सोमवार, मई 16, 2011

किये कराये पर पानी..... एक व्यथा हँसते गाते

अपने ब्लॉग प्रोफ़ाईल में मैंने शुरू में ही लिख दिया था कि पुरानी बातें, पुरानी फ़िल्में, पुरानी गीत, पुरानी किताबें, पुरानी यादें, पुरानी… वगैरह वगैरह मुझे बहुत पसंद हैं। कुछ पुराने चुटकुले भी इन वगैरह वगैरह में शामिल हैं। ऐसा ही एक   छोटा सा गंदा सा  चुटकुला था -  मास्टर जी ने बच्चों से पूछा, “किये कराये पर पानी फ़ेरना, इसका वाक्य प्रयोग बताओ।”  बच्चे ने कहा, “फ़्लश में पानी छोड़कर मैंने सब किये कराये पर पानी फ़ेर दिया।”

ये चुटकुला अब मेरे लिये त्रासदी बनकर रह गया है। सिर्फ़ एक पोस्ट ने मेरे डेढ़ साल के किये कराये पर पानी फ़ेर दिया। ब्लॉग नाम देखिये, मेरे काम देखिये। गाली गलौज मैं लिख दिया करता,  अपने बच्चे जवान हो रहे हैं और प्रेम मोहब्बत के गाने मैं सुनवा दिखा  दिया करता, छांटकर महिला ब्लॉगर्स के यहाँ मैं कमेंट किया करता, उल्टे सीधे चुटकुले फ़त्तू के नाम से डाल दिया करता – ये सब किसलिये भला?   अपनी छवि सुधारने के लिये ही तो, और एक गोलमोल सी कविता से पंगा क्या ले लिया, सबने जबरदस्ती  ही धर्मात्मा बना दिया। पिछले जमाने में शरीफ़, आस्तिक  कहलाना बड़ाई की बात होती होगी लेकिन आज के समय में किसी को ये सब खिताब दे देना गाली देने से कम नहीं है।

आप सब बड़े बेमुरव्वत निकले, कूटनीति की चार नीतियों में से पहली अपना ली ताकि ये बंदा अपनी जिंदगी को नीरस कर ले। कोई अद्वैत से जोड़ बैठा इसे, किसी को अध्यात्म दिखाई दे गया, किसी को काव्य रस मिल गया, जुलम भयो रामा जुलम भयो रे। हमारे प्रतुल भाई ने तो उसकी व्याख्या ऐसी शानदार कर दी कि हमारे खानदान् में सात पीढ़ी तक किसी ने  ऐसा  नहीं सोचा होगा। ले देकर एक सतीश सक्सेना जी ने और एक अदा जी ने थोड़ा मेरी भावनाओं की कदर की। बड़े भाईजी ने आगाह किया कि इसे जुनून कहते हैं और  देवीजी  ने समझाईश दी कि पतवार तो कब्जे में रखना था। ये दो कमेंट न मिलते तो मैंने टंकी पर चढ़ ही जाना था। चलो इन दोनों को धन्यवाद दे देता हूं कि समय से कदम उठाकर इन्होंने   ब्लॉग जगत में अपील, विचार, पुनर्विचार जैसे आग्रह होने से बचा लिये।  आप सबकी भी मिन्नतें, चिरौरी बच गईं। वैसे सोचकर मजा बहुत आ रहा है कि कैसे सब मना रहे होते, सब न सही कुछ तो मना ही रहे होते कि वीरू टंकी से नीचे उतर आ।      खैर, फ़िर कभी सही।

