गुरुवार, दिसंबर 09, 2010

कोई चेहरा भूला सा....

उसने घड़ी देखी, साढे छह बजे थे अभी। खूब आराम से भी चले तो छह पचास वाली मैट्रो तो मिल ही जायेगी। चालीस मिनट का रास्ता इस स्टेशन से उसके  स्टेशन, दस मिनट आगे पैदल, यानि पौने आठ बजते न बजते घर पहुंच जायेगा। फ़िर छिन जायेगा अकेलापन उसका।

वो मैट्रो में चुपचाप आकर सीट पर बैठ गया। वही रोज का रूटीन, इंगलिश के अखबार से सुडोकू, हिंदी के अखबार से वर्ग-पहेली, ये हल करते करते रोज उसका स्टेशन आ जाता था  और वो जहमत से बच जाता था लोगों से औपचारिकता निभाने से। उसे बहुत अजीब लगते थे रोज रोज वही सवाल और वही जवाब।  बल्कि सवाल-जवाब ही उसे अजीब लगते थे, बहुत अजीब। कुछ सवाल थे जिनके जवाब नहीं और कुछ ऐसे जवाब थे जिनका कोई सवाल हो ही नहीं सकता था।

आज की सुडोकू 5 स्टार्स वाली थी, खासी मुश्किल लेकिन इसीमें मजा आता है उसे, मुश्किल काम करने में ही, सो पूरी तन्मयता से लगा हुआ था कागजी सुडोकू हल करने में। “एक्सक्यूज़ मी, अंकल आप का नाम सुशांत है न?”  चौंक कर उसने चेहरा अखबार से ऊपर उठाया तो एक आठ नौ साल की लड़की अपनी आंखों में एक मासूम सवाल लिये खड़ी थी। बच्ची के चेहरे पर नजरें जम ही गई थीं जैसे उसकी। कहाँ देखे हैं ऐसे नैन-नक्श इतने करीब से, कहाँ? शायद जब भी आईना देखा हो उसने, ऐसा ही अक्स दिखता हो।  खुद पर गुस्सा भी आ रहा था उसे कि ऐसा भी क्या अनमनापन कि अपनी सूरत  भी कभी अनजानी सी लगती है उसे और आज इस बच्ची की शक्ल में अपनी सूरत ही तो नहीं दिख रही कहीं?   जब बच्ची ने दोबारा वही पूछा तो उसने आसपास बैठी सवारियों की तरफ़ देखा, कौन है इस खूबसूरत बच्ची के साथ?

उसे लगा जैसे एक जोड़ी आंखें उसके चेहरे पर नजर जमाये हैं, सामने वाली सीट पर उसकी नजर गई तो फ़िर वहाँ से हटी नहीं। वही दिलफ़रेब चेहरा,   वही सितमगर आंखे और चेहरे पर पसरा वही तिलिस्मी सूनापन जो खामोश आवाजें लगाकर उसे खींचता रहा था अपनी ओर।  नौ साल के समय ने उसके अपने चेहरे का भूगोल बेशक बदल दिया था लेकिन शायद उस तिलिस्म में घुसने की हिम्मत वक्त भी नहीं कर सका था। अबकी बार बच्ची ने मानो उसे झकझोरते हुये  फ़िर पूछा, “अंकल. बताईये न आप का नाम सुशांत ही है न? मम्मी ने पूछा है।” वो जैसे नीम बेहोशी की हालत में था, “बेटा, मम्मी को कह देना कि सुशांत को खोये हुये नौ साल बीत चुके हैं। मुझे भी उसकी तलाश है, लेकिन वो शायद अब नहीं मिलेगा।”

बाहर देखा तो उसके स्टेशन से पहला स्टेशन आ गया था। घर की दूरी यहाँ से तीन किलोमीटर थी, गनीमत है कि रास्ता ज्यादा रोशन. ज्यादा चलता हुआ नहीं था।   एक झटके से सीट छोड़ दी थी  उसने। गाड़ी रुकने से पहले वो पलटा, बच्ची के माथे को चूमा और उसके सर पर हाथ फ़ेरा, भगवान से शायद सब खुशियाँ उस बच्ची के लिये मांगी और बाहर निकल गया।

