शुक्रवार, जुलाई 02, 2010

सिल्वर स्पीच एंड गोल्डन साईलेंस -Part 1

सुना था कहीं कि पहला प्यार और पहली नौकरी कभी नहीं भुलाये जा सकते, अपन नौकरी वाली बात से सहमत हैं। जहां तक बात पिरेम,  पियार,  पिरीत, ईसक-विसक की है, खुश रहना है तो  करो और भूल जाओ। देवदास किताबों में और परदे पर बहुत अच्छा लगता है लेकिन  घर में,  परिवार में, ऑफ़िस में, दोस्तों के बीच  अगर देवदास आ जाये तो सारे माहौल का कर्फ़्यू लगा दे। इसलिये प्यारो, गमों से मिज़ाज़ मिलाकर रखो,  टेंशन लेने का भी नहीं, देने का भी नहीं। वैसे भी पहला प्यार भूल नहीं सकते तो फ़िर  वो पहले के साथ आखिरी  प्यार भी है। कहावत गलत हो गई न?  तो आज याद आ रही है  एक और आपबीती नौकरी के संबंध में।
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“यार, एक बात दिमाग में आ रही है कई दिनों से। न तो कुछ कह पा रहा हूं तुम लोगों से और न चुप रह पा रहा हूं।” मैंने अपने दोस्तों से कहा। उन दिनों हम पांच दोस्त एक मकान किराये पर लेकर रह रहे थे। सारा दिन एक ही ऑफ़िस, एक ही घर। यूं समझ लीजिये कि चौबीस घंटों का साथ था।
सुनकर राजीव तो हंसने लगा, जितेन मुस्कुराने लगा, राजा तो फ़िर राजा ही था, बेफ़िक्र और बेपरवाह।  ले देकर एक एस.के. था, जिसने उत्सुकता दिखाई। “भाई, यारों से नहीं बात करेगा तो और किससे करेगा? बोल न, क्या बात है?” और बेचारे ने सबसे जूनियर होते हुये भी राजीव की तरफ़ आंखें तरेरीं। “अगला बन्दा परेशानी में है और तुम हंस रहे हो।”
राजीव ने वैसे ही हंसते हुये कहा, “प्यारे, तुझे अभी हमारे साथ रहते हुये थोड़ा ही समय हुआ है। जिस दिन इन भाई साहब के दिमाग में कुछ बात आ जाती है न, तो समझ ले कि नई कहानी तैयार हो रही है कोई।”
अब गुस्सा तो मुझे आ रहा था, लेकिन क्या करता, पता था अपने दोस्तों की आदत का। सहमत हों या न हो, पीछा नहीं छोड़ते थे मेरा(करबद्ध प्रार्थना है कि इस बात का कोई अन्यथा मतलब न निकाला जाये), इन सबको मेरा खून पीना अच्छा लगता था।  मैंने कई बार कोशिश करी कि अकेला रह लूं, पर मजाल है एक भी मान जाये। लड़ते थे, झगड़ते थे और फ़िर थोड़ी देर में वैसे के वैसे। परदेश में रहने के और कितने भी नुकसान हों, दोस्तों की पहचान हो जाती है। मैंने कहा भी राजीव से, “बेट्टे, हंस ले पहले, फ़िर बात सुनियो। तेरे  हिसाब से तो दिमाग वाला हिस्सा खाली ही है मेरा।   न अपील करे तो जाने दियो बात को हवा में।”
फ़िर से हंस दिया वो, “बीमारी तो यही है, बात करेगा तो अपील तो करेगी ही। चल अब बक फ़टाफ़ट, क्या बात है?”
मैंने कहा, “यार, मुझे लग रहा है कि हम सबकी भाषा बहुत खराब हो गई है। शायद परिवार से दूर रह रहे हैं, एक लापरवाही सी आ गई है अपनी सबकी बोलचाल में। हर बात में चार पांच बार गालियां निकालने लगे हैं हम। ये आदत पक गई तो कितनी दिक्कत होगी? कोई हमें सुनेगा तो क्या सोचेगा हमारे बारे में, हमारे परिवार के संस्कारों के बारे में।”
अब सारे एक एक डिग्री नीचे उतर आये थे। राजीव मुस्कराने लगा था, जितेन भाव शून्य, राजा वैसा ही था खोया हुआ ख्यालों में और हमारा नया नया एस.के. परेशान दिखने लगा, यानि बात ने असर किया। अब मैं तो करवट बदल कर सो गया, करो अपने दिमाग की लस्सी। मुझे पता था थोड़ी देर में साले जबरदस्ती उठायेंगे, जब स्टेशन पर डीलक्स की सवारियां ताड़ने जाना होगा। और फ़िर वहीं कोई सर्वमान्य हल निकलेगा इस समस्या का। , मैंने तो खैर पहले ही सोच लिया था कि क्या एक्शन-प्लान रहेगा।
तो साहब, नियत समय पर हमें उठाया गया, स्टेशन पर जाकर डीलक्स ट्रेन की आगवानी के लिये खड़े हुये, ट्रेन के आने पर यात्रियों का दर्शन, निरीक्षण, अवलोकन तथा  चिट्ठाजगत की  तर्ज पर   धड़ाधड़ टिप्पणियां, धड़ाधड़ वाह-वाही और धड़ाधड़ पसंद जैसी क्रियायें सम्पन्न की गईं। गाड़ी के जाने के बाद रेलवे के ही एक बेंच पर हमारी लंबीमेज बातचीत(रेलवे ने गोल बेंच लगाई होतीं तो हम भी गोलमेज बातचीत कर लेते) शुरू हुई।  हमेशा की तरह हंसी मजाक, छेड़ाखानी जैसे पड़ावों से होती हुई समस्या की गेंद फ़िर अपन के पाले में आ गिरी, ’जो बोलेगा वही कुंडी खोलेगा।’  ऐसे  निकम्मे दोस्त थे हमारे, और अनुराग सर और अली साहब हमें कहते हैं कि खुशकिस्मत हो जो ऐसे दोस्त मिले। सही बात है जी, हैं खुश्किस्मत। तो निर्णय सुनाया गया कि रोज एक अक्षर तय कर लिया जायेगा, जैसे ’क’,   ’म’ या ’ल’ और दिनभर में जो भी उस अक्षर का उच्चारण करेगा, एक रुपया प्रति गलती के हिसाब से जुर्माना भरेगा। इसी बहाने कुछ भी बोलने से पहले सोचा जायेगा और भाषा पर थोड़ा नियंत्रण रहेगा। आज से उन्नीस बीस साल पहले तक एक रुपये की भी कुछ कीमत होती थी, और उन दिनों हम सब थे गाली-गुफ़्तार के मामले में थोक के डीलर।  यह तय हुआ कि शाम को जो भी कलैक्शन होगा, उसे कॉमन खर्चे के काम लाया जायेगा।
साहिबान, अगले दिन का कोड रखा गया ’ल’, और कमर कस ली सबने तोलने के बाद बोलने की।

