रविवार, मार्च 04, 2012

रविवार, फ़रवरी 19, 2012

जाग जाग, रुक रुक.......


1. हमारे बैंक में एक कंपनी का एकाऊंट था, जिनकी लगभग रोज बैंक से अच्छी खासी ट्रांसैक्शन्स होती थीं। कैश के अलावा दूसरे छोटेमोटे कामों के लिये वहाँ की एक महिला कर्मचारी जो वृद्ध हो चुकी थीं, रोज बैंक आती थीं। उस कंपनी में कभी उनके पति काम करते थे और उसकी मृत्यु के बाद कंपनी वालों ने इन महिला को नौकरी दे दी थी। खैर, रोज आने जाने के कारण सभी बैंककर्मियों से वो खासी परिचित थीं और महिला कर्मचारियों से प्राय: घरेलु विषयों पर उनकी बातचीत चलती रहती थी। एक दिन कुछ बात चल रही थी और उनके मुँह से बेसाख्ता निकला, "रांड तो रंडापा काट ले, पर रंडुये नहीं काटने देते"  है तो यह एक साधारण सा मुहावरा, लेकिन हमारा खास भोला ये सुनकर एकदम से ताव में आकर बोला, "माताजी, तुस्सी सान्नूं दस्सो, त्वानूं कौन तंग करदा है? असी देख लांगे उस स्साले नूं(माताजी, तुम हमें बताओ कि तुम्हें कौन तंग करता है? उस साले को मैं देखता हूँ।")  उसके बाद थोड़ा बहुत मरण जोगा,  नासपीटा, बेशर्म, बेवकूफ़ टाईप का धूल-धक्खड़ उड़ा और आखिर में माताजी और दूसरी नारियों को समझाया गया कि शब्द न देखें बल्कि भाव देखें(समझाने वालों में हम शामिल नहीं थे, हमें तो पता था कि भोला द ग्रेट को इस मुहावरे के बारे में पता  ही नहीं होगा)। बाद में भोला को जब यही बात याद दिलाई जाती तो वो वही मुहावरा हमें सुना दिया करता कि रांड तो रंडापा......। कहता था कि वो तो भलाई करना चाहता है लेकिन कोई करने ही नहीं देता।

निष्कर्ष  - रांतोरंकाले, परंनकादे।

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2. पच्चीस तीस  साल पहले की बात है, चुनाव की गिनती हो रही थी। EVM  का नहीं, ढोल बक्से वाला टाईम था। पहले दौर की गिनती चल रही थी, अंदर से खबर आई कि भैयाजी कुछ हजार वोटों से पीछे चल रहे हैं। कार्यकर्ताओं के चेहरे पर उत्तेजना के भाव आ रहे थे और भैयाजी वहीं दरी पर आराम से लेटे हुये थे। कुछ समय बाद अंदर से खबर आई, पहले से भी ज्यादा वोटों से पिछड़ रहे हैं और अंतर बढ़ता जा रहा है।  कार्यकर्ताओं का रक्तचाप, उम्मीदें बढ़ घट रही थी और दरी पर देखा तो भैयाजी नदारद।? एक नजदीक से जानने वाला था, बोला, "मैं देखकर आता हूँ।" स्कूल के पीछे एक पार्क था, जैसा कि इसने अंदाजा लगाया था नेताजी ठाठ से घास पर सो रहे थे। घबराये हुये चेले ने उन्हें  उठाया और ताजा जानकारी देते हुये डरते डरते कहा कि लगता है अपनी हार होगी और आप हैं वहाँ से गायब हो गये। भैयाजी ने पूछा, "फ़लां इलाके की पेटियाँ खुल गईं क्या?" बताया गया कि उनका नंबर तो सबसे बाद में आयेगा। वो बोले, "फ़िर मुझे बार बार जगाने की जरूरत नहीं, एक बार ही आना अब ढोल बाजों के साथ। अपना होमवर्क पूरा है, मुझे सोने दे।" और आखिर में उस इलाके की पेटियाँ खुलीं तो वही हुआ। होमवर्क पूरा था और नेताजी को इस पर और खुद पर यकीन था।

