अपने ब्लॉग प्रोफ़ाईल में मैंने शुरू में ही लिख दिया था कि पुरानी बातें, पुरानी फ़िल्में, पुरानी गीत, पुरानी किताबें, पुरानी यादें, पुरानी… वगैरह वगैरह मुझे बहुत पसंद हैं। कुछ पुराने चुटकुले भी इन वगैरह वगैरह में शामिल हैं। ऐसा ही एक छोटा सा गंदा सा चुटकुला था - मास्टर जी ने बच्चों से पूछा, “किये कराये पर पानी फ़ेरना, इसका वाक्य प्रयोग बताओ।” बच्चे ने कहा, “फ़्लश में पानी छोड़कर मैंने सब किये कराये पर पानी फ़ेर दिया।”
ये चुटकुला अब मेरे लिये त्रासदी बनकर रह गया है। सिर्फ़ एक पोस्ट ने मेरे डेढ़ साल के किये कराये पर पानी फ़ेर दिया। ब्लॉग नाम देखिये, मेरे काम देखिये। गाली गलौज मैं लिख दिया करता, अपने बच्चे जवान हो रहे हैं और प्रेम मोहब्बत के गाने मैं सुनवा दिखा दिया करता, छांटकर महिला ब्लॉगर्स के यहाँ मैं कमेंट किया करता, उल्टे सीधे चुटकुले फ़त्तू के नाम से डाल दिया करता – ये सब किसलिये भला? अपनी छवि सुधारने के लिये ही तो, और एक गोलमोल सी कविता से पंगा क्या ले लिया, सबने जबरदस्ती ही धर्मात्मा बना दिया। पिछले जमाने में शरीफ़, आस्तिक कहलाना बड़ाई की बात होती होगी लेकिन आज के समय में किसी को ये सब खिताब दे देना गाली देने से कम नहीं है।
आप सब बड़े बेमुरव्वत निकले, कूटनीति की चार नीतियों में से पहली अपना ली ताकि ये बंदा अपनी जिंदगी को नीरस कर ले। कोई अद्वैत से जोड़ बैठा इसे, किसी को अध्यात्म दिखाई दे गया, किसी को काव्य रस मिल गया, जुलम भयो रामा जुलम भयो रे। हमारे प्रतुल भाई ने तो उसकी व्याख्या ऐसी शानदार कर दी कि हमारे खानदान् में सात पीढ़ी तक किसी ने ऐसा नहीं सोचा होगा। ले देकर एक सतीश सक्सेना जी ने और एक अदा जी ने थोड़ा मेरी भावनाओं की कदर की। बड़े भाईजी ने आगाह किया कि इसे जुनून कहते हैं और देवीजी ने समझाईश दी कि पतवार तो कब्जे में रखना था। ये दो कमेंट न मिलते तो मैंने टंकी पर चढ़ ही जाना था। चलो इन दोनों को धन्यवाद दे देता हूं कि समय से कदम उठाकर इन्होंने ब्लॉग जगत में अपील, विचार, पुनर्विचार जैसे आग्रह होने से बचा लिये। आप सबकी भी मिन्नतें, चिरौरी बच गईं। वैसे सोचकर मजा बहुत आ रहा है कि कैसे सब मना रहे होते, सब न सही कुछ तो मना ही रहे होते कि वीरू टंकी से नीचे उतर आ। खैर, फ़िर कभी सही।
पिछले महीने ही सूचना मिल गई थी कि पिछले साल की तरह इस साल फ़िर से बुड्ढे तोते को प्रशिक्षण हेतु नामित किया गया है। कई सालों से यह एक घोषित युद्ध छिड़ा हुआ है प्रबंधन और हमारे बीच। वो कहते हैं चाहे कितना खर्च हो जाये सिखाकर मानेंगे और हम कहते हैं कि चाहे जितना जोर लगा लो, ऐसे ही भले हैं हम नासमझ से, बुद्धू से। खुशी इस बात की थी कि हमें अभी चुका हुआ नहीं मान लिया है प्रबंधन ने। जिस दिन पत्र आया था, लौटते ही चहकते हुये ये सूचना दी कि फ़िर से ट्रेनिंग आ गई है। सुनने को मिला, “उपलों में चाहे घी के कनस्तर उंडेल दिये जायें, रहेंगे उपले ही।” एक बार तो ताव देने के लिये मूँछों पर हाथ गया ही था लेकिन धरती पर पैर रहने का ये फ़ायदा रहता है कि इंसान अपनी हैसियत नहीं भूलता। ये सोचकर हाथ जेब में डाल लिया कि हमारा समझौता कौन करवायेगा?
मुझे याद आ गया डीटीसी का हमारा एक ड्राईवर मित्र। एक दिन उन पति पत्नी से मुलाकात हुई तो दोनों खफ़ा खफ़ा से थे। पूछा तो भाभी तो कुछ बोली नहीं, भाई ने बताई ये बात। कहने लगा, रात ग्यारह बजे ड्यूटी करके घर आया तो तेरी भाभी पूछती है, “रोटी खायेगा?” जवाब मिला, “ना, रैण दे। जेवड़ी(रस्सी) ल्या दै, फ़ाँसी खा लूँगा।” गुस्से में धम धम करती वो रोटी बनाण लगी और मैं सामणे बैठ गया कि गुस्सा ठंडा हो जायेगा इसका। गैलां ही आके बैठ गया हमारा पालतू काड़ू(कालू)। इब इसनै पैली रोटी बनाई और मन्नै थाली आगै करी तो बोली, डट जा(रुक जा), यो बेचारा भूखा सै। उसके बाद एक रोटी कालू के सामने फ़ैंकी गई और दूसरी मेरी थाली में। तीन रोटी खाकै कालू ने अपना मुँह जीभ से पोंछ लिया और मुझे तीसरी रोटी देके इसनै तवा तलै उतार दिया और न्यूं बोली, “इस बेचारे नै जाणवर होके भी अक्कल सै कि हिसाब से रोटी खानी चाहियें और एक तू सै कि और रोटियों की बाट देखे सै।” भाई, फ़ेर मेरे ते रया नईं गया और मन्नै एक जड़ दिया इसकै। इब तू ही फ़ैसला कर कि गलती किसकी सै, मेरी अक इसकी?
उस दिन तो मैं हँसता रहा, समझाया अपने दोस्त को कि कुछ बीबियाँ अपने पति को बहुत प्यार करती हैं और कैसे न कैसे उनका समझौता करवा दिया। तब मेरे ऐसे सलाहकार दोस्त नहीं थे, अब आपका इस मामले में क्या कहना है? कसूरवार कौन है, वो आदमी जो ड्यूटी करके आधी रात में घर आता है और ऐसा ट्रीटमेंट पाता है और मारपीट करने वाला कहलाता है या वो औरत जो आधी रात में अपने पति को खाना बनाकर खिलाती है और फ़िर उससे मार खाती है। बेचारे कालू कुत्ताजी जी को बैनेफ़िट ऑफ़ डाऊट देने की फ़िक्सिंग पहले ही हो चुकी है, इसलिये अपना जवाब इन दोनों विकल्पों तक ही सीमित रखें। वैसे मुझे मालूम है कि कोई मानने वाला है नहीं, जवाब देंगे तो अपनी मर्जी से। ठीक है यारों, जैसा मन हो वैसा जवाब दे देना, हमारी तो देखी जायेगी।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान एक हाई स्टेटस के प्रशिक्षु से कुछ मजेदार बतचीत हुईं, वो अगली बार। तब तक ये मस्ती भरा गाना सुन लीजिये। काका और किशोर दा, क्या कैमिस्ट्री है..