पिछले महीने ही सूचना मिल गई थी कि पिछले साल की तरह इस साल फ़िर से बुड्ढे तोते को प्रशिक्षण हेतु नामित किया गया है। कई सालों से यह एक घोषित युद्ध छिड़ा हुआ है प्रबंधन और हमारे बीच। वो कहते हैं चाहे कितना खर्च हो जाये सिखाकर मानेंगे और हम कहते हैं कि चाहे जितना  जोर लगा लो,   ऐसे ही भले हैं हम नासमझ से, बुद्धू से। खुशी इस बात की थी कि हमें अभी चुका हुआ नहीं मान लिया है प्रबंधन ने। जिस दिन पत्र आया था, लौटते ही चहकते हुये ये सूचना दी कि फ़िर से ट्रेनिंग आ गई है।  सुनने को मिला, “उपलों में चाहे घी के कनस्तर उंडेल दिये जायें,  रहेंगे उपले ही।”  एक बार तो ताव देने के लिये मूँछों पर हाथ गया ही था लेकिन धरती पर पैर रहने का ये फ़ायदा रहता है कि इंसान अपनी हैसियत नहीं भूलता। ये सोचकर हाथ जेब में डाल लिया कि हमारा समझौता कौन करवायेगा?

 मुझे याद आ गया डीटीसी का हमारा एक ड्राईवर मित्र। एक दिन उन पति पत्नी से मुलाकात हुई तो दोनों खफ़ा खफ़ा से थे। पूछा तो भाभी तो कुछ बोली नहीं, भाई ने बताई ये बात। कहने लगा, रात ग्यारह बजे ड्यूटी करके घर आया तो तेरी भाभी पूछती है, “रोटी खायेगा?” जवाब मिला, “ना, रैण दे। जेवड़ी(रस्सी) ल्या दै, फ़ाँसी खा लूँगा।”  गुस्से में धम धम करती वो रोटी बनाण लगी और मैं सामणे बैठ गया कि गुस्सा ठंडा हो जायेगा इसका। गैलां ही आके बैठ गया हमारा पालतू  काड़ू(कालू)। इब इसनै पैली रोटी बनाई और मन्नै थाली आगै करी तो बोली, डट जा(रुक जा), यो बेचारा भूखा सै। उसके बाद एक रोटी कालू के सामने फ़ैंकी गई और दूसरी मेरी थाली में। तीन रोटी खाकै कालू ने अपना मुँह जीभ से पोंछ लिया और मुझे तीसरी रोटी देके इसनै तवा तलै उतार दिया और न्यूं बोली, “इस बेचारे नै जाणवर होके भी अक्कल सै कि हिसाब से रोटी खानी चाहियें और एक तू सै कि और रोटियों की बाट देखे सै।”  भाई, फ़ेर मेरे ते रया नईं गया और मन्नै एक जड़ दिया इसकै। इब तू ही फ़ैसला कर कि गलती किसकी सै, मेरी अक इसकी?

उस दिन तो मैं हँसता रहा, समझाया अपने दोस्त को कि कुछ बीबियाँ अपने पति को बहुत प्यार करती हैं   और कैसे न कैसे उनका समझौता करवा दिया। तब मेरे ऐसे सलाहकार  दोस्त नहीं थे, अब आपका   इस मामले में  क्या कहना है?    कसूरवार कौन है, वो आदमी जो ड्यूटी करके आधी रात में घर आता है और ऐसा ट्रीटमेंट पाता है और मारपीट  करने वाला कहलाता है      या वो औरत जो आधी रात में अपने पति को खाना बनाकर खिलाती है और फ़िर उससे मार खाती है। बेचारे    कालू कुत्ताजी जी को बैनेफ़िट ऑफ़ डाऊट देने की फ़िक्सिंग पहले ही हो चुकी है, इसलिये अपना जवाब इन दोनों विकल्पों तक ही सीमित रखें। वैसे मुझे मालूम है कि कोई मानने वाला है नहीं, जवाब देंगे तो अपनी मर्जी से। ठीक है यारों, जैसा मन हो वैसा जवाब दे देना, हमारी तो देखी जायेगी।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान एक हाई स्टेटस के प्रशिक्षु से कुछ मजेदार बतचीत हुईं, वो अगली बार। तब तक ये मस्ती भरा गाना सुन लीजिये। काका और किशोर दा, क्या कैमिस्ट्री है..

शनिवार, मई 07, 2011

बिना पतवार की नौका


  
                                                                    (गूगल से साभार)



तुम हो जैसे अथाह जलराशि,

और मैं हूँ

एक बिना पतवार की नौका।

पूरी तरह से,

तेरी मौजों के सहारे।

रहने दे मेरा वज़ूद,

या मिटा दे मुझे,

सब अख्तियार हैं तुझे।

बल्कि खुश होता हूँ हमेशा,

जब भी ऐसा सोचा कि

मुझे मिटाकर देखना कभी,

तुझमें ही खो जाऊँगा, 

औरतुझमें ही घुल जाऊँगा।

फ़िर  कैसे अलग करोगे भला?

