शनिवार, जून 02, 2012

हो रहा निर्माण-उत्थान .....


एक हमारा वैरी बैस्ट फ्रैंड रहा है 'राजा बाबू ', अरे वही जिसका जिक्र पुरानी कई पोस्ट में कर चुका हूँ, शायद याद होगा आपको| बैंक में एक ही साथ भर्ती हुए थे हम और शुरुआती पोस्टिंग एक ही ब्रांच में थी| वो राजस्थान के एक खाते पीते राजपूत परिवार से था और आठवीं कक्षा से ही पढाई के सिलसिले में परिवार से दूर जयपुर में एक कमरा किराए पर लेकर रहता था| शुरू से ही अकेले रहने के कारण लगभग हर क्षेत्र में स्वावलंबी था और चूंकि हम बाईस साल की उम्र में घर से पहली बार अकेले रहने को निकले थे तो तीन चार साल के साथ में बहुत कुछ राजा की बदौलत सीखा| कुछ मामलों में वो हमारा लोहा मानता था और बदले में हम हर मामले में उसका लोहा-लक्कड मानते थे, क्योंकि बाह्य मोर्चे पर शुरू से ही हमारा सिद्धांत रहा है कि 'जियो और जीने दो' 'पियो और पीने दो' वगैरह वगैरह| एक बात और स्पष्ट कर दें कि खाने की जगह पर पीने और पीने देने की बात महज इस सावधानी के चलते कही है कि कहीं अन्ना टीम अपने तोपखाने का मुंह इस वजह से हमारी तरफ न खोल दे| यूं भी आरोप बड़े बड़ों पर लगते और लगवाये जाते हैं और घेरे में आ जाते हैं हम जैसे छुटभैये तो सावधानी बरतने में कोई बुराई नहीं है, वैसे भी आई.पी.एल., आई.पिल्ल का ज़माना है|

राजा की कई बातें उस समय हमें अजीब लगा करती थीं, लेकिन मैंने महसूस किया कि उसकी बातें थोथी बात न होकर तजुर्बों का नतीजा था| खैर ज्यादा ज्ञान झाडने का अपना भी मूड नहीं है एकाध टाईमपास किस्सा सुनाते हैं| सुनने के कोई पैसे नहीं है यारों, तुम्हारा कुछ न बिगडेगा और हमारे ठण्ड पड़ जायेगी| एकाध ऐसा भी है हमारा यार जिसे 'मज़ा सा' भी आ सकता है| 

'कीमत चुकता' में अपने राजा बाबू के जिन मकान मालिक साहब का जिक्र किया था, वे एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे| बहुत रौबीला चेहरा था उनका, आवाज भी दमदार थी लेकिन बोलते बहुत गिना चुना थे और हँसते हुए तो कभी दिखे ही नहीं| यहाँ तक कि जब मास्टरनी जी आसपास नहीं होती थी, तब भी नहीं हँसते थे| वैसे देखने में जैसे भी लगते हों, थे बड़े ही सज्जन आदमी| यूं भी रौबदाब वाले लोगों को सज्जन बताना ही पड़ता है, दुनिया का दस्तूर ही यही है| जब भी छुट्टी वाले दिन उनके घर जाना होता था तो हर बार कहते थे कि 'का संजय जी, कछु पहले नहीं आ सकते थे? अभी हाल कलेवा करके हटे हैं हम, पहले आ जाते यार थोड़ा सा?' पहली बार सुना तो मुझे लगा कि शायद उनका मतलब ये है कि मैं समय से पहुँच जाता तो मेरा ही कलेवा कर जाते, जो न कर पाने का अफसोस व्यक्त कर रहे हैं| फिर कहते, "चलो कोइ बात नहीं, फिर कभी सही|' हम भी सत्वचन कहकर उस घड़ी को टाल देते| ये डायलाग हर छुट्टी वाले दिन दोहराए जाते, और उसके बाद जम जाते हम लोग बावन पत्ते के खेल में| हम सब चहकते रहते और मास्साब चुपचाप खेलते रहते| नाक के किनारे तक आये चश्मे के ऊपर से झांकती उनकी आँखें हम सबका गहन निरीक्षण करती रहती और हमें हमेशा कन्हैयालाल की याद आ जाती| | 