सर्दियों की पहली बारिश, लोग रुकने का इंतज़ार कर रहे थे और वो स्टेशन से बाहर निकल आया। कितना डरते हैं लोग भीगने से, बीमार होने से, जैसे भीगने से बचना ही जिंदगी का सबसे बड़ा काम हो। बीच बीच में बालों में हाथ फ़ेर रहा था और ऊपर बादलों को देख रहा था बहुत हसरत से, कि कहीं रास्ता तय करने से पहले उनका  पानी खत्म न हो जाए।

घर में घुसा तो माँ उसे देखकर चौंक गई, “क्यों भीगा सर्दी में, घर ही तो आना था तो बारिश रुकने का इंतजार कर लेता। और तेरी आंखें कैसे लाल हो रही हैं जैसे रोकर हटा हो अभी?”  वो हंस रहा था, “मैं और रोया होऊँ? क्या माँ, तुम भी बस्स। आंख में कुछ गिर गया है शायद।” और फ़िर से हँस दिया था वो हमेशा की तरह, वादा भी आखिर कोई चीज होता है।

55 टिप्‍पणियां:

  1. संजय बाऊ जी! अभी तक तो हाथ मिलाते ही उँगलियाँ चुरा लेते थे, अब ख़्याल मिलते ही कहानियाँ चुराने लगे!! मेरी कहानी “अजनबी”, करीब 1982 के आस पास लिखी, आज मेरे दिमाग़ से गुज़र गई. आज तक कभी ब्लॉग पर कहानी (यहाँ तक कि लघुकथा भी) लिखने का साहस नहीं हुआ, इसलिए यह भी नहीं कह सकता कि जब पोस्ट करूँगा तो आप पढ़ लेना. बस यकीन कर लो आप!!
    ख़यालों की बिल्कुल ऐसी हेड ऑन टक्कर कभी नहीं देखी. जब इतना कह दिया तो पोस्ट के बारे में कुछ भी नहीं रहता कहने को. फत्तू कि गैरहाज़िरी वाजिब थी, क्योंकि बारिश का बहाना बनाना तो उसके सामने असम्भव होता! शंकर जयकिशन का तो जो भी गाना लगा दो, छू लेता है दिल को, यह तो मौसम के अनुसार था. वैसे आज लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है ज़्यादा जँचता!

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  2. film ke scene ki tarah lagi ye post. singh is king mein bhi aisa ek kirdaar tha, poorani kai filmo mein to bharmaar hai... aapke likhne ka andaaz yahan screenplay ki tarah hai...mujhe pata nahi ye kahani aapke dimaag mein kyun upaji...kahan se ye vichaar aaya janab?

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  3. @"चला बिहारी जी"
    कमाल है, आपने तो मेरे लिखने से पहले ही मेरी टिप्पणी भी चुरा ली। यकीन न हो तो एक पक्की गवाही दिलवा सकता हूँ। पूरी कहानी में मेरी 1981 से अब तक अधलिखी कहानी से सिर्फ एक बात का फर्क है। [मेरा नायक बारिश में हैट लगा लेता है - 9 साल में बाल काफी कम रह गये हैं ;)]

    इत्तेफाक़ अक्सर होते हैं - कभी-कभी गज़ब के इत्त्फाक़ भी होते हैं।

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  4. सुबह सुबह सेंटी कर दिए।
    @
    गनीमत है कि रास्ता ज्यादा रोशन. ज्यादा चलता हुआ नहीं था।
    रोशन और चलता हुआ होता तो क्या न उतरता?

    कमाल है! प्रेमपत्र की इस बार की कड़ी में मनु भी छत पर भीगा है।

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  5. बदले हुए मौसम में मिजाज भी थोड़ा बदला सा.

