शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

कुछ गाने-वाने की बात हो जाये?

आजकल ऑफ़िस में कुछ अपग्रेडेशन का काम चल रहा है। जाने का समय तो है, आने का कोई समय नहीं है। पब्लिक डीलिंग तक तो रूटीन का काम चलता रहता है, उसके बाद कभी तो बहुत काम रहता है और कभी सिर्फ़ बैठकर इंतज़ार करते रहो कि इलैक्ट्रिशियन या दूसरे टैक्नीशियन अपने हिस्से का काम कर रहे हैं। कभी लाईट डिस्कनैक्ट कर रहे हैं कभी इधर की तार यहाँ से डालकर वहाँ निकाल रहे हैं। अपन बावलों की तरह कभी इधर देखकर हैरान होते हैं कभी उधर देखकर हक्के-बक्के। सावन का महीना, बंद हाल में लाईट भी नहीं, गा ल्यो कजली और खा ल्यो मालपुये। अब नौकरी करनी है तो ये सब भुगतना ही पड़ता है। एकाध साथी को और बैठना पड़ता है बेचारे को साथ में, जबरदस्ती ही।  अपना तो खैर चल ही जाता है कि पता है घर पर कौन सा गले में हार डाले जाने हैं, जैसे कंता घर भले वैसे भले बिदेस। पर ये खाली बैठना, बस मार ही डालता है। जब दिल ढूंढता था फ़ुर्सत के रात दिन, तब तो मिले नहीं और जब मिलते हैं तो उस समय उन्हें न ओढ़ सकते हैं न बिछा सकते हैं। सुडोकू भी कितने हल करें, अखबार में एक ही आती है और एक ही हिन्दी की वर्ग पहेली। और फ़िर ये कागज की पहेलियां हल करने से जिन्दगी की पहेलियाँ कहाँ सुलझती हैं?
साथी हमारे गृहस्थ आदमी हैं,   बेचारे कुढ़ते रहते हैं और खीझते रहते हैं लेकिन साथ में बैठे जरूर रहते हैं। हमने भी सोचा कि एक्स्ट्रा टाईम में रुकना रोकना तो मजबूरी है, लेकिन अगर इनके मनोरंजन का कुछ ख्याल रखा जाये तो थोड़ा ठीक रहेगा। बिजली तो भाई लोग काटे रखते हैं, रोज अपने मोबाईल में जितनी गुंजाईश होती है, गाने लोड करके ले जाते हैं, फ़ुर्सत हुई तो चला दिया कि टाईम पास हो जायेगा भाई का। एक दिन गज़लें ले गये, तो भाई साहब ने मुँह बिचका दिया। कहने लगे कि इन गज़लों में से दिल, शराब, महबूबा, दीदार जैसे दस शब्द लिख कर देता हूँ, वो निकाल दो फ़िर देखो कि क्या बचता है इनमें? मैंने भी हाँ में हाँ मिलाई, सही बात है जी, और फ़िर ये सब ख्वाम्ख्वाह की ही तो चीजें हैं। अगले दिन ले गये पंजाबी गाने, उन्हें कहाँ पसंद आने थे? नहीं आये। नये फ़िल्मी गाने उन्हें फ़ूहड़ लगे तो वो भी फ़ेल हो गये। आखिरी हथियार के तौर पर एक रात काली करके अपने पसंदीदा गानों में से शार्टलिस्टिंग की और ले गये हुज़ूर की अदालत में। हम हुये थोड़े से सफ़ल। उन्होंने रियेक्शन तो देनी शुरू की, देखिये बानगी – गाना दर गाना।

चंचल साहब गा रहे थे बुल्ले शाह की काफ़ी – फ़िल्म बॉबी की, सुनते रहे भाई साहब हमारे मगन होकर। जब अंत में चंचल ने कई बार दोहराया, मैं नईं बोलना, मैं नईं बोलना। मैं नईं बोलना जा, मैं नईं बोलनाSSSS -
प्रतिक्रिया – तू नईं बोलना ते ………..  खड़ के, साला शोर मचाई जांदा है नईं बोलना, नईं बोलना। भारत दा विदेश मंत्री समझदा है खुद नूं, पहले कैंदा है पाकिस्तान नाल नईं बोलणा, नईं बोलणा फ़िर आप ही कैंदा है वार्ता करेंगे।

सागर फ़िल्म का गाना था – सागर जैसी आँखों वाली ये तो बता तेरा नाम है क्या?
प्रतिक्रिया – तू सालेया नाम तों कि लैणा है, सीधे सीधे काम बता।

किशोर कुमार गा रहे थे – आदमी जो कहता है, आदमी जो सुनता है, जिंदगी भर वो सदायें पीछा करती हैं।
प्रतिक्रिया – केड़े जमाने दी गल्ल करदा ऐ जी ऐ बंदा, आदमी तां सिर्फ़ सुनदा है, कहंदी ते जनानी है। झूठ बोल्दा है जी ऐ।