एक दिन सीप खेल रहे थे और पत्ते बांटे गए| पत्ते मैंने ही बांटे थे और उस दिन कितनी ही देर तक वो मुझे चश्मे के ऊपर से बहुत कहर भरी नजरों से देखते रहे, तो कुछ अजीब सा लग रहा था| जब उनकी बारी आयी तो फिर वही काम, पत्ते देखें और मुझे देखें, फिर से पत्ते देखें और मुझे देखें| काफी देर तक ऐसा चलता रहा तो मैंने कहा, 'चलिए मास्साब, चाल चलिए |' बहुत कम बोलने वाले मास्साब ने फिर वही क्रिया दोहराई, मैंने फिर से कहा तो गुस्से में, खीझ में अपनी रौबीली आवाज में बोले, "खेलें क्या, घंटा? ये पत्ते दिए हैं?" कहकर सबके सामने अपने पत्ते पलट दिए, वाकई सब पत्ते आठ या आठ से नीचे नीचे के थे| जो नहीं जानते हैं, उन्हें बता दें कि सीप एक ऐसा खेल है जिसमें नौ या नौ से बडे पत्ते का ही घर बनाया जाता है| उनका स्टाईल से कहा गया 'घंटा' शब्द घंटा, दिन, महीना नहीं सारी उम्र हम दोस्तों को याद रहेगा| उस समय के मौजूद दोस्तों से अब भी कभी बात मुलाक़ात होती है तो एकाध बार 'रुक यार' 'बैठ यार' कहने पर दूसरा बन्दा मास्टर साहब को और उनके स्टाईल को दोहरा कर वो वक्त याद कर ही लेते हैं, 'रुकें क्या, ...?  बैठें क्या, ....?'|

आज ऑफिस में एक महिला ग्राहक बैंक के काम से आई थी| मेरे साथ वाली सीट पर बैठे सहकर्मी से कुछ पूछ रही थी और काम में व्यस्त मेरा वो सहकर्मी उसे बोला, "कैशियर से पूछ लीजिए|" पहनावे, बोलचाल से हाई सोसाईटी प्रोफाईल दिखने वाली महिला बोली, "कैशियर इस बारे में क्या बतायेगा, घंटा? आप अभी आये हैं यहाँ , मैं जानती हूँ उसे|" सहकर्मी मुंह और नीचे करके काम में और ज्यादा व्यस्त हो गए और मैं? मैं तो खैर वाश रूम में चला गया था, शूगर चैक करवानी ही होगी :(

कई घंटे बीत चुके उस बात को, तबसे राजा की बातें याद आने लगी है| एक और बात वो कहा करता था कि शादी के बाद जैसे जैसे वक्त गुजरता जाता है पति पत्नी की आदतें, व्यवहार आपस में और ज्यादा, और ज्यादा मिलता जाता है| और तो और, शक्ल भी मिलने लगती है और बुढापा आते आते बहुत से पति पत्नी देखने में भाई-बहन लगने लगते हैं| उस समय ये बात सुनकर अजीब सा लगता था,  मजाक भी लगता था और वितृष्णा भी होती थी लेकिन बाद में देखा तो कई मामलों में वाकई ऐसा होता दिखता है| वजह सोचता हूँ तो यही लगता है कि जितना ज्यादा हम किसी के साथ संपर्क में रहते हैं, उतना ही उससे प्रभावित होते और उसे प्रभावित करते हैं फिर चाहे दो इंसान हों या दो संस्कृतियाँ, दो मजहब हों या दो राजनीतिक पार्टियां|  अगर जीवंत हैं तो शायद ऐसा होता ही होगा फिर रिश्ता चाहे कोई भी हो, व्यक्तिगत स्तर पर यह जल्दी दिखने लगता है लेकिन समष्टि स्तर पर धीरे धीरे|  अबके राजा से मिलूँगा तो उसकी एक्सपर्ट राय लूँगा इस मामले पर और उसे आज की बात भी बताऊँगा| खूब हँसेंगे हम दोनों और शायद गाना भी गायें, 'हो रहा भारत उत्थान, हो रहा भारत निर्माण'

