग कार्यविभाजन के मामले में बहुत सतर्क होते हैं। संयुक्त परिवार में देवरानी-जेठानी वाला मामला समझ लीजिये, मेरी ड्यूटी उसकी ड्यूटी से ज्यादा क्यों?   तरह तरह के खट्टे मीठे तर्क देकर हर कर्मी की  कोशिश यह दिखाने की रहती है कि सब से ज्यादा काम, सबसे ज्यादा जिम्मेदारी का काम, सबसे ज्यादा जोखिम का काम उसके सर मढ़ा जा चुका है।  अपना सौभाग्य यह रहा कि अधिकतर जगह अपन उम्र में सबसे छोटे रहे। माँगकर तो हमने कभी टिप्पणी नहीं ली तो ड्यूटी में कौन सा विभाग मांग कर लेते? बड़े बुजुर्ग अपने हिसाब से अपनी पसंद से सीट चुन लेते हैं और बचा खुचा प्रसाद रूप में हमें मिल जाता था। ये और बात है कि कभी कभी पूँछ भैंस से ज्यादा लंबी होती है।

तो जी हुआ ये कि नई जगह पर आये तो दो तीन जगह हमारी चाल-चरित्र और चेहरा जांचा परखा गया और रिजैक्शन लेते लेते हम इस शाखा में आधा दिन देर से  पहुंचे। उस्ताद जी सेविंग डिपार्टमेंट, लॉकर, पेंशन और सैलरी सँभाल चुके  थे और सिर्फ़ बचा खुचा ही बचा था वो हमें मिल गया जैसे क्लियरिंग, एफ़.डी. डिपार्टमेंट, ड्राफ़्ट्स, टैक्स, आवर्ती जमा, वगैरह वगैरह। 

कार्य विभाजन के अनुसार सेविंग विभाग उस्तादजी के पास और करेंट विभाग हमारे पास थे।   सितंबर का महीना शुरू ही हुआ था कि हमने हिन्दी शब्दावली का प्रयोग   ज्यादा करने के लिये उस्ताद जी को मना लिया। थोड़ी हील हुज्जत के बाद उस्ताद जी मान गये। त्वरित संदर्भ के लिये प्रचलित शब्दों की हिंदी आपको बता दें 

सेविंग खाता   -  घरेलु बचत खाता
करेंट खाता     -   चालू खाता
क्लियरिंग       -  किलेरिंग (समाशोधन शब्द  उस्तादजी को बड़ा अटपटा लगा)

कुछ दिन तो पूरा नाम  लेते रहे  और फ़िर धीरे धीरे छोटे नाम पर  आ गये।     अब जो भी ग्राहक आता\आती और काम  कहाँ होगा ये पूछा जाता तो उस्तादजी फ़ट से कहते, “घरेलु है तो इधर आ जाओ, चालू है तो उधर संजय जी के पास जाओ।”  सावन भादों के महीने और हम हैं कि सूखे में ही जीवन बिता रहे हैं। चालू खाते में लेनदेन करने तो सिर्फ़ ’आता’ श्रेणी के ग्राहकगण ही आते हैं। रोना इस बात का  नहीं था बल्कि उनके शब्द प्रयोग का है कि घरेलु है तो इधर आ जाओ और चालू टाईप के हैं तो उधर चले जाओ। अब कौन है जो खुद को चालू बताये? दिन में दस बीस बार ये डायलाग मारकर उस्ताद जी हमारी खिल्ली  उडा रहे थे और स्टाफ़ के भी सारे बंदे मजे ले रहे थे। खैर, सब्र का टोकरा है अपने पास – खुद को कोसते रहे कि काहे हिंदी वाला पंगा ले लिया लेकिन अब क्या हो सकता था? तो जी,   ’आता’ सब इधर है और ’आती’ उस्तादजी के पास। मैं भी कह देता, “उस्तादजी, मजे ले लो मुझसे। कोई बात नहीं, देखेंगे।”