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  6. आज क्यूँ मिजाज बदला सा है

    क्या बात है भाई, आज की इस्टोरी में ये उदासिपन क्यूँ ? और फत्तू महाराज कहाँ गए ?
    गाने में भी वही ? कोई याद आ रही है शायद :)

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  7. लगता है फत्तू कहानी पढ़ रहा है।
    ..घबड़ाइए नहीं, मैं इस कहानी के अपने होने का दावा नहीं करूंगा। इधर का हाल तो ठीक उल्टा है।

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  8. @ चला बिहारी......:
    सलिल भैया, यकीन न करने की कोई बात ही नहीं है। मैं खुश हूँ कि आपकी वो कथा कहीं छपी नहीं है या मैंने देखी नहीं है, नहीं तो मुझे ही अपराधबोध होता। पहले एक बार ऐसी दुविधा का सामना कर चुका हूँ, हालांकि जिनके सम्मुख शर्मिंदा हो सकता था, उन्होंने(अनुराग शर्मा जी) खुद ही सदाशयता से इस बात की तसदीक की थी कि अलग अलग समय पर अलग अलग व्यक्तियों के दिमाग में एक जैसे विचार, आईडिया आ सकते हैं। जो गाना आपने सजेस्ट किया है, वो मेरी प्रायोरिटी में दूसरे नंबर पर था, नहीं लगाया तो सिर्फ़ इसलिये कि अपनी एक पोस्ट पर पहले लगा चुका हूँ, मेरा फ़ेवरेट सांग है वो भी। वैसे आज जो लगाया है, वो आज की लिस्ट में तीसरे नंबर पर था।

    @ आनंद राठौर:
    मैं फ़िल्म बहुत कम देखता हूँ आनंद, हाँ आपके कमेंट के बाद ’सिंह इज़ किंग’ का किरदार याद आ गया क्योंकि यह फ़िल्म देख रखी है, लेकिन लिखते समय कहीं ख्वाबो-ख्याल नहीं था उसका। नहीं मालूम दोस्त, कहाँ से विचार आया ये।

    @ स्मार्ट इंडियन:
    हा हा हा, फ़िर से वही कापीकैट वाली बात हो गई मेरे साथ। गज़ब इत्तेफ़ाक ही है, और सही में एकदम।

    @ गिरिजेश राव:
    रोशन और चलते हुये रास्ते पर हम ही न उतरते, बाकी सब तो वैसेइच रहता।

    @ राहुल सिंह जी:
    सरजी, वो गाना है न-
    यहाँ मौसम हर एक पल में बदल जाये,
    प्यास कभी मिटती नहीं एक बूंद भी मिलती नहीं,
    और कभी रिमझिम घटायें पीछा करती हैं -
    मौसम तो वैसे भी आते जाते हैं, और ये तो हिंदुस्तानी मौसम है जी, बदलता रहता है:)

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  9. बेहद भावुक ...ख्यालों में जाने को मजबूर करती यह कहानी बहुत अच्छी लगी ! शुभकामनायें संजय !

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  10. कही सुना था कि इस तरह पहेलियाँ हल करने वाले लोंग पलायनवादी होते हैं ...

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  11. bahut badhiya kahaani...bhaavuk kar deti hai.aabhaar.

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  12. ये लघु कथा अच्छी लगी पर टिप्पणियां पढ़कर लगा कि एक कहावत थोडा सा परिवर्तन करना पड़ेगा. वो कहते हैं ना कि दो बदमाश एक सा सोचते हैं पर लगता है अब कहना पड़ेगा कि कई बदमाश एक सा सोचते हैं.
    अब एक चिन्ह भी लगा दू ताकि मामला रफा दफा हो जाय... :)

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  13. ये बेरिअर पहले तो नहीं हुआ करता था इस राह में......and i think the traffic was also smooth and free flowing....

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  14. speechless...!!

    hote hain, kabhi kabhi mujh jaise bakbaki bhi speechless hote hain...

