रविवार, अगस्त 15, 2010

पीपल का पेड़, दद्दू लोग और हमारा मिडास टच

मेरा एक सहकर्मी है, नहीं था, पता नहीं ये है ठीक है या था ठीक है। कई साल हम इकट्ठे रहे आजकल अलग अलग जगह पर पोस्टेड हैं।   जाने दो, हरियाणा का वासी,  ठेठ जाट और उसपर तुर्रा ये कि कई साल तक उसकी और मेरी सीट साथ साथ रही थी। मतलब अंदाजा लगा सकते हैं कि कितने गुणों, दुर्गुणों की खान है वो। पक्का आर्यसमाजी, तर्क ऐसे जोर से किया करता कि बस पूछिये मत। चाय का ऐसा शौकीन कि हर एक घंटे के बाद तलब लग जाती उसे, “रे, चाय मंगा ल्यो रे कोई सा।” मैं नया नया आया था, पहला ही दिन था मेरा वहां।  मैंने सोचा कि यार इसमें क्या बड़ी बात है?  प्यून को आवाज लगाने ही वाला था कि दूसरी तरफ़ बैठे साथी ने इशारे से रोक दिया। ’दो मिनट चुपचाप बैठ,’ हंसते हुये उसने धीरे से मुझसे कहा। मैं भी पुराना तमाशबीन, बैठा रहा। दो नहीं पांच मिनट लगे होंगे, मेरे यार ने पन्द्रह बार हांक लगा दी होगी, और फ़िर खुद ही खड़ा होकर कहने लगा, “मन्नै ई बोलकर आनी पड़ोगी, सारे बैठे हैं मेरे सुसरे जाढ़ भींचकर” और जाकर खुद ही चाय का आर्डर देकर आया। अब साथ वाला कहने लगा,  ’इसका रोज का ड्रामा है, तलब लग जायेगी तो न्यूऐ रुक्के मारेगा और फ़िर आप ही चाय पिलायेगा सबको।’   बस जी अपने को जम गया बंदा, अपनी पटेगी इसके साथ, पटी अपनी और खूब जमकर पटी।

एक दिन बताने लगा कि मेरे गांव के घर में एक पीपल का पेड़ है। जब कभी भी गांव जाना होता है, देखता हूं कि घर की सभी औरतें कुंये से पानी खींचती हैं और पीपल को जरूर चढ़ाती हैं, और मैं उनकी धर्मान्धता का हमेशा बहुत मजाक उड़ाया करता। फ़िर उसने बताया कि एक दिन पता नहीं उसके मन में क्या आई कि बिना काम के ही वैसे ही गांव चला गया। बाहर चारपाई पर बैठा था और अंदर उसके लिये चाय-दूध की तैयारी चल रही थी। अनायास ही उठा और कुंये से एक बाल्टी पानी खींचा और जाकर पीपल की जड़ में डाल दिया। कह रहा था कि मेरी चाची ने मुझे देखा और हैरान भी हुई कि आज तुझे क्या हुआ है?  रात को वो अपने बीबी बच्चों के पास शहर लौट आया। सुबह गांव से फ़ोन आया और चाची ने बताया कि कल शाम जिसे तुमने पानी डाला था, वो बरसों पुराना पीपल का पेड़ गिर गया है। बात हंसी मजाक में आई गई हो गई, लेकिन वो भूल नहीं पाया  अब तक कि ये केवल संयोग मात्र है या फ़िर कुछ लेने-देने का संबंध?  आखिर तो हम भारतीय बहुत पहले से और विज्ञान जगत भी सौ पचास साल से वनस्पति में जीवन को मानता ही है।
भूला अगर वो नहीं, तो मैं भी नहीं। मेरे अपने दादाजी अंतिम समय में लगभग तीन साल तक बिस्तर में रहे। मधुमेह के कारण उनके घुटनों पर असर पड़ गया था।  वैसे एकदम एक्टिव, खुराक वगैरह उस समय भी हमसे ज्यादा, आवाज हमसे ज्यादा बुलंद, जिंदादिल एकदम। इन तीन सालों में अपना उनका वास्ता सिर्फ़ खाना लाकर देने तक, दवा देने तक या थोड़ा बहुत हंसी मजाक तक ही रहा, पता नहीं क्यूं। पिताजी रिटायर हो चुके थे तब तक, और मेरे दादाजी की व्यक्तिगत संभाल उन्होंने स्वेच्छा से और जिद करके अपने तक ही रखी।  नहलाना, धुलाना, कपड़े बदलना, बिस्तर पर पड़े मरीज के सभी दैनिक कार्य, सब कुछ पिताजी के सुपुर्द था और उन्होंने पूरी तपस्या के साथ यह काम किया। बाई द वे, बता दूं कि मेरे पिताजी अकेले पुत्र रहे अपने मां-पिताजी के, एक बहन और थीं और उनका भी तब तक देहांत हो चुका था। बल्कि मेरे दादाजी के बड़े भाई नि:संतान थे तो मेरे पिताजी दो परिवारों के अकेले पुत्र रहे।