अब बात क्लियरिंग की। जब कोई ग्राहक अपने खाते में किसी दूसरी शाखा या दूसरे बैंक का चैक जमा करवाता है तो  जिस प्रक्रिया के द्वारा उस चैक के पैसे मंगाये जाते हैं, उसे क्लियरिंग या समाशोधन कहते हैं। अब लगभग सभी बैंक केन्द्रीयकृत हो चुके हैं तो दिल्ली जैसे शहर में क्लियरिंग का काम बहुत ज्यादा है। इस बात को सभी मानते हैं। मुर्दे का सिर मूडने से उसका वजन कम नहीं होता लेकिन उस्तादजी ने दयानतदारी दिखाते हुये  काम का बंटवारा किया कि होम क्लियरिंग(अपने बैंक की दूसरी शाखा के चैकों की क्लियरिंग) वो किया करेंगे। क्लियरिंग में होम क्लियरिंग का चैक सप्ताह में एकाध आता है तो ये उनका कसूर थोड़े ही है?  अब क्लियरिंग आने पर जब पियन पूछता है कि इन्हें कहाँ ले जाऊँ?   उस्ताद जी कहिन, “घरवाली इधर ले आ, बाहर वाली संजय जी के पास।”  खून तो बहुत जलता है लेकिन हिन्दी सेवा का व्रत मैंने ही दिलवाया था नहीं तो पहले तो यही कहते थे कि होम क्लियरिंग इधर ले आ, अदर बैंक वाली उधर ले जा। खून के घुँट पी रहा था रोज।
उस दिन हैड ऑफ़िस से चिट्ठी आई, उस्तादजी को प्रशिक्षण के लिये जाना था। मैंने आवाज लगाई, “ओ उस्ताद जी!”  और मेरी आजमाई हुई बात है कि जिस दिन मेरी ऐसी आवाज सुन लेते हैं, उस्तादजी कुरुक्षेत्र में किंकर्तव्यमूढ़ अर्जुन की मुद्रा में आ जाते हैं। पेशानी पर बल, हाथ पैर शिथिल,  होंठ कंपकंपाने लगते हैं कि आज कुछ सुनने को मिलेगा:)


आये उस्तादजी, बैठे। “बोलो जी?”

मैंने चिट्ठी दिखाई, मन में लड्डू फ़ूटे उनके लेकिन उम्मीद के मुताबिक बोले कि यार, मैं तो जाना ही नहीं चाहता ट्रेनिंग पर, लेकिन जाना तो पड़ेगा।

सब बैठे थे।  मैंने पूछा, “एक बात बताओ जी, आप तो जी चले जाओगे ट्रेनिंग पर। पीछे से जी वो घरवाली और बाहर वाली जो होती है जी, किलैरिंग,  उसका क्या होगा?

उस्ताद जी, “घरवाली भी आप ही देखोगे और बाहरवाली भी।”

सब हँस रहे थे, मैं भी, उस्तादजी भी और बाकी स्टाफ़ के लोग भी। मरे जाते हैं काम के बोझ से, दुख के और तकलीफ़ के तो बिन बुलाये, बिन चाहे हजार मौके आते हैं हँसी के  बहाने खोजने पड़ते हैं। ऊपर वाले की कृपा है कि कैसी भी तपती लू हो, ठंडी बयार अपना पता खोज ही लेती है।

हिन्दी दिवस हो चुका,  बैनर वगैरह लपेट कर रख दिये गये हैं। अगले साल फ़िर से जोर शोर से ड्रामा किया जायेगा और जैसे हमने आज काजू वाली मिक्सचर, बिस्कुट, लिम्का वगैरह भकोसकर हिन्दी दिवस मनाया है, अगले साल और जोर शोर से,  बोले तो एकाध मिठाई भी मेन्यू में जुड़वाकर हिन्दी सेवा का व्रत लेने की शपथ लेंगे। कल से फ़िर वही सेविंग, करेंट, होम क्लियरिंग, वही हम और वही उस्तादजी – वहीं बहू का पीसना और वहीं सास की खाट।

अब आज की बेगार लेते जाओ  - अपने घर के, आस पास के,  परिचय के सभी पात्र लोगों के बैंक खाते खुलवायें। विशेष तौर पर बच्चों को सेविंग की आदत जितना जल्दी डालेंगे, उतना ही उन्हें आत्मनिर्भर होने में  मदद मिलेगी। जैसे बच्चों को मॉल्स, सिनेमाघर वगैरह लेकर जाते हैं, कभी कभी उन्हें बैंकों में भी लेकर जायें ताकि वो बैंकिंग  हैबिट्स सीख सकें और आने वाले समय में शिक्षा ऋण आदि सुविधाओं के बारे में आत्मविश्वास से निर्णय ले सकें।