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  15. कौन थी !!!!! कब छूटी !!!!! और वो बच्ची किसकी थी ???? क्योंकि आपने कहा की आपकी शकल उस आईने में दिख रही थी ( अजी बच्चे साफ़ आइने ही तो होते है ) ................ और जे छत्तीस अंकल भी यादों के झरोके में ना जाने खिसको याद कर रहे है :)................ताई को खे दूंगा तो सारे झरोके बालकोनी बिलागिंग धरी रै जाएगी................... अर आप जे किस्से किसी और का नाम ले कर क्यों परोसते हो,,,,,,,, साब मरदजात हो हिम्मते मर्दा दिखाओ कभी ( फिर मैं देखूंगा काकी के सामने ये मरद कैसे दरद से फद्फदायेगा :))) )

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  16. speechless...!

    hote hain... mujh jaise bakbaki bhi speechless hote hain

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  17. .

    आदरणीय संजय जी,
    मुझे आपकी इस कथा में 'निर्मल वर्मा' झाँकते नज़र आये.
    आपकी लेखन शैली 'यात्रा-वृत्तांत' 'संस्मरण' और 'रेखाचित्र' गढ़ने में माहिर है.
    आपको शायद न पता हो, आप बेशक अपनी मौज में लिखते हों,
    लेकिन यह सच है कि आपमें एक बड़े साहित्यकार के गुण हैं.
    आपके लेखन से मुझे प्रेरणा मिलती है.

    .

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  18. @अलग अलग समय पर अलग अलग व्यक्तियों के दिमाग में एक जैसे विचार, आईडिया आ सकते हैं |

    बिल्कूल ऐसा होता है आज से १५ साल पहले मैंने अपनी एक कहानी ( आप की नहीं दूसरी ) अपनी बहन को सुनाई उसके ५-६ साल बाद वही कहानी हमारा भाई हमें सुनाने लगा अपनी कह कर उसे भी थोड लिखने का शौक था हम बहने हँस पड़े पर हम निश्चिन्त थे की उसने मेरी कहानी दोहराई नहीं थी क्योकि उसने मेरी कहानी सुनी नहीं थी और उस समय वो काफी छोटा भी था | आज से चार साल पहले हम तीनो फिर एक बार हसे जब हमने उसी कहानी पर एक नहीं दो फिल्मे बनी देखी | दो बार तो ऐसा हुआ की मेरी पोस्ट आधी ही थी की किसी और की पोस्ट देख कर लगा की इन लोगों ने तो मेरी ही पोस्ट विचार चुरा लिए है |

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  19. कहानी अच्छी लगी पर पता नहीं क्यों ऐसी सारी कहानिया मुझे अधूरी सी लगती है लगता है की ये अभी ख़त्म नहीं हुई है | बस वही वाली फिलिंग आती है कि पिक्चर अभी बाकि है | लाल पत्थर फिल्म भी किसी दुखांत अंत वाली नावेल पर ही बनी थी जिसे समझना थोडा मुश्किल था पर फिल्म में हेमा जी गजब की खुबसूरत लगती है गाना तो अच्छा है ही |

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  20. कुछ लम्हें जिन्हें मैं भूलना चाहता हूँ, क्यों याद दिलाते हैं जी आप
    कोई कहता है मेरी कहानी चुरा ली, कोई कहता है टिप्पणी चुरा ली और कोई स्क्रिप्ट अपनी बता रहा है। मेरा आरोप भी झेलो ये मेरी जिन्दगी की कथा है, जो आपने सबको सुना दी :)

    प्रणाम

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  21. कहानी और उसका ट्रीटमेंट अच्‍छा है।

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  22. छोटी सी, दिल को छूनेवाली कहानी। बधाई।

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  23. वादा निभाने मे भीग जाना भी खुशनसीबी है।

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  24. @ Indranil Bhattarcharjee:
    1.जाने क्यों.. २.जाने कहाँ? ३.हाँ जी ४.ना जी। हा हा हा,

    @ देवेन्द्र पांडेय:
    धन्यवाद बेचैन आत्मा जी, अभयदान हेतु:)

    @ सतीश सक्सेना जी:
    शुभकामनाओं हेतु शुक्रिया, सक्सेना साहब।

    @ वाणी गीत:
    सही ही सुना होगा जी आपने, एकदम सही।

    @ अरविन्द:
    धन्यवाद अरविन्द जी।

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  25. @ विचार शून्य:
    बन्धु, ये चिन्ह हर जगह कामयाब हो जायेगा ना? फ़िर तो मौजां ही मौजां.....
    & dearest, the traffic is free & smooth flowing, once again. thanx.