उस दिन कार्तिक पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा, गुरू नानक जन्म दिवस, गंगा स्नान और\या पता नहीं किन किन त्यौहारों की छुट्टी थी। देख लो जी कित्ती नाईंसाफ़ी है सरकार की, चालाकी भी कह सकते हैं कि सिर्फ़ एक छूट्टी में इतने त्यौहार और कम से कम तीन धर्म निबटा देती है। देर तक सोकर, नहा धोकर, इत्र फ़ुलेल लगाकर रोड इंस्पैक्टरी के इरादे से घर से निकलने वाला था कि पिताजी ने कहा कि यार आज तेरी छुट्टी है, मेरी मदद कर कुछ। तेरे दादाजी को नहलाना है, दो तीन दिन हो गये हैं। दो तीन दिन से दद्दू कुछ सुस्त दिख रहे थे, खाना भी कम खा रहे थे। मैंने कहा कि चलो पहली बार पिताजी ने कुछ काम कहा है, हाथ लगवा देते हैं। हम दोनों बाप बेटे ने मिलकर उनके कपड़े उतारे, नहलाया, बदन पोंछ कर कपड़े  पहना रहे थे कि दादाजी ने अपनी आंखें तो खुली रहने दीं और सांस लेना बंद कर दिया। मेरा पहली बार सेवा टहल करना शायद बरदाश्त नहीं हुआ उन्हें, मुझे उसी समय याद आ गया पीपल का वो पेड़ जो शायद बरसों से बाट जोह रहा था मेरे दोस्त के हाथों पानी डाले जाने की।
दादाजी के बड़े भाई, मेरे बड़े दादाजी, मैंने पहले बताया कि नि:संतान थे। हमारी दादी का देहांत कई साल पहले हो चुका था। इनकी उमर अस्सी के ऊपर ही थी। घर हमारे तीन चार किलोमीटर के फ़ासले पर थे, कई बार कहने के बावजूद हमारे साथ रहने नहीं आ रहे थे वो, हर बार यही कहते कि कुछ हिसाब किताब है मेरा लोगों के साथ, समेट लूं फ़िर वहीं रहना है तुम लोगों के पास। वैसे कोई दिक्कत नहीं थी, उनके घर के आसपास सभी अपने कुल परिवार के ही लोग थे, हमारा घर ही उन सबसे दूर था।  दूसरे तीसरे दिन कभी पिताजी, कभी मैं और कभी मेरा भाई उनसे मिलने जाते रहते थे। काफ़ी एक्टिव थे बड़े दादाजी हमारे, लेकिन वृद्धावस्था के चलते महीने दो महीने में एकाध बार नर्सिंग होम में एडमिट होना ही पड़ता था। साथ में रहने वाले जरूरत पड़ने पर हमें खबर कर देते और हमारे घर से कभी मेरे पिताजी और कभी मेरी मां और उधर के परिवारों से कोई सदस्य, सभी मिलजुल कर समय निकाल लेते थे। तीन चार दिन में बड़े दादाजी घर वापिस हो लेते थे। वही रूटीन शुरू, रात ढलते ही टी.वी. ऊंची आवाज में चालू और वो भी चालू हो जाते थे, ड्रिंकने और थिंकने में। हमारे साथ न रहने की सबसे बड़ी वजह यही समझ में आती है मुझे। मुझे फ़ख्र है कि मेरे घर का सबसे बिगड़ा सदस्य मैं हूं। इस बिगड़ैलपने पर फ़ख्र इसलिये होता है कि मेरे परिवार के बाकी सदस्यों की सादगी और बढ़ जाती है इससे।