’रोटी कपड़ा और मकान’ में मनोज जी और जीनत पर फ़िल्माया गाना, ’मैं न भूलूंगा, मैं न भूलूंगी’
प्रतिक्रिया – नईं भुल्लोगे ते दुख ही पाओगे। तुसी वी ऐंवे ही आओगे दफ़्तर विच बिना शेव कीत्ते।

मैं हर गाने पर उनकी प्रतिक्रिया देखदेखकर हैरान हो रहा था कि कितनी सटीक ऑब्जर्वेशन है इनकी।
 आखिर में मेरा अकेला फ़ेवरेट फ़ास्ट गाना. लावारिस फ़िल्म से ’अपनी तो जैसे तैसे, थोड़ी ऐसे या वैसे, कट जायेगी।
प्रतिक्रिया – ऐ गाना है मज़ेदार, देखन विच्च किन्ना मजा आंदा है।
मैंने कहा, “यार, मुझे तो सुनने में ज्यादा मजा आता है, ये गाना। देखने लगो तो ध्यान भटकता है इधर उधर, सुनो तो सिर्फ़ गाने की वर्डिंग पर ध्यान जाता है।
पुनर्प्रतिक्रिया – तुसी तां होजी ड्राई आदमी, अगली बंदी ने किन्नी कुर्बानी कीती सी, तुसी सारी भुला दित्ती।

मैं सोच रहा था कि भाई मेरे, हमने तो भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खां, ऊधम सिंह, मदन लाल धींगड़ा जैसे अनगनित वीरों की कुर्बानी भुला दी तो कल्पना ऐय्यर या जो भी थी, उसकी कुर्बानी भुलाने का इल्ज़ाम भी अपने सर पर ले ही लेते हैं, देखी जायेगी।

आज फ़त्तू वाला स्पेस inner beautiful वाले अमित जी के नाम,  हमारी एक पर्सनल मेल बिना अमित की इजाजत के पब्लिकली पब्लिश कर रहा हूँ, विश्वास है इस धृष्टता का भी बुरा नहीं माना जायेगा।

From: मो सम कौन ?
To: antarsohil1977@gmail.com
Sent: Friday, August 06, 2010 4:16 PM
Subject: [अन्तर सोहिल = Inner Beautiful] New comment on मन्नै तै रै छोड कै लुगाई मेरी जावेगी.
मो सम कौन ? has left a new comment on your post "मन्नै तै रै छोड कै लुगाई मेरी जावेगी":
भाई अमित, वादा पूरा कर लिया तुमने तो।
भले आदमी, एक बार शिकायत तो करते मुझसे कि जिस फ़त्तू को इस्तेमाल करके मैं कमेंट और वाहवाहियाँ बटोर रहा हूं, वो फ़त्तू पहले से ही तुम्हारी पोस्ट्स का कैरेक्टर है। वो तो आज भाटिया जी के ब्लॉग से पुराने लिंंक्स लेते हुये पहुंचा तो पता चला और शर्म से पानी पानी हो रहा हूं। रागणी का भी पूरा स्वाद नहीं ले पाया।
आज मेरी तरफ़ से तुम्हें प्रणाम।

Amit Gupta
to me show details 4:20 PM (2 hours ago)
काहे की शिकायत जी
फत्तू उतना ही आपका है जितना मैं आपका हूँ, दिल से
आपकी टिप्पणी पाकर पोस्ट सफल हो गई
प्रणाम
p.s. -  गाने तो जी और भी बहुत सारे थे, पर आपका ध्यान भी तो रखना है। आज इन्हें ही झेलो..

बुधवार, अगस्त 04, 2010

छेड़छाड़ हमारा अधिकार, हम इसे हासिल करके ही रहेंगे!