शोले में वीरू इत्ता सीरियस होकर जय से बोलता है, "यार जय, मैंने कुछ सोचा है|" जय कहता है, "हाँ भाई, कभी कभी ये काम भी करना चाहिए|" तो जी हमने सोचा कि अपनी पसंद के फ़िल्मी गाने तो कई सुनवा चुके, आज कुछ और दिखाते हैं यूट्यूब के सौजन्य से - बोडी लैंग्वेज क्या कहती है? वीडियो पुराना है, उसके बाद से तो जमुना में और भी कीचड हो चुका है, वो क्या कहते हैं 'much water has flown in the river' :)

                                                   

56 टिप्‍पणियां:

  1. लोग बि‍न मतलब जाने ही कई शब्‍दों का प्रयोग करने लगते हैं, कई बार अपने आप को तीस मारखां साबि‍त करने के लि‍ए तो कई बार अपनी हीन भावनाओं को छुपाने के लि‍ए. महि‍ला का घंटाप्रवचन भी इसी प्रकार की प्रक्रि‍या के अंतर्गत आएगा ☺☺ इसी तरह एक वि‍ज्ञापन आता है आजकल जि‍समें 'इसकी तो ले लूं मैं' का प्रयोग हो रहा है. अलावा इसके 'मेरी तो फट ली' जैसी बातों का प्रयोग भी धड़ल्‍ले से हो रहा है. लेकि‍न कोई नहीं बोल रहा कि‍ राजा नंगा है...

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    1. कोई न बोले, इसीलिये तो चौतरफ़ा घेरेबंदी हो रही है काजल भाई। आपके इस कमेंट ने सप्ताह भर पहले सुने एक सीनियर के अनुभव की याद दिला दी जिसमें अपनी बीबीजी से ’क्यों, फ़ट गई बस्स?’ के जवाब में उन्होंने कन्टाप लगाने की चेतावनी दी थी और बदले में प्राईम टाईम के एक सीरियल का उदाहरण पाया था।
      खास तौर पर आज वाला आपका कमेंट मुझ ऊलजुलूल लिखने वाले के लिये बहुत बड़ा सम्मान है।
      आभार क्या दें,. ?

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  2. घंटाघर की दास्तान पर मुस्कुराकर रह गया.. कई बार तो मैंने भी यह मुहावरा प्रयोग किया है आवेश में!! दरसल कई बार कुछ शब्दों से एक्सप्रेशन में वज़न आ जाता है...
    साथ रहते रहते शक्ल मिलने वाली बात भी देखी है.. लेकिन यहाँ जो यू-ट्यूब से आपने दिखाया वो तो भारत निर्माण की अनोखी दास्तान कहता है!!
    मजेदार टिपिकल संजय मार्का पोस्ट!!

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    1. मिलियन टन कहें या ट्रिलियन टन या और भी जिसका , जितना मन करे वज़न जोड़ ले पर , इसके सामने सब हल्के :)

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    2. ओ हैवीवेट ब्लॉगरों,
      आप दोनों महारथियों के सामने मेरा क्या वजन और मेरी बात का क्या वजह्न, कहिये तो? स्नेहाकांक्षी हूँ और हमेशा रहूंगा।

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  3. जब बातें एहसास की हों तो लफ्ज़ कम पद जाते है और कम लफ़्ज़ों में ही बहुत कुछ कह जाते हैं .
    ता फिर शेष अनुभूति ................

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    1. और कभी कभी लफ्ज ही अहसासों को खा जाते हैं, सिंह साहब|

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  4. लगता है रस्‍ता भटक जाएंगे, किस किस गली मुहल्‍ले से गुजार लाते हैं, लेकिन हर बार कोई अपना पास-पड़ोस ही निकल आता है.