तो जी ऐसा हुआ कि शाम को ऑफ़िस से वापिस आया तो मां कहने लगी कि तेरे बड़े दादाजी नर्सिंग होम में हैं। मैं कहने लगा, “इसमें क्या बड़ी बात है, छ: महीने न देखें नर्सिंग होम का बिस्तर तो बड़ी बात होगी।”  भगवान के आगे मेरे पत्थरदिल होने की, बेरहम होने की, ममताशून्य होने की शिकायत की गई और समझाबुझाकर मुझे पहली बार नर्सिंग होम भेजा गया कि जा उनके पास, वो याद करते रहते हैं तुझे,  और उन्हें अच्छा लगेगा। चला गया जी, सोचकर गया था कि घंटा भर बैठ कर आ जाऊंगा, वहां लग गये तीन चार घंटे, दूसरे परिवार से जिस रिलीवर ने आना था, वो आया ही नहीं। बैठा हुआ कुढ़ता रहा, खीझता रहा और जब वापिसी का मौका लगा तो कसम खाकर उठा कि आज के बाद नहीं आना इनके पास होस्पिटल में। दो घंटे के बाद फ़ोन आ गया कि मरीज के घर जाने की जिद के चलते उन्हें घर ले आया गया था और अब वो अपने असली घर को चले गये हैं। देख लो जी कैसी लाज रखी मेरी कसम की भगवान ने, पहली बार गया था उनसे मिलने नर्सिंग होम में, नहीं हुआ बरदाश्त उनसे भी। मेरी आंखों के सामने फ़िर से पीपल का पेड़ भरभराने लगा था….।
वो दिन है और आज का दिन, मेरा अपना कोई बीमार होता है तो मैं कोशिश करता हूं कि रिस्क न ही लूं कोई। पत्त्थरदिल समझा जाना मंजूर है, लेकिन…।
यहां ब्लॉगजगत में आया, तो कुछ पुराने ब्लॉगर्स ने मुझे हाथों हाथ ले लिया, मैं धन्य हो गया। मैंने उनकी परंपरा को आगे बढ़ाते हुये कुछ ऐसे ब्लॉग शार्टलिस्ट किये, जो अपेक्षाकृत नये थे और मुझे अपीलिंग लगे, मैं उनका फ़ॉलोवर बन गया। इनसे भी शायद बर्दाश्त नहीं हुआ,
२.http://athaah.blogspot.com/
३. http://bhanu-choudhary456.blogspot.com/
४. http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/
ये मैंने दो चार उदाहरण दिये हैं, जिसे छू दिया है वही इनैक्टिव हो जाता है। हा हा हा। जस्ट फ़ॉर टैस्टिंग ’अपना पंचू’ को फ़ॉलो करना बंद किया तो लोकेन्द्र सिंह राजपूत जी कुछ ऐक्टिव दिखने लगे हैं। जो पुराने वाले हैं अपने यार बेली, वो पके हुये हैं, लेकिन मुझे अब भी अपने पर यकीन है। हा हा हा...
क्यों नहीं भारत सरकार मेरे इस मिडास टच का फ़ायदा उठाती? पकड़ो किसी घोटालेबाज को,  किसी आतंकवादी को, किसी देश के दुश्मन को, एक बार कुटम्मस चढ़ाकर  भर्ती करो किसी नर्सिंग होम में,  और मुझे भेज दो उसकी लुक-आफ़्टर करने। अबे सालों, तुम्हारी धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी और अलानी फ़लानी छवि भी बरकरार रह जायेगी और मेरा भी कुछ जीवन सफ़ल हो जायेगा। कल को कहीं अमरीका या चीन को पता चल गई न ये बात, तो ले जायेंगे हाईजैक या लोजैक करके, फ़िर हाथ मलते रहना कि ब्रेन ड्रेन हो गया। अभी तो कदर नहीं करते, फ़िर भेजोगे रंग बिरंगे डोज़ियर जैसे अब मांगते हो दाऊद को, और पाकिस्तान देता नहीं। खैर, हम नाउम्मीद नहीं हैं जी, जब चाचा, पायलट, किसान पुत्र, धरती पुत्र, अर्थशास्त्री जैसे प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो आप में से कभी न कभी कोई ब्लॉगर भी जरूर प्रधानमंत्री बनेगा। तब अपनी सुनवाई जरूर होगी। पता नहीं कितने खूनों से हाथ रंगे जाने हैं अपने, देखी जायेगी।