उस्तादजी की छत्रछाया बनी रहेगी अपने पर तो मिलवाते रहेंगे आपको  :)

बुधवार, अगस्त 31, 2011

पाले उस्तादजी


नौ बजने वाले थे और मैं बार बार मोबाईल में टाईम देख रहा था। इतना लेट तो कभी नहीं होते, हारकर फ़ोन मिलाया। पूछा कि कहाँ हो तो जवाब मिला कि जनाब आज  चार्टर्ड  बस से निकल गये हैं। भले आदमी एक कॉल  करके बता भी तो सकते थे लेकिन लीक पर चल पड़े तो  साधारण बंदे और हमारे उस्तादजी में अंतर ही क्या रहता?

ऑफ़िस पहुँचकर  जब यही बात उनसे कही तो हमेशा की तरह कुसूर मेरा ही निकला। “पहले मैं कभी एक मिनट भी लेट हुआ? आपको समझ जाना चाहिये था कि मैं बस से निकल आया होऊँगा।” कुछ जगह ऐसी होती हैं जहाँ  सब्र ही अकेला विकल्प बचता है। हमने अपनी गलती मान ली तो उन्होंने अभयदान देते हुये अन्ना के अनशन तोड़ने को इस परिवर्तन का कारण बताया। बीच बीच में कई बार आकर अन्ना और उनकी टीम के बारे में  कई तरह की बातें सुना गये। मसलन, ’क्या जल्दी थी इतनी जल्दी अनशन खत्म करने की?’  या फ़िर, ’आंदोलन अब दम तोड़ देगा। इन्हें चाहिये था कि क्रमिक अनशन करते। अबे, अन्ना बारह तेरह दिन खींच गये, किरण बेदी और केजरीवाल और वो जो भूषण वगैरह है, महीना-दो महीने तो ये भी अनशन कर ही सकते थे। फ़िर  पब्लिक में और भी जागरूकता आती’ आदि आदि।

बाद में फ़ुर्सत मिलने पर इस बात का खुलासा हुआ| अजीज, हमारा एक ग्राहक, जब चैक जमा कराने आया तो उस्तादजी ने उसे आवाज लगाई, “ओ अजीज, ये ले तेरी अमानत।”  और जेब से टोपी निकालकर उसे लौटा दी।  अब कहानी समझ आई। अन्ना के अनशन के दूसरे दिन की बात है, घर आने के लिये जब बाईक स्टार्ट की तो उस्तादजी पिछली सीट पर जम गये। उनका स्टाईल है ये कि जिस दिन काटते हैं, शाम को मरहम भी  लगाते हैं।

तो उस शाम को उनका आदेश हुआ था  कि “अजीज की दुकान की तरफ़ चलो।”  चल दिये हम कि होगा कुछ काम। देखकर अजीज खुश हो गया, “आईये सर, आज कैसे मेहरबानी की?”   थोड़ा सा घुमाफ़िराकर उस्तादजी ने उससे ’मैं अन्ना हूँ’ वाली टोपी ली और पाँच सौ का नोट पेश किया, “ले पैसे काट ले।”   पाँच रुपये की टोपी और उसके लिये पांच सौ का नोट,  वो भी उन बैंक वालों से जिनसे रोज वास्ता पड़ता है, इतना भी अनाड़ी नहीं हुआ  अजीज अभी। वो हाथ जोड़ रहा था, “रहने दो साहब, और बतायें कुछ, चाय-ठंडा वगैरह लेंगे?”  पन्द्रह मिनट अबे ले ले और नहीं साहब,  नहीं के डायलाग चले फ़िर उस्ताद जी ने कहा, “चल, तेरा उधार या तेरी अमानत मेरे सिर पर” और टोपी सिर पर धारण करके ड्राईवर को चलने का आदेश दिया, “चलो जी, हैलमेट की टेंशन खत्म।”

लगभग दस दिन तक सुबह शाम मोटर साईकिल की पिछली सीट पर ’मैं अन्ना हूँ’  वाली टोपी पहनकर सफ़र करने के बाद आज उस्ताद जी ने अमानत लौटा दी थी। अब मुझे आंदोलन के बारे में उनकी प्रतिक्रियाओं का अर्थ समझ आने लगा था।