 फ़िर क्या हुआ? देखेंगे हम लोग...........

 

14 टिप्‍पणियां:

  1. अब तो बात आगे पर आ पड़ी। देखते रहिए हमलोग। देखेंगे और पढेंगे, चारा भी क्‍या है? समझौता कर लिया है।

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  2. फत्तू लगता है फिर कहीं किसी म और ब एक करने गया है :)

    मुझे भी फत्तू का न होना अखरा.....वैसे पोस्ट एकदम रापचीक है....एन वक्त पर पार्ट टू का एलान अच्छा नहीं है....लगता है डायमंड कॉमिक्स का एलान हो रहा है....क्या साबू कार चलाना सीख पाएगा....क्या चाचा चौधरी की चाय ठंडी होते होते गरम हो पाएगी....पढ़िए अगले अंक में :)

    btw

    अनुराग जी का कहना सही है कि खुशकिस्मत थे जो दोस्त मिले।

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  3. बाऊ जी,
    नमस्ते!
    मैंक्या चक्के फट दित्ते तुस्सी! वधिया! पर ये जेड़ा पार्ट 2 दा प्रोग्राम है, ये वधिया नी कित्ता तुस्सी! पर ओहदे विच वी दादा मुनि वरगा तुहाडा "देखेंगे हम लोग" वोत पसंद आया! और इस्तो पहले मैं भूल जाऊं, टाइटल भी मस्त है!
    जय हो!

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  4. चलिये बात पहले प्रेम से ही शुरू की जाये ...मित्रवर मेरे ख्याल से पहले प्रेम की संभावनायें अनंत हैं ! प्रथम होने के लिये ये शर्त कहां है कि एक ही बंदे / बंदी से प्रेम किया जाये ? ज़ाहिर बात ये है कि हर नई साईट पर आप पहला प्रेम करते हैं / कर सकते हैं / करने की सोच सकते हैं :) अगर मैनेज कर सकें तो "करो और भूल जाओ" की भी जरुरत नहीं :)
    [ वैधानिक चेतावनी : बहरहाल रिस्क पर कोई टिप्पणी नहीं ]

    इससे आगे...