आज के अखबार में एक खबर का शीर्षक था, “छेड़छाड़ से रोका तो घर पर हमला।” खबर कुछ इस तरह से थी कि कुछ लड़के एक परिवार की लड़कियों को रोज सड़क पर छेड़ते थे।  लड़कियों के परिवारवालों ने उन्हें रोकने की, समझाने की कोशिश की तो लड़कों ने पहले तो वही पर उन्हें पीटा और फ़िर कुछ देर बाद अपने साथियों के साथ उनके घर पर आकर तोड़फ़ोड़ भी की और फ़िर से उन्हें पीटा। 
देख लो जी, कितनी नाईंसाफ़ी है बेचारे लड़कों के साथ। एक तरफ़ तो इस सवा अरब की आबादी वाले देश का भार इनके कंधों पर जबरन लादने के बिना राशन के भाषण पिलाये जाते हैं, और जब ये बेचारे  प्रेरित होकर सामर्थ्यानुसार भार उठाना चाहें तो अखबार में ऐसी ऐसी खबरें छापकर इनका मनोबल तोड़ा जाता है। इनका गुस्सा तो सबने देख लिया,  त्याग किसी ने नहीं जाना समझा। अपनी पढ़ाई-लिखाई, कैरियर, घर के जरूरी काम वगैरह छोड़कर इस सामाजिक यज्ञ में डाली जा रही आहूति की तारीफ़ करना तो दूर की बात है, ऐसा सिद्ध करने के प्रयास किये जा रहे हैं कि जैसे इन्होंने बहुत गलत काम कर दिया हो।
गलत काम का विरोध हम शुरू से ही करते रहे हैं, विरोध का तरीका बेशक थोड़ा अलग हो सकता है। मिडल स्कूल से लेकर सैकंडरी स्कूल तक स्कूल प्रबंधन के द्वारा हमपर किये गये इमोशनल और फ़िज़िकल अत्याचार का विरोध हमने किया था, स्कूल से भागकर फ़िल्में देखने के तरीके से। अगर हमारे उस स्कूल का इतिहास हमारे द्वारा या हमारे किसी साथी के द्वारा लिखा जाये तो ‘school bunkers association’ के संस्थापक सदस्य के रूप में हमारा योगदान भुलाया नहीं जा सकता। जैसे देश की आजादी में सारे क्रांतिकारी एक तरफ़, बापू-चाचा एक तरफ़ और फ़िर भी इनका पलड़ा भारी था, हमारे स्कूल से भागने वाले तो कई थे लेकिन धनंजय और हमारी जोड़ी का अलग ही स्थान था। अत्याचार हमने सहना नहीं था, बस।
सीनियर सैकंडरी में साथी बदल गये लेकिन मिशन नहीं बदला हमारा। अध्यापक हमें एवायड करते थे, हमसे फ़िर अत्याचार सहन नहीं हुआ, हमने उन्हें अवायड करना शुरू कर दिया। कोई अंग्रेजी फ़िल्म नहीं छोड़ी जी हमने। अपने स्कूल में पहली ऐतिहासिक हड़ताल में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया लेकिन हमने अत्याचार चुपचाप  नहीं सहन किया।
कालेज में आकर भी अन्याय का विरोध करने के बचपन के संस्कारों ने हमें व्यस्त रखा। कैंटीन वाले द्वारा समोसे में मिर्च ज्यादा डालने का मामला हो या चाय में चीनी कम होने का मामला, लाईब्रेरियन महोदय का लाईब्रेरी में चुपचाप बैठने की सलाह देना हो या किताबें समय से वापिस करने का आग्रह, अनचाही कन्याओं द्वारा लिफ़्ट देने का मामला हो या मनचाही कन्याओं द्वारा घास न डालने का मुद्दा, हम अपने कर्तव्यपथ से कभी नहीं चूके।
इतना गौरवशाली इतिहास होने के बावजूद, अगर आज हम अपने जूनियर्स के साथ होने वाले अन्याय को चुपचाप सहन कर लें तो हम खुद से कैसे नजरें मिलायेंगे? तो प्रथम पैराग्राफ़ में वर्णित छेड़छाड़क समुदाय के सदस्यों, खुद को अकेला मत समझना। हम और हमारे जैसे कई बुझते चिराग तुम्हारे साथ हैं। अच्छे काम में रुकावटें आती ही हैं, लेकिन ये रुकावटें जीवट वालों को और मजबूत करेंगी। अगर तुम में से कोई हमें पढ़ता हो तो अपना बायोडाटा हमें प्रेषित करे ताकि हम आपका मुद्दा सही तरीके से उठा सकें। बायोडाटा भेजते समय अपने धर्म, जाति आदि का उल्लेख जरूर करें ताकि आपका केस और मजबूत हो सके। कित्ता सेंसेशनल लगेगा जब लिखा होगा शीर्षक में, “अल्पसंख्यक युवाओं के मानवाधिकारों का हनन” या “अनु.जाति\जजा के उभरते युवाओं के साथ भेदभाव?” 
हम ये मामला मानवाधिकार आयोग तक जरूर पहुंचायेंगे, क्योंकि अगर खूबसूरत दिखना लड़कियों का अधिकार है तो उन्हें छेड़ना तुम्हारा भी तो मानवाधिकार है। बेइज्जती, मारपीट, बदनामी आदि सहकर भी आप लड़कियों के आत्मविश्वास को जो बूस्ट कर रहे हैं वो काबिले तारीफ़ है। तुम्हारी छेड़छाड़ के कारण ही कास्मेटिक आईटम्स की मांग बनी हुई है, नहीं तो लोग तो भूख से मर रहे हैं। पन्द्रह रुपये किलो आटा न खरीद सकने वाले लोगों के देश में चार सौ रुपये की रेवलॉन की लिपस्टिक, मस्कारा, रूज़, पाऊडर, अलाना, फ़लाना के बढ़ते बाजार में तुम्हारे योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। तुम्हारी छेड़छाड़ के चलते ही भारतीय उद्योग जगत अन्तर्राष्ट्रीय मंदी का मुकाबला कर सका है। और कोई इस बात को समझे  न समझे, हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री जरूर वांछित विकास दर को बनाये रखने में तुम्हारी भूमिका को सराहेंगे। इसलिये हम पी.एम.ओ. तक भी इस मामले को पहुंचायेंगे कि ’छेड़छाड़ हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे हर हाल में हासिल करके रहेंगे।’
सरकार से मांग की जायेगी कि हर जिले हर गांव में ’छेड़छाड़ प्रशिक्षण केन्द्र’ की स्थापना की जाये, बीस सूत्रीय योजना में इसे शामिल किया जाये, हो सके तो इस काम के लिये नरेगा के माध्यम से  आर्थिक सहायता भी मुहैया करवाई जाये ताकि कोई अपनी धार्मिक, सामाजिक, जातीय या आर्थिक विषमताओं के कारण अपने इस अधिकार से वंचित न रह जाये।
मेरे उदीयमान साथियों, जरूरत पड़ने पर  हम कैंडल मार्च भी निकालेंगे और सरकार तक अपनी बात पहुंचा कर ही रहेंगे।