निष्कर्ष - होमवर्क पूरा हो तो चैन से सो\जाग सकते हैं।

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अब बात अपनी, फ़िल्म चाँदनी में एक गाना था जिसके बोल थे कि मेरे दर्जी से आज मेरी जंग हो गई, उसी तर्ज पर ’मेरे नाई से आज मेरी जंग हो गई’ मूड बड़ा ऑफ़ है :(   इस नाई भाई ने मेरे साथ कितने ही जुलम किये हों, मैंने कभी उफ़्फ़ तक न की। हजामत कराने जाता था और वो मालिश, पालिश सब चीज के पैसे झाड़ लेता रहा और आज जब उससे मेरी दाढ़ी से तिनके निकालने की बात की तो  तिनका-विनका निकाला नहीं। अब वो कहता था कि फ़ीस लगेगी, कुछ निकला नहीं तो उसका क्या कुसूर? मैं कहता रहा कि उसने निकाला नहीं, फ़ीस काहे बात की? वो दावा करता है कि वो सही है और तिनका नहीं है, मैं कहता रहा कि वो कामचोर है, तिनका तो है और जरूर है। 

लगता है बतानी ही पड़ेगी सारी कहानी(हमारी सारी भी हमारी तरह आधी अधूरी ही होगी)।  कुछ दिन पहले किसी ने मेल में  फ़ीमेलों को बड़ी जागरूक करती अपनी एक पोस्ट का लिंक भेजा। कमेंट ऑप्शन नहीं था तो कमेंट नहीं कर पाया। पोस्ट का लिंक मैं इसलिये नहीं दे रहा क्यूंकि लेखक एक बहुडिग्रीधारी, मल्टीप्रोफ़ैशनल,   हरफ़नमौला, क्लास-कांशियस और पता नहीं क्या-क्या है और हम जैसे मिडिल क्लास के साधारण से बंदे के ब्लॉग पर लिंक दिये जाने से कहीं उनकी क्लास न हिल जाये:) या फ़िर जैसा कि आमतौर पर कहा जाता है कि लोग मशहूर होने के लिये पहले से ही मशहूर लोगों के साथ अपनी इंटीमेसी दिखाकर मशहूर होना चाहते हैं, मुझे डर लगा कि   मैं कहीं मशहूर न बन जाऊं..:)     पोस्ट पढ़ने के बाद से ही दाढ़ी में तिनका वाली सनक शुरू हुई है।

उस पोस्ट में साईकोलोजिकल, इमोशनल, सैक्सुअल, फ़ाईनैंशियल और बहुत से मुद्दे उठाये\गिराये गये हैं, उससे कोई दिक्कत नहीं।  अपने पेट में दर्द(अहा! मीठी-मीठी)  इसलिये उठी है कि उस पोस्ट का लिंक हमें भेजा गया है। कोई दुख नहीं, कोई नाराजगी नहीं,  है तो सिर्फ़ एक जिज्ञासा कि इस पार्टिकुलर लिंक के द्वारा श्रीमान जी ने मुझे क्या संदेश देना चाहा होगा क्योंकि अमूमन ऐसा नहीं ही करते ।  महिलाओं को बरगलाने वाले पुरुषों के जो लक्षण दिये गये हैं, उनमें से एकाध तो हम पर लागू होता ही है मसलन देर रात नैट पर सक्रिय होना।  अगर हमें टार्गेट करके वो पोस्ट लिखी गई है तो भी कोई समस्या नहीं है  क्योंकि हम तो अपेक्षा इस से बहुत ज्यादा की करते हैं:) जैसे मैं यह पोस्ट लिखकर इसका लिंक संबंधित जगह पर भेजूँगा, और मेरे लिये यह पहली बार है और शायद आखिरी भी। और अगर छेड़छाड़ ही थी तो हम भी थोड़ी बहुत कर ही लेते हैं:)  वैसे इस बात पर एक चुटकुला भी याद आ गया कि एक सत्तर साल का आदमी एक मशहूर वकील के पास गया और बताया कि उस पर रेप का मुकदमा शुरू हो रहा है और वो चाहता है कि चाहे जैसे हो, चार्ज साबित हो जाये:)  

बहुत समय हुआ,  अपने को यहाँ बुरा लगना बंद हो चुका है। इतना तो समझता ही हूँ कि दुनिया में हर तरह के लोग हैं और कोई भी सबके लिये एक सा नहीं हो सकता।  किसी सीधे, सच्चे इंसान से वास्ता पड़ जाता है तो सिर्फ़ अच्छा लगता है और दिल से अच्छा लगता है। और इस मामले में मैं बहुत किस्मत वाला रहा हूँ  कि हमेशा से अच्छे लोगों से वास्ता पड़ता ही रहा है। 