मुझे मुझ से, मुझे खुद से......



अब ये फ़ूट ही गई है तो आलोचनाओं से डरकर मैं भी फ़ूट लेता हूँ, काहे से कि  अपना मानना है कि  आलोचना सिर्फ़ की जानी चाहिये, ली नहीं जानी चाहिये।   लौटकर देखता हूँ, आप सबको तो:)


मंगलवार, मई 03, 2011

पंगा न लै.....


पढ़ा-लिखा कुछ खास  नहीं था, शुरू से ही डील डौल वगैरह का काफ़ी अच्छा था। शरारती एक नंबर का, मारपीट जब तक एकाध बार कर न ले, खाया पिया हजम  ही नहीं होता था। शायद सातवीं या आठवीं तक स्कूल गया फ़िर कहीं किसी दुकान पर नौकर लग गया। ट्रेन से डेली पैसेंजरी करता था। आदतें आसानी से जाती  नहीं, अंदर  सीटें खाली हों  तो गेट पर लटकना और भीड़ हो तो जबरदस्ती सीट के लिये धक्कामुक्की करना उसका शगल था। जल्दी ही ट्रेन में मशहूर हो गया था,  कुछ जगह ऐसी होती हैं और कुछ बंदे ऐसे, जिनके लिये बदनामी ही मशहूरी होती  है।

समय बीतता गया,  उसकी प्रतिभा नित निखार पा रही थी। अब  उसने नया शौक पाल लिया, चलती गाड़ी में दरवाजे से हाथ बढ़ाकर टायलेट की खिड़की की सलाखें पकड़कर डिब्बे के पिछले हिस्से में पहुंचता और फ़िर दूसरे डिब्बे की खिड़की की सलाखें पकड़कर उस डिब्बे में घुस जाता। तालियाँ बजाने वालों का मनोरंजन हो रहा था मुफ़्त में, और वो खुद को हीरो समझता था। एक दिन हाथ फ़िसल गया और वो चलती गाड़ी से नीचे गिर गया। जान बच गई लेकिन एक टाँग घुटने के पास से काटनी पड़ी। वही तालियाँ बजाने वाले अब उसे बेवकूफ़ बता रहे थे।

कुछ दिन के बाद वो लाठी का सहारा लेकर चलता दिखाई दिया। स्वभाव वैसा ही, वही यारों दोस्तों के साथ धौल धप्पा और हो हल्ला। कुछ महीनों के बाद नकली पैर लगवा लिया उसने। अब बिना सहारे के भी चल लेता था, हाँ थोड़ी सी लंगड़ाहट(मौके के हिसाब से कभी कभी ज्यादा भी) जरूर बाकी थी। घरवालों ने शादी भी कर दी उसकी। दूसरे बहुत से सरकारी आँकड़ों की तरह ये लिंगानुपात वाले आँकड़े भी आज तक मेरी समझ में नहीं बैठे। बताते हैं कि हजार के पीछे आठ सौ के करीब लड़कियाँ हैं यानि उस हिसाब से लगभग हर पांचवा आदमी कुँवारा रहना चाहिये जबकि मुझे शायद ही कोई लड़का ऐसा दिखता हो जो लड़की के अभाव में कुँवारा रह गया हो। दूर क्यों जाया जाये, मुझ जैसे तक को(थोड़ा कन्फ़्यूज़न है, ही लिखा जायेगा या भी?) गौरवर्णीय, सुंदर, सुशील और गृहकार्य में दक्ष, जैसी कि हर भारतीय विवाहयोग्य कन्या होती ही है, मिल गईं:))  गरज ये कि कैसा भी बंदा हो, उसके लिये ऊपर वाले ने कहीं न कहीं कोई उसका जोड़ बना ही रखा है तो जी हमारा हीरो भी अब तक शादीशुदा हो गया था। जल्दी ही राशनकार्ड में तीन नाम और जुड़ गये।

भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ,   हमारे भारत में परंपरा चली आ रही है कि जो कुछ न करता हो उसका ब्याह कर दो कुछ तो करता रहेगा स्साला, कुछ तो करेगा:)  जो किसी काम में लगे हुये हैं वे बेशक कुँआरे रह जायें, जैसे हमारे राहुल बाबा बेचारे जनसेवा में लगे हैं तो अब तक…, लेकिन जिसके पास कोई काम नहीं, वे सब खूँटे से बांध दिये जाते हैं। दरअसल हँसते-खेलते, आजाद किस्म के लोगों को देखकर इन चीजों को खो चुके लोगों को बड़ी टीस उठती होगी कि हमारी आजादी छिन गई और ये है कि अब तक सर उठाकर घूम रहा है। शुभचिंतक होने का ड्रामा सा रचकर उम्रकैद दिलवाकर ही मानते हैं। यकीन न हो तो किसी शादी में देख लीजिये, दूल्हा बेचारा कसा बंधा सा कसमसाता रहता है और दूसरे नाच नाच कर खुशियां  मनाते हैं। ये खुशी वैसी ही होती है जैसे अपनी कालोनी की लाईट गायब होने के बाद पड़ौसी कालोनी की जलती बत्तियों को हसरत भरी निगाह से देखने के बाद उन्हें भी गुल होते देखकर हमें अतुलनीय खुशी का अहसास होता है। शेरवानी, सेहरा इत्यादि इत्यादि पहनाकर दूल्हे को सजाया नहीं जाता बल्कि मार्निंग शो में प्रिंसीपल साहब के द्वारा छापा मारकर स्कूल के बच्चों को यूनीफ़ोर्म के जरिये पहचानने वाली बात से इसे जोड़ा जा सकता है। ऐन वक्त पर अगर दूल्हा भागने की कोशिश करे तो भीड़ में अलग से पहचान लिया जाये, इसीलिये ये सब नौटंकी की जाती है।

फ़िर से बहक गया मैं,  हीरो की शादी भी हो गई और घर बच्चों से गुलजार भी हो गया। परिवार बढ़ा तो जिम्मेदारियां भी बढ़ीं। श्रीमानजी ने अब कुछ कमाई वगैरह करने की सोची और जल्दी ही फ़ाईनैंस का धंधा शुरू कर दिया। भारत सरकार ने तो अब financial inclusion जैसे काम शुरू किये हैं, हमारे ये मित्र अरसा पहले से ’जिसका कोई नहीं, उसका तो खुदा है यारो’ की स्टाईल में खुदाई दिखा रहे हैं। नजदीक ही एक सब्जी मंडी उनका कार्यक्षेत्र है, गरीब(तर) लोगों को पांच हजार देते हैं और दो महीने तक सौ रुपया रोज की किस्त। हिसाब सीधा है लेकिन ब्याज की दर निकालना इतना सीधा नहीं क्योंकि जिन दस बीस लोगों से उनका व्यवहार है, उनके यहाँ से पैसों के अलावा फ़ल, सब्जी वगैरह प्यार मोहब्बत में ले ही ली जाती है। शाम को जब रिक्शा में बैठकर घर लौटता है तो जेब नोटों से और रिक्शा दस बारह थैलियों से भरी होती है। हालचाल पूछने पर ऊपर वाले का शुक्रिया देते हैं और नम्रता से बताते हैं कि गरीबों की मदद करते हैं तो उनकी दुआयें काम आ ही जाती हैं।