:) फ़तू के गृहस्थ जीवन में उठापटक चल रही थे और इसके चलते फ़त्तू ने दाढ़ी वाढ़ी बढ़ा रखी थी, दिखने में बाबाजी ही लगता था उन दिनों। एक दिन गली में से जा रहा था तो एक मियां बीबी का झगड़ा देख सुनकर ठहर गया। बीवी गुस्सा होकर घर से निकली और दौड़ती हुई फ़त्तू के पास से निकल गई। उधर मियां ने आवाज भी लगाई थी कि ’बाबाजी, पकड़ियो इसे।’ फ़त्तू चुपचाप उस औरत को भागते हुये देखता रहा। 
उसके पति ने पास आकर गुस्से में कहा, “क्या बाबाजी, पकड़ न सके था इसनै?”
फ़त्तू, “बाबाजी ने के कहे था पकड़न ताईं, बाबाजी तो अपनी नै ही  छोड़ै हांडे है।”
तो जी, फ़त्तू से तो रहो सारे बेफ़िक्र, वो तो अपनी ही छोड़े फ़िर रहा है। मस्त रहो और आजादी का दिन सैलीब्रेट करो। हमें तो इस दिन भी ड्यूटी पर जाना है, देखी जायेगी हमारी आजादी की तो।

देशभक्ति के गाने तो बहुत से बजेंगे आज सब जगह, यहां तो कुछ और ही सुन लेना।

28 टिप्‍पणियां:

  1. घबराना मत भाई! सर्दी, जुकाम बुखार कुछ भी नहीं हुआ है (ये बातें झूथी बातें हैं जो लोगों ने फैलाई हैं...)। भाई, म्हारी तबियत ठीक सै।

    संस्मरण पसन्द आये और गीत के बारे में क्या कहूं, बीते (जवानी के) दिन बहुत याद आते हैं, उस ज़माने के गाने सुन कर। काश एक टाइम मशीन होती तो उस्की सीट पर पर्मानेंट कब्ज़ा कर लेता।

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  2. आज और कुछ भी नहीं कहेंगे संजय जी हम...
    क्यूंकि हम गीत सुन रहे हैं....बस ..
    धन्यवाद...

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  3. बढ़िया संस्मरण!

    स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

    सादर

    समीर लाल

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  4. स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    जय हिंद !!

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  5. पीपल अपना , दादा जी अपने , भारत सरकार अपनी और वे ..मीनें भी अपनेइच् कहां कहां दांव लगाएंगे आपको ! फिलहाल तो फत्तू और उसके पडोसी की बीबी का भागना सेलिब्रेट करो जी :)

    स्वतंत्रता के पावन पर्व पर ऑन ड्यूटी मित्रों को अनंत शुभकामनायें !