उनका ताजा ऑब्जैक्शन\ओब्जर्वेशन(हमारे उस्तादजी की हर ओब्जर्वेशन दरअसल कोई न कोई ऑब्जैक्शन ही होती है)  ये है कि ये  अनशन एकदम से फ़ेयर नहीं था। कह रहे थे कि टी.वी. पर उन्होंने खुद देखा है कि अन्ना बिसलेरी का पानी पी रहे थे। हमने अपना सामान्य ज्ञान दिखाने की कोशिश की, ’अनशन में  पानी तो अलाऊड होता है।’ 

“यैस, लेकिन बिसलेरी साधारण पानी नहीं है।  आप बोतल चैक करिये, उस पर लिखा रहता है ’मिनरल वाटर’,   पावरफ़ुल पानी है वो।”

खून में दौड़ती हुई गुलामी देखकर सिर पीट लेने का मन करता है क्भी कभी लेकिन फ़िर सोचता हूँ शायद  हम जैसों को  देखकर भी किसी को यही लगता होगा कि बेकार में प्रगति के पथ पर सटासट दौड़ते इंडिया की राह में रोड़े अटका रहे हैं। इन जैसों की मानें तो जो हो रहा है उसे प्रभु इच्छा मानकर उसी की आदत डाल लेनी चाहिये, न गिला किया जाये और  न शिकवा किया जाये। आयेगा कोई कल्कि अवतार और खुद ही कर करा लेगा, जो ठीक होगा। दुनिया बनाने वाले को अपनी दुनिया की फ़िक्र नहीं है क्या?  
  
लेकिन blessing in disguise की तरह हम इनसे भी वरदान खींच लेते हैं। गुणों के सागर,  हर इल्म के माहिर और वक्त के पारखी इन उस्ताद जनों के अपन सदैव आभारी हैं। कई मामलों में निर्णय लेने में जब सक्षम न हो पा रहे हों कि इधर जायें या उधर जायें, तो हम इनके निर्णय का इंतज़ार करते हैं और आँख मूंदकर इनके पक्ष के विपक्षी बन जाते हैं और अभी तक अपना ये निर्णय सही ही रहा है
अजीज की अमानत लौटाकर और भी बिंदास दिख रहे थे हमारे पाले उस्तादजी। वैसे वो हमेशा बिंदास ही होते हैं, बस हुकमरानों की तरह दिखते फ़िक्रमंद हैं ताकि दूसरे ये न समझ लें कि बड़े सुकून में हैं, कोई कामधाम नहीं है इनके पास। किसी भी सिच्युएशन के लिये उनके पास प्रोब्लम मौजूद रहती है। ऐसा हुआ तो ये प्राब्लम, नहीं हुआ तो दूसरी प्राब्लम।

दिन में दो तीन बार चपड़ासी को बुलवाकर कभी कम्प्यूटर को टेबल के सुदूर उत्तर में रख लेते हैं और कभी दक्षिण-पूर्व में। आधा फ़ुट आगे खिसका लिया और कभी डायरैक्शन टेढ़ी कर ली। कोई कुछ पूछे, उससे पहले ही उनका रेकार्ड चालू हो जाता है, “दुखी आ गया यार मैं तो इस कम्प्यूटर से, जब देखो बंद हो जाता है।  आऊटपुट क्या बैंगन निकलेगी, सारा दिन तो इसी वास्तुशास्त्र में निकल जाता है। अब जगह बदल कर देखी है, शायद सही चल जाये ।” हमने कई बार खुद को प्रस्तुत किया कि हमारा कम्प्यूटर ले लो, हमारी सीट ले लो – आप बिगड़ी चीजों  से परेशान हो, हमें अब सुधरी चीजों से डर लगता है:)  लेकिन नहीं, कह्ते हैं  कि यार मुझसे छोटे हो, मैं  इतना स्वार्थी नहीं हुआ कि अपनी मुसीबत तुम्हें दे दूँ।   बस हम कुर्बान हो जाते हैं उनके बड़प्पन पर, क्या हुआ अगर थोड़ा बहुत उनकी सीट का काम इधर आ गया तो, चलता है।