आदत मेरी भी खराब है, जो बात कोई खुद से बता दे उसपर बेशक ध्यान न जाये लेकिन जो पर्दे में है वहां ताक झांक जरूर करनी है। खलनायक फ़िल्म  का  गाना याद आ रहा है, ’नायक नहीं…’ वाला।    कहीं उल्टा सीधा सोचने लगो सब,  हमारे जयपुर नरेश तो जरूर इसमें भी कोई प्वाईंट ढूंढ लेंगे, अगर इसे पढ़ा तो।    कित्ती खराब सोच है यार तुम्हारी, छवि मेरी खराब करते हो:)    तो एक शाम मैंने अपने दोस्तों से  जानना चाहा कि यार सरकारी बैंकों को तो अपने ऋण वसूलने में इतनी दिक्कत आती है और ये बंदा कई गुना ज्यादा की दर पर कैसे कारोबार चला रहा है? जवाब में पहले तो बैंकों की कार्यप्रणाली की माँ-बहन एक की गई फ़िर हमारे हीरो की कार्यप्रणाली की तारीफ़ें की गईं। मालूम चला कि दिक्कतें तो उसे भी आती हैं लेकिन उनसे निपटने के उसके फ़ार्मूले भी अलग हैं। हर लोन का जमानती तो होता ही है, इसके अलावा इस  धंधे में   आदमी का थोड़ा सा रफ़-टफ़ होना भी लाजिमी है। जरूरत पड़ने पर डिफ़ाल्टिंग पार्टी से गाली-गलौज करना पड़ता है। कई बार मार पीट भी करनी पड़ती है। मेरी शंकायें बढ़ने लगीं थी। माना कि ये इस लाईन में शुरू से है, डील डौल भी अच्छा है लेकिन कभी सामने वाला भारी पड़ जाये तो?  अब तो ये बेचारा भाग भी नहीं सकता, एक टांग नकली है उसकी। या फ़िर  बात चौकी-थाने पर पहुंच जाये तो? बताया गया  कि ऐसी स्थिति में नकली टांग ही तो उसका ट्रंप कार्ड बन जाती है। जब तक खुद हावी है तब तक तो कोई दिक्कत है ही नहीं, जब खुद पर बात आये तो पुलिस के आने से पहले उसकी लकड़ी वाली टांग उसके हाथ में आ जाती है। सी.एम.ओ. द्वारा जारी विकलांगता सर्टिफ़िकेट और  पहचान पत्र हमेशा पास रहते ही हैं। दुहाई दे देता है, “आप ही करो जी फ़ैसला, मैं हैंडिकैप्ड आदमी हूँ। एक कदम बेख्याली में रखा जाये तो मेरी टाँग निकल जाती है, मैं क्या खाकर इस ’रेमंड्स’  से लड़ूंगा?”

मैंने तो उसे हमेशा ही हँसते, खिलखिलाते देखा है लेकिन सुना है कि मौका देखकर आँसू भी निकल जाते हैं उसके। फ़िर पुलिस वाले बेचारे भी उसे क्यों मेहमान बनायेंगे, उससे तो कुछ हासिल होना नहीं। उल्टे उसकी सेवा पानी करनी पड़ेगी, नहीं तो रिक्शा मौका-ए-वारदात से थाने की तरफ़ और जरूरत पड़ने पर एसीपी ओफ़िस, डीसीपी ओफ़िस, हैडक्वार्टर की तरफ़। रास्ते सब मालूम हैं उसे, ये भी और वो भी, आर.टी.आई, समाज कल्याण विभाग, मानवाधिकार  वगैरह-वगैरह। मैंने कहा, फ़िर तो गनीमत है कि ये अल्पसंख्यक वर्ग से नहीं है, वरना एक और प्वाईंट जुड़ जाता उसके हक में।

तो मित्रों, आज के प्रवचन से ये शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि अपनी खामियों, कमजोरियों, दुखों, तकलीफ़ों को सही अवसर पर इस्तेमाल करने वाला  प्राय: कामयाब होता है, जितना ज्यादा दुखी दिखाई दे सकने की कला में निपुण होगा, वह भीतर से उतना ही सुखी होगा। जिस तरह आजकल चैन में लगा परिचय-पत्र गले में टांगकर जेब में रखा जाता है और वक्त जरूरत  दिखाकर अपना कार्य सिद्ध किया जाता है, इसी भाँति अपनी वास्तविक, काल्पनिक तकलीफ़ों का सर्टिफ़िकेट हमेशा अपने साथ रखें और मौके पर उसका प्रदर्शन करके चिरकाल तक अनंत सुख के भागी हों। सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु ........

p.s. - एक बिटिया की तरफ़ से एक शिकायत दर्ज हुई थी, उसके पापा कहते तो  न भी  मानता लेकिन बिटिया का  कहना  है तो  सर-माथे पर:)  आशा है, अब ठीक लग रहा होगा।  दोबारा कुछ कहना हो तो पापा को बीच में डालने की बजाय सीधे दो लाईनें मेल कर देना।  मुझ लापरवाह को  जिम्मेवारी का अहसास करवाने के लिये शुक्रिया।

http://youtu.be/zmzSnJmB7QQ

मंगलवार, अप्रैल 26, 2011

हम चिल्ल हो चुके सनम(some lighter moments)...