लेकिन यारों, एक बात है, कल को अगर कोई तुम्हारी बहन-बेटी को छेड़ेगा तो बुरा मत मानना,  ये मानवाधिकार उस छेड़ने वाले के भी तो हैं न?

:) फ़तू को भीड़ भरी बस में दरवाजे के सामने वाली ही सीट मिली हुई थी। एक बुढ़िया जिसके साथ तीन चार बच्चे थे और पांच छ थैले थे, बस में चढ़ी। फ़त्तू ने तरस खाकर एक थैला अपने पैरों के पास रख लिया और एक बच्चे को अपनी गोद में बैठा लिया। बुढ़िया ने मौके का फ़ट से फ़ायदा उठाया और फ़त्तू की गोद में एक और बच्चे को बिठा दिया। उस बच्चे की गोद में दूसरे को बिठा दिया और दो थैले उन बच्चों को पकड़ा दिये। 
फ़ारिग होकर बुढ़िया ने बड़े प्यार से फ़त्तू से कहा, “भाई, घणा समझदार सै तू,  नाम के सै थारा?”
फ़त्तू बोला, “ताई, मेरा नाम सै खूंटा, किमै और टांगणा हो तो ल्या उसने  भी टांग दे, मेरी तो देखी ज्यागी।”






रविवार, अगस्त 01, 2010

खाओ मनभाता, पहनो जगभाता और लिखो.......