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  6. हा! हा! हा! .. मुझे लगता है आपका 'मिडास टच' अपना असर खो रहा है लोग वापस अपनी फॉर्म में लौट रहे हैं. आज सुबह "दिल की कलम" फिर से शुरू हुई. वैसे ये आपका अपना नजरिया है. मैं तो मानता हूँ की आपकी शागिर्दी में मैंने काफी कुछ सीखा है. बहरहाल स्वतंत्रता दिवस की बधाई स्वीकार करें.

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  7. फुटपाथ से जा रहा था ऑफिस की तरफ..पीछे से एक बड़ी सी गाड़ी आई अऊर उस छोटे से रास्ते पर 110 की स्पीड से पार कर गई... मैं फुटपाथ पर होता भी काँप गया..जहाँ स्पीड 25 से 30 भी ज्यादा होती वहाँ वो रॉकेट की तरह निकला था और मेरे ऑफिस वाली लेन में मुड़ गया..मैं बस इतनाही बड़्बड़ा पाया “मरेगा क्या?”… ऑफिस के लिए मुड़ा तो देखा कुछ दूर चलकर,पिछली रात की बारिश से एक पेड़ ठीक उसी समय उस रॉकेट रफ्तार गाड़ी के ऊपर गिरा.. गाड़ी दबी और ड्राइवर उसी सीट पर बैठा गाड़ी की रफ्तार से भी अधिक रफ्तार से ब्रह्माण्ड छोड़ गया. ऊपर वाला इतनी जल्दी मेरी इतनी कुतर्की बात मान गया... काफी दिन सदमें में रहा मैं..
    चलो आपको न्यौता देते हैं फॉलोवर बनने का… शायद इसी बहाने मुक्तिलिखी हो हमारी, इस ब्लॉगलोक से!!

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  8. ये क्या राज खोल दिया संजय जी अब से आपकी हर पोस्ट पर टिप्पणियों की भरमार होगी सब पर यही लिखा होगा की मेरी पत्नी बीमार है मेरी सास बीमार है या मेरी बहु बीमार है आ कर देखा जाये आने जाने का खर्च दिया जायेगा | जरा फत्तू की घरवाली को भी देख आये बेचारे की बाबागिरी बंद हो मेरे किसी दुश्मन की तबीयत नासाज होगी तो आप को खबर करुँगी |

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  9. स्वाधीनता दिवस की अनन्त शुभकामनाएं.

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  10. फ़त्तु का जावाब नही. स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ.

    रामराम.

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  11. @ अनुराग सर:
    हाँ जी, लोग अफवाहें भी बहुत फैलाते हैं| वैसे,आप तो माशाल्लाह अब भी काफी जवान हैं| गाना पसंद आया, आभार|

    @ अदा जी:
    'बिल्ली को तो सपने में भी चूहे दिखते हैं जी' आपको तो सपने भी गाने सुनाने सुनाने के ही आते होंगे:) गुस्ताखी माफ़| आभारी हूँ आपका.

    @ समीर सर,
    धन्यवाद सर|

    @ काजल कुमार जी:
    आभारी हूँ सरजी|

    @ अली साहब:
    देख लो अली साहब, एक अकेली जान और कितने जोखिम हैं जान को, आप जैसे मित्रों का आशीष है, कट रही है| शुक्रगुजार हूँ आपका|

    @ दीप:
    बंधु, आज स्वतंत्रता दिवस है ना कि अप्रैल फूल| शागिर्द तो हम हैं तुम्हारे, कायल हैं तुम्हारे सटीक वार के। कम लफ्जों में कितना कुछ कह जाते हो| आभार व्यक्त करता हूँ कि दोस्त मानते हो मुझे|

    @ चैतन्य जी:
    ऐसा मत कहिये सर जी, अच्चे लोगों की ब्लॉगजगत में बहुत जरूरत है| आभारी हूँ आपका, आप सिर्फ वाहवाही ही नहीं करते, दोस्तों की भूल सुधारना भी दोस्ती ही है|