अच्छे भले कई दिन गुजर गये थे कि आते थे, पढ़ते थे, कहीं मन किया तो टिपिया देते थे। न ऊधो से लेना, न माधो का देना। बैठे ठाले फ़िर से बेगार शुरू करवा कर ही माने।   सारांश 1 यहाँ लागू हो सकता है वैसे:)

रिश्ते बनाने का/बनाये रखने का मुझे शौक नहीं, टूट रहे हों तो टूटने देता हूँ। ये पोस्ट पढ़ते समय किसी को ऐसा लगे कि बंदा दुखी है या परेशान है तो ये लिखने की कमी। रिदम सिर्फ़ संगीत में ही तो नहीं होता:) हम एकदम से खुश हैं और इस पोस्ट के बाद अगर कुछ नई डेवलपमेंट्स होती हैं तो उसके लिये भी तैयार, क्योंकि होमवर्क पूरा है:)

लिखते लिखाते, छपते छापते वही टाईम हो गया:) आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि सब जागरूक हो गये होंगे, महिलायें तो विशेष रूप से:) वैसे बाई द वे, जाग कर रुकना ही है तो जागा ही क्यूँ जाए? न आये कोई सा\सी कमेंट करने, अपने पास एक वो तो है ही अपनी परमानेंट वाली .....
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देखी जायेगी:)





गुरुवार, दिसंबर 01, 2011

नशा है सबमें मगर रंग नशे का है जुदा........


"गीत लिखने वाले ने ठीक लिखा है, मतलब निकालने वालों ने भी ठीक मतलब निकाला है। अन्ना का फ़ार्मूला भी ठीक है और इस बात पर अन्ना की खिंचाई करने वाले भी ठीक हैं।
लिखने वाले, कहने वाले इतना कुछ लिख कह गये हैं कि हर कोई अपने मतलब की बात निकाल ही लेता है।
 अनुराग जी का ये कहना "जिन्होने समाज-सुधार में थोड़ा भी योगदान दिया है वे उनसे तो बेहतर ही हैं जिन्होने कुछ नहीं किया" बिल्कुल ठीक है।
8 A.M. वाली हमारी ये टिप्पणी पता नहीं ठीक है या नहीं:)"
ये कमेंट किया था अंशुमाला जी की पोस्ट पर ’नशा शराब में होता तो......’
http://mangopeople-anshu.blogspot.com/2011/11/mangopeople.html?showComment=1322361489913#c6657040222165410415 ,
लेकिन वो फ़ंस गया था स्पैम में तो सोचा कि चलो आज इसी पर सही। मेहनत बरबाद न हो, इसलिये इतनी मेहनत और कर ली। फ़िर  किसी वजह से पोस्ट नहीं कर पाया था और अब तो कमेंट भी दिख रहा है। लिख दिया था तो अब छाप भी देते हैं कौन सा पैसे लग रहे हैं अभी?  :))
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जहाँ तक मेरी जानकारी है, ये गीत प्रकाश मेहरा ने लिखा था। वही प्रकाश मेहरा, जिन्हें हम एक मसाला फ़िल्ममेकर के नाम से जानते हैं। इस गीत से भी ज्यादा लावारिस फ़िल्म के कैबरे डांस वाले गीत ’अपनी तो जैसे-तैसे’ के शब्दों ने मुझे बहुत प्रभावित किया था। उस गीत को अगर आप बिना देखे हुये सुनें तो उसका एक अलग ही प्रभाव पायेंगे।  अवैध रिश्तों के नतीजे के रूप में पैदा हुई, पली बढ़ी इंसानी नस्ल के दर्द को बहुत नफ़ासत से बयान किया गया है। कमर्शियल सिनेमा की मजबूरियों के चलते इस गाने को फ़िल्माते वक्त यकीनन दिल से बहुत बड़ा समझौता किया गया होगा। मैं इस गाने को देखने की जगह ऑडियो फ़ार्मेट में सुनना ज्यादा  पसंद करता हूँ, आखिर दिल तो है दिल, दिल का ऐतबार क्या कीजै:)