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    1. अब इस भटकन का तो क्या ईलाज है राहुल सर, मैं खुद बहुत अटका, भटका हूं लेकिन अपने संभाल लेते हैं हमेशा।

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  5. राग घंटद्ध्वनि पे आधारित इस बंदिश का संबंध उस्ताद-ए-मालिक-ए-मकान और बैंकर-ए-साहिब-ए-सामान और ग्राहक-ए-मोहतरमान के जुड़वां घरानों से है ! इसका तो ज़रा भी अंदाज़ ना था :)

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  6. संस्मरणों का मोजैक ..
    पति पत्नी वाली बात तो कई लोगों के दावों में है !

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    1. कई लोगों पर ही सही डाक्टर साहब, लागू हो ही जाता है।

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  7. अजीब संयोग रहा , जिस दिन किताब में पति- पत्नी के विचारों के मेल के बारे में पढ़ा था , उसी दिन डॉक्टर ने भी इसी बात का जिक्र किया ...वाकई हमेशा साथ रहने वालों की आदतों और व्यहार पर असर पड़ता ही है ! कुछ शब्द आदत में आ जाते हैं तो मुश्किल ही छूटते हैं , सामने वाला लाख पहलू बदलता रहे !

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    1. इसीलिये आदत बने, इससे पहले ही संभल जाना बेहतर है|

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    2. और वैसे भी किसी ने सही ही कहा है,
      "आदत कभी छूटती नहीं, और छूट जाये तो आदत नहीं!"

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  8. सही बात है, सोचने को कार्य भी करना चाहिये..

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  9. बुढ़ौती में जब पति पुरूष न रहे, पत्नी महिला न रहे तब 'भाई बहन जैसे लगते हैं' कहना ही शिष्टाचार है। अब उस महिला ग्राहक की तरह ये तो नहीं कह सकते.... "बुढ़ऊ क्या कर लेंगे..घंटा ?" इसीलिए आदरणीय मनमोहन सिंह जी के लिए लोग लोग आदरसूचक शब्दों का ही इस्तेमाल करते हैं। वैसे कहीं कहीं खिसिया कर घंटा बजाते भी देखे जाते हैं।:)

    ...यह सब ज्ञान पहले मुझे नहीं था। आपकी पोस्ट से हुआ। इसलिए आप गुरू (घंटाल) हुए।:)

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    1. और भी कई जन मजे लेते रहते हैं अपुन से, आप भी ले लो :)

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  10. वज़न शब्दावली से रौब गांठने की बराबरी के प्रलोभन में बंदिशों की अर्थ-सजगता विस्मृत हो जाती है।

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    1. ज्यादा सजगता दिखाने पर लोग आउट्डेटेड आईटम भी बता देते हैं सरजी।

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  11. बढ़िया विडियो... साफ दिखाता कि असली राजा कौन है!

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    1. ताजा वीडियो तो कुछ दिन पहले न्यूज़ में देखा था, उसकी क्लिपिंग नहीं मिली तो इस पुराने से काम चलाया है। नया मिल जाता तो और भी बढ़िया रिज़ल्ट दिखते।

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  12. अब इतना धांसू पोस्ट पढ़कर टिपियायें क्या ....?

    पति-पत्नी वाली बात पर अनूप सेठी जी की कविता याद आ गयी


    घिस घिस कर पति पत्नी भी सिल बत्ता हो जाते हैं

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    1. हमारी पोस्ट से आपको कुछ याद आया, लिखना वसूल हुआ| ऐसे ख़ूबसूरत लिंक मिलते रहे तो टिप्पणी बक्से का शीर्षक बदलना होगा, सेठीजी की कविता का रास्ता बताने के लिए अलग से धन्यवाद|

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  13. संजय जी जिस कार्य में लोगों को घंटा लगता है आप उसे मिनट में कर लेते हैं..........आपकी पोस्ट पढ़कर वास्तव में एक मिनट में जी खुश हो गया.
    शुभ कामनाएं आपको.
    जय हिंद !