    @ अंशुमाला जी:
    भीड़भाड़ से बचने का अपने पास रास्ता है जी, अपना ईमेल एड्रेस हम भी छुपा लेंगे(आपकी तरह)| कोई कमेंट्स के लिए धन्यवाद भी पहुंचाना चाहे तो फेल हो जाए, हा हा हा| आपके कमेंट्स बहुत रोचक लगते हैं, धन्यवाद|

    @ वन्दना जी:
    मैडम, आपको भी बहुत सी शुभकामनाएं|

    @ ताऊ रामपुरिया:
    ताऊ, फत्तू और लफ़त्तू थारे ही बिगाड़्योड़ हैं सारे| मुझ एकलव्य के द्रोणाचार्य सो ताऊ थम, थारे ब्लॉग की वजह से ही इस जगत से नाता जुड़या है आपना, आभार|
    राम राम|

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  12. उस दिन कार्तिक पूर्णिमा, बुद्ध पूर्णिमा, गुरू नानक जन्म दिवस, गंगा दशहरा कई त्यौहारों की छुट्टी थी। देख लो जी कित्ती नाईंसाफ़ी है सरकार की, चालाकी भी कह सकते हैं कि सिर्फ़ एक छूट्टी में इतने त्यौहार और कम से कम तीन धर्म निबटा देती है।

    @ ऐसा संभव तो नहीं, सभी अलग-अलग दिनों में पड़ते हैं, केवल कार्तिक पूर्णिमा और नानक जयन्ती ही एक दिन पड़ते हैं. या फिर आप क्या सोचकर कह रहे हैं फिलहाल समझ नहीं पाया.

    — एक बेहतरीन पोस्ट

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  13. गज़ब का मिडास टच है। अपराधी को छू दें तो अपराध उड़नछू हो जाये। यह संयोग मात्र है,हृदय पर न लें।

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  14. @ प्रतुल जी:

    प्रतुल जी,
    सबसे पहले धन्यवाद लें, इतनी एकाग्रता से और बारीकी से मुझे पढ़ने के लिये। सहमत हूं कि मुझसे भूल हो गई। कार्तिक पूर्णिमा और गुरू नानक देव का जन्मदिवस एकसाथ पड़ता है, ये तो तय है। इस पवित्र दिन गंगा स्नान का भी बहुत महत्व है और स्थानीय लोगों में यह गंगा द्शहरा के नाम से प्रसिद्ध भी है। हालांकि मेरे एक ग्रामीण मित्र से यही शंका मैं भी एक बार प्रकट कर चुका हूँ, जवाब में कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, सिर्फ़ यही सुना कि भाई हम लोगों में तो मतलब काम से है, गंगा दशहरा कह लें या कुछ और। और आज मैं खुद ही यह लिख बैठा। बुद्ध से संबंधित भी कोई महत्वपूर्ण दिन इसी दिन मनाया जाता है, ऐसा मुझे अब भी लगता है, हालांकि निश्चिंत नहीं हूं। फ़िर भी त्रुटि तो है ही, सुधार करवाने के लिये हॄदय से आभारी।

    @ प्रवीण पाण्डेय जी:
    ठीक है जी, नहीं लेंगे। आभार।

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  15. एक साँस में कभी अच्छा शरबत नहीं पीना चाहिए.... क्यूंकि फिर आप स्वाद नहीं बता पाते...सिर्फ कहते हैं बेहतरीन!!!!

    कुछ चुनने के लिए जबरदस्ती नहीं कर सकता...सिर्फ कहूँगा, टचवुड सर जी...यूँ ही लिखते रहे.

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  16. ऊंची बात कह दी भाई जी ने। बधाई!