अब अपने सामने प्राब्लम ये आ खड़ी हुई है कि जिक्र तो छेड़ दिया, और परिचय करवाया नहीं।  तो मिलवाते हैं आपको किसी दिन  हमारे पाले उस्तादजी से।   ’पाले उस्तादजी,’    इस वाक्यांश में ’पाले’  संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया या विशेषण किसी भी रूप में फ़िट कर सकते हैं। ’जाकी रही भावना जैसी’ वाले स्टाईल में किसी भी रूप में और किसी भी रोल में फ़िट होने की कूव्वत रखते हैं हमारे ताजातरीन ’पाले उस्तादजी।’ बस ये ध्यान रखियेगा, ये बहुत संक्षिप्त  परिचय है, जिसे कहते हैं - tip of an iceberg.
 
बैंक में अमूमन शाम सात  बज जाया करते हैं।  चार बजे के बाद पब्लिक आऊट तो अपन लोग हो जाते हैं मर्जी के मालिक। मोबाईल में गाने शुरू किये और काम निबटाना शुरू। यहाँ  आये चौथा-पाँचवां दिन था और पहली बार ही गाने सुनने शुरू किये थे कि श्रीमानजी आ कर खड़े हो गये। तब तक अपनी दुआ सलाम के अलावा और ज्यादा परिचय नहीं था। “मैं अपना काम छोड़कर ये गाना सुनने आया हूँ, बहुत प्यारा गाना है।” हमारी पसंद की तारीफ़ करें और हम खुश न हों?   एक के बाद दूसरा गाना, फ़िर तीसरा। गाने चलते रहे और इनका मूड बनता गया। फ़िर आया गाना, “जो हमने दास्ताँ अपनी सुनाई, आप क्यूँ रोये”  ये साहब मुड़कर चल दिये। अब अपने को बात खटकी, बुलाया और पूछा कि क्या ये गाना पसंद नहीं आया? बोले,  “नहीं, ये बात नहीं है। गाना बहुत अच्छा है और आवाज भी, लेकिन ये गाना सुनकर मेरी बीमारी याद आ गई है।”
“बीमारी और आपकी? आप तो माशाअल्लाह जवानों से भी जवान दिखते हैं।”

मजबूरी में ही सही, बैठ गये हमारे सामने और कहने लगे कि पिछले अट्ठाईस साल से उनकी  आँख में आँसू नहीं आते। मैंने नादानी में इस बात के लिये बधाई दे डाली और वो और मायूस हो गये, “देखो, मेरी बीमारी में भी मुझे बधाई दे रहे हो, और ये कम्बख्त आँसू हैं, जो अब भी नहीं आये।” बता रहे थे कि कई सालों से सोच रहे हैं कि डाक्टर को चैक करवायें कि आँसू सूख क्यों गये हैं,  फ़िर खुद ही कहने लगे कि गंगोत्री\गोमुख से जो पानी की धारा निकलती है वो खुदबखुद गंगासागर पहुँच जाती है। रास्ते में बेशक अनगिनत नदियाँ मिलती हैं, लेकिन  स्रोत  ही सूख गया तो फ़िर क्या बचा?  उनका मन हल्का करने के लिये मैंने  वैसे ही कहा कि मुझे हँसे हुये कई साल बीत गये हैं तो फ़ौरन टोक दिया, “अभी हफ़्ता पहले तो बहुत चहक रहे थे, जिस दिन आपसे मिलने कोई गैस्ट आये थे। अबे किशन,  झूठ बोलते हुये पकड़े गये संजय जी, ले सौ रुपये इनसे और कुछ खाने-पीने का सामान लेकर आ।  अब तो वैसे भी अन्ना ने अनशन तोड़ दिया है, खाते समय गले में कुछ अटकेगा भी नहीं।”
 
“एक बात बताओ, आप हो किसकी तरफ़?  कभी सरकार की बुराई, कोई सरकार के खिलाफ़ आवाज उठाये तो फ़िर उसकी बुराई। ”

“इसका जवाब दो शब्दों में नहीं दे सकता। जैसे, किसी ने एक बार पूछा था कि वैजीटैरियन हूँ या नॉन-वैजीटैरियन तो मैंने कहा था कि मौकाटैरियन हूँ।”

हमने उस दिन, उस पल  से उन्हें उस्तादजी पाल लिया, सॉरी उस्तादजी मान लिया है।