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    1. बन्धु,
      इस कमेन्ट को देखकर हो सकता है एलोवेरा सप्लाई पार्टी न आ जाये:)
      जानता हूं दोस्त जब तुम वास्तव में कहते हो तो वास्तव में ही मतलब होता है तुम्हारा।
      जय हिंद!!

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  14. मेरा अनुमान है कि ‘घंटा‘ पर लिखा गया यह पहला आलेख है।
    मजेदार बातों के साथ आप जीवन के गंभीर यथार्थ भी आसानी से जोड़ देते हैं।

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    1. जो दिखता है, कभी कभी उसपर अपना नजरिया भर जाहिर कर देने की कोशिश करता हूं। जानता हूं कि ये बयार किसी के रोके रुकने वाली तो है नहीं, इसलिये कोई फ़ैसला नहीं सुनाता।
      आप मेरे लिखे में गंभीरता खोज लेते हैं, बड़प्पन है आपका।

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  15. :)
    जब मैं दूसरी में पढता था तो मेरा एक दोस्त हुआ करता था अशोक, उसे भी हर बात में घंटा कहने की आदात थी और वो जोर से कहता था राग के साथ।
    मास्टर साब का संस्मरण बहुत रोचक है, और ताश के खले का अच्छा बताया आपने, वरना ये सवाल सबसे पहले मुझे ही करना था। ताश में अनाड़ीपन मुझसे शुरू हो कर मुझ ही पर ख़त्म होता है।
    सामीप्य से खरबूजा बनना तो लाज़मी है ही।
    वीडियो में ब्रेकिंग न्यूज़ वाकई सही है, ब्रेकिंग है ये अलग बात है।

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    1. इस शब्द के अलग अलग मौके पर अलग अलग उच्चारण होते हैं, अब अशोक का तो धन्यवाद ही देना बनता है कि अग्रिम डेमो दे चुका है :)
      ताश में अनाड़ीपन होना एक प्लस प्वाईंट है दोस्त, एंजॉय दिस अनाड़ीपन। हमने माहिर होकर ही क्या कर लिया, ...?
      :)

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  16. pichle 3072 ghante se to haum aapke saanidhya me bitaye us 1 ghante ki yaden sanjoye baithe h .............. par pata nahi !!!!!! chaliye mail par hi kahta hu aage ki baat :(

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    1. क्या पता नहीं भाई?
      कह डालो जो कहना है, यहाँ या मेल में, जहां रुचे|

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  17. कुछ समझ नहीं आया
    अब क्या घंटा टिप्पणी करूं

    जै राम जी की

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  18. aaj aapka lekh padhkar apna bachpan yaad aa gaya..jab yah shabd kisi se suna ..bada dyanemic type ka laga..apni vocabulary me shamil kar liya....aaur phir jitnee teebrats se yah shabd muh se nikla usse bhee teji se ek tamacha gal per raseed kar diya pitaji ne....hamesha kee tarah aaj bhee anand hee anand..sadar badhayee aaur amantran ke sath

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    1. आशुतोष जी,
      उन्हीं परिवारों को, उन्हीं संस्कारों को याद करने का तरीका थी ये पोस्ट, जहां कुछ गलत होते ही संभाल\सुधार लिया जाता था| अभी न वैसे पिताजी रहे और पतिजी तो बिलकुल भी नहीं, काजल भाई का कमेन्ट और मेरा जवाब उसी पीड़ा को याद कर रहा है, बस आसपास के हाल देखकर खिसिया लेते हैं|
      आज भी कितनी ही नापसंदगी की बात हो, पिताजी के सामने(किसी अन्य के बारे में भी)ऐसा बोलने की हिम्मत हम भाईयों की नहीं है|
      आप का आमंत्रण सर माथे पर है सरकार|