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  17. @ Avinash Chandra:
    अविनाश, तुम तो शब्दों के जादूगर हो भाई, कमेंट में भी वही जादू झलका देते हो जो तुम्हारी कविताओं में। अच्छा लगता है जब तुम कहते हो कि अच्छा लगा।

    @ अनूप शुक्ल जी:
    हम और धन्य हो गये प्रभुवर, आपके पधारने से। ऊंची बात कौन से भाई जी ने कह दी, सरजी खुल कर नहीं बताया।
    आभारी हूं कि आपने पढ़ा।

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  18. पहले तीन पैराग्राफ पढ़कर हम बहुत सीरियस थे. उसके बाद जो भी पढ़ा, अभी तक हंसी बंद नहीं हुई.

    हम आपकी इसी कला के तो फैन हैं. कहाँ से चलते हैं और कहाँ पहुँच जायेंगे, ये फत्तू भी नहीं बता सकता.

    बहुत बढ़िया पोस्ट...बहुत हँसे आज हम.

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  19. जीईइईईईईईईईईईईईस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्सा आग्या।

    राम-राम जी

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  20. मै तो उचित दूरी से ही सम्बन्ध रखून्गा .

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  21. @ शिव कुमार मिश्र जी:
    शिव भैया, जर्रानवाजी है आपकी, झेल लेते हैं मुझे। आप जैसे व्यंग्यकार के कमेंट्स संजीवनी समान लगते हैं।

    @ अन्तर सोहिल:
    अमित जी, अब फ़त्तू का कोई किस्सा आप की तरफ़ से आये तो मजा आये।


    @ धीरू सिंह जी:
    सावधानी में ही बचाव है जी, ट्रकों के पीछे भी लिखा ही रहता है, ’keep distance.'

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  22. संस्मरण इतने रोचक हैं कि एक बार पढ़ना शुरू किया तो खतम कर के ही चैन आता है.
    अच्छा, बहुत अच्छा लिख लिख रहे हैं ..बधाई.

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  23. अभी तक आप के बताए ब्लॉग ही पढ़ रहा था. आपकी पसंद अच्छी है.

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  24. भारी दुविधा है | जब आपकी सेवा और प्यार इतना खतरनाक है तो आपकी दुश्मनी और नाराजी कितनी खतरनाक होगी !

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  25. सारे कमेंट्स विशेषकर अंशुमाला जी के कमेंट्स भी लेख की तरह बहुत ही मस्त लगे. लेकिन मुझे एक बात सोचने पर मजबूर कर रही है. आपने जिन लोगो की सेवा की या ब्लॉग जगत में जिन को फोलो किया वो इनक्टिव हो गए में ये सोचने पर मजबूर है की जो ४३ आप को फोलो कर रहे है उनका क्या होगा ?

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  26. @ देवेन्द्र जी:
    सब अच्छा ही अच्छा बताने के लिये बहुत धन्यवाद जी। आप अच्छा लेखने के अलावा दूसरों की तारीफ़ बहुत अच्छे से करते हैं जी। अच्छा लगा जी कि जो हमें अच्छा लगा वो आपको भी अच्छा लगा। हा हा हा।
    सच में आभार आपका।

    @ हेम पाण्डेय जी:
    कोई दुविधा नहीं है सरजी इस बात की, अपन किसी से नाराज होते ही नहीं और होते भी हैं तो रास्ता बदल लेते हैं बस्स। सबको अपनी राय रखने का हक है। हमारी नाराजगी से घबराकर कमेंट तो नहीं किया आपने? :))

    @ भावेश जी:
    सर, आप कभी कभी आते हैं लेकिन आपके कमेंट्स भी क्वालिटी कमेंट्स होते हैं, और आप लोग विदेश में रहकर भी इस देश की जो फ़िक्र करते हैं, हमें अदा जी, समीर सर, अनुराग सर,दीपक मशाल और आप जैसे भारतीयों पर गर्व है।
    धन्यवाद आपका।
    बाकी हमारी तो दुआओं में अगर असर होगा तो सबका अच्छा ही अच्छा होगा।

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  27. संजय जी में तो आपके टच करने से ही एक्टिव रहूँगा... so always keep in touch

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