पुरानी कहावत है कि इंसान को खाना वो चाहिये जो मनभाता हो, पहनना वो चाहिये जो जगभाता हो। सही कह गये थे जी पुराने लोग अपने टाईम के हिसाब से, लेकिन इसमें हमारा क्या योगदान है?  कई रातों की नींद इस सवाल के कारण उड़ी रही(ऐसा लिखने से बात का वजन बढ़ गया न?) और फ़िर भी अपनी समस्या का हल नहीं निकल रहा था। नहीं निकलता तो न निकले, हम कौन सा नोबल के लिये मरे जा रहे हैं।  जब देना होगा तो अपने आप दे देंगे नोबल कमेटी वाले ढूंढ ढांढ कर। शंका का समाधान तो नहीं निकला लेकिन अपनी एक पोस्ट का मैटीरियल जरूर निकल आया। हमारा प्रश्न बनता है जी ’अगर खाया मनभाता जाये, पहना जगभाता जाये तो लिखा क्या जाये?’
हम नये नये आये थे इस ब्लॉगजगत में, और चारों तरफ़ छपा ही छपा देखकर ऐसे कूद रहे थे, ऐसे ऊल रहे थे जैसे कि नया नया तैराक स्वीमिंग पूल में छपाछप –छपाछप कर रहा हो या फ़िर ..जाने दो  । कहां तो जब से पंजाब में आये हैं, हिन्दी पढ़ने को तरस गये थे और अब कुछ भी लिखकर ब्लॉगपास्ट.काम लिखो और सर्च करो और कुछ न कुछ निकल ही आता था। शुरू के कई दिन तो हिन्दी प्रेम को बांहों में लेकर झूमते और ब्लॉग ब्लॉग घूमते ही निकल गये। फ़िर जब थोड़ा बहुत पढ़ना शुरू किया तो आनन्द में और वृद्धि होने लगी। जल्दी ही दिख गया कि ये तो अपनी ही दुनिया है,  बिल्कुल अपनी। वही टांग खिंचाई,  घिसटा घिसटी, तेरा ब्लॉग मेरे ब्लॉग से ज्यादा पॉपुलर क्यों, तेरे को मिलने वाले कमेंट्स मेरे को मिलने वाले कमेंट्स से ज्यादा कैसे, हमारा धर्म ज्यादा महान। कोई टंकी पर चढ़ रहा है, कोई चढ़ने की धमकी दे रहा है। बस्स जी, हमने तो मान लिया कि पहले कभी रहा होगा कश्मीर धरती का स्वर्ग, अब तो जो है यहीं हैं, यही है और सिर्फ़ यहीं है।
अब तक लिखने के वायरस ने कब्जा कर लिया था हमारे दिलो दिमाग पर। दूसरों का लिखा देखते थे तो  वो कौन सा तो काम्पलेक्स होता है, बी-काम्प्लेक्स नहीं यार आई काम्प्लेक्स, हाँ इन्फ़ीरियरिटी काम्प्लेक्स। ब्लॉग सुधार से लेकर,गली, मुहल्ला, शहर से ascending order में ऊपर ऊपर चढ़ते हुये विश्व सुधार तक के आह्वान, आलोचना, वेदना, प्रार्थना  भरे लेख पढ़कर हम   descending mode  में आ गये थे।अब हमने सोचना शुरू किया कि क्या लिखें?  अपने को तो इन सब बातों का ज्ञान है ही नहीं, जो ज्ञान  हमें है वो तो सबके पास आलरेडी बहुतायत में है।  चढ़ती जवानी में एक बार कहीं पढ़ा था, ’when I drink, I think, and when I think, I drink.’ बड़ी फ़ैंतेसी करी थीं जी हमने भी इस बारे में। लेकिन मेरी बात रही मेरे मन में, मैं पी न सका उलझन में।  अब चढ़ते बुढ़ापे में ये थिंकने के लिये ड्रिंकना और ड्रिंकने के लिये थिंकना तो वैसे भी नहीं होना है। जो हमारे मन में है, कैसे कहें और जो नहीं कहा उसे कोई कैसे समझे? वैसे तो कहे को भी कौन समझता है, पर ऐसा कह दें तो यार लोग गुस्सा हो जायेंगे, इसलिये नहीं कहते।   तो ए दिले नादान, सार्थक चिंतन और लेखन भी हमीं कर देंगे तो फ़िर ऐसा लिखने वालों की कदर कौन करेगा?  अपन तो बेवज़ूल से आदमी हैं, फ़िलहाल तो ऐसा ही लिखेंगे।वैसे भी  जिसका काम उसी को साजे, हम तो बीरबल ने जो चतुराई दिखाई थी बिना काटे लाईन को छोटी करने की, उसी चतुराई का मुकाबला करेंगे दूसरों की खींची लाईन को बड़ी सिद्ध करके।        क्या करें, अपना तो स्वभाव ही ऐसा भुरभुरा सा है। भुरभुरा स्वभाव तो जानते ही होंगे सब?  कूद पड़े हम भी इस मैदान में।