बात करें नशे की तो ये भी मजे की तरह किसी का गुलाम नहीं। नशे का मायना सबके लिये अलग अलग है।  शराबी को शराब से नशा होता है तो किसी को सत्ता से नशा होता है। किसी के लिये रूप से बड़ा कोई नशा नहीं तो किसी के लिये धन सबसे बड़ा नशा है। असली बात है नशे का असर, वो असर आपको कहाँ लेकर जा रहा है, ये बात ज्यादा मायने रखती है।   बातों का नशा भी है और मुलाकातों का नशा भी है, और तो और मुक्का लातों का नशा भी होता है। समाजसेवा, परोपकार ये भी तो नशे से कम नहीं? शक्ति का नशा होता है तो भक्ति का भी नशा ही होता है। ये  जो पीर-पैगंबर और हमारे दूसरे नायक हुये हैं, वो भी चाहते तो हम लोगों की तरह लीक पर चलते हुये जिंदगी बिता सकते थे। घर से बेघर होकर कहाँ कहाँ की यात्रायें की, किसी ने जहर पिया, किसी ने गोली खाई, कोई फ़ाँसी चढ़ा। कोई जलते तवों पर बैठाया गया, किसी को हाथी के आगे फ़ेंका गया। उनकी रूह पर भक्ति का नशा न होता तो ये सब संभव हो सकता था?  

गुरू नानक देव जी द्वारा की गई यात्रायें चार उदासियों  के नाम से जानी जाती हैं। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान वो सिद्धों के इलाके में पहुँचे। अपने वर्चस्व वाले इलाके में एक नये साधु का आना सुनकर उन्होंने एक बर्तन भेजा, जो लबालब दूध से भरा हुआ था।  लाने वाले ने वो बर्तन पेश किया और चुपचाप खड़ा हो गया, गुरू साहब ने उस बर्तन में गुलाब के फ़ूल की पंखुडियाँ डाल दीं जो दूध के ऊपर तैरने लगीं। इन यात्राओं में बाला और मरदाना उनके सहायक के रूप में शामिल थे। ये माजरा उन्हें समझ नहीं आया तो फ़िर गुरू नानक देव जी ने उन्हें समझाया कि सिद्धों ने उस दूध भरे बर्तन के माध्यम से यह संदेश भेजा था कि यहाँ पहले से ही साधुओं की बहुतायत है, और गुंजाईश नहीं है। गुरूजी ने गुलाब की पंखुडि़यों के माध्यम से यह संदेश दिया कि  इन पंखडि़यों की तरह दूध को बिना गिराये अपनी खुशबू उसमें शामिल हो जायेगी, अत: निश्चिंत रहा जाये। उसके बाद दोनों पक्षों में प्रश्नोत्तर भी हुये। सिद्धों ने एक प्रश्न किया था कि आप ध्यान के लिये किन वस्तुओं का प्रयोग करते हैं? उत्तर देते हुये गुरू नानक देव जी ने कहा था, "नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात"  कि प्रभु नाम सिमरन की ये खुमारी दूसरे नशों की तरह नहीं कि घड़ी दो घड़ी के बाद उतर जाये। ये तो वो नशा है जो एक बार चढ़ जाये तो दिन रात का साथी बन जाता है।

अब एक किस्सा शराब और शराबी पर, खुद सुना-सुनाया। हमारे एक भूतपूर्व गार्ड फ़ौज की पेंशन लेने हर महीने एक या दो तारीख को अपने पैतृक गाँव वाले बैंक में  जाया करते थे। उनका कहना था कि इस बहाने कम से कम महीने में एक बार बूढ़े माँ-बाप, भाईयों के परिवार से मिलना हो जाता है। उनका गाँव हरियाणा-राजस्थान  सीमा पर पड़ता था। उस इलाके में एक जाति विशेष रूप से  इस कुटीर उद्योग में संलग्न थी। कई बार इस बात का जिक्र कर चुके थे।  एक बार गार्ड साहब पेंशन लेकर लौटे तो दो तीन दिन तक उनकी तबियत कुछ नासाज़ दिखी। दरियाफ़्त करने पर उन्होंने कुछ इस तरह बताया।

"इस बार पेंशन लेने गया तो बैंक में ही एक पुराना मित्र मिल गया, जो कुछ साल किसी डाक्टर के पास कंपाऊडरी करने के बाद अब  गाँव में  अपनी डाक्टरी पेल रहा था(क्लैरिफ़िकेशन - गीता है नहीं मेरे पास, न तो उस पर हाथ रखकर कसम खा लेता कि  डाक्टरी ही बताया गया था)। बैंक के काम से फ़ारिग होकर दोनों दोस्तों ने जिन्दगी के गम दूर करने की या इस मुलाकात को सेलिब्रेट करने की सोची। डाक्टर ने कहा कि आज तुझे ’झीणी’ के हाथ की खींची हुई शराब पिलाता हूँ। जालिम क्या तो खुद है, और क्या शराब खींचती है..बिना पिये अंदाजा लगाना मुश्किल है। हमने भी सोची कि सरकारी उचित दर वाली दुकान से तो रोज पीते हैं, आज स्वदेशी, स्वावलंबी, कुटीर उद्योग वाली  ही सही।  वैसे भी डाक्टर सिफ़ारिश कर रहा है तो पहुँच गये उस ठीये पर अपने और पूरे जहान के गम गलत करने। पूरी बस्ती में कम से कम बारह पन्द्रह घर थे जिन्होंने घर के पिछवाड़े में गड्डे बना रखे थे और उन गड्डों में शराब बनने बनाने की सतत प्रक्रिया चलती रहती थी।