पिछले बहुत समय से  कोई फ़िल्म नहीं देखी। एक तो टिकट बहुत महंगी है, अकेले जायें तो परिवार वालों के साथ अन्याय लगता है और  बारात साथ लेकर जायें तो जेब के साथ अन्याय लगता है।    दूसरे तीन घंटे तक बैठकर अपनी आंखे खराब करो और फ़िर अब तो हर बात पर टिप्पणी की आदत  जो पड़ गई है, यह भी इसकी जिम्मेदार है। अब हम तो ठहरे ऐंवे से ही वेल्ले आदमी, टिप्पणी  कर भी देंगे लेकिन ये हीरोईन  खाली थोड़े ही हैं जो जवाब  वगैरह देंगी या और कुछ नहीं तो धन्यवाद ही दे देंगी। ऐसा वनवे ट्रैफ़िक प्यार-मोहब्बत में तो बेशक चला लिया होगा लेकिन हर जगह ऐसे करने लगे तो अपनी कंपनी और भी घाटे में चली जायेगी।

लेकिन बकरे का अब्बा कब तक खैर मनाता, इबके वाले वीकेंड में आ ही गया छुरी के तले। दोस्त के यहाँ गया तो  टीवी में आ रही थी ’हम दिल दे चुके सनम’   नाम काफ़ी सुन रखा था और फ़िर टाईटिल से लगा कि अपने ही किसी भाई-बंधु की कथा होगी। बैठ ही गये देखने। अज्जू भैया, सल्लू मियां जैसे एक्शन हीरो और ऐश्वर्या जैसी ग्लैमरस हीरोईन,  लड्डू पे लड्डू फ़ूट रहे थे जी हमारी खोपड़ी में। लेकिन  धोखा हो गया  हमारे साथ, भंसाली जी ने  बताया कुछ और दिखाया कुछ और।  कोई एक्शन नहीं, लेकिन  फ़िल्म ने  बांधे रखा।

फ़िल्म तो सबने देख ही रखी होगी जिन्होंने नहीं देखी तो कुछ सोचकर ही नहीं देखी होगी:)  अपन कोई समीक्षा वमीक्षा नहीं करने वाले। अपन तो बतायेंगे कि बाद में क्या चर्चा हुई। फ़िल्म के बाद सभी   ने  अजय देवगण के रोल की जमकर तारीफ़ की। नारी स्वतंत्रता का सम्मान करने वाले युवक की भूमिका में अभिनय तो वाकई अच्छा था। अब जब सब तारीफ़ कर रहे थे तो हम भी तारीफ़ कर देते तो  मजा नहीं आना था। अपनी छवि के प्रति बहुत जागरूक रहने के कारण  जरूरी था कि  थोड़ा हटकर बात की जाये। लिहाजा हमने तो कहा कि एक नंबर का बुद्धू था हीरो। सुनते ही सारे he &  she हमारी सोच को  ’छि छि’ बोलने लगे। घटिया मानसिकता,  पुरुषवादी,  परंपरावादी, रूढिवादी, लकीर के फ़कीर आदि जितनी तारीफ़ हो सकती थी, की गई। देश के विकास न करने के पीछे,  बढ़ती गरीबी,  जनसंख्या, अपराध यहाँ तक कि भ्रष्टाचार बढ़ने तक का जिम्मेदार हमें और हमारी सोच को बताया गया। तब तक महिलायें महिला-कोच, सॉरी किचन में चली गई और यारों ने 8 P.M. की घोषणा कर दी।