ऐसे में कहीं पढ़ने को मिला कि ’बोल्डनेस आने ही वाली है।’ ये तो सोने पर सुहागा हो गया जी, ’ चुपड़ी और वो भी दो-दो।’  हम तो खुद बोर हो गये थे अब तक जी, जी लिख बोल कर। कित्ता मजा आयेगा जब देवनागरी में अपनी असली पंजाबी भाषा में लिखकर पोस्ट डालेंगे और भारी भारी कमेंट  करेंगे। ’ओये, भैन देया यारा,  कित्थों ल्या के ऐनी वदिया पोस्ट लिख दित्ती है तू’ या किसी के कमेंट के जवाब में हम भी उसकी मां बहन को याद करेंगे।  पर इत्ती भारी पोस्ट ये  ब्लॉगर संभाल भी लेगा? अभी तो ये सुविधा फ़्री में मिली हुई है, लेकिन हमें इन कंपनियों की हकीकत पता है। पहले तो फ़्री की चाय पिला पिला कर आदत डाल देते हैं और फ़िर अपनी मनमर्जी करते हैं। अब हमें पता है कि महीने का सात सौ रुपये का ये इंटरनेट का नया खर्चा पास करवाने में कितनी दिक्कत आई थी। इतनी परेशानी तो वित्तमंत्री को बजट पास करवाने में भी नहीं आती। और ये अस्थाई सहायता कोई धारा 370 या आरक्षण  विधेयक नहीं है जो ड्यूराप्लाई से ज्यादा  स्थाई हो। हमें मिलने वाली ये वित्तीय सहायता अमेरिकी अनुदान की तरह है, जिसके दम पर पाकिस्तान की तरह अपने हालात थोड़े समय के लिये भुलाये जरूर जा सकते हैं लेकिन इसके बदले में हमें कैसे अपना जमीर(जो भी है थोड़ा बहुत) गिरवी रखना पड़ता है। तो हम तो जी खुदी को बुलंद करके पलकें बिछाये हुये   किशोर कुमार की नकल करते हुये ’हुगली डू हुगली डू हुगली डू, मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू, चली आ, चली आ’  करते घूम रहे हैं पर ये साली बोल्डनेस दिखी नहीं अभी तक।
खैर, जब आने की खबर महक चुकी है तो बोल्डनेस को आना तो है ही, बेशक 5-7 साल और लग जायें। हमारी तो इतनी ही इल्तिज़ा है कि हमारे सामने ही आ जाये तो अच्छा है, वैसे भी ज्यादा टाईम है किसके पास?  एक बार जी भर के देख तो लेते उसको। फ़िर दिमाग दूसरी तरफ़ चलने लगता है कि सारी उम्र शराफ़त अली बनके बितादी,  अब आखिरी उम्र में ऐसा पंगा क्यों लें जी? जो हैं, जैसे हैं उसी आधार पर बिकें तो ठीक है वरना दीन से भी जायेंगे और दुनिया से भी। तो जी ’जेहि विधि राखे राम, तेहि विधि रहिये’ पर भरोसा रखते हुये लगभग आधा सफ़र तो तय हो गया, जब तक शिशुपाल के १०० अपराध पूरे नहीं होंगे तब तक का अभयदान तो है ही। फ़िर जो होगा, देखा जायेगा।
:) फ़त्तू को सफ़र में कहीं रात हो गई तो रात काटने के लिये उसने गांव के बाहरी किनारे पर बने एक घर का किवाड़ खटखटाया।  मालकिन आई और रात काटने के इजाजत भी मिल गई। गृह्स्वामिनी ने बातों बातों में बता दिया कि वह अकेली अपने बच्चों के साथ रहती है। जब फ़त्तू खाना खाने के लिये बैठा तो उसने गौर किया कि घर में कम से कम  बारह-चौदह बच्चे  चिल्ल-पौं मचाये हुये हैं। ऐसा लगता था कि हर साल का मेक और मॉडल वहाँ मौजूद है। हैरान होते हुये उसने पूछा, “यो इतने सारे बच्चे थारे ही सैं?”
जवाब आया, ’बात यूं सै जी, म्हारा घर सै गांव के बाहर जी.टी.रोड से सटा हुआ, रात बेरात  थारे जैसा  कोई न कोई आ ही जावे है  रात काटने की इजाजत मांगने। और म्हारा सै भुरभुरा सुभाव, हमसे मना करा ही नहीं जाता।”
तो जी हमारा सवाल अभी भी मुंह बाये खड़ा है हमारे आगे कि लिखा क्या जाये?  बाकी तो हमारा स्वभाव भी आप जान ही गये होंगे, भुरभुरा ही है। अगर कहीं से जवाब मिल जायेगा तो उसका भला और न मिलेगा जवाब तो उसका भी  भला।