अपने पसंदीदा अड्डे पर पहुँचकर डाक्टर ने आवाज लगाई, "ओ झीणी, देख आज नया बंदा लेकर आया हूँ। तेरी इतनी तारीफ़ की है इसके आगे, नीचा न दिखा दियो मन्नै।" 

चहकती हुई झीणी बाहर आई "कौण डाक्टर सै के?" 

दो ही मिनट में झूलती टेबल और हिलती कुर्सियों के साथ मैचिंग करता एक लबालब भरा हुआ जग और दो गिलास लेकर झीणी हाजिर हो गई। डाक्टर ने जेब से तली मूँगफ़लियों का पैकेट निकाला और हम दोनों शुरू हो गये। डाक्टर घूँट घूँट पीने के बाद ’जियो झीणी रानी’ का नारा लगाता था। मुझे स्वाद अटपटा सा लगा लेकिन डाक्टर को सुरूर में आते देखकर मैं भी धीरे धीरे घूँट भर रहा था। बचपन का दोस्त बहुत दिनों के बाद मिला था, शायद डाक्टर ज्यादा ही जोश में आ गया था। एकदम से पूछने लगा, "मैंने यहाँ सबके ठियों पर चखकर देख रखी है, लेकिन झीणी रानी, तेरी शराब में बात ही कुछ अलग है। कई बार पूछा है तुझसे, आज बता ही दे कि अलग से इसमें  क्या मिलाती है तू? बोल न,  तुझे मेरी कसम है आज। मेरे दोस्त के सामने मन्ने नीचा न दिखा दियो।" अब बात ये है जी, लुगाई जात ऐसी ही होवे है कि जहाँ अपनी कसम दे दो, फ़ट्ट से  पिघल जावै है। झीणी भी पिघल गई और बोली, "डाक्टर, तू भी न बस्स...।  देख, माल मसाला तो सब जगह एक सा ही डले है, मैं तो अपनी जानूँ हूं कि जद से ब्याह के इस घर में आई हूँ, रोजी रोटी की कसम है मुझे अगर मन्ने एक बार भी इस गड्डे के अलावा कहीं और मूता हो।"

मैंने अब तक जो दो चार घूँट भरे थे, सूद समेत टेबल पर उलट दिये और डाक्टर की दिप दिप करती आँखें पता नहीं इस बात से खुश थीं कि झीणी ने उसे नीचा नहीं दिखाया  या  इस बात से कि उसके बचपन का दोस्त शहर  वाला होकर देसी चीजों को पचाने की अपनी शक्ति खो बैठा है। मैं उठ रहा था और वो मेरा हाथ पकड़ कर बैठा रहा था, एक जग और पियेंगे। बार बार कहता था कि झीणी ने उसकी बात का मान रखा है और सीक्रेट फ़ार्मूला बता दिया है।  "बकवास मत कर तू।  आज माँ बाबू से मिले बिना ही वापिस जा रहा हूँ, कह दियो उनसे कि एकदम से कोई जरूरी काम आ गया था।"

बाद का हाल पूछने पर गार्ड साहब ने इस वाकये का सबक ये बताया कि गाँधी बाबा महान थे। उनके बताये तीन बंदर भी महान थे। न बुरा देखो, न बुरा सुनो और न बुरा बोलो। मैंने यूँ ही पूछ लिया कि काम तो एक ही बंदर से चल सकता था जिसकी मार्फ़त ये संदेश मिलता कि बुरा मत करो?  ड्यूटी ऑफ़ किये काफ़ी देर हो चुकी थी, आज सरकारी उचित दर के ठेके के सेवनदार बने हुये गार्ड साहब ने कहा, "इस सारी बात से आपने कोई सबक नहीं सीखा। फ़ालतू के सवाल करने से सेहत को नुकसान पहुँच सकता है, जैसे डाक्टर के सवाल से हुआ। महान लोगों ने जो कह दिया, चुपचाप से उसे मान लो और मान नहीं सकते तो भी संकट के समय में उनके बोले डायलाग बोल दो। बातों का पालन उतना जरूरी नहीं है जितना मौके-बेमौके पर उनका बोला जाना।   