    @ saanjh:
    ye paap bhi hamaare sar hi aayega:)

    @ अमित शर्मा:
    हम तो यार तुम्हारे चक्कर में दुनिया से पंगा लेने को तैयार हैं और तुम हमारी ही रोटी-वोटी सब बंद करवाने पर तुले हो। अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का...। भगवन, जिस दिन पांव धर दिये न तुम्हारी गुलाबी नगरी में, सर्टिफ़िकेट की जरूरत तुम्हें न पड़ जाये कहीं, बता दिया है:)

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  26. आज सुबह सुबह ही फ़त्तू मेरे धौरै आया था. कह रहा था आज उधर जरा सेंटि कामकाज चल रहा है ताऊ, आज तो मैं तेरे धौरे ही रहूंगा.:) भाई जरा संभलिये...फ़त्तू नै वापस भेज दिया सै समझा बुझाकै.

    रामराम.

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  27. क्या कमाल है! दुनिया उदास भी नही होने देती। खुश होना तो हमेशा से दुनिया को तकलीफ़ देता है!

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  28. @ प्रतुल वशिष्ठ:
    इतना जुल्म मत करिये दोस्त, कहीं भूल से मैं न समझ बैठूं... हा हा हा।

    @ Anshumala ji:
    ये पोस्ट वाला मामला हमारे साथ भी हो चुका है कई बार। और अंशुमाला जी, अपना मानना है कि जो कहानी अधूरी रह गई,वही ठीक है, पता नहीं क्यों, शायद पलायनवादी हूं मैं:)

    @ अन्तर सोहिल:
    झेलेंगे दोस्त, आखिर दोस्त हैं हम:)

    @ राजेश उत्साही:
    धन्यवाद, आपकी हर टिप्पणी मुझे बल देती है।

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  29. कैसे लिखूँ? और अगर आप कहेंगे कि हाथ से लिखो... तो क्या लिखूँ?
    "वादा भी आखिर कोई चीज होता है।" इस पर वही तिलिस्मी सूनापन, बारिश का शुक्रिया तो जैसे सब पर बनता है.

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  30. @ डा. अजीत गुप्ता जी:
    धन्यवाद मैडम।

    @ प्रवीण पण्डेय जी:
    सही कहते हैं जी आप।

    @ ताऊ रामपुरिया:
    ताऊ, थम और आयेओड़ ने लौटा दो,बात हजम नहीं हुई:)
    फ़त्तू नै शरण दे देनी चाहिये थी, खैर, देखी जायेगी, जब मिल बैठेंगे हम दो - फ़त्तू और मैं।
    राम राम।

    @ ktheLeo:
    देख लो जी, कैसे दुश्मन हैं सारे। कोई मर्दानगी को चैलेंज दे रहा है, कोई आरोप लगा रहा है। मजा-सा नहीं आने देते ये, है न?

    @ अविनाश चन्द्र:
    राज्जा, तुम तो जो भी लिख दोगे, अपने को पसंद आना ही है।

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  31. पिछली बार आपने हमारे पोस्ट पर नमकहराम फ़िल्म का एक डायलॉग चिपकाया था.. ह्रिषि दा की एक बात आज आप के लिए... फिल्म आनंद सेः
    हर आदमी एक ट्रांसमिटर होता है और उसके अंदर से वेव्स निकलती हैं, उसे तलाश होती है एक ऐसे आदमी की जो उन वेव्स को रिसीव कर सके… उस आदमी के अंदर से कोई वेव निकली और मैंने उसे पकड़ लिया, वही तो है मुरारीलाल!
    ये मुरारीलाल पूरी फ़िल्म में कहीं नहीं था और पूरी फ़िल्म में छाया हुआ था. आज तीन तीन मुरारीलाल दिकाई दे गए.. दिल्ली, पंजाब और अमेरिका (?) में...