    देखिये दोस्ती वाली कुछ बात तो जरुर है आपमें ...आपने तय किया "ल" मुझसे पहले के चारों टिप्पणीकारों ने बोला क्या ? ...और मैंने भी केवल उदाहरण के लिए बोला है फिर भी एक रुपया जमा मानिये :)
    हाँ तो आगे क्या हुआ ?

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  5. नया आईडिया ...बहुत रुचिकर रही अब तक की कहानी ...!

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  6. क्या साबजी कैसी मगनता से बड़ते बड़ते जैसे ही चिरिया हाथ आने को थी की उड़ गयी फुर्रर्रर्र >>>>>>>> अब्कै तो बेगा आज्यो घणी देर सहन कोणी होवल्यी सा>>>>>>>>>>>>>>>

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  7. अर ये ’क’, ’म’ या ’ल’ सूँ पिरारम्भ होबाली गाल्याँ कुण कुण सी है, जरा म्हांने भी तो सम्झाज्यो.......... :-)))

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  8. अगली कडी का बेसब्री से इंतजार है
    आशा है इस पोस्ट से ज्यादा नमकीन होगी

    प्रणाम

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  9. मज़ेदार और कौतुक भरा संस्मरण! देखा ’ल’ नहीं कहा न!!!!

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  10. बात तो सही है कि आदमी पहली नौकरी और पहला प्यार नहीं भूलता.... मेरी पहली नौकरी वर्ल्ड बैंक में थी.... बहुत खुश हुआ था कि साढ़े इक्कीस साल में ३००० लोगों को पछाड़ कर .... एक पोस्ट के लिए सेलेक्शन लिया था.... असिस्टैंट प्रोजेक्ट मेनेजर ..... के रूप में.... और प्रेमिकाओं का तो कहना ही क्या.... इतनी लड़की मेरी ज़िन्दगी में आई हैं.... कि अब तो हिसाब ही रखना छोड़ दिया.... जहाँ देखता था कि लड़की शादी के झंझट में पड़ने वाली है.... तो भागना पड़ता था.... हे हे हे .....मैंने तो इतनी लड़कियों से प्यार किया है.... कि अब तो कुछ होता भी नहीं.... हाँ! यह है कि अब्ब भी आदत गई नहीं है.... मैं तो हर लड़की से यही कहता था और हूँ भी कि तुम ही मेरा पहला और आखरी प्यार हो.... अब भाई अपनी पर्सनैल्टी पे घमंड जो है इतना.... अब तो बढती उम्र का टेंशन हो रहा है.... फिर भी जो भी करेंगे ....चालीस के बाद ही.... और चालीस में तो फिलहाल टाइम है.... तब तक के .... अपना टहलाना जारी है और रहेगा.... शुरुआत ही ग़ज़ब कर देते हैं आप तो.... कि मन की बात निकालनी ही पड़ती है.... और संस्मरण इतना अच्छा लिख देते हैं कि अपनी ही यादों में चले जाते हैं.....

    फत्तू .... (फट्टू नहीं....).... कहाँ गया है आजकल ? बहुत मिस कर रहे हैं फत्तू को....

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  11. किस मुँह से और कितनी तारीफ करुँ आपकी लेखन शैली की नहीं पता सर.. आपको पढ़ना आनंद दायक और तकलीफ दायक दोनों हे होता हिया.. अब आप कहेंगे कि विरोधाभाषी बातें कैसे?? तो सच यही है सरकार कि आपको पढ़कर जो आनंद मिलता है वो बयाँ नहीं कर सकता और आजकल जो समय की कमी और अंतर्जाल की गड़बड़ी है उसकी वजह से पढ़ नहीं पा रहा .. इस लिए तकलीफ होती है कि जाने कितने सुन्दर लेख पढ़ने से रह गए.. :(

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  12. आपका अंदाजे बयां लाजवाब कर गया, बधाई तो बनती है भाई। स्वीकारिए।
    ................
    अपने ब्लॉग पर 8-10 विजि़टर्स हमेशा ऑनलाइन पाएँ।

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  13. @ फत्तू लगता है फिर कहीं किसी म और ब एक करने गया है :)
    हँसी रोके नहीं रुक रही। सोच रहा हूँ कि सतीश और संजय मिल कर लिखें तो क्या बात हो !

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