शुक्रवार, जुलाई 30, 2010

सॉरी लारा, सॉरी बिप्स,,,,,

आज यह पोस्ट लिखते हुये मन बहुत भारी हो रहा है। मैं जानता हूं कि कोई सीरियसली नहीं लेगा, मत लो यारो, मुझे जो कहना है कहूंगा ही। कई दिन से ये नाटक चल रहा था, कल कहीं जाकर पर्दा गिरा है।चलो, मामला एक तरफ़ तो लगा। पिछले दो तीन महीने से रोज दिन में कई बार फ़ोन पर मैसेज आ रहे थे ’इन्विटेशन’ के।  सोनू निगम से शुरू हुये थे, फ़िर मीका का नंबर आया। जब देखो एक ही बात, ’आपको …. ने इन्वाईट किया है अपने ब्लॉग पर।’  शुरू में तो हम समझे कि भाई कुछ गलतफ़हमी सी हो गई है, हमने तो अपनी ब्लॉग यात्रा जिन ब्लॉग्स से शुरू की थी, वहीं से बेआबरू होकर निकाले गये थे और ये सितारे हमें काहे को इन्वाईट करने लगे? कुछ तो स्टैंडर्ड होगा ही इनका? वो रोज के रोज इन्वाईट करते रहे और हम इग्नोर करते रहे। महीना भर मैसेज भेजने के बाद कंपनी वालों को यकीन हुआ कि हम ’दोस्ताना’ टाईप के आदमी नहीं हैं, तब कहीं जाकर मैसेज आने बंद हुये। मन में थोड़ी सी शांति आई लेकिन पूरा इत्मीनान नहीं आया। इतना ज्ञान हमें बहुत पहले से प्राप्त हो चुका था कि पुरानी बीमारी, पुरानी यादें और पुरानी महबूबा अगर अचानक से ही सताना बंद कर दें तो यह कोई अच्छे लक्षण नहीं हैं बल्कि ये मुसीबतें अपने से बड़ी मुसीबतों को रास्ता देने के लिये जमीन तैयार कर रही हैं।
तो जी, हम तो एवररेडी थे नया पंगा झेलने को। दो दिन के बाद फ़िर से मैसेज आया, अबकी बार लारा के ब्लॉग का इन्विटेशन था। ले लो भैया, कर लो खेती और भर लो दंड। पता होता कि कलयुग के बाबाजी की तपस्या भंग करने के लिये ऐसी ऐसी अप्सरायें न्यौते भेजेंगी तो भैया हम तो सोनू निगम या मीका का ही आमंत्रण स्वीकार कर लेते। वक्त जरूरत पर बहस कर लेते उनके साथ, लड़ भिड़ भी लेते मौका देखकर लेकिन अब लारा के साथ तो झगड़ा भी नहीं कर सकते। दिल को मजबूत करके डिलीट कर दिया मैसेज। कहीं गृह-मंत्रालय के हत्थे चढ़ जाता ऐसा मैसेज तो हमारा नारको टेस्ट ही हो जाना था। लो जी, फ़िर से पुरानी कहानी शुरू हो गई, रोज वही संदेसा और रोज वही हमारा दिल को मजबूत करके डिलीट करना। पन्द्रह दिन तक लड़ाई चलती रही और एकबार फ़िर हम विजेता बने। दो दिन बिना मैसेज के निकल गये और तीसरे दिन फ़िर वही मैसेज की ट्यून सुनकर फ़ोन देखा तो अबकी बार विपाशा थी। नहीं जीने देंगे भाई ये मोबाईल कंपनी वाले। अबे यार, हम तो इसकी फ़िल्म भी नहीं देखते कभी, ऐसा नहीं कि अच्छी नहीं लगती, बहुत अच्छी लगती है पर हम ठहरे वो जिन्होंने बचपन में ही lufthansa का विज्ञापन देख रखा है, ’we check the people, who check the craft you travel’. वो उसका जॉन है न, उसकी बाडी देखकर  हौल सा पड़ जाता है| कहीं उस एथलीट को पता चल गया तो हम भाग भी नहीं सकेंगे। है तो बाईक भी अपने पास, पर वो भी अपने जैसी ही है, चालीस की रेंज वाली और वो ठहरा ’धूम मचा दे।’ कई दिनों तक मन पर काबू रखे रखा, लेकिन कल पता नहीं मौसम बेईमान था या क्या था, कल मैसेज आया तो फ़ैसला कर लिया कि आज विपाशा का न्यौता स्वीकार कर ही लेना है, जो होगा देखा जायेगा। इरादा पक्का करके शाम को बैंक से अपनी बाईक उठाई और चल दिये घर की ओर जैसे चंगेज़ खान इस शस्य श्यामला धरती पर कब्जा करने के लिये पता नहीं कितने सौ मील से घोड़े पर सवार होकर आया था। गांव से बाहर निकले ही थे अभी, एक मोड़ सा है वहां, जैसे ही मोड़ पार किया एक काला कुत्ता एकदम से बाईक के आगे आ गया। अमां, हम खोये हुये थे सांवले से ख्यालों में और सामने आ गया ब्लैक एंड ब्यूटीफ़ुल। मुश्किल से बचाया उसे और वो सड़क के दूसरी तरफ़ जाकर हमें ही घूर रहा था। ये समय आ गया है आजकल। अब काली बिल्ली के रास्ता काटने पर अपशगुन होता है, ये तो सुना था लेकिन काला कुत्ता रास्ता काट जाये तो क्या होता है?  और फ़िर याद आ गई तीन साल पहले की एक घटना। सुबह के समय बस स्टैंड से बैंक की तरफ़ जा रहा था कि अचानक सड़क की दूसरी तरफ़ से अपनी तरफ़ भागकर आते एक पिलूरे पर नजर पड़ी।  बिना जैब्रा क्रॉसिंग के ही सड़क पार कर रहा था और उसके गतिमान शरीर को देखकर मैं अचंभित रह गया था। ऐसा लगा मुझे कि वो मेरी तरफ़ आते हुये  जैसे गाना गा रहा हो -
तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई, यूं ही नहीं दिल लुभाता कोई,
जाने तू या जाने ना, माने तू या माने ना।
पहले भी मैं तुझे दांतों में लेकर, चाटा किया और काटा किया,
जाने तू या जाने ना, माने तू या माने ना।
और मैं उसे देख ही रहा था कि उसने आकर मेरी बाईं पिंडली अपने मुंह में भर ली थी। मुझे तो पता ही बाद में चला जैसे हमारी सरकार को बहुत बाद में पता चला था कि कारगिल में आकर पाकिस्तान ने अड्डा जमा लिया है। तो जी, जब हमारे कारगिल पर उस पिलूरे ने दांत गड़ा लिये उसके बाद ही हम एक्शन में आये। वो वाली टांग नब्बे डिग्री तक उठा दी थी और वो पिलूरा भी ऐसा जिद्दी अपने पडौसियों की तरह कि लटक ही गया पर छोड़ा नहीं। हाथ में जो बैग था उससे मारकर उसे भगाया, लेकिन तबतक वो चाटे, काटे, दोऊ भाँति विपरीत वाला काम कर चुका था। बाद में देखा तो पेंट में उसके दांतों से कट लग गया था। पिंडली सुरक्षित थी लेकिन उस दिन के बाद से मुझे भी चाटने और काटने की आदत सी हो गई है। वो पेंट अब तक संभालकर रखी है, आदमी को निराशावादी नहीं होना चाहिये।  जब सचिन का पैड, एल्विस प्रैस्ले की गिटार, सलमान की शर्ट और ….. के अंतर्वस्त्र नीलाम हो सकते हैं तो क्या पता जी दस बीस साल में हमारी उस पेंट का भी नंबर लग ही जाये।  
खैर, बात अभी की  चल रही थी और दिमाग पहुंच गया तीन साल पहले की बात पर। कल की बात पर लौटते हैं, उस कुत्ते को बचाने में लड़खड़ा गये थे और निहारने में तो ऐसा डगमगाये कि बाईक को संभाला सड़क के किनारे खड़े एक पेड़ ने। बहुत नुकसान हो गया जी हमारा तो, और हमारे से ज्यादा गृह-मंत्रालय का। जिसकी इन्श्योरेंस एक्सपायर्ड थी, हमारी बाईक, वो ज्यादा डैमेज हो गई और जिसकी इन्श्योरेंस इंटैक्ट थी एकदम टन्न, यानि हम, वो  सिर्फ़ टूट फ़ूट कर रह गये। वहीं पर बैठे बैठे मन ही मन विपाशा से माफ़ी मांग ली और लारा से भी। सॉरी लारा, सॉरी बिप्स – हमारे भरोसे मत रहना। मत करना हमारा इंतजार, तुम जाओ अपने परफ़ैक्ट मैच के पास, हमारी तो देखी जायेगी। यूँ भी बड़े नाखूनों वाली और लिपस्टिक लगाने वाली सुंदरियों को हम दूर से ही प्रणाम करते रहे हैं।
देश की शायद सबसे बड़ी मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनी के मालिक लोगों, पिछले दिनों आपने साऊथ अफ़्रीका में एक बड़ा टेक ओवर किया है, बहुत बहुत बधाई हो। अगले दिन अखबार में पढ़ी थी स्टेटमेंट कि पचास हजार से काम शुरू किया था, और अब संभवत: पचास हजार करोड़ की डील की है आपकी कंपनी ने। सच में बहुत तरक्की की है आपने। अब आपने इतना योगदान दिया है देश की अर्थव्यवस्था में, बहुत कुर्बानी दी है आपने लेकिन यार ये उलटे सीधे तरीके से अपने उपभोक्ताओं को चूना लगाकर पैसा कमाना सीखा कहां से है? महीने के तीस-पैंतीस रुपये हमारे जैसे हर उपभोक्ता के ख्वाम्ख्वाह में लग भी जायेंगे तो वो मरने वाला नहीं है, तुम्हारा पेट जब भर जाये तो बता देना। हम तो बिना मोबाईल के भी जी लेंगे, तुम्हारा काम कैसे चलेगा?
:) फ़त्तू और उसका चेला गली के बीच में अपनी अपनी चारपाई बिछाकर सो रहे थे। एक ट्रैक्टर वाले को वहां से होकर गुजरना था, कई बार हार्न बजाने पर भी कोई हरकत न हुई तो वो और उसके साथी ट्रैक्टर से उतर कर चारपाई के नजदीक आकर उन्हें आवाज देने लगे। फ़त्तू ने मुंह से चादर हटाई और कहने लगा, “भाई, कितना ही दुखी हो ले, यो  तो सै महा आलसी, कोई फ़ायदा न होगा। तमनै जाण की जल्दी सै तो एक काम करो, मेरी चारपाई ने उठाकर साईड में कर दो, मैं तो इतना ए कर सकूं सूं थारी खातिर।"