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  32. ... bahut badhiyaa ... prabhaavashaalee lekhan ... behatreen !!!

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  33. संजय जी, कहानी बहुत ही सुंदर और मार्मिक तथा गहरे एहसास से भरी है. सुंदर रचना. .......

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  34. संजय जी,
    कथानक की भाषा, शैली, प्रवाह और भाव अपनी पराकाष्ठा पर लगे...
    कहानी के पात्र का निर्णय बेशक दुविधा में डालता है, परन्तु सब कुछ दुनिया में 'सही' नहीं होता...मैं सही-ग़लत के विवाद में नहीं पड़ना चाहती,
    कहानीकार ने पात्र के मनोभावों को बहुत कम शब्दों में उकेरने की चेष्टा की है...और इस काम में आप पूरी तरह सफल हुए हैं...बेशक उसका निर्णय पलायवाद की तरफ इंगित करता है, परन्तु पाठकों की सहानुभूति अप्रत्यक्ष रूप से बटोर पाने में वो सफल है...शायद कारण यह हो कि इस निर्णय की वजह, अन्त तक सस्पेंस ही बना रहा ...
    अस्तु...कहानी भाषा के हिसाब से अत्युत्तम लगी...
    आभार स्वीकार कीजिये...!

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  35. kya pratikriya ho saktee hai............
    jeendgee ke kuch mod khud hee uljhe se lagte hai......
    shayad iseese bhatkan naseeb hotee hai........

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  36. संजय जी, आज एक शब्द....आह-वाह

    कहाँ छिपा रखा है ये कला-कौशल.

    भाई आज आपके मुरीद होने पर गर्व सा हो रहा है.

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  37. @ मजा-सा नहीं आने देते ये, है न?
    # sorry uncle :-((

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  38. सर जी…

    अपने को तो पूरी कहानी का सार बस इसी एक पन्क्ति में नज़र आ गया…… "वादा भी आखिर कोई चीज होता है।" बस इसी को साथ लिये जा रहा हूँ।

    किसी भी कथ्य की सबसे बडी बात यही होती है कि कितना कहा गया है और कितना अनकहा छोड़ दिया गया है। वही अनकहा हिस्सा पाठक के अवचेतन में उस के साथ रह जाता है। आपकी कहानी भी ऐसे ही मेरे साथ रहेगी।

    नमन!

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  39. भाई साहब प्रणाम,
    देरी के लिये माफी (दो दिन से नेट बंद पडा है अभी भी एक मोबाईल मांग कर काम चला रहा हूँ)
    कहानी बहुत भावुक करने वाली है। “वादा भी कोई चीज होता है “
    इस वादे ने मारा,
    आज फत्तु आता तो उसकी भी आँखे नम होती

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  40. @ सम्वेदना के स्वर:
    दिल्ली, अमरीका वाले बड़े मुरारीलालों में पंजाब के छुटभैये मुरारीलाल को क्यों घसीटते हो जी?

    @ उदय:
    शुक्रिया, उदय जी।

    @ उपेन्द्र:
    उपेन्द्र भाई, आभारी हूँ आपका।

    @ अदा जी:
    आपका विवादों से दूर रहने का निर्णय स्वागतयोग्य है। कहानी जैसी बन पाई, लिख दी। आप लोगों का स्नेह है, प्यार है, कि सहानुभूति मिल गई नायक को, पलायनवादी(?) होने के बावजूद।
    वैसे पलायनवादी का सर्टिफ़िकेट देने में आपने अपनी सखी की खूब ताल से ताल मिलाई:)

    @ Apnatva:
    भटकन, उलझन, जीवन.. सब एक ही तो हैं, शुक्रिया सरिता मैडम।

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  41. @ दीपक बाबा:
    मुरीद? भाई जी, बाबा कौन है हमारे में? मजाक करते हो यार...