लोकतंत्र में रहते हैं, जीतेगा वही  जिसके वोट  ज्यादा होंगे(वैसे भी पीने के बाद सारे खुद को नेता\अभिनेता समझते हैं और इतने सारे देवदासों के सामने मैं अकेला लस्सीटोटलर क्या झगड़ा करता?) लेकिन अपनी राय रखने का हक तो सबको है।  यूँ  भी ’बोर्न टु बी डिफ़ीटेड’ का कापीराईट होने के कारण हारकर अपने को तसल्ली ही होती है कि  कोई अपना ही तो जीता है।  जब अपनों की  तरकश के सब तीर खाली हो गये, पूछा कि और पीनी है? एक बोला, “बस्स, हम  chill हो चुके सनम।” उड़ा लो बेट्टे मेरा मजाक, देख लेंगे तुम्हें भी कभी:) 

तो जी, फ़िर हमने भी अपना पक्ष सामने रखा। “मैंने कब कहा कि उसे अपनी बीबी को उसके पहले प्रेमी के पास छोड़ने नहीं जाना चाहिये था? मैंने तो उसे बुद्धू बताया है। उसका फ़ैसला बिल्कुल सही था, जब मन ही न मिलें तो यही फ़ैसला ठीक था। बुद्धू तो उसे इसलिये कहा कि इतना बड़ा काम  करने गया था,  तो पूरा करके आना था। हम लोग सरकारी खर्चे पर कहीं ट्रेनिंग या सरकारी काम पर जाते हैं तो घूमना फ़िरना वगैरह तो होता ही  है वो तो खैर उसने भी कर लिया। लेकिन लौटकर जिस काम से गये थे, उसकी स्टेटस रिपोर्ट तो संतोषजनक होनी चाहिये थी। अबे बुधू, गया भी और ऐन मौके पर अगली के दिल और दिमाग ने क्या पलटा खाया कि समीर को बोल दिया ’ना जी’   इधर बोल दिया ’हां जी’ और तुम सारे कर रहे हो ’वाह-जी।’  अबे इतनी मुश्किल से ऐसा सुनहरा मौका हाथ आया था  और इसने फ़िर से वही वाला माडल अपने गले बांध लिया।  इससे तो ’अग्निसाक्षी’  वाला नाना पाटेकर सही था,  बरबाद हो गया लेकिन अपनी बात से नहीं टला। दारू तुम्हारे हाथ में है, झूठ मत बोलना।  तुम सब बताओ अगर उसकी जगह होते तो क्या करते? चलो, मैं ही बताता हूँ, मैं होता तो पहले तो उसे  भला-बुरा समझाता, न मानती तो उसका हाथ थमाता  उसके मन के मीत के हाथ में,  हाथ मिलाता और गुडलक विश करके   अपना कोट अपने कंधे पर टांग कर वापिस आ जाता। चलो, अब बारी बारी से बताओ कि तुम क्या करते?”

किचन साथ ही थी, सबने सहमकर उधर देखा और एक कहने लगा, “बना यार एक एक पटियाला और, स्साली सारी उतर गई।”

गीत के बारे में तो saddest और sweetest का रिश्ता मालूम है, कम से कम अंग्रेजी गीतों के बारे में लेकिन हँसी मजाक वाली बात में ये saddest और sweetest पता नहीं सही है या नहीं:))
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आज सुनवाते हैं आपको एक पुराना पंजाबी गीत। बोल बेशक अच्छे से न समझ आयें, अपने को पसंद आया था पहली बार ही। आज के युग के honour killing से इसका कोई वास्ता नहीं, बहुत पुराना गीत है अंग्रेजों के समय का।    इस गीत में जो बात कही गई है वह है ’सुच्चा सिंह फ़ौजी’  और उसके पगड़ीबदल दोस्त ’घुक्कर’ और ’मल्ल’ के बारे में।  मल्ल की मदद से घुक्कर ने सुच्चा सिंह के भाई नारायण सिंह की बीबी ’बीरो’ पर बुरी नजर रखी और फ़िर क्या हुआ? सुनिये ’खाड़ा लगया होया सी’   (’खाड़ा’ से मतलब है आल्हा या सांग टाईप का संगीतमय आयोजन)।
http://youtu.be/fTvwlysqkMI