याद आ रही हैं ये सब बातें और लग रहा है कहीं मीडिया ने जरूर वो क्लिपिंग डिस्टार्ट या एडिट कर दी होगी जिसमें एक गाल पर तमाचे के बाद गाँधीजी को याद करते हुये फ़ौरन दूसरा गाल आगे बढ़ाया गया होगा.........।.......सरदारजी ने पद संभालते ही जो टेक लगाई थी ’देहि शिवा वर मोहे इहै, शुभ करमन से कबहुँ न टरूँ’ बराबर पूरी कर रहे हैं। साझीदार के  एक थप्पड़ लगते ही खुद फ़ोन लगाकर हालचाल पूछा,  इससे ज्यादा और क्या कर सकते हैं?........कसाब के 26\11 को तीन साल हो गये हैं, सिल्वर जुबली पता नहीं कितने साल में मानी जाती है आजकल?  कानून अपना काम करेगा -yes, law will take its own course. .........जो हमसे टकरायेगा, चूर चूर हो जायेगा।....... केजरीवाल तो लपेटे में आ ही  गये थे, अब क्रेन बेदी, हो जाओ तैयार, मुकदमेबाजी के लिये।............. रामदेव, बालकिशन, अलानो  फ़लानों, यू आल डिज़र्व दिस ट्रीटमेंट। सबकी फ़ाईलें तैयार हैं।  समझते ही नहीं गाँधीजी के तीन बंदर वाला इशारा...।.......झीणी बाई, तुझे सर्च करता हूँ फ़ेसबुक पर और दूसरी साईट्स पर, हौंसला न छोड़ियो और जारी रहियो अपने कुटीर उद्योग में  वैल्यू एडीशन करने में।   यू.पी. वालों के बाद हरियाणा पंजाब के दलितों पिछड़ों के घर भी सवारी तशरीफ़ ला सकती है,  कभी तो वोट यहाँ भी पड़ेंगे.......हो सकता है झीणी बाई के ठीये पर ही अबकी बार.................... .......सरकार किसानों का भला करके ही मानेगी, एफ़ डी आई पर पीछे नहीं हटना है जी.............जनता साली पागल कहीं की, समझती है नहीं कुछ  और बरगलाये में आ जाती है.................बिचौलियों को उनकी औकात दिखा देनी है इस बार...............कनिमोझी छूट गई.....मालेगांव वाले छूट गये.....law will take its course..............ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर, तेरे पैर न छोड़ेंगे...................और इशारा करो जी आप तो, गद्दी जायेगी तो जाये.................तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा............

इतनी बार नशा नशा लिखा गया है मुझसे कि  गम और भी गलत होता जाता है:)) सरकार राशन कार्ड में कैरोसीन के साथ इसका भी कोटा बाँध दे तो कैसा रहे?  खाओ-पियो करो आनंद  और .....................

रविवार, अक्टूबर 23, 2011

’द वैरी बैस्ट कस्टमर सर्विस’


“ये ब्रांच बुढ्ढों की ब्रांच है, सूखी ब्रांच।” जबसे इस ब्रांच में आया, श्रीमुख से कई बार यह सुन चुका था। पुरानी ब्रांच से पर्सनल फ़ाईल आने के बाद अपनी जन्मतारीख सुबूत के तौर पर पेश करते हुये हमने निवेदन किया कि ’अभी तो मैं जवान हूँ’  फ़िर यह आक्षेप क्यों और सूखी और हरी भरी ब्रांच का कैसा वर्गीकरण?    उस्तादजी ने स्पष्ट किया कि  इस डायलाग का पूर्वार्ध  उनका नहीं है, कोई दूसरा स्टाफ़ कभी यहाँ आया था और उसने यह रिपोर्ट दी थी। इस डायलाग का उत्तरार्ध भी उनका नहीं है, लेकिन उनकी सहमति दोनों अर्धांशों से है। हमारी उम्र वाली बात ‘age is nothing but a figure’ टाईप कुछ डायलाग बोलकर खारिज कर दी गई  और सूखी-गीली संबंधी विषय पर एक और  होमवर्क   हमें थमा दिया। “बैंक वालों की तरफ़ से सबसे अच्छी कस्टमर सर्विस कब होती है?”  गये थे नमाज पढ़ने और रोज़े गले बँधवा कर उस दिन हम घर लौटे।  रात भर मगजमारी किये और अगले दिन और भी थका हुआ चेहरा लेकर जब बिना जवाब लिये हाजिर हुये तो हमें पकड़ कर आईना दिखा दिया कि देखो, ये किसी जवान का चेहरा है?  फ़िर खुद ही अपने पिछले दिन के  सवाल का जवाब दिया, “बैंक वाले सबसे अच्छी कस्टमर सर्विस दशहरे से दिवाली के बीच देते हैं। और यह जवाब सिर्फ़ इस सवाल का नहीं है बल्कि सूखी ब्रांच क्या और कैसे होती है, इसका भी है। त्यौहार है  कि बस ब्ल्यू लाईन की तरह सिर पर आने को है और यहाँ कोई पार्टी दिखती ही नहीं है।” हमारे ज्ञान चक्षु खुल गये।