    @ अमित शर्मा:
    अपना मेल बाक्स चैक करो। बड़े आये सारी बोलने वाले:)

    @ रवि शंकर:
    रवि, तुम इस को लेकर बहुत बेहतर लिखोगे कभी, मुझे यकीन है।

    @ दीपक सैनी:
    कहा था प्यारे, ब्लॉगिंग मंगता बना देती है:) शुक्रिया दीपक, खूबसूरत प्रतिक्रिया के लिये।

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  42. ओह...रे फत्तू तू कहां हो लिया रे !

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  43. बच्ची के मम्मी के साथ बड़ी बेइंसाफी हुई.

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  44. डर लगता है इस कहानी का नायक ना बन जाऊ मैं .आज से मेट्रो मे तो नही बैठुंगा .

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  45. छोटी सी कहानी मे एक ज़िन्दगी समेट दी। मगर ये वादा कितना बडा है कहने मे पूरा जीवन लग जायेगा। दिल को छू गयी कहानी। शुभकामनायें।

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  46. ओह अफ़सोस... आपके अलावा इस ट्रेजडी से 'चला बिहारी जी' और 'स्मार्ट इन्डियन साहब' भी दो चार हो चुके हैं !


    [ ससुरा इस मामले में स्माइली लगाना भी रिस्की लग रहा है ]

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  47. @अली साः
    मैंने ऐसा तो नहीं कहा था!!!

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  48. @ काजल कुमार जी:
    फ़त्तू कम बैक करेगा जी, पक्का:)

    @ सुब्रमणियन साहब:
    आपका फ़ैसला सर माथे पर।

    @ धीरू सिंह जी:
    हा हा हा, देखा डर गये बड़े बड़े ब्लॉगर भी..

    @ निर्मला कपिला जी:
    शुक्रिया मैडम जी।

    @ अली साहब:
    अली साहब, अतिशयोक्ति कर गये। असली ट्रैजेडी वालों के साथ हम दो चार हुये हैं - सबजैक्ट और प्रैडिकेट इंटरचेंज कर दिये आपने, और फ़िर स्माईली भी नहीं लगाया ससुरा, हम दो लगा देते हैं :) :)
    वैसे सलिल भैया की ओब्जैक्शन नोट करिये आप..

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  49. शायद नौ दस साल बाद हम भी लिखें :)

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  50. संजय जी,
    कई दिनों में लौटा हूँ . आपने तो कमाल ही कर डाला इस बीच !
    अपना फत्तू ही सही है इस मामले में , न कभी खोया न कभी ढूँढा किसी को .

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  51. @ चला बिहारी.....:
    क्या सलिल भैया, डर गये क्या बदनामी से? साड्डे नाल रहोगे ते ऐसे ही नाम कमाओगे:)

    @ अभिषेक ओझा:
    सही सबक सीखा है, जीनियस...

    @ prkant:
    प्रोफ़ैसर साहब, कमाल तो पुराना है - हाईकमान से मंजूरी अब जाके मिली थी, वो क्या कहते हैं उसे ’अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’
    चलो, आपने तो फ़त्तू को सही माना, शुक्रिया।

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  52. दादा इस कहानी को पढ़कर मुग्ध हो गया। आप की लेखनी के इस आयाम से भी परिचित हो गया। :)

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  53. खयालो में खो गया हूँ पड़कर

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  54. हम जीते हैं इन्हीं पलों को लेकिन उतार नहीं पाते उसे शब्दों में दिल को छू गई बच्ची की बातें और आँखों का लाल होना . भाई जी आपकी ईमानदारी को लाख लाख प्रणाम

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  55. अर्चना जी ने आज फिर यह कहानी पढ़वा दिया। कमेंटस् भी।

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