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  19. अपने बहुत ही अच्छी तरह से और सयुक्त सब्दो को सजोया है मन पर्फुलित होगया यहाँ आके
    http://dineshpareek19.blogspot.in/2012/06/blog-post_04.html
    आप मेरे ब्लॉग पे आये इस से मेरा मन बड़ा ही खुश हुवा है आशा करता हूँ की आप आगे भी निरंतर आते रहेंगे
    आपका बहुत बहुत धयवाद
    दिनेश पारीक

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  20. एक 'घंटा' : ध्वनी-प्रदूषण
    एक 'घंटा' : समय-प्रदूषण
    एक 'घंटा' : वाणी-प्रदूषण :)
    वाणी-प्रदूषण का सार्थक संकेत करता आलेख!!
    निरामिष: शाकाहार संकल्प और पर्यावरण संरक्षण (पर्यावरण दिवस पर विशेष)

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  21. आपके इस 'घंटे' ने दिमाग की घंटी बजा दी..वीरू की तरह हम भी सोचने लगे और बसंती की तरह बकबकाने लगे हैं...

    युंकी, दिल्ली में जब हम थे तो लोगों को बहन की गाली, कोमा, सेमी कोलन की तरह यूज करते सुनते ही थे, मेरे एक कलीग थे गौरव कपूर उनके पिता ही उनको बहन की गाली देकर बात करते थे...वो भी सबके सामने :(

    युंकी आप इतने परेशान काहे हैं, ज़माना बदल रहा है, गुलज़ार साहब ने 'कमीने' को मान्यता (संजय बाबा वाली नहीं) दिलवा दी है, बस एक गाने का सवाल है बाबा जी , गुलजार साहब,समीर साहब के बच्चे जियें...एक 'घंटा मय' गीत लिख देंगे, करीना, कटरीना, महिमा ठुमका लगा देंगी, तो फिर आप भी सुर में गायेंगे..ये जो------हैSSSSS

    और एक बात, आज-कल मुझे लोग मेरे पति के नाम से बुलाने लगे हैं, लोग कहते हैं, बहुते कन्फ़ुसियन हो रहा है उनको, और हम सोच रहे हैं, कि इतनी बेकार शकल तो थी नहीं हमरी :):)

    हाँ नहीं तो..!!

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  22. कमीने को मान्यता मिले या किसी और को, इस बात पर हम काहे परेशान होंगे? हम तो जमाने के बदले ढंग देखकर थोड़े से हैरान हैं बस, तो उसका फार्मूला ये निकाल रहे हैं कि हम भी जमाने के साथ बदल देखते हैं| आशा है ऐसा करने से किसी को परेशानी नहीं होगी|
    और आपकी एक बात पर हमारा ख्याल ये है कि पतिजी को भी यकीनन आपके नाम से बुलाया जा रहा होगा, अलबता वो इस बात से खुस ही होंगे|

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  23. आपका भी मेरे ब्लॉग मेरा मन आने के लिए बहुत आभार
    आपकी बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना...
    आपका मैं फालोवर बन गया हूँ आप भी बने मुझे खुशी होगी,......
    मेरा एक ब्लॉग है

    http://dineshpareek19.blogspot.in/

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  24. उदयपुर से बाहर पुणे में अस्‍तव्‍यस्‍त हूं इस कारण पोस्‍ट देर से पढने को मिली, आनन्‍द आ गया।

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    1. अजित दी,
      ग्रीष्मावकाश हैं, आप शायद मकरंद एकत्रीकरण में व्यस्त हैं, शुभकामनाएं|