आज कुछ छिटपुट किस्से इसी विषय पर हो जायें।

आजकल चैक बुक पर नाम, एकाऊंट नंबर आदि प्रिंट होकर आता है। ग्राहक से चैक बुक रिक्वीज़िशन स्लिप भर कर आ जाने के बाद हम लोग ऑनलाईन डिमांड  दे देते है और लगभग बारह दिन में चैकबुक प्रिंट होकर आ जाया करती है। मुझे हैरानी हुई जब इन दिनों यह समय सीमा बारह दिन की जगह सात-आठ दिन की हो गई। आश्चर्य व्यक्त करने पर इसका श्रेय यह कहकर  दीवाली को दिया गया कि इन दिनों में मुर्दे भी उठकर ड्यूटी पर हाजिर हो जाते हैं। जो स्टाफ़ सदस्य शाम के समय घड़ी की सुईयों को देखकर पैक अप कर लिया करते थे, इन दिनों में स्वेच्छा से देर तक बैठने को तैयार रहते हैं। फ़लस्वरूप कार्य की गति बढ़ जाती है।

उस्तादजी ने पुराना एक वाक्या बताया कि एक बार एक पार्टी सभी स्टाफ़ सदस्यों को दीवाली पर सूट लेंग्थ दे गई थी। अभी वो सज्जन ब्रांच में ही थे कि एक स्टाफ़ सदस्य बोला, “आ गया एक और खर्चा, कपड़ा दे दिया गिफ़्ट में और सिलाई और टाई?” कस्टमर समझदार था या मौके पर बात कहने वाला, ये फ़ैसला आप करें लेकिन  सतना लिफ़ाफ़ा  प्रकरण  हमारे उस्तादजी कई साल पहले ही देख\दिखा चुके हैं। मेरी सरल सी जिज्ञासा कि उस्तादजी वो टोकने वाले सज्जन आप के सिवा …? वैसे हमारे  उस्ताद जी मंद मंद मुस्कुराते हुये बहुत भले दिखते हैं।

ऐसे ही एक और किस्से में उन्होंने बताया कि एक बार इतने पैकेट इकट्ठे हो गये थे कि मैनेजर साहब से शिकायत करनी पड़ी कि इन डिज़ाईनर पैकेट्स में से  इतने के तो गिफ़्ट नहीं निकलेंगे जितना टैक्सी का किराया  जायेगा। मैनेज करना ही तो मैनेजर का काम है,  मैनेज किया  मैनेजर साहब ने बल्कि करवाया उस्ताद जी ने।
एक स्टाफ़ जो हरित शाखा से  अपेक्षाकृत सूखाग्रस्त शाखा में दीवाली से दो महीने पहले ही स्थानांतरित हुआ था, पहले तो स्थानांतरण स्थगित करवाने में जुटा रहा, असफ़ल रहने पर उसने दीवाली वाले सप्ताह में अवकाश ले लिया। ये किस्सा तो मेरे सामने ही घटा था, अपन समझते थे कि ये उनका प्रोटैस्ट का तरीका है। बाद में पता चला कि वो सप्ताह उन्होंने पुरानी ब्रांच में बिताया।