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  25. घंटा?! घंटा?! घंटा?!
    बाऊ जी,
    नमस्ते!
    रहोगे तो देहाती टाईप्स! ये जो लेडीज़ ने बोला है, यह नारी-उत्थान का एक्ज़ाम्पल है केवल... और आपने वाश रूम की राह पकड़ ली इतनी सी बात पे! वो क्या कहते हैं इंगरेजी में? एम सी पी हैं कतई आप भी, मेरी तरह!
    सन २००२ में सत्रह साल का लौंडा जब मैं दिल्ली युनिवेर्सिटी पहुंचा तो एक खूबसूरत जनानी मुझे देख कर बोली, "फक दीज़ विलेजर्स"! मुझे समझ नहीं आया. असल में इन चीज़ों की पढाई मैंने हिंदी में ही की थी. मैं मुस्कुरा के आगे बढ़ गया. जब पता चला के वो क्या कह रही थी तो रोमांचित हो गया. स्वाद आया. ये तो सोचा नहीं के उसकी मंशा गाली देने की थी. अगले ही दिन पहुँच गया उसके सामने. खूबसूरती के झुण्ड में विचर रही थी. मैंने कहा, "मैडम, मैं तैयार हूँ"....... उसके बाद ना बोली वो हाई सोसाईटी प्रोफाईल दिखने वाली बला. हा हा हा...
    ਪੰਜਾਬੀ ਚ ਕਹੰਦੇ ਨੇ "ਦੇਰ ਨਾ ਲਾਯੀਂ, ਘੇੰਟਾ ਪਹਿਲਾਂ ਫੜ ਲਯੀੰ".
    Its left to you whether the Ghanta is Babaji's or Clock Tower's!!!!

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    1. हम भी हिन्दी भाषा वाले ही रहे हैं काके, हम तो अंगरेजी की पढाई भी हिन्दी मीडियम से करते रहे:)
      कुछ पढकर अपनी कोई बात याद आ जाए तो समझो दिल मिले हुए हैं| पंजाबी कुझ ज्यादा ही आ गई है, ध्यान नाल, हर गल्ल दे दो मतलब हुंदे ने काके ते तेरी ते अजे कुडमाई वी होनी है:)
      लव यू

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    2. अरे हम तो समझे थे कि हम ही अकेले हैं जिन्हे, अँग्रेजी पढने के लिये वजीफ़ा मिलता था!

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  26. भाई इस बार तो कमाल हो गया’मजा सा’ पहले आ गया और हम पहुँचे बाद में!

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  27. aapki post padh kar ham bhi kuchh sochne ko majboor ho gaye hain.
    ek shabd ke kai arth niklte hainab jo jaisa samjhe.
    han~! aapka pura lekh padh gai aur bahut hi rochak bhi laga---
    dhanyvaad
    poonam

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  28. हा हा हा हा .... हा हा हा... रुकिए... पेट दुःख रहा है.. हंसी डबल हो गयी... एक तो आपकी पोस्ट पढ़कर दूसरा अपनी एक साथी की याद आ गयी....
    कॉलेज के दिनों में मेरी सहपाठी ने एक दिन मेरे सामने कहा कि वो साला क्या घंटा बिगड़ेगा मेरा... तब मैंने उसे बायपास तरीके से घंटा शब्द का असली वाला अर्थ बताया... उसके बाद उसके क्या हाल थे बता नहीं सकता...
    एक अपना ही वाक्य है... ग्वालियर में गाली साली आम है.. लेकिन अपुन थोड़े से शरीफ हैं (ऐसा लोग कहते हैं. अपुन भी मानते हैं. ). सो गालियों से बचते थे.. लेकिन चूतिया और भोसड़ी के टाइप की हलकी फुलकी गाली पिताजी के सामने भी मुंह से निकल जाती थी.. क्योंकि इसे हम गाली मानते ही नही थे... एक दफा मालवा क्षेत्र के अपने से उम्र में छोटे दोस्त के साथ बैठा था... यही मुंह से चूतिया टाइप का शब्द निकल गया... भाई उछल पड़ा.. लड़कियों की तरह मुंह पर हाथ रखकर... ओ भैया आपने गाली दी... मैं सोच मैं पड़ गया.. कि अपुन ने तो आजतक गाली नहीं दी, बड़ी मुश्किल से समझ आया कि ये गाली हैं..

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  29. बार बार देखने वाली वीडियो है जी.
    आपने भी क्या ढूंढ कर लगाईं है.

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