किसी स्टाफ़ के छुट्टी पर रहने पर उससे जूनियर को अस्थाई रूप से उस पद पर काम करवाने की परिपाटी रही है, ताकि कार्य में व्यवधान न पड़े। बदले में उस स्टाफ़ को कुछ अतिरिक्त भत्ता जिसे ऑफ़िशियेटिंग अलाऊंस या विशेष भत्ता कहते हैं, प्रबंधन की तरफ़ से दिया जाता है। एक शाखा में एक अधिकारी का पद काफ़ी समय से खाली था और एक दूसरा जूनियर कर्मचारी दो तीन महीनों से उस पद पर ऑफ़िशियेट कर रहा था। कुछ ग्राहक ऐसे होते हैं जो पद के हिसाब से गिफ़्ट दिया करते हैं, जब उनका गिफ़्ट पैक उनके मूल पद के हिसाब से मिला तो उन्होंने ये शिकायत मैनेजर से की,  और आवाज उठाने की कीमत केबिन में रखे पैकेट्स की मार्फ़त  मनपसंद पैकेट्स से सवाई-ड्यौढ़ी वसूल की।

बैस्ट फ़ार्मूला लगा अपने को अपने भोला का, दीवाली के मौके पर वो बना देता है अपना छोटा सा चाईना बाजार,  हर माल पचास रुपये। किस डिब्बे से क्या निकले, इस सब से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था। सीधा सा हिसाब, जितने पैकेट      X     रु. 50\-.        उसमें भी  कोई सौ-दो सौ की ऊपर नीचे  कर ले तो अगला हिसाब किताब नहीं रखता था। सैंकड़ों में रकम पहुँचते ही उसका कैल्कुलेटर काम करना बंद कर देता था।

सबकी बता दी, अपने बारे में तो कुछ भी नहीं कहा। ये सब मैं ही तो हूँ, मेरी ही मल्टीपल पर्सनैल्टी के अलग अलग रूप अपने पूरे उरूज पर। जिन लोगों के काल्पनिक किस्से सुना देते हैं, वो सब मेरे ही तो वो रूप हैं जो मैं होना चाहता हूँ लेकिन कभी किसी का मन रखने के लिये, किसी की नाराजगी के डर से हो नहीं पाता।      अपने सुख, अपने लाभ के लिये कभी उस्ताद जी का रोल प्ले करता हूँ, कभी भोला का, कभी इसकी तरह व्यवहार करता हूँ, कभी उसकी तरह। जो अच्छा हो गया, उसका श्रेय अपनी अक्ल को, अपनी हाजिरजवाबी को और जब मनमाफ़िक न हुआ तो किसी दूसरे के सिर पर ठीकरा फ़ोड़ दिया। और तो और उस ऊपर वाले को भी नहीं बख्शता। तकलीफ़ के समय तो खूब याद कर लेता हूँ और जरा सा आराम मिलते ही फ़िर यहीं का होकर रह जाता हूँ।

खैर,  बहरहाल. anyway जो भी हो अपनी तो पहली सरकारी दिल्ली वाली दिवाली है,  उम्मीद से हैं :))           जुटे हैं उस्ताद जी के कहे अनुसार ’द वैरी  बैस्ट  कस्टमर सर्विस’ करने में, जो होगा सिर माथे पर।  आगे कभी हो सकता है अपने भी किस्से कोई सुनाकर अपना और दूसरों का टाईम खोटी करें।

:) फ़त्तू  पशु मेले से भैंस  लेकर आया। घर तक पहुँचते पहुँचते जिस किसी से आमना सामना हुआ,  खरीद मूल्य बताते बताते दुखी हो गया। दुखी भी ऐसा कि भैंस बांधते ही कुँए में छलाँग लगा दी। सारा गाँव इकट्ठा होकर फ़त्तू को कुँए से निकलने की पुकार करने लगा, जैसे ब्लॉग जगत में……...। फ़त्तू ने आवाज लगाई और पूछा, “सारे गाम आले आ लिये अक कोई सा रै रया है?”  जब कन्फ़र्म हो गया कि सब आ लिये तो वो भी बाहर निकल आया और फ़िर अपना सवाल दोहराया, “सारे गाम आले आ लिये अक कोई सा रै रया है?”   फ़िर से कन्फ़र्मेशन मिल गई तो जोर से बोला, “भैंस आई सै चालीस हजार की, अबके किसी ने पूछ लिया तो उसने इसी कुँए में गेर दूँगा।”

हैं तो अपन भी कुँए में ही, लेकिन भरोसा है उसपर,  जिसने वादा किया है डूबने न देने का और निभाया भी है। फ़त्तू की तरह  सबको एक साथ ही विश कर देते हैं।
दोस्तों,  सारे ब्लॉग मित्रों को  और उनके परिवार को ’शुभ दीपाभली’  :)) 
भीतर-बाहर का सब अंधेरा दूर हो और चारों तरफ़ खुशियाँ, उल्लास अपना प्रकाश बिखेरें,  दिल से कामना